LLB Hindu Law Part 2 Vivah Post 4 Book Notes Study Material PDF Free Download

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औचित्यपूर्ण कारण LLB Hindu Law Notes

दाम्पत्य-अधिकार की पुनर्स्थापना की कोई भी याचिका तब तक सफल नहीं होती जब तक यह न प्रदर्शित किया जाय कि साथ न रहने के आधार युक्तियुक्त नहीं हैं। यदि न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि अलग रहने के कारण उचित एवं युक्तियुक्त हैं तो याचिका खारिज कर दी जाती है। जहाँ पति ने पत्नी के विरुद्ध चारित्रिक दोष का आरोप लगाया हो, अथवा वह पत्नी को व्यभिचारिणी अथवा वेश्या कहकर मानसिक उत्पीड़न देता रहा हो तो वहाँ पत्नी को अलग रहने का युक्तियुक्त एवं पर्याप्त कारण है जिसके आधार पर पति के दाम्पत्य-अधिकार की पुनर्स्थापन याचिका खारिज कर दी जायेगी। इस प्रकार याची की क्रूरता का आचरण भी उसके दाम्पत्य-अधिकार के पुनर्स्थापन की याचिका को खारिज करा देगा। इस विषय पर प्रमिलावाला बारिक बनाम रवीन्द्रनाथ बारिक का वाद महत्वपूर्ण है। इसमें पत्नी द्वारा ससुर के घर रहने पर उसकी सास उसके साथ दुर्व्यवहार करती थी तथा उसका वहाँ रहना अत्यन्त दु:खद हो गया था। उसने अपने पुत्र अर्थात् उसके पति का मस्तिष्क पत्नी के प्रति विषाक्त कर दिया था जिससे पति भी खिचा-खिचा रहने लगा। पत्नी अपने मायके चली गई और वहाँ रहने लगी। पति द्वारा धारा 9 के अधीन वाद लाये जाने पर पत्नी ने क्रूरता का अभिवचन लिया और यह प्रतिवाद किया कि पति के बाहर रहने की दशा में, सास द्वारा अत्यन्त दुर्व्यवहारपूर्ण आचरण किया जाना क्रूरता की ऐसी दशा है जिससे याचिका खारिज कर दी जायेगी। जहाँ पति-पत्नी में अलग रहने का समझौता हो गया है वहाँ ऐसा समझौता अलग रहने का युक्तियुक्त कारण नहीं होता और यदि कोई पक्षकार दाम्पत्य-अधिकार की पुनर्स्थापना की याचिका लाता है, तो वह याचिका सफल होगी।

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___ एन० आर० राधाकृष्णन् बनाम एन० धनलक्ष्मी के वाद में मद्रास हाईकोर्ट ने यह कहा कि पति द्वारा पत्नी को साथ रखने की याचना किया जाना पूर्ण अधिकार नहीं है। यदि पत्नी एक अच्छी नौकरी में हो, किन्तु पति से दूर रहती हो तो उस स्थिति में पत्नी का अलग रहना एक युक्तियुक्त कारण होगा और पति का दाम्पत्य-अधिकार पुनर्स्थापना-सम्बन्धी प्रार्थनापत्र खारिज कर दिया जायगा। मिरचू लाल बनाम श्रीमती

1. पावेल बनाम पावेल, 92 एल० जे० 61

2. साराह अब्राहम बनाम पाइली अब्राहम, ए० आई० आर० 1951 केरल 751

3. शकुन्तला बाई बनाम बाबूराव, 1963 म०प्र० 10; देखिए तुलसा बनाम पन्ना लाल, 1963 म० प्र.51

4. मु० गुरुदेव बनाम सावन सिंह, 1965 पंजाब 1691

5. प्रेमी बनाम दयाराम, 1965 हिमा० प्र० 15; कुसुमलता बनाम कामता प्रसाद, 1965 इला० 2801

6. विजय दा बनाम श्रीमती आलोक दा, 1969 कल० 477; देखिए श्रीमती सुमन बाई बनाम आनन्द राव, ए० आई० आर० 1976 बा० 2121

7. ए० आई० आर० 1977 उड़ीसा 1321

8. तिरुमल नायडू बनाम राजम्मल, 1968 मद्रास 2011

9. ए० आई० आर० 1957 मद्रास 337; देखिए प्रवीनाबेन बनाम सुरेशभाई, ए० आई० आर० 1975 गुज०691

देवी बाई के बाद में पत्नी विवाह के समय दूसरी जगह नौकरी कर रही थी, किन्तु समय-समय पर पति के पास चली आती थी और वहाँ रुकती थी। बाद में पत्नी ने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पति के साथ रहने लगी। कुछ समय बाद पत्नी ने पुन: कहीं बाहर नौकरी ढूँढ़ ली और यह कहा कि छुट्टियों में वह पति के घर जाकर उसके साथ रहेगी और पति को भी इस बात की अनुमति दे देगी की वह भी अपनी इच्छानुसार उसके निवास स्थान पर आ सकता है और साथ-साथ रह सकता है। इर प्रकार पत्नी द्वारा अलग नौकरी करने पर पति ने धारा 9 के अन्तर्गत याचिका दायर कर दिया। किन्तु न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी और यह कहा कि इस मामले में यह नहीं कहा जा सकता कि पत्नी पति के बिना युक्तियुक्त कारण से अलग रह रही है।

इस विषय पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने श्रीमती स्वराज बनाम के० एम० गर्ग के एक रोचक एवं महत्वपूर्ण मामले का निर्णय किया है। पति तथा पत्नी दोनों के वैवाहिक आशय के विषय पर पंजाब उच्च न्यायालय की पूर्णपीठ द्वारा निर्णीत श्रीमती कैलाशवती के वाद’ में दिये गये निर्णय को स्वीकार न करते हुए दिल्ली न्यायालय ने उसके विरोध में अपना मत व्यक्त किया। इस उपर्युक्त मामले में पति एवं पत्नी दोनों नौकरी करते थे। पत्नी तथा पति दोनों उच्च शिक्षा प्राप्त थे किन्तु पत्नी अभागे पति से अच्छी नौकरी में थी जबकि पति विदेशी उपाधियों से युक्त था। पत्नी ने पति की इस प्रस्तावना पर कि वह आकर उसके साथ रहे यह कहा कि वह स्वयं आकर उसके साथ रहे। इस बात को लेकर दोनों में अनबन हो गई। पति ने अन्त में पत्नी के विरुद्ध दाम्पत्य-अधिकार-पुनर्स्थापना सम्बन्धी प्रार्थना-पत्र दायर कर दिया। न्यायालय ने प्रार्थनापत्र को खारिज कर दिया और यह कहा कि पत्नी के अलग रहने का पर्याप्त कारण था। वह अच्छी नौकरी में थी जब कि पति उससे निम्नस्तरीय नौकरी करता था, अतएव पत्नी पति के साथ रहने के लिए बाध्य नहीं थी।

न्यायालय ने उपर्युक्त मत्त की पुष्टि में कुछ अत्यधिक विवादपूर्ण तर्कों को प्रस्तुत किया है जिनमें न केवल पंजाब उच्च न्यायालय की दलील का खंडन किया गया वरन् सामान्यत: न स्वीकार किये जाने वाली मान्यताओं को समर्थन दिया गया। न्यायालय ने यह संप्रेक्षित किया कि पति-पत्नी को समान अधिकार प्राप्त है। यदि विवाह के समय उन दोनों ने अपने वैवाहिक आवास के विषय में कोई समझौता नहीं किये हैं तो दोनों एक-दूसरे को अपने साथ रहने के लिए समानता के सिद्धान्त के अनुसार बाध्य कर सकते हैं। इसमें पति को कोई विशेषाधिकार नहीं प्राप्त है कि वह पत्नी को अपने साथ रहने के लिए बाध्य करे, विशेषकर जब कि पत्नी एक अच्छी नौकरी में है। इस सम्बन्ध में पूर्वविधि में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो गया है क्योंकि पत्नी की सामाजिक प्रास्थिति काफी बदल गई है।

श्रीमती अलका भाष्कर बनाम सच्चिदानन्द के मामले में बम्बई उच्च न्यायालय ने पुन: उपर्युक्त मत का समर्थन किया और यह कहा कि यह आवश्यक नहीं है कि पति का घर अथवा उसके माता-पिता का घर ही वैवाहिक घर माना जाय। यदि पति-पत्नी दोनों अच्छी नौकरी अलग-अलग कर रहे हों किन्तु कोई फ्लैट साथ-साथ अपने-अपने आय से लेने का अनुबन्ध कर चुके हैं तो वही फ्लैट इन पक्षकारों का वैवाहिक घर समझा जायेगा। प्रस्तुत मामले में पति-पत्नी अलग-अलग नौकरी करते थे। पति ने यह इच्छा व्यक्त की कि पत्नी नौकरी छोड़ दे जिसको उसने अस्वीकार कर दिया। पति ने इस बात पर पत्नी के विरुद्ध कुछ मिथ्यारोप लगाये जिससे उसने पति के साथ रहना एकदम छोड़ दिया। पति ने अभित्याग के आधार पर विवाह-विच्छेद की याचिका दायर की। पत्नी इस बात पर पति को स्वीकार करने के लिए तैयार थी कि पति अपने आचरण तथा मिथ्यारोप पर क्षोभ व्यक्त करे, किन्तु पति उसके लिए तैयार नहीं था तथा वह उन मिथ्यारोपों पर दृढ़ रहा। यदि पत्नी ‘इन परिस्थितियों में पति के साथ सहवास नहीं करती तो उसके अलग रहने का यह एक उचित आधार है।

इसी प्रकार करनाल सिंह अमर बनाम श्रीमती भूपिन्दर कौर के वाद में जहाँ पति अपनी पत्नी को शारीरिक ताड़ना देता था, खौलते पानी से उसका हाथ जला दिया और उसके विरुद्ध

1. ए० आई० आर० 1977 राज० 1131

2. ए० आई० आर० 1978 दि० 2961

3. 1977 हिन्दू एल० आर० 1751

4. ए० आई० आर० 1991 बा० 1641

5. ए० आई० आर० 1977 पं० तथा हरि० 191

चरित्र-दोष का गम्भीर आरोप लगाया और इस प्रकार मानसिक यातना दी। न्यायालय ने निरूपित किया कि पत्नी ने ठीक ही पति से मक्ति ले ली और वह उसका घर छोड़कर अपने माता-पिता के पर सुरक्षित रहने लगी। ऐसी स्थिति में पति द्वारा लायी गई दाम्पत्य जीवन के अधिकार की पुनर्स्थापना की। याचिका खारिज कर दी गई। श्रीमती सत्यादेवी बनाम अजायब सिंह के मामले में न्यायालय ने याची का याचिका में इस आधार पर आज्ञप्ति दे दी कि पत्नी के पास कोई गम्भीर तथा भारी कारण नहीं। था जिसके आधार पर याचिका खारिज की जा सकती है। इस मामले में पत्नी के काली होने के कारण पति उससे खिचा-खिचा रहता था। उसका व्यवहार पत्नी के साथ अच्छा नहीं था और वह दूसरी शादी करना चाहता था। पति के दुर्व्यवहार के कारण वह पिता के घर चली गई। बाद में पंचों के बीच-बचाव से दोनों के सम्बन्ध ठीक हो गये और वह पति के साथ रहने लगी। कुछ समय बाद वह पिता के घर चली गई और पति के घर न आने का कारण पति का दुर्व्यवहार बताने लगी। पति ने तब धारा 9 में याचिका दायर किया। अभिवचन में पत्नी ने यह कहा कि पति का व्यवहार ठीक नहीं है, वह क्रूरतापूर्ण व्यवहार करता है। न्यायालय ने कहा कि जो दुर्व्यवहार या क्रूरता बतायी जाती है, वह पुनर्स्थापन की आज्ञप्ति खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यहाँ युक्तियुक्त कारण एवं औचित्य का प्रयोग गम्भीर कारणों के अर्थ में किया गया है।

केरल उच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार पति के द्वारा दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना सम्बन्धी दायर की गयी याचिका को खारिज करने के लिये पत्नी के ऊपर यह दबाव नहीं डाला जा सकता कि वह साबित करे कि उसको शारीरक ताड़ना दी जाती रही है। यदि उसको मानसिक संताप दिया जाता रहा है तो भी धारा 9 के अन्तर्गत दायर की गयी याचिका खारिज की जा सकती है।

कलकत्ता उच्च न्यायालय के अनुसार जहाँ धारा 9 के अन्तर्गत कोई याचिका न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गई हो वहाँ ऐसे मामले में पक्षकारों के द्वारा विवाह अधिनियम की धारा 13 के अन्तर्गत संशोधन आवेदन-पत्र के माध्यम से विवाह-विच्छेद के आधार के अन्तर्गत इसमें कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता और न ही अन्य कोई आधार को वाद के संशोधन के द्वारा जोड़ा जा सकता है।’

हरदीप सिंह बनाम श्रीमती दलीप कौर के वाद में पंजाब हाईकोर्ट ने यह निर्णय दिया कि जहाँ पति ने इस आग्रह को, कि वह अपने पिता-माता से अलग घर बना कर रहे, अस्वीकृत कर दिया जाता था, वहाँ पत्नी का इस बात से असंतुष्ट होकर पति से अलग रहने का कोई वैध कारण नहीं उत्पन्न हो जाता और इस आधार पर पति के दाम्पत्य अधिकार की पुनर्स्थापना की याचिका का विरोध नहीं कर सकती और पृथक् आवास का दावा कर सकती है। पति के दाम्पत्य-अधिकार की पुनर्स्थापना की आज्ञप्ति उसी दशा में सफल होगी जबकि पत्नी को अलग रहने के युक्तियुक्त कारण नहीं हैं।

उदाहरण के लिये, यदि वृद्ध माता-पिता का साथ रहना पति-पत्नी के सुख एवं सहवास में बाधा उत्पन्न करता हो अथवा श्वसुर का व्यवहार पुत्रवधू के प्रति ठीक नहीं हो। जहाँ पत्नी को इस बात का भय हो कि नौकरी कर लेने पर उसके पति का व्यवहार उसके प्रति क्ररतापर्ण हो जायेगा और । इसी भय के कारण वह अलग रहती है और दहेज की माँग का मिथ्या आरोप लगाती है वहाँ उसके अलग रहने का औचित्यपूर्ण कारण नहीं माना गया।

रवीन्द्र नाथ बारिक बनाम श्रीमती प्रमिला बाला बारिक के वाद में पति द्वारा धारा 9 के अन्तर्गत याचिका दायर किये जाने पर पत्नी ने अभिवचन में यह कहा कि पति का पिता उसको प्रायः

1. ए० आई० आर० 1973 राज० 201

2. एस० जय कुमारी बनाम एस० कृष्णन नायर, ए० आई० आर० 1995 केरल 1391

3. रीमा बजाज बनाम सचिन बजाज, ए० आई० आर० 2012 राजस्थान 81

4. 1970 पंजाब 2841

5. ए० आई० आर० 1974 केरल 1241

6. दीपा बनाम दिनेश चन्द्र, ए० आई० आर० 1993 इलाहाबाद 2441

7. ए० आई० आर० 1979 उड़ीसा 851

परेशान करता है तथा यातनापूर्ण व्यवहार करता है। अतएव पति द्वारा दायर की गई याचिका खारिज कर दी जानी चाहिये। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि पत्नी की शिकायत पति के विरुद्ध नहीं वरन् उसके पिता के विरुद्ध थी जिसके कारण वह पति के साथ नहीं रहना चाहती। फिर भी न्यायालय ने पति की याचिका खारिज कर दी और यह अभिनिर्धारित किया कि पत्नी का पति से अलग रहना युक्तियुक्त

श्रीमती मंजुला जावेरी लाला बनाम जावेरी लाल विट्ठलदास के वाद में पति-पत्नी विवाह के बाद पत्नी के पिता-माता के साथ रहे। कालेज खुलने पर पति, जो कि एक प्रोफेसर था, कालज। की सेवा में चला गया, किन्तु पत्नी के स्वास्थ्य ठीक न होने के आधार पर उसके साथ नहीं गई और फिर दोनों एक-दूसरे के साथ नहीं रहे। पति-पत्नी को पत्र लिखता रहा और इस बात के लिए आग्रह करता रहा कि वह साथ-साथ रहे किन्तु पत्नी ने इस आग्रह की अवहेलना की। वह इस आधार पर और अधिक हठी होती गई कि पत्र में लिखी गई बातों से उसके मस्तिष्क को आघात पहँचा है, क्योंकि उन बातों से उसके चरित्र के ऊपर आक्षेप आता है। न्यायालय ने पति की याचिका को स्वीकार कर लिया और यह कहा कि पत्र में लिखी गई बातों से उसे किसी प्रकार की क्षति नहीं हुई है। उसे अलग रहने के लिए कोई यक्तियुक्त कारण नहीं था, अत: उसकी अपील खारिज कर दी गई।

श्रीमती शान्ता बनर्जी बनाम सुशान्त कुमार बनर्जी,2 के वाद में यह निरुपित किया गया कि इस धारा के अन्तर्गत अनुतोष उसी दशा में प्रदान किया जायेगा, जब न्यायालय पूर्ण रूप से सन्तुष्ट हो जाये कि विवाह का दूसरा पक्षकार बिना किसी कारण के अलग हो गया है। उपरोक्त वाद में पति-पत्नी के बीच आपसी वैचारिक मतभेद था। पत्नी का आचरण हमेशा अपने पति के प्रति क्रूरतापूर्ण रहता था, यदि ऐसी स्थिति में पति अपनी पत्नी के आचरण को क्षमा करते हुए उसको अपने साथ रखना चाहता है और पत्नी उसके बावजूद भी साथ नहीं रहना चाहती, तो इस स्थिति में पति धारा 9 की उपधारा (1) के अन्तर्गत दाम्पत्य जीवन की पुनर्स्थापना सम्बन्धी उपचार पाने का हकदार होगा।

अन्ना साहब बनाम ताराबाई के वाद में यह निरूपित किया गया कि धारा 9 की उपधारा (1) के अनुसार अनुतोष उसी दशा में प्रदान किया जायेगा, जब न्यायालय इस बात से सन्तुष्ट हो जायेगा कि विवाह का दूसरा पक्षकार बिना किसी युक्तियुक्त कारण के अलग हो गया है। युक्तियुक्त कारण की व्याख्या कहीं नहीं की गई है। विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 के अन्तर्गत युक्तियुक्त कारण को प्रभावित करने का भार उस व्यक्ति पर दिया गया है जो स्वयं विवाह के दूसरे पक्षकार से अलग रहा है। इस अधिनियम के अन्तर्गत धारा 9 की उपधारा (2) को हटा दिया गया है क्योंकि उपधारा (1) के अधीन ‘युक्तियुक्त कारण’ के बिना शब्दों का प्रयोग किया गया है जिसकी विशद् व्याख्या में उपधारा (2) की सभी बातें सम्मिलित हैं, इसीलिए इस उपधारा की आवश्यकता ही नहीं रह गई थी। उपधारा (2) के होने से ‘युक्तियुक्त कारण’ पद जो उपधारा (1) में प्रयुक्त है, अत्यन्त विवादास्पद हो गया था और उसकी व्याख्या के सम्बन्ध में उच्च न्यायालयों में मत-वैभिन्य उत्पन्न हो गया था। परिणामत: 1976 के संशोधन अधिनियम में उसे हटा दिया गया है। धारा 9 के अधीन याचिका की सफलता के लिए याची को सद्भावयुक्त होना चाहिये। यदि याचिका सद्भाव से नहीं दायर की गई है अथवा किसी दुर्भाव से, दूर के उद्देश्य से दायर की गयी है तो याचिका खारिज

1. ए० आई० आर० 1975 गुज० 1581

2. ए० आई० आर०2012 कल० पृ० 161

3. ए० आई० आर० 1970 म०प्र० 36 (इस वाद में याची ने पत्नी के विरुद्ध दाम्पत्य जीवन की पुनर्स्थापना के हेतु याचिका प्रस्तुत की। न्यायालय के अनुसार पत्नी के अनेक अभिवचनों में यह अभिवचन कि पति उसकी इच्छा के विरुद्ध उसको साथ ले जाता है, वह पति के साथ नहीं जाना चाहती, क्योंकि वह उसको नहीं चाहती आदि बातें पत्नी के अलग रहने के युक्तियुक्त कारण नहीं बनाते।)

कर दी जायेगी। जहाँ विवाह का कोई पक्षकार कुछ समय के लिए दूसरे पक्षकार से अलग हो गया है जब कि अलग रहने का उसका स्थायी एवं निश्चित भाव नहीं है तो वह धारा 9 के अर्थ में अलग रहना नहीं माना जायेगा।

दाम्पत्य अधिकार के सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय ने आंध प्रदेश द्वारा टी० सीधा बनाम वेंकट सुब्बाया में दिये गये निर्णय को उलट दिया यह ज्ञातव्य है कि सरीथा बनाम वेंकट मुलाया के मामले में न्यायालय ने यह कहा था कि धारा 9 में दी गई दाम्पत्य जीवन की पुनस्र्थापना सम्बन्धी उपचार एक जंगलीपन तथा बर्बरता से भरा हआ उपचार है जो संविधान के अनुच्छेद 21 मे दिये गये व्यक्तिगत स्वतन्त्रता तथा मानवीय गरिमा के उल्लंघन में है। अतः धाराको शून्य एवं निष्यभ करार कर दिया। न्यायाधीश के अनुसार, दाम्पत्य अधिकार की पुनस्र्थापन की डिकी संवैधानिक तौर पर व्यक्तिगत प्राइवेसी के अधिकार का सबसे बुरा उल्लंघन है। यह किसी नारी को अपने शरीर को कर और किससे एक बच्चे का जन्म देने का साधन बनाया जाता है, उसके इस बात पर निर्णय लेने की स्वतन्त्रता पर अनावश्यक नियंत्रण आरोपित करता है। उसका अपने शरीर के विभिन्न अंगों को स्पर्श न किये जाने के अधिकार से वंचित करता है, क्योंकि यह प्रत्येक स्त्री की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता है कि वह यह तय करे कि किस व्यक्ति से और कब वह अपने शरीर के अवयवों का स्पर्श करायेगी। न्यायाधीश के अनुसार इस प्रकार धारा 9 के अधीन डिक्री से प्राइवेसी के व्यक्तिगत अधिकार पर कुठाराघात करना होगा। इस निर्णय में दी गई विधि प्रतिपादना को उच्चतम न्यायालय ने सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार में उलट दिया और दिल्ली उच्चतम न्यायालय द्वारा हरविन्दर कौर बनाम हरमन्दर सिंह चौधरी में दिये गये विचार का पुष्टीकरण किया। न्यायालय के अनुसार दाम्पत्य अधिकारी की पुनर्स्थापना सम्बन्धी उपचार विवाह के पक्षकारों को एक-दूसरे के सन्निकट लाता है तथा उनके आपसी मतभेद को दूर करने में सहायक होता है जिससे वे सद्भाव से रह सके। इसका उद्देश्य विवाह जैसी संस्था को सुरक्षित रखना है। टी० सरीथा के मामले में न्यायाधीश के मस्तिष्क में दाम्पत्य सम्बन्ध का तात्पर्य केवल लैगिक संभोग से है। किन्तु यह सही दृष्टिकोण नहीं था। न्यायालय लैगिक सम्भोग को बाध्यकर नहीं करता और न ही कर सकता है। सम्भोग वैवाहिक जीवन का एक अंग है किन्तु सभी कुछ नहीं है और न ही विवाह के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को गौण बना देता है। यह उपचार सहवास तथा सद्भाव से रहने की प्रवृत्ति को प्रेरित करता है। सम्भोग भी उसका एक प्रयोजन हो सकता है। यह कहना उचित नहीं है कि दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना वैवाहिक पवित्रता पर सरकार का घोर आघात है। उच्चतम न्यायालय ने उपर्युक्त मामले में यह संप्रेक्षित किया कि भारत में पति-पत्नी का एक दूसरे के साथ रहने का अधिकार किसी परिनियम की ही देन नहीं है बल्कि विवाह-जैसी अवधारणा में अन्तर्निहित है। धारा 9 के ही अन्तर्गत इसको किसी अत्याचार का माध्यम होने से बचाने का रक्षोपाय प्रदान कर दिया गया है। अत: धारा 9 में दिया गया प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं करता।

इस वाद में पत्नी ने दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिये याचिका दायर की। विवाह के दो वर्ष बाद उसके पति ने उसे घर से बाहर निकाल दिया। उसका कथन था कि पति तथा उसके घर वालों का व्यवहार शुरू से ठीक नहीं था। पति ने इन सभी कथनों का खण्डन किया। किन्तु पति की इच्छा पर उसकी स्वीकृति से आज्ञप्ति पास कर दी गई। पत्नी का कहना है कि वह आज्ञप्ति पास हो जाने के बाद दो दिन तक पति के साथ रही, फिर बाद में पति के दुर्व्यवहार के कारण वापस आ

1. श्रीमती सुशीला कुमारी बनाम प्रेम कुमार, ए० आई० आर० 1976 दि० 3211

2. ए० आई० आर० 1983 आंध्र प्रदेश 3561

3. सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार, ए० आई० आर० 1984 एस० सी० 15621

4. ए० आई० आर० 1984 एस० सी० 15621

5. ए० आई० आर० 1984 दिल्ली 661

6. ए० आई० आर० 1984 एस० सी० 15621

गई। एक वर्ष बीतने पर पति ने धारा 13 के अधीन इस आधार पर विवाह-विच्छेद की याचिका दायर कर दी कि धारा 9 के अन्तर्गत आज्ञप्ति पास हो जाने के बाद एक वर्ष तक आज्ञप्ति का पालन नहीं हुआ जबकि पत्नी ने इसका विरोध यह कहते हुए किया कि वह दो दिन तक साथ रही और बाद में भी, फिर घर के बाहर निकाल दी गई। उच्च न्यायालय के स्तर पर पत्नी का अभिकथन गलत सिद्ध हुआ। अत: विवाह-विच्छेद की डिक्री पास हो गई। इसी निर्णय के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील की गई। अपील में यह कहा गया कि पति स्वयं दोषी था। उसने जानबूझ कर धारा 9 की आज्ञप्ति नहीं पूरी की जिससे धारा 13 के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद की याचिका दायर कर सके। अपाल म न्यायालय का ध्यान इस बात की ओर भी आकृष्ट किया गया कि दाम्पत्य अधिकारों की पुनस्थापना का प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 तथा अनुच्छेद 21 में दिये गये अधिकारों का उल्लंघन करता है। यह एक कठोर, बर्बरतापूर्ण तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का ह्रास करने वाला प्रावधान है। उच्चतम न्यायालय ने इसको स्वीकार नहीं किया और उसकी अपील खारिज कर दी। राजेश कुमार उपाध्याय बनाम न्यायाधीश कुटुम्ब न्यायालय, वाराणसी के वाद में पत्नी ने पति के बेरोजगार रहने के आधार पर विवाह-विच्छेद की एक याचिका दायर किया जिसमें इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह आदेश अभिनिर्धारित किया कि पत्नी द्वारा की गयी विवाह-विच्छेद की याचिका का आधार पूर्णतः गलत है अत: न्यायालय ने पत्नी की याचिका को निरस्त करते हुए धारा 9 के अन्तर्गत दाम्पत्य जीवन के पुनस्र्थापना का आदेश पारित किया। इसी सन्दर्भ में उच्चतम न्यायालय ने टी० श्रीनिवास बनाम टी० वासलक्ष्मी के वाद में भी, दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के सम्बन्ध में यह सम्प्रेक्षित किया कि जहां पत्नी अपने पति के साथ दाम्पत्य पुनर्स्थापना की इच्छा रखती है, लेकिन पति इसके बावजूद भी उससे अपनी दूरी रखे तथा उसे (पत्नी) कभी भी अपने निवास स्थान पर रहने की इजाजत नहीं दिया तो ऐसी स्थिति को न्यायालय ने अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण बताया और पति के द्वारा विवाह-विच्छेद की याचिका को निरस्त करते हुये दाम्पत्य पुनर्स्थापना का आदेश पारित किया। धारा 9 के अन्तर्गत यदि आज्ञप्ति का पालन नहीं हुआ है तो एक वर्ष के बाद विवाह का कोई पक्षकार विवाह-विच्छेद की याचिका दायर करने का अधिकारी हो जाता है।

वारालक्ष्मी चरक बनाम सत्य नारायण चरक के बाद में दाम्पत्य अधिकार के सम्बन्ध में आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा यह निर्णीत किया गया कि जहाँ पर पक्षकारों के बीच दाम्पत्य अधिकार का पुनर्स्थापन आदेश की वजह से सम्बन्ध विखण्डित हो चुका हो और पक्षकारों के बीच किसी भी प्रकार की कोई सम्भावना न बनती हो वहाँ ऐसी स्थिति में पत्नी को दाम्पत्य सम्बन्धों के निष्क्रिय स्थिति में, पति के साथ रहने के लिये उसे बाध्य नहीं किया जा सकता।

पी० लेवन्या बनाम पी० दिनेश राव, के वाद में पुनः आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि जहाँ पति ने किसी विशिष्ट कारण के बगैर पत्नी को स्वीकार करने से मना कर दिया हो वहाँ ऐसी स्थिति में दाम्पत्य अधिकारों का पुनर्स्थापन आदेश न्यायालय के द्वारा दिया जा सकता है।

न्यायिक पृथक्करण-अधिनियम की धारा 10 में न्यायिक पृथक्करण का अनुतोष कुछ निश्चित परिस्थितियों में प्रदान किया गया है।

पृथक्करण की यह व्यवस्था हिन्दू विवाह अधिनियम के लागू होने के पूर्व के विवाहों और अधिनियम के पारित होने के बाद के विवाहों पर समान रूप से लागू होती है। यह अनुतोष विवाह के दोनों पक्षकारों को प्राप्त है, अर्थात् पति-पत्नी दोनों इसके लिये याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं।

1. ए० आई० आर० 1998 इलाहाबाद पृ० 3511

2. एस० सी०सी० 1998 (3) पृ० 1121

3. ए० आई० आर० 2008 आ० प्र० 1351

4. ए० आई० आर० 2013 ए० पी० 116.

जिला न्यायालय द्वारा ऐसे विवाहों को न्यायिक पृथक्करण की दशा में स्वीकृत किया जायगा. यदि याची धारा 10 की उपधाराओं के उपखंडों में से किसी भी एक शर्त को पूरा करता है। विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 के अधीन न्यायिक पृथक्करण तथा विवाह-विच्छेद के आधार अब एक समान हो गये हैं। उन्हीं आधारों पर दोनों अनुतोषों में किसी एक को प्राप्त किया जा सकता है। संशोधन अधिनियम, 1976 में न्यायिक पृथक्करण के आधार और अधिक संख्या में हो गये हैं। अब न्यायिक पृथक्करण के आधार निम्नलिखित हैं

(1) जहाँ प्रत्युत्तरदाता ने विवाह के बाद स्वेच्छा से किसी दूसरे व्यक्ति के साथ लैगिक सम्भोग किया है।

(2) क्रूरता (Cruelty)-जब याची के साथ एक दूसरे पक्ष ने क्रूरता का व्यवहार किया है।

(3) अभित्याग (Desertion)-जब याची का दूसरे पक्ष ने दो वर्ष पूर्व तक लगातार अभित्याग किया हो, यह समय याचिका के दायर करने की तिथि से दो वर्ष पूर्व तक माना जायगा (धारा 19-ए)।

(4) कोढ़ (Leprosy)—जब दूसरा पक्ष याचिका दायर करने के एक वर्ष पहले घोर कोढ़ से पीड़ित रहा हो (धारा 10-सी)। (विवाह विधि संशोधन अधिनियम, 1976 के अनुसार)।

(5) रतिजन्य रोग (Venereal disease)-जब दूसरा पक्ष याचिका दायर करने के समय के पूर्व से ऐसे रतिजन्य रोग से पीड़ित रहा हो जो सम्पर्क से दूसरे को भी हो सकता है। (विवाह विधि संशोधन अधिनियम, 1976 के अनुसार)।

(6) मानसिक विकृतता-जब प्रत्युत्तरदाता उपचार से ठीक न होने योग्य मस्तिष्क विकृतता से पीड़ित हो अथवा इस प्रकार की मानसिक अव्यवस्था से लगातार अथवा बार-बार पीड़ित रहा है और इस सीमा तक पीड़ित रहा है कि याची प्रत्युत्तरदाता के साथ युक्तियुक्त ढंग से नहीं रह सकता।

(7) व्याख्या- ‘मानसिक अव्यवस्था’ पद से मानसिक बीमारी, मस्तिष्क का अपूर्ण अथवा प्रभावित विकास, मनौवैज्ञानिक विकृति या व्याधियाँ अथवा इसी प्रकार की मानसिक निर्योग्यता तथा विकृति का सम्बोध होता है। इसके अन्तर्गत सभी मानसिक रोग सम्मिलित हैं।

‘मनोवैज्ञानिक विकृति’ का तात्पर्य लगातार होने वाली एक ऐसी मानसिक अव्यवस्था अथवा मानसिक निर्योग्यता से है जिससे प्रत्युत्तरदाता का असामान्य रूप से उग्र अथवा गम्भीर रूप से अनुत्तरदायित्वपूर्ण आचरण का बोध होता है, चाहे वह उपचार के योग्य हो अथवा न हो।

(8) धर्म-परिवर्तनयदि प्रत्युत्तरदाता धर्म-परिवर्तन द्वारा हिन्दू नहीं रह गया है तो याची इस आधार पर न्यायिक पृथक्करण की आज्ञप्ति प्राप्त कर सकता है।

(9) संसार-परित्याग-विवाह का कोई पक्षकार जब संसार का परित्याग करके संन्यास धारण कर लेता है तो दूसरा पक्षकार न्यायिक पृथक्करण की आज्ञप्ति प्राप्त कर सकता है।

(10) प्रकल्पित मृत्युयदि विवाह के किसी पक्षकार के बारे में सात वर्ष या इससे अधिक समय से उन लोगों के द्वारा इसका जीवित होना नहीं सुना गया है जो उसके विशेष सम्बन्धी हैं और जिन्हें. यदि वह व्यक्ति जीवित होने का ज्ञान होता, तो विवाह के दूसरे पक्षकार को न्यायिक पृथक्करण की आज्ञप्ति प्राप्त करने का आधार प्राप्त हो जाता है।

न्यायिक पृथक्करण की याचिका दायर करने के लिए पत्नी को निम्न अतिरिक्त आधार प्राप्त हैं

(1) पति द्वारा बहुविवाह-पत्नी विवाह-विच्छेद के लिए तलाक की याचिका इस आधार पर भी प्रस्तुत कर सकती है कि पति ने अधिनियम के प्रारम्भ होने के पूर्व पुनः विवाह कर लिया था अथवा विवाह के पूर्व पति द्वारा विवाह की गई कोई पत्नी विवाह के समय जीवित थी। यह आधार तभी लागू होगा जबकि दूसरी पत्नी याचिका प्रस्तुत करने के समय जीवित हो।

(2) पति द्वारा बलात्कार, गुदा-मैथुन अथवा पशुगमन-यदि पति बलात्कार, गुदा-मैथुन अथवा

पशुगमन के अपराध का दोषी हो तो इन आधारों पर पत्नी तलाक की आज्ञप्ति प्राप्त कर सकती है।

(3) जहाँ हिन्दू दत्तकग्रहण तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18 के अधीन अथवा दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 की कार्यवाही के अन्तर्गत पति के विरुद्ध पत्नी के पक्ष में भरण-पोषण के लिए आज्ञप्ति अथवा आदेश पास कर दिया गया है और इस प्रकार की आज्ञप्ति या आदेश पास हो जाने के बाद विवाह के पक्षकारों में सहवास एक वर्ष अथवा और अधिक वर्षों से नहीं हुआ है।

(4) यदि उसका विवाह 15 वर्ष की आय पूरा होने के पूर्व सम्पन्न हआ है और उसने 15 वर्ष की आयु प्राप्त करने के बाद किन्तु 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने के पूर्व विवाह को निराकृत कर दिया है।

सोनदूर गोपाल बनाम सोनदूर रजनी, के वाद में पत्नी ने अपने पति पर न्यायिक पृथक्करण की याचिका प्रस्तुत किया। उपरोक्त वाद में पति अपने नौकरी की तलाश के लिये विदेश गया और विदेश में ही नौकरी के दौरान वहाँ की नागरिकता प्राप्त कर लिया, उसने अपनी पत्नी को कुछ समय पश्चात् भारत वापस भेज दिया तथा वह वहाँ पर निवास करने लगा। पत्नी ने इस आधार पर न्यायिक पृथक्करण का वाद न्यायालय में संस्थित किया। उपरोक्त वाद में पति का यह कथन था कि वह भारत का नागरिक नहीं रह गया है और उसने दूसरे देश की नागरिकता स्वीकार कर ली है इसलिये वह न्यायालय के क्षेत्राधिकार सीमा से बाहर है अर्थात् ऐसे मामले का विचारण भारत के सीमा क्षेत्र के अन्तर्गत नहीं हो सकता। उपरोक्त मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि जहाँ पक्षकार गण के पूर्वज, कुटुम्ब मूलत: भारत के निवासी हों और वह हिन्दू विधि से शासित हो रहे हों वहाँ विवाह का कोई पक्षकार दूसरे देश की नागरिकता प्राप्त कर लेने पर भी न्यायालय के क्षेत्राधिकार के सम्बन्ध में कोई प्रश्न नहीं उठा सकता बल्कि ऐसे मामले का विचारण न्यायालय अपने क्षेत्राधिकार सीमा के अन्तर्गत कर सकता है और वहाँ न्यायालय के द्वारा दिया गया निर्णय पक्षकारों पर बाध्यकारी होगा।

न्यायिक पृथक्करण की विशेषताएँ एवं विवाह-विच्छेद से भिन्नता

न्यायिक पृथक्करण की आज्ञप्ति प्राप्त कर लेने पर याची प्रत्युत्तरदाता के साथ सहवास करने के दायित्व से मुक्त हो जाता है। न्यायिक पृथक्करण से विवाह-सम्बन्ध समाप्त नहीं होता, इसलिए विवाह के पक्षकारों को सहवास पुनर्स्थापित करने से यह धारा नहीं रोकती। कहने का आशय यह है. कि विवाह के पक्षकार आपस में फिर से पति-पत्नी की तरह रह सकते हैं। न्यायिक पृथक्करण की अवधि में पति या पत्नी किसी दूसरे के साथ विवाह नहीं कर सकते और न जारकर्म ही कर सकते हैं। किन्तु यदि कोई पक्ष इस अवधि में दूसरे अन्य व्यक्ति के साथ सम्भोग करता है तो वह तलाक का आधार – बन जायेगा। यदि न्यायिक पृथक्करण से अलग हुए पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ फिर से रहना चाहते हैं तथा अपने वैवाहिक जीवन को पुनर्स्थापित करना चाहते हैं तो विवाह-संस्कारों को फिर से सम्पन्न करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि न्यायिक पृथक्करण के बावजूद भी उनका मूल विवाह अस्तित्व में बना रहता है।

न्यायिक पृथक्करण विवाह-विच्छेद से भिन्न होता है। विवाह-विच्छेद में पति-पत्नी के सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं जबकि न्यायिक पृथक्करण में सम्बन्ध स्थगित हो जाते हैं, समाप्त नहीं होते। विवाह-विच्छेद के बाद पक्षकारों को दूसरा विवाह करने का अधिकार उत्पन्न हो जाता है किन्तु न्यायिक पृथक्करण में इस प्रकार का अधिकार उत्पन्न नहीं होता। न्यायिक पृथक्करण की स्थिति में यदि पति-पत्नी सहवास करते हैं तो उस आशय की आज्ञप्ति निष्प्रभ हो जाती है और वे मूल प्रास्थिति में वापस हो जाते हैं किन्तु विवाह-विच्छेद में यह सम्भव नहीं है।

न्यायिक पृथक्करण की आज्ञप्ति के बाद विवाह के पक्षकार सहवास के दायित्वाधीन नहीं हैं। जहाँ पत्नी ने पति के विरुद्ध न्यायिक पृथक्करण प्राप्त कर लिया है और उसके बाद पति सहवास

  1. ए० आई० आर० 2013 एस० सी० 2679.

नहीं करता, जैसा कि उसके ऊपर इस प्रकार का कोई दायित्व नहीं है, तो पति को दोषी नहीं माना जा सकता और यदि वह पति बाद में एक वर्ष के पश्चात् विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति चाहता है तो अधिनियम की धारा 23 (1) (अ) के अर्थ में यह दोष नहीं माना जायेगा और न यह माना जायेगा कि पति ने अपनी गलती का फायदा उठाया।

उच्चतम न्यायालय के अनुसार न्यायिक पृथक्करण की आज्ञप्ति अनेक अधिकार एवं दायित्वों को जन्म देता है। इससे पति-पत्नी को अलग रहने की न्यायिक अनुमति प्राप्त हो जाती है। किसी पक्षकार को एक दूसरे के सहवास का अधिकार नहीं रहता है। विवाह से उत्पन्न अन्य सभी अधिकार स्थगित हो जाते है। किन्तु न्यायिक पृथक्करण की आज्ञप्ति विवाह को समाप्त नहीं कर देती। इसके द्वारा पारस्परिक समन्वय का तथा सम्मिलन का अवसर प्राप्त हो जाता है तथा पक्षकार यदि चाहे तो अपने जीवनपर्यन्त पति-पत्नी जैसा जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

न्यायिक पृथक्करण की आज्ञप्ति के एक वर्ष पश्चात् तक सहवास पुनः आरम्भ करने की दशा में वह तलाक का आधार बन जाता है।

(1) विवाह के दूसरे पक्षकार का अन्य व्यक्ति के साथ सम्भोगजहाँ प्रत्युत्तरदाता ने विवाह के बाद स्वेच्छा से किसी दूसरे व्यक्ति के साथ लैंगिक सम्भोग किया।

(2) सम्भोग का प्रमाण–निर्णीत वादों को देखने पर यह स्पष्ट होता है कि सम्भोग को प्रमाणित करने के लिए उपधारक तथ्यों पर निर्भर करना पड़ेगा जो इस प्रकार हो सकते हैं

(1) पारिस्थितिक साक्ष्य। (2) पत्नी को सन्तान उत्पन्न होना, जबकि गर्भधारण के समय पति का सम्पर्क न रहा

(3) रतिजन्य रोग से ग्रस्त हो जाना।

(4) किसी पूर्व कार्यवाही में जारता के कृत्य की संस्वीकृति।

(5) पत्रों की प्राप्ति, जिससे जारता सिद्ध हो सके।

जारकर्म के एक बार भी किये जाने का प्रमाण न्यायिक पृथक्करण के लिए पर्याप्त होगा। साक्ष्य पारिस्थितिक हो सकती है, किन्तु परिस्थितियाँ ऐसी होनी चाहिए जो कि उस व्यक्ति के निरपराध होने की अवधारणा को खण्डित कर दें। विवाह के पूर्व किया गया जारकर्म अनुतोष का आधार नहीं हो सकता

संभोग की बात प्रत्यक्ष प्रमाण द्वारा साबित करना आवश्यक नहीं और यदि उसमें कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य दिया जाता है तो बहुत कम सम्भावना है कि वह विश्वास किया जाय और ऐसे साक्ष्य सामान्यत: अमान्य हुआ करते हैं। सामान्य नियम यह है कि परिस्थितयाँ ऐसी होनी चाहिये जो सामान्य विवेक वाले व्यक्ति के लिए युक्तियुक्त जान पड़ें। लेकिन जहाँ विवाह के पश्चात् पत्नी के जारतापूर्ण व्यवहार से सम्बन्धित तथ्य को न्यायालय के समक्ष पति के द्वारा साबित न किया जा सके तो ऐसी परिस्थिति में विवाह विच्छेद की अनुज्ञप्ति न्यायालय के द्वारा नहीं प्राप्त की जा सकेगी। सुवराय बनाम सरस्वथी के बाद में न्यायालय ने यह कहा कि अधिकतर मामलों में साक्ष्य पारिस्थितिक होते हैं और उन

1. सुमित्रा मन बनाम गोविन्द्र चन्द्र मन्न, ए० आई० आर० 1988 कल० 1921

2. जीतसिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (1993) 1 एस०सी० सी० 3251

3. भगवान सिंह बनाम अमर कौर, 1902 पंजाब 1441

4. कोलमैन बनाम कोलमैन, (1953) एल० ई० आर० 6171

5. श्रीमती पुष्पा बनाम राधेश्याम, ए० आई० आर० 1972 राज० 269; देखिए श्रीमती स्वयंप्रभा बनाम ए० एस० चन्द्रशेखर, ए० आई० आर० 1982 कर्ना० 2951

6. सीमा कुमारी बनाम सुनील कुमार झा, ए० आई० आर० 2014 पटना 44.

7. ए० आई० आर० 1967 मद्रास 851

परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं जिनमें वह कृत्य किया गया बतलाया जाता है। किन्तु यह प्रमाण इस प्रकार का होना चाहिये जो हर प्रकार से यह साबित करे कि संभोग किया ही गया होगा। यदि कोई ऐसा व्यक्ति किसी स्त्री के शयनकक्ष में आधी रात के समय पाया जाता है जो उस स्त्री से किसी प्रकार सम्बन्धित नहीं है तो किसी प्रकार के सन्तोषजनक उत्तर के अभाव में यह निष्कर्ष निकाला जायेगा कि उसने जारकर्म किया होगा। किन्तु पत्नी यदि किसी अन्य व्यक्ति के साथ स्कूटर पर जाती हुई पायी जाय अथवा किसी दूसरे व्यक्ति के साथ बात करती हई पायी जाय तो आधुनिक युग के परिप्रेक्ष्य में जब कि सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो चुके हैं, पत्नी को जारता के अपराध में होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

चन्द्रमोहिनी श्रीवास्तव बनाम ए० पी० श्रीवास्तव के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह कहा कि जहाँ कोई व्यक्ति पत्नी के पास प्रेमपत्र लिखा करता था और प्रेमपत्र में लिखी बातों से यह पता चलता है कि उसका सम्बन्ध पत्नी से लैंगिक अवश्य रहा होगा, उससे यह निष्कर्ष निकालना कि पत्नी से उसका सम्बन्ध अवैध रहा होगा, गलत है क्योंकि पति ने पत्नी द्वारा उन पत्रों के उत्तर में लिखा कोई ऐसा पत्र नहीं प्रस्तुत किया जिससे जारता का सम्बन्ध निर्धारित किया जा सकता। अत: पति की याचिका खारिज कर दी गयी। किन्तु जहाँ दोनों के बीच पत्रों के आदान-प्रदान से यह स्पष्ट निष्कर्ष निकलता हो कि उनके सम्बन्ध लैंगिक अवश्य हैं वहाँ पत्नी के इस प्रकार के आचरण के लिए पति को उपयुक्त अनुतोष पाने का अधिकार प्राप्त है। जारता का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिल सकता, अतएव न्यायालय को अप्रत्यक्ष प्रमाण पर ही निर्भर करना होता है।

यदि किसी व्यक्ति ने प्रतिषिद्ध सम्बन्ध के अन्तर्गत विवाह कर लिया है और बाद में यह ज्ञात हो जाने पर कि विवाह शून्य है, दूसरा वैध विवाह कर लेता है तो शून्य विवाह की (पूर्व) पत्नी के साथ सम्भोग करना भी जारता होगी जो वैध विवाह की पत्नी को न्यायिक पृथक्करण का अनुतोष प्रदान कर सकती है।

एम० अरुणा कुमारी बनाम ए० जनार्दन राव, के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह कहा कि जहाँ किसी मामले में न्यायालय ने धारा 9 के अन्तर्गत कोई आदेश पारित कर दिया हो और उस आदेश के परिणामस्वरूप भी पति-पत्नी के बीच दाम्पत्य पुनर्स्थापन नहीं हुआ हो उस स्थिति में न्यायालय न्यायिक पृथक्करण की आज्ञप्ति पारित करेगा तत्पश्चात् वे पक्षकारगण विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति प्राप्त करने के अधिकारी होंगे।

(2) क्रूरतासामान्य दृष्टि में जो क्रूरता समझी जाती है, वह विधिक-क्रूरता से भिन्न है। इंग्लैंड में हाउस ऑफ लार्ड्स ने कहा था कि विधिक क्रूरता होने के लिये जीवन को, शरीर के किसी अंग को अथवा स्वास्थ्य को शारीरिक अथवा मानसिक खतरा अथवा इस प्रकार का खतरा युक्तियुक्तरूपेण होना चाहिये। क्रूरता से सम्बन्धित विधि विवाह संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा संशोधित अवश्य हो गया। फिर भी इसके पूर्व जो व्याख्या क्रूरता की की गई थी वही स्थिति बनी रही। क्रूरता सरल अर्थ में उपचार का अधिकारी नहीं बनाता जब तक कि शरीर अथवा मस्तिष्क को उससे यह भय नहीं बना रहता कि विवाह के दूसरे पक्षकार के साथ रहना खतरे से युक्त होगा। क्रूरता यों तो

(1) शारीरिक, अथवा (2) मानसिक हो सकती है।

शारीरिक क्रूरता से आशय ऐसे हिंसापूर्ण कृत्य से है जो विधिक क्रूरता के लिये पर्याप्त हो

1. श्रीमती स्वयंप्रभा बनाम ए० एस० चन्द्रशेखर, ए० आई० आर० 1982 कर्ना० 2951

2. ए० आई० आर० 1967 सु० को० 5811

3. बन्छनिधी दास बनाम कमला देवी, ए० आई० आर० 1980 उड़ीसा 1721

4. ए० आई० आर० 2003 एस० सी० डब्लू० 290.

5. रसेल बनाम रसेल, (1897) ए० सी० 3951

6. श्रीमती सुलेखा बैरागी बनाम प्रो० कमलाकान्त बैरागी, ए० आई० आर० 1980 कल0 3701

तथा जो प्रत्येक दशा में पक्षकार की प्रास्थिति के अनुसार बदलती रहती है। जहाँ शारीरिक प्रताड़ना दी गई है अथवा जीवन, स्वास्थ्य अथवा किसी अंग के खतरे की युक्तियुक्त आशंका हो, वहाँ क्रूरता का निर्धारण किया जा सकता है।

मानसिक क्रूरता का निर्धारण प्रत्येक मामले में अपनी परिस्थिति पर निर्भर करेगा, इसमें शारीरिक चाट अथवा हिसा की बात नहीं आती। इस प्रकार की करता से आशय उन कृत्यों से है जिनके द्वारा किसी पक्षकार, को मानसिक पीड़ा पहँचती है जिससे उसके स्वास्थ्य पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता हो। मिथ्या । दोषारोपण, तथा पति का अत्यधिक शराब का सेवन करना तथा अन्य स्त्री से अवैध सम्बन्ध, अपशब्द, वश्यावृत्ति के लिये स्त्री को बाध्य करना.’ निंदा, व्यंग्य आदि इस प्रकार की क्रूरता में आते हैं। बिना किसी आधार अथवा औचित्यपूर्ण कारण के पत्नी पर जारता का लांछन लगाना मानसिक क्रूरता है।’ एक निर्बल क्षीणकाय वाले पति के प्रति भीमकाय वाली पत्नी द्वारा आये दिन झगड़ा करना तथा न केवल पति को पीटना वरन् उसकी वृद्धा माता एवं उसकी बहन को भी पीटना तथा पति को माता एवं बहन से अलग रहने के लिये बाध्य करना एवं पति का नशेड़ी होना तथा उसकी कोई आमदनी नहीं होना आदि ऐसी घटनायें हैं जो शारीरिक तथा मानसिक दोनों प्रकार की क्रूरता के अन्तर्गत आती हैं।

यदि पत्नी का आचरण अपने पति व उसके परिवार के प्रति प्रारम्भ से ही अच्छा न हो और वह अपने पति तथा पति के माता-पिता को मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रही हो और जिसके आचरण की वजह से पति को अपनी नौकरी से भी त्याग पत्र देना पड़ा हो, और जहाँ पत्नी पति के घर बिना युक्तियुक्त कारण के अलग रह रही हो, वहाँ पत्नी का यह कृत्य मानसिक क्रूरता के दायरे के अन्तर्गत आयेगा।’ पुनः उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि जहाँ पति की किसी महिला से दोस्ती हो तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह अपनी पत्नी पर मानसिक क्रूरता करने का दोषी है। न्यायालय ने उपरोक्त वाद में यह स्पष्ट किया कि मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आने वाला अपराध प्रत्येक मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करता है और न्यायालय को यह चाहिये कि वह ऐसे संवेदनशील मामले की गहन समीक्षा करें।

ए० जया चन्द्रा बनाम अनिल कौर के मामले में हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 के अन्तर्गत क्रूरता के बारे में एक सामान्य सिद्धान्त प्रतिपादित किया गया। उपरोक्त वाद में न्यायालय ने यह सम्प्रेक्षित किया कि क्रूरता मानव के आचरण एवं व्यवहार के माध्यम से होती है तथा जहाँ मानव आचरण एवं व्यवहार इस तरह के हों कि दूसरा पक्ष उसके साथ नहीं रह सकता और सामान्य प्रज्ञावान व्यक्ति यह बात अनुभव करता है, ऐसी परिस्थितियाँ क्रूरता मानी जायेंगी।

पुन: इस बात की अभिपुष्टि उच्चतम न्यायालय ने सुमन कपूर बनाम सुधीर कपूर10 के वाद में की, जिसमें न्यायालय ने वाद के तथ्यों तथा पक्षकारों के आचरण के आधार पर क्रूरता शब्द को परिभाषित किया। न्यायालय ने इस बात की भी सम्पुष्टि की कि जहाँ पक्षकार गण अपना विवाह-विच्छेद क्रूरता के आधार पर लेना चाहते हैं तथा इस बात की याचिका न्यायालय के समक्ष की है वहाँ पक्षकार को इस बात को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है कि प्रतिवादी उसके प्रति दुराशय की भावना रखता है, ऐसे मामले में न्यायालय का यह कर्त्तव्य है कि वह वाद के तथ्यों के आधार पर क्रूरता को निर्धारित करे। प्रस्तुत मामले में उच्चतम न्यायालय ने पति के पक्ष में क्रूरता के आधार पर विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति पारित कर दिया था। आज्ञप्ति प्राप्त करने के पश्चात् पति ने अपना

1. जीप्स बनाम जीप्स, (1908) 89 एल० टी० 741

2. मुल्तान सिंह बनाम मीना रानी, ए० आई० आर० 2014 पंजाब व हरियाणा 598.

3. कोलमैन बनाम कोलमैन, 56 एल० जे० पी० 371

4. स्वयंप्रभा बनाम एस० चन्द्र शेखर, ए० आई० आर० 1982 कर्नाटक 2951

5. जसवीर कौर बनाम हरजिन्दर सिंह, ए० आई० आर० 2014 पंजाब व हरियाणा 187.

6. रानी देवी बनाम हुसन लाल, ए० आई० आर० 1988 पं० एवं हरि० 651

7. ओम प्रकाश पोद्दार बनाम रीना कुमारी, ए० आई० आर० 2013 दिल्ली 209.

8. पिनाकिन महिपात्रे रावल बनाम स्टेट ऑफ गुजरात, ए० आई० आर० 2014 एस० सी० 331.

9. ए० आई० आर० 2005 एस० सी० पृष्ठ 5341

10. ए० आई० आर० 2009 एस० सी० 589.

विवाह एक दूसरी स्त्री के साथ रचाया। इसी दौरान पली ने उच्चतम न्यायालय में विशेष इजाजत की याचिका इस आधार पर प्रस्तुत किया कि पति ने बिना अवधि सीमा बीते हये अपना विवाह रचाया है अत: उसके विवाह को शून्य घोषित किया जाय। उपरोक्त मामले में न्यायालय ने पति के इस कार्य को अनुचित ठहराया तथा पत्नी को पाँच लाख रुपये क्षतिपूर्ति देने की आज्ञप्ति पारित किया।

श्री पदचार बनाम वसन्ता बाई के मामले में मैसूर हाईकोर्ट ने यह निरूपित किया है कि वैवाहिक विधि में क्रूरता असंख्य प्रकार की हो सकती है। यह साधारण अथवा नशंसतापूर्ण हो सकता। है। यह भौतिक अथवा मानसिक हो सकती है। यह शब्दों से, इशारों से अथवा हिंसा से अथवा अहिसा से या केवल चुपचाप रहने की अवस्था से भी हो सकती है। यही कारण है कि न्यायालयों ने कोई एक विशेष परिभाषा क्रूरता की नहीं दी है। विधिक करता समय-समय पर सामाजिक तथा आर्थिक परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ बदलती रहती है। इस धारा के अन्तर्गत क्रूरता शारीरिक ही नहीं होती, यह मानसिक क्रूरता की स्थितियों को भी सम्मिलित करती है। क्रूरता का प्रश्न संपूर्ण तथ्यों पर तथा विवाह के पक्षकारों के आपसी सम्बन्धों पर निर्धारित किया जायेगा। उनकी संस्कृति, स्वभाव, प्रास्थिति, उनका स्वास्थ्य, उनके प्रतिदिन के जीवन के आपसी सम्बन्ध तथा अन्य अनेक सारी बातों पर क्रूरता का विचार किया जायगा जो सब नहीं बताये जा सकते। किन्तु जब कभी भी उन पर विचार किया जायेगा तो अवश्य देखा जायेगा कि क्या वे सब बातें धारा 10 (1) में क्रूरता के अपराध के लक्षणों के अन्तर्गत आती हैं। प्रस्तुत वाद में पत्नी अत्यन्त चिड़चिड़े स्वभाव की स्त्री होने के नाते आये दिन पति से लड़ाई-झगड़ा करती थी तथा पति का अपमान घर तथा घर से बाहर करना एक सामान्य बात हो गई थी। एक बार पत्नी ने पति को बस से यात्रा करते समय गालियाँ दी, कालर पकड़कर खींच लिया तथा अनेक प्रकार से अपमानित किया। एक अन्य दिन उसने पति को भोजन बनाने के लिये विवश किया और जब पति ने भोजन की थाली परोस कर पत्नी के सामने रखा तो उसने यह कहते हुए कि ‘गोबर की तरह खाना पकाया है’ जोर से थाली उसके सिर पर पटक दिया। दूसरे दिन पति को कार्यालय जाते समय उसके सहयोगियों के समक्ष गाली दिया, गला पकड़ कर तिरस्कार किया। वह पति के मर जाने की बात आये दिन करती थी और यह चाहती थी उसके बीमा पालिसी तथा फंड का रुपया उसे मिल जाये। पत्नी के इस व्यवहार से पति का जीवन नरक हो गया, पास-पड़ोस तथा सम्बन्धियों के बीच हँसी-मजाक का विषय बन गया तथा आये दिन लोग उसके साथ व्यंग कसते थे जिससे उसको घोर मानसिक क्लेश पहुँचता था और उसके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा था। न्यायालय ने पत्नी को क्रूरता का दोषी ठहराया।

बम्बई उच्च न्यायालय ने विनीत एच० जोगेलेकर बनाम वैशाली विनीत जोगेलेकर के वाद में यह मत व्यक्त किया कि क्रूरता के बारे में कोई विशेष परिभाषा नहीं दी जा सकती। प्रस्तुत वाद में पति ने अपनी पत्नी श्रीमती वैशाली विनीत से, हिन्दू वैदिक रीति के अन्तर्गत विवाह किया था, जिसके परिणामस्वरूप उसके दो सन्तानें हुईं। पति एक शंकालु एवं अभिमानी प्रकृति का व्यक्ति था, जिसकी वजह से उसका अपने परिवार में माता, पिता एवं भाइयों से आपसी वैमनस्य रहता था, इन्हीं वैमनस्यता के कारण वह अपने माता-पिता के परिवार से अलग होकर, अपने परिवार के साथ एक किराये के मकान में रहने लगा, कुछ दिनों तक वह वहाँ ठीक से रहा, लेकिन कुछ समय उपरान्त पत्नी एवं पति के सम्बन्ध में कटुता आने लगी जिसके परिणामस्वरूप पत्नी का पति के साथ रहना अत्यन्त कष्टकारी हो गया, यह बात इतनी बढ़ गयी थी कि वह पत्नी के साथ-साथ अपने बच्चों को भी बिना कारण परेशान करता था, जो कि पत्नी एवं बच्चों के लिये असहनीय हो गयी थी, जिससे उन लोगों को घोर मानसिक क्लेश पहुँचता था और उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ने लगा, ऐसी स्थिति को देखते हुये न्यायालय ने पति को क्रूरता का दोषी ठहराया।

1. ए० आई० आर० 1970 मैसूर 2321

2. ए० आई० आर० 1998 मुम्बई, पृ० 731

उच्चतम न्यायालय ने गुरुपीत सिंह बनाम हरियाणा राज्य के बाद में यह मत व्यक्त किया कि फरता के बारे में कोई विशेष एवं स्पष्ट परिभाषा नहीं दी जा सकती। प्रस्तुत वाद में पति ने अपना प्रेम विवाह अपने ही विभाग में कार्यरत महिला से किया। विवाह के कुछ समय पश्चात् पति एवं उसकी माता पत्नी को आये दिन प्रताड़ित करने लगे और इसी दौरान पति एवं पत्नी अपनी आपसी सहमति से विवाह विच्छेद के लिए न्यायालय में आवेदन संस्थित किया। इसी बीच आवेदन करने के पश्चात् उसके पति एवं माता ने आपराधिक षड़या करके उसको अपने आवास में जला कर मार डाला। प्रस्तुत वाद में न्यायालय ने उसके पति एवं माता को घोर क्रूरता का दोषी ठहराते हुये मृतका के उत्तराधिकारी को तीन लाख रुपये अदा करने का आदेश पारित किया, इसके साथ ही न्यायालय ने यह भी सम्पेक्षित किया कि मृतका का पति एवं उसकी सास को ऐसे घृणित कार्य के लिये आजीवन कारावास की सजा सुनाई।

जम्मू तथा कश्मीर उच्च न्यायालय ने जियालाल अग्रवाल बनाम सरला देवी के वाद में यह मत व्यक्त किया- “किसी एक मामले के तथ्यों के आधार पर क्रूरता के सम्बन्ध में विधि के सामान्य सिद्धान्त प्रतिपादित करना खतरनाक तथा अनुचित होगा। प्रत्येक मामले के निजी तथ्यों के आधार पर क्रूरता निश्चित की जायेगी। क्रूरता की प्रतिपादना समय-समय पर एवं स्थान-स्थान पर व्यक्ति के सामाजिक प्रास्थिति, आर्थिक परिस्थितियों तथा अन्य बातों के परिप्रेक्ष्य में बदलती रहती है। विवाह के पक्षकारों के आपसी सम्बन्ध के प्रसंग में ही क्रूरता का निर्धारण किया जायेगा। इसके अतिरिक्त पक्षकारों की सभ्यता, नीति, स्वभाव आदि अन्य बातें हैं जिनको ध्यान में रखा जाता है। जहाँ पत्नी सास के व्यवहार से पीड़ित है जिससे पति का कोई सम्बन्ध नहीं है और पत्नी की सारी शिकायत यह कि पति के सामने सारी बातें होती है किन्तु वह कुछ नहीं बोलता, वहाँ पत्नी क्रूरता का दोष नहीं लगा सकती। क्रूरता को निश्चित करने के लिये पति का आचरण, उनका वैवाहिक सम्बन्ध, पारिस्थितिक समस्याये आदि सभी बातों पर ध्यान देना आवश्यक है क्योंकि हिन्दू विवाह की प्रकृति संविदात्मक नहीं है।”

इस मामले में पति ने इस आधार पर न्यायिक पृथक्करण की याचिका दायर की कि उसकी पत्नी नाक के ऐसे रोग से पीड़ित है जिससे हमेशा दुर्गन्ध निकलती रहती है और जो असाध्य है। इसके परिणामस्वरूप पत्नी से सहवास करना तथा उसके साथ जीवन व्यतीत करना असम्भव हो गया था। ऐसी परिस्थिति में उसे न्यायिक पृथक्करण अथवा विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति प्रदान कर दी जानी चाहिये। किन्तु न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी क्योंकि पत्नी के नाक का रोग इस प्रकार भीषण तथा वीभत्स नहीं था कि उसके साथ रहना सम्भव न हो। न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि इस प्रकार की स्थिति क्रूरता के अन्तर्गत नहीं आती पत्नी का रोग पति के लिये खतरनाक नहीं था और न इसी बात का भय था कि वह भी इसी प्रकार के रोग का शिकार उसके सहवास से हो जायेगा। अत: किसी प्रकार की क्रूरता के अभाव में याचिका खारिज कर दी गई।

हिन्द विधि के अन्तर्गत क्रूरता के लिये आशय का होना आवश्यक नहीं है। भगवन्त बनाम भगवन्त के मामले में एक बार पति ने पत्नी के भाई को गला दबा कर मार डालने का प्रयास किया तथा दूसरे मौके पर अपने छोटे पुत्र को उसी प्रकार मार डालने की कोशिश की। न्यायालय के समक्ष यह साबित किया गया कि पति ने ऐसा कार्य पागलपन में किया है। न्यायालय ने कहा कि इस मामले में पति का आचरण ऐसा है जिसे क्रूरता निर्धारित किया जायेगा, चाहे इसका आशय हो या न हो।

1. ए० आई० आर० 2002 एस० सी० 3218।

2. ए० आई० आर० 1978 पृ० 69; देखिए परिहार (प्रीति) बनाम परिहार (कैलाश), ए० आई० आर० 1978 राज० 140; एम० एम० बनर्जी बनाम आर० के० महतो, ए० आई० आर० 1992 पटना 321

3. गोपालकृष्ण शर्मा बनाम डॉ० मिथिलेश कुमारी, ए० आई० आर० 1979 इला० 3161

4. 1967 बं0 800

पंजाब हाईकोर्ट ने भी पी० एल० सायल बनाम सरला रानी के मामले में यही मत व्यक्त किया शाा वाद के पक्षकार 1948 में विवाहित हुए और उनके दो सन्तानें हुईं। उनका वैवाहिक जीवन सुखमय नहीं था। पत्नी पति का प्यार अधिक से अधिक चाहती थी और इसके लिए वह एक फकीर से कुछ उपाय पळने गई। पति का प्रेम पाने के लिये फकीर ने एक प्रेम-द्रव पति को पिलाने के लिये दिया। उसने उस

को पति को पिला दिया जिससे उसका पति गम्भीर रूप से बीमार पड़ गया। उसे साधारण बुखार हो गया तथा चक्कर आने लगा जिससे उसकी स्नायुविक दुर्बलता, मचली, भार में कमी, पेट में जलन, पीठ में दर्द तथा अन्य कष्ट उत्पन्न हो गये। उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ा और वह अस्पताल में कुछ समय तक रहा। पत्नी इस समय उसकी परिचर्या में बराबर रही। ठीक हो जाने पर पति ने पत्नी के विरुद्ध करता के आधार पर न्यायिक पृथक्करण की याचिका दायर की। न्यायाधीश ने कहा कि क्रूरता के लिये करता का आशय होना आवश्यक नहीं है। यदि पक्षकारों के बीच में ऐसा सम्बन्ध है जिससे उनमें तनाव की स्थिति बनी रहती है और विवाह के एक पक्षकार को दूसरे से भय बना रहता है तो क्रूरता होगी, भले ही क्रूरता का आशय हो या न हो।

जहाँ पति-पत्नी को कुछ अवसरों पर साथ चलने के लिये बाध्य करता है जब कि पत्नी साथ नहीं जाना चाहती थी। न्यायालय ने कहा-हालांकि इसमें दोनों में बहुत अधिक असंतोष तथा अनबन हो गई, किन्तु इसको पति की क्रूरता नहीं कहा जा सकता। श्रीमती अलोका डे बनाम मृणाल कान्ति डे’ का मामला क्रूरता के सम्बन्ध में एक रोचक वाद है। इसमें पति ने न्यायिक पृथक्करण की याचिका इस आधार पर प्रस्तुत किया कि उसकी पत्नी एक बदमिजाज, झगड़ालू तथा असहिष्णु प्रकृति की स्त्री है। उसने बहुत बार उसको सुधारने की कोशिश की, किन्तु वह असफल रहा। बाद में पति को कुछ ऐसे प्रेम-पत्र प्राप्त हुए जो उसने अपने प्रेमी को लिखा था। इस पर पत्नी ने अपनी गलती स्वीकार की और क्षमा-याचना कर ली। कुछ दिनों के लिये वह अपने पिता के घर चली गई किन्तु बाद में जब वह वापस आयी तो उसका पुराना व्यवहार फिर शुरू हो गया। न्यायालय के समक्ष यह भी साक्ष्य प्रस्तुत किया गया कि पत्नी के असहिष्णु प्रकृति होने की जिम्मेदारी पति पर भी है और ऐसी कोई बात नहीं थी जिससे यह पता चलता कि वह जानबूझ कर पति को व्यथित करना चाहती थी। न्यायालय ने कहा कि इस प्रकार की परिस्थितियों में यह नहीं कहा जा सकता कि पत्नी का व्यवहार इतना क्रूरतापूर्ण है कि पति को न्यायिक पृथक्करण की डिक्री प्रदान कर दी जाय, विशेष कर उस स्थिति में जबकि पति ने पत्नी के दोषों को एक बार माफ कर दिया है।

के० श्री निवासन राव बनाम डी० ए० दीपा, के मामले में उच्चतम न्यायालय ने पत्नी के मानसिक क्रूरता के आधार पर पति की विवाह विच्छेद की याचिका को स्वीकार करते हुए, मानसिक क्रूरता की श्रेणी को स्पष्ट करते हुये यह विचार व्यक्त किया कि यह जरूरी नहीं है कि पति-पत्नी एक ही छत के नीचे रहकर ही मानसिक क्रूरता करें बल्कि वह दूर रहकर भी मानसिक क्रूरता कर सकते हैं और जहाँ पक्षकारों के बीच विवाह विच्छेद का आधार मानसिक क्रूरता बनता हो और पक्षकारों के बीच किसी प्रकार की सुलह-समझौता होने की गुंजाइश न हो, वहाँ न्यायालय को इस आधार पर विवाह विच्छेद की आज्ञप्ति पारित कर देनी चाहिये, और ऐसी आज्ञप्ति पारित करते समय न्यायालय को इस बात का अवलोकन करना चाहिये कि वह पत्नी को उसके जीवन निर्वाह के लिये उचित व स्थायी भरण पोषण की धनराशि पत्नी को दिलवाये जिससे वह अपने जीवन यापन को सुचारु रूप से कर सके।

डॉ० मालती रवि बनाम डॉ० बी० वी० रवि, के मामले में उच्चतम न्यायालय ने इस बात की अभिपुष्टि की कि जहाँ पक्षवारों के बीच मानसिक क्रूरता का आधार न्यायालय के समक्ष साक्ष्यों के द्वारा सिद्ध हो गया हो, वहाँ ऐसे मामलों में न्यायालय को पक्षकारों के बीच विवाह विच्छेद की याचिका का

आदेश पारित कर देना चाहिए। उपरोक्त मामले में पुन: उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि मानसिक क्रूरता के मापदण्ड को गणतीय सिद्धान्त के नियमों के द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता बल्कि उसका

1. 1951 पं० 1251

2. अन्नासाहेब बनाम ताराबाई, ए० आई० आर० 1970 एम० पी० 361

3. ए० आई० आर० 1973 कल03931

4. ए० आई० आर० 2013 एस० सी०2176.

5. ए० आई० आर० 2014, एस० सी० 2881.

आकलन पक्षकारों के बीच परिस्थितियों को ध्यान में रखकर करना चाहिये और उसी के अनुसार उनके बीच न्यायसंगत निर्णय देने का प्रयास करना चाहिये।

न्यायिक पृथक्करण को समुचित ठहराने वाली विधिक करताओं को निम्नलिखित शीर्षकों में वर्णित किया जा सकता है-

(1) वास्तविक अथवा आशंकित शारीरिक चोट,

(2) गाली देना तथा अपमानित करना,

(3) अतिशय रति-संभोग

(4) रति-संभोग की अस्वीकृति, शंकर प्रसाद पाल चौधरी बनाम माधवी पाल चौधरी के निर्णय में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि जहाँ पत्नी बिना किसी युक्तियुक्त अथवा औचित्यपूर्ण कारण के रति-संभोग से इन्कार करती है अथवा सम्भोग पूरा होने में लगातार असमर्थता प्रकट करती है अथवा इस प्रकार का आचरण करती है कि सम्भोग पूरा न हो सके तो उस दशा में पति के पति यह क्रूरता होगी।

(5) उपेक्षा करना, जहाँ पत्नी के बीमार हो जाने पर पति उपचार नहीं करता तथा पत्नी को पिता के घर से वापस आने पर उसी दिन घर से इस आधार पर बाहर निकाल देता है कि उसके पिता ने उसको घर पर अवैध रूप से रोक रखा था। न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि यहाँ पति द्वारा पत्नी के प्रति क्रूरता होगी। दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार यदि पति अस्पताल में भीषण दुर्घटना के परिणामस्वरूप भरती हो गया है और आठ माह तक आसाम के सैनिक अस्पताल तथा दिल्ली के अस्पताल में पड़ा हो और पत्नी उसकी गम्भीर स्थिति की सूचना पाने के बावजूद भी उसको अस्पताल में देखने नहीं गई जबकि उसके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी तो यह एक ऐसी उपेक्षा है जो क्रूरता का परिचायक है और इस आधार पर विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति दी जा सकती है।

(6) रतिजन्य रोग का संपर्क,

(7) अति मद्यपान जिससे दूसरे पक्षकार के स्वास्थ्य पर मद्यसेवन के दुष्कृत्यों का प्रभाव पड़ सकता हो, जहाँ विवाह का कोई पक्षकार अति मद्यपान करके दूसरे पक्षकार के साथ दुर्व्यवहार करता है अथवा उसके जीवन को नरक बना देता है वहाँ मद्यपान क्रूरता मानी जायेगी जिसके आधार पर न्यायिक पृथक्करण अथवा विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति प्राप्त की जा सकती है वैसे मद्यपान स्वत: में क्रूरता नहीं होगी।

(8) किसी अनैतिक व्यक्ति से साहचर्य के लिये विवश करना,

(9) पति तथा पत्नी पर अनैतिकता का निराधार आरोप लगाना, यदि विवाह का एक पक्षकार दूसरे के ऊपर चरित्र-दोष का आरोप लगाता है तो इस प्रकार का चरित्र-लांछन भी क्रूरता के अन्तर्गत आता है। यदि क्रूरता के आचरण को एक बार माफ कर दिया गया है और फिर बाद में क्रूरता का व्यवहार दोहराया गया है तथा चरित्र-लांछन के अपराध को जारी रखा जाता है तो उससे पीड़ित पक्षकार का यह अधिकार समाप्त नहीं हो जाता कि वह विवाह-विच्छेद की याचिका न लाये, क्योंकि उसने एक बार माफ कर दिया था।

1. श्री पदचार बनाम बसन्ताबाई, ए० आई० आर० 1970 मै० 2321

2. कसमलता बनाम कामता प्रसाद, 1965 इलाहाबाद 2801

3. ए० आई० आर० 1982 कल० 4741 देखिये सुनील कुमार बनाम उषा, ए० आई० आर० 1994 | एम० पी० 11

4. देखिये अनिल भारद्वाज बनाम श्रीमती निर्मलेश, ए० आई० आर० 1987 दि० 1111

5. बलबीर कौर बनाम धीरदास, ए० आई० आर० 1979 पं० और हरि० 1621

6. राजेन्द्र सिंह जून बनाम तारामती, ए० आई० आर० 1980 दि0 2131

7. बेकर बनाम बेकर, (1955) 3 आर० ई० आर० 1931

8. श्रीमती रीता बनाम व्रज किशोर, ए० आई० आर० 1984 दि0 2911

9. कृष्णारानी बनाम चुन्नीलाल, ए० आई० आर० 1981 पंजाब तथा हरि० 1991

जब पति अपनी पत्नी को अनैतिकता तथा व्यभिचार ऐसे गलत दोषों से आरोपित करता है और इन दोषारोपों को जारी रखता है जिससे पत्नी दुःखी रहती है तो निश्चित है कि इससे उसके स्वास्थ्य के ऊपर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है और यह बात पत्नी के न्यायिक पृथक्करण की याचिका के लिए पर्याप्त होगी।

(10) बच्चों को गम्भीर प्रताड़ना देना।

पत्नी का भयानक रोग से पीड़ित होना–यदि पत्नी किसी भयानक अथवा गम्भीर रोग से पीड़ित है और पति उसके साथ सम्भोग करने से वंचित हो जाता है तो विधि की दृष्टि में यह पति के प्रति विधिक क्रूरता होगी।

केरल उच्च न्यायालय ने भी विधिक क्रूरता की उपर्युक्त परिभाषा का समर्थन किया है।

करता पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय डॉ० एन० जी० दास्तान बनाम श्रीमती एस० दास्तान’ में अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इस मामले में पति जो एक असिस्टेन्ट प्रोफेसर थे, बाद में विदेश में एक ऊँचे पद पर काम करने लगे। उनकी पत्नी सुचेता भी एक उच्च शिक्षा प्राप्त महिला थी जो वाद के समय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय में अच्छे पद पर काम करती थी। पत्नी का आचरण पति के प्रति प्रारम्भ से ही अनुचित एवं क्रूरतापूर्ण था। पत्नी पति को सदैव यह कहकर भय देती रहती थी कि वह आत्महत्या कर लेगी, घर को आग लगाकर खाक कर देगी अथवा उसको नौकरी से निकलवा देगी और उसे समाचार-पत्रों में प्रकाशित करवायेगी। उसे गाली देना, उसका अपमान करना पत्नी का सामान्य आचरण हो गया था। मंगल-सूत्र को तोड़ना, पति के कार्यालय से लौटने के समय घर को अन्दर से बन्द करके पति को घर से बाहर रखना, एक छोटे बच्चे की जिह्वा पर मिर्च का चूर्ण घिसना, एक बच्चे को बुरी तरह मारना जब कि वह तेज बुखार में था तथा आधी रात में जब पति सो रहा हो, उसके कमरे में तेज पावर का बल्ब जला कर उसके बगल में इस दृष्टि से बैठना कि उसको कष्ट पहुँचे, आदि ऐसे कृत्य थे जो क्रूरता के अन्तर्गत आते हैं। इन कार्यों से विवाह का उद्देश्य समाप्त हो गया था। अत: न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि ये कार्य क्रूरता के अन्तर्गत आते हैं। किन्तु उच्च न्यायालय ने इस याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया कि याची पति ने पत्नी के इस क्रूरतापूर्ण आचरण को माफ कर दिया था कि उसके क्रूरतापूर्ण कृत्य के बावजूद भी वह उसके साथ सामान्य जीवन व्यतीत करता था, इसलिए विधि की दृष्टि में यह समझा जायेगा कि उसने क्रूरता को माफ कर दिया। इसी प्रकार सदन सिंह बनाम श्रीमती रेशमी के वाद में पत्नी का अभिकथन कि पति का अनैतिक सम्बन्ध अपनी भाभी से था, पति के प्रति एक प्रकार की क्रूरता थी। किन्तु पति द्वारा, इस प्रकार के दोषारोपण के बावजूद पत्नी के साथ सहवास करना, उसके अपराध को माफ कर दिया हुआ समझा जायेगा।

न्यायालय ने मानसिक पीड़ा एवं आघात को क्रूरता के अन्तर्गत सम्मिलित किया है। ललिता देवी बनाम राधामोहन के मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने यह अभिनिर्धारित किया कि क्रूरता में केवल शारीरिक आघात अथवा पीड़ा ही नहीं आता वरन् ऐसे भी मानसिक तथा मनोवैज्ञानिक कृत्य आते हैं जिनसे दूसरे पक्षकार के मस्तिष्क में यह भय उत्पन्न हो जाता है कि यदि वह उसके साथ रहेगी या रहेगा तो उसके प्राण एवं स्वास्थ्य को खतरा होगा। जहाँ पति एक दूसरी स्त्री से प्रेम करने लगता है। और उसको उसी घर में रखता है जिस घर में उसकी पत्नी निवास करती है तथा उसको यह भी

1. इकबाल कौर बनाम प्रीतम सिंह, 1963 पंजाब 242; उमरीबाई बनाम चित्तार, 1966 म०प्र० 2051

2. रूप लाल बनाम करतारी देवी, ए० आई० आर० 1970 जे० एण्ड के० 1581

3. सराह अब्राहम बनाम पिपली अबाहम, 1959 केरल 531

4. ए० आई० आर० 1975 एस० सी० 15341

5. ए० आई० आर० 1982 इला० 821

6. ए० आई० आर० 1976 राज० 11

वचन देता है कि वह उससे विवाह कर लेगा, न्यायालय ने यह कहा कि यह स्थिति उसकी पत्नी के लिए असह्य थी और ऐसे पति के साथ जीवन व्यतीत करना उसके मस्तिष्क को असीम पीड़ा का कारण बन गया था जो क्रूरता के अन्तर्गत आयेगा। अत: न्यायालय ने पति के इस आचरण को क्रूरतापूर्ण अभिनिर्धारित करके न्यायिक पृथक्करण की आज्ञप्ति प्रदान कर दी।

पुन: इस बात की अभिपुष्टि धमेन्द्र पाल बनाम श्रीमती पुष्पा देवी के वाद में पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय ने किया। न्यायालय ने प्रस्तुत वाद में यह अभिनिर्धारित किया कि जहाँ विवाह के कोई पक्षकार एक दूसरे पर गलत आरोप व चरित्र पर लांछन लगाते हैं; वहाँ यदि ऐसा आरोप गलत सिद्ध होता है तो ऐसे आरोपों को क्रूरता माना जायेगा। प्रस्तुत वाद में पत्नी द्वारा पति के ऊपर लगाये गये चारित्रिक लॉछन का आरोप गलत सिद्ध हुआ जिसमें न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि पक्षकारों को न्यायिक पृथक्करण की आज्ञप्ति प्रदान की जा सकती है।

दिल्ली उच्च न्यायालय की विशेष खण्डपीठ ने हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 10 की विस्तृत व्याख्या करते हुये दहेज की माँग को भी क्रूरता के अन्तर्गत परिभाषित किया। प्रस्तुत मामले में पति का आचरण पत्नी के प्रति क्रूरतापूर्ण था, पति अपने सारे भावनात्मक एवं व्यावहारिक पक्ष को पत्नी के साथ समाप्त कर उससे अपने पिता के घर से दहेज लाने के लिये अक्सर दबाव बनाता था। उपरोक्त मामले में न्यायालय ने सम्पूर्ण तथ्यों का अवलोकन करने के पश्चात पति के इस आचरण को क्रूरतापूर्ण ठहराया तथा पत्नी के पक्ष में न्यायिक पृथक्करण की आज्ञप्ति पारित किया।

जहाँ पत्नी अपनी शारीरिक शिथिलता के इलाज को जारी रखने से पीछे हटती है तथा अपने वैवाहिक दायित्व को पूरा करने में उपेक्षा करती है तथा पति के विरुद्ध गलत शिकायत उसके प्राधिकारी के प्रति भेजती है, न्यायालय ने वहाँ पत्नी के आचरण को क्रूरतापूर्ण अभिनिर्धारित किया। जहाँ पत्नी पति के साथ परिवार में रहना इस आधार पर इन्कार करती है कि परिवार में दो व्यक्ति टी० बी० से पीड़ित हैं जिससे उसके स्वास्थ्य को भी खतरा उत्पन्न हो सकता है। न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि पत्नी का यह आचरण पति के प्रति क्रूरता अथवा अभित्याग नहीं कहा जा सकता जब कि वह पति के साथ अलग घर में रहने के लिए तैयार है।’

(3) अभित्याग की व्याख्या-अभित्याग का तात्पर्य याची का दूसरे पक्ष (अर्थात् पति या पत्नी) द्वारा अभित्याग है, जब कि यह अभित्याग बिना युक्तियुक्त कारण या बिना दूसरे पक्ष की अनुमति या दूसरे पक्ष की इच्छा के विरुद्ध किया गया हो। लाभकौर बनाम नारायण सिंह के वाद में न्यायालय ने यह संप्रेक्षित किया कि अभित्याग का अर्थ विवाह के दूसरे पक्षकार का आशय स्थायी रूप से त्याग देना तथा उसके साथ निवास छोड़ देने का है जो कि बिना उसकी स्वीकृति तथा युक्तियुक्त कारण के होता है।

पुनः श्रीमती रंजीत सिंह कौर बनाम सुरेन्द्र सिंह गिल, के वाद में न्यायालय ने यह सम्प्रेक्षित किया कि अभित्याग का अर्थ है कि विवाह का कोई पक्षकार साआशय दूसरे पक्षकार को बिना युक्तियुक्त कारण व सहमति के बिना छोड़ देना और अपने को वैवाहिक दायित्वों से अलग कर लेना है।

इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय ने डॉ. मालती रवि बनाम बी० वी० रवि, के वाद में यह सम्प्रेक्षित किया कि जहाँ विवाह के पक्षकारों में अभित्याग करने के आशय का अभाव है अर्थात वह अपना वैवाहिक जीवन समाप्त नहीं करना चाहते, वहाँ ऐसा कृत्य अभित्याग की कोटि के अन्तर्गत नहीं सम्मिलित किया जायेगा।

न्यायालय ने एक अन्य मामले में यह सम्प्रेक्षित किया कि जहाँ विवाह के कोई पक्षकार अप्राप्य आधार पर अपने जीवन साथी से अलग हो जाता है वहाँ ऐसे पक्षकार हिन्दू विवाह अधिनियम की

1. ए० आई० आर० 2006, पंजाब व हरियाणा 691

2. श्रीमती इन्द्रबाला टोपो बनाम फ्रांसिज एक्सवियर टोपो, ए०आई० आर० 2002 दिल्ली 54 (विशेष खण्डपीठ).

3. सुनील कुमार दत्ताराय बनाम स्वर्णदत्ता राय, ए० आई० आर० 1982 गौहाटी 361

4. ए० आई० आर० 1978 पंजाब एवं हरि० 3171

5. ए० आई० आर० 2012 म०प्र० 741

6. ए० आई० आर० 2014 एस० सी० 2881.

धारा 13 के अन्तर्गत अपने विवाह-विच्छेद की याचिका उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है और इन मामलों की सुनवाई करने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 142 के अन्तर्गत केवल उच्चतम न्यायालय को होगी न कि अधीनस्थ न्यायालय को और इस आधार पर विवाह-विच्छेद की डिक्री उच्चतम न्यायालय के द्वारा ही पारित किया जा सकता है।

यह वैवाहिक आभारों का पूर्णरूपेण खण्डन है। जहाँ कोई पक्षकार भावावेश अथवा क्रोध में किसी स्थायी भाव के अभाव में दूसरे पक्षकार को त्याग देता है वहाँ अभित्याग नहीं माना जायेगा। अभित्याग के लिए दो वस्तुओं का होना आवश्यक है

(1) बिना स्वीकृति के एक पक्षकार की इच्छा के विरुद्ध दूसरा पक्षकार अलग रह रहा हो,

(2) अभित्याग का स्पष्ट अभिप्राय मौजूद हो। इसी प्रकार जहाँ तक वियोजित पक्ष का सम्बन्ध है, दो बातें आवश्यक हैं

(1) स्वीकृति का अभाव,

(2) ऐसे आचरण का अभाव जो दूसरे पक्षकार को औचित्यपूर्ण कारण प्रदान करता है।

अभित्याग का मामला उस स्थिति में भी हो सकता है जब कि पति-पत्नी एक ही घर में रह रहे हों किन्तु इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि एक पक्षकार दूसरे के प्रति इतनी उपेक्षा अथवा, उदासीनता रखता है अथवा आपसी सम्बन्ध के बिगड़ापन का खुला प्रदर्शन है तो इस प्रकार का भी आचरण परित्याग कहा जायेगा।’ अभित्याग की पूरी अवधि में वियोजित पक्षकार को विवाह की पुष्टि करते रहना चाहिये और औचित्यपूर्ण शतों पर वैवाहिक जीवन की पुनर्स्थापना के लिए तैयार करना चाहिये। यदि कोई पक्षकार आचरण अथवा शब्दों द्वारा दूसरे पक्षकार को छोड़ने के लिए बाध्य करता है तो इस प्रकार बाध्य करने वाला पक्षकार अभित्याग का दोषी होगा, न कि घर छोड़ने वाला पक्षकार, भले ही उसने स्वयं घर छोड़कर अलग रहना प्रारम्भ किया हो। जहाँ पत्नी पति का अभित्याग युक्तियुक्त (reasonable) कारण से करती है वहाँ अभित्याग नहीं कहा जायेगा। उदाहरणार्थ जहाँ पति हमेशा पत्नी को असतीत्व तथा भ्रष्ट-चरित्र (loose moral) होने का दोषी करार करता रहता है जिसके कारण वह अलग रहने के लिए विवश हो जाती है वहाँ पत्नी को अभित्याग का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। सरला सिकरोदिया बनाम डॉ० कृष्णलाल के मामले में पति ने पत्नी को दूसरी जगह इलाज के लिए छोड़ दिया और बाद में उसको यह पत्र लिखता रहा कि वह असतीत्व तथा भ्रष्ट चरित्र की दोषी है तथा उसके भाई को भी यह पत्र लिखा कि वह चरित्र-भ्रष्ट है एवं उसके अनैतिक सम्बन्ध अन्य लोगो से विवाह के पूर्व थे और अब भी हैं। उसने पत्नी के विरुद्ध वैवाहिक जीवन की पुनस्र्थापना की याचिका और बाद में तलाक की याचिका इस आधार पर दायर की कि पत्नी अलग रह कर अभित्याग की दोषी है। न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी और यह अभिनिर्धारित किया कि पत्नी को अलग रहने का न्यायोचित कारण था।

दीपक कुमार बनाम गौरी देवी के मामले में पत्नी अपने बच्चे के जन्म के पश्चात् अपने पति के घर में निवास कर रही थी, और पति के दुर्व्यवहार के कारण उसे पति के घर को छोड़ना पड़ा। उपरोक्त वाद में पति ने अभित्यजन के आधार पर विवाह-विच्छेद की याचिका न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया। उपरोक्त वाद में न्यायालय ने पति की विवाह-विच्छेद की याचिका को निरस्त

1. कैलाश देव बनाम शांति, ए० आई० आर० 2012 राजस्थान 103।।

2. विपिन चन्द्र बनाम प्रभावती, ए० आई० आर० 1957 सु० को० 1761

3. तपनकुमार चटर्जी बनाम कमला चटर्जी, ए० आई० आर० 1989 कल0741

4. परिहार बनाम परिहार, ए० आई० आर० 1978 राज० 140; देखिये ओम प्रकाश नारंग बनाम प्रभा नारंग, ए० आई० आर० 1978 दि0 2401

5. ए० आई० आर० 1982 राज० 2201

6. ए० आई० आर०2014 पटना 51.

करते हये यह सम्प्रेक्षित किया कि पत्नी अपने पति के घर का अभित्याग नहीं करना चाहती थी बल्कि वह पति के आचरण से क्षुब्ध होकर अपने पति से अलग हो गयी थी। न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि पत्नी को अलग रहने का न्यायोचित कारण था जिसका लाभ पति को नहीं दिया जा सकता।।

पुन: उच्चतम न्यायालय ने अशोक कमार जैन बनाम समित्रा जैन, के वाद में यह अभिनिर्धारित किया कि विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति उस दशा में नहीं पारित की जानी चाहिये जहाँ पर पति के आचरण के कारण पत्नी ने उसके साथ रहने से इन्कार कर दिया हो।।

विपिन चन्द्र वाले वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह कहा था कि अभित्याग का अभिप्राय प्रत्येक मामले की अपनी परिस्थितियों से जाना जाता है। कुछ मामले में परिस्थिति-विशेष से आभत्याग का अभिप्राय निकाला जा सकता है, किन्तु कुछ मामलों में परिस्थितियों से अभित्याग का आशय नहीं निकाला जा सकता। यदि वियोजक पक्ष वियोजित पक्ष के साथ फिर से रहने के लिए निश्चय करता है तथा वैवाहिक जीवन को पुनर्स्थापित करना चाहता है, चाहे वह विधि में दी गई अवधि के भीतर हो अथवा उसके व्यतीत हो जाने के बाद हो, किन्तु अनुतोष की कार्यवाही प्रारम्भ न हुई हो तो अभित्याग भंग हुआ समझा जायगा। इस वाद में न्यायालय ने पति की याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया कि पत्नी के मस्तिष्क में पति का अभित्याग कर देने का कोई स्थायी भाव नहीं उत्पन्न हुआ था। पत्नी पति की अनुपस्थिति में पति के मित्र से प्रेम करने लगी थी। पति के वापस आने पर जब वह बात उसको पता चली तो वह उसके बारे में पूछताछ करने लगा जो कि पत्नी को अच्छा नहीं लगा और वह नाराज होकर अपने पिता के घर चली गई। पति के पत्र लिखने पर उसके पिता ने लिखा कि वह वापस जाने के लिए तैयार है, किन्तु बाद में पति ने ही उसे वापस बुलाने की इच्छा नहीं प्रकट की। इस स्थिति में न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए यह निर्धारित किया कि अभित्याग में निम्नलिखित तीन बातें होनी चाहिए-

(1) पृथक् रहने की स्थिति,

(2) अभित्याग करने का स्थायी आशय,

(3) विनियमित अवधि (statutory period) तक अलग रहना।

उपरोक्त मामले में अभित्याग करने का कोई स्थायी आशय नहीं साबित हुआ था इसलिये याचिका खारिज कर दी गई थी।

उच्चतम न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण वाद लक्ष्मण बनाम मीना में इस उपर्युक्त सिद्धान्त का समर्थन किया है।

इस मामले में लक्ष्मण ने अपनी पत्नी के विरुद्ध न्यायिक पृथक्करण की याचिका अभित्याग के आधार पर प्रस्तुत किया। पति एक डॉक्टर था और उसका परिवार एक रूढ़िवादी दृष्टिकोण वाला था। पत्नी केवल हाईस्कूल पास थी किन्तु बहुत धनी परिवार की थी तथा आधुनिक एवं स्वच्छन्द विचार वाली स्त्री थी। पत्नी पति के साथ बम्बई में आकर रहने लगी, किन्तु उसके साथ उसका सम्बन्ध सुखद न रहा। पत्नी बिना उसकी सहमति के उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने मन से पति को छोड़कर चली गई और अपने माता-पिता के साथ सिंगापुर में रहने लगी। सिंगापुर से एक बार जब वह बम्बई आयी तो एक रिश्तेदार के घर 15 दिनों तक रुकी रही, किन्तु वह न तो लक्ष्मण से मिली और न अपने सात वर्षीय पुत्र को देखने गई जब कि पति का घर वहाँ से केवल 5 मिनट की दूरी पर था। बाद में वह सिंगापुर वापस चली गई। पति द्वारा बुलाये जाने के लिये पत्र लिखने पर वह उत्तर में लिखती थी कि वह आने के लिये तैयार है लेकिन उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं है, इसलिये अभी नहीं आयेगी। पत्नी की यह बात एक बहाना मात्र थी। वस्तुत: वह पति के साथ नहीं रहना चाहती थी। न्यायालय

1. ए० आई० आर० 2013 एस० सी० 2916.

2. ए० आई० आर० 1957 एस० सी० 1761

3. ए० आई० आर० 1964 एस० सी० 401

ने कहा कि पत्नी ने पति की बिना सम्मति के घर छोड़ दिया था जिसके पीछे कोई भी उचित कारण नहीं था। दूसरा यह कि उसके आचरण से यह स्पष्ट था कि पति के साथ उसका रहने का आशय नहीं था और इस प्रकार की स्थिति दो वर्ष से अधिक तक बनी रही। अत: अभित्याग के आधार पर न्यायिक पृथक्करण की डिक्री प्रदान कर दी गई। उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित सिद्धान्त प्रतिपादित किये-

(1) अभित्याग का सारभूत अर्थ यह है कि विवाह के एक पक्षकार द्वारा दूसरे पक्षकार का स्थायी रूप से बिना किसी कारण अथवा उसकी सहमति के त्याग देने का आशय।

(2) अभित्याग के अपराध के लिये चार चीजें आवश्यक है- पृथक् रहने की बात, (ii) अभित्याग की इच्छा, (ii) अभित्याग किये गये पक्षकार में सहमति का अभाव तथा (iv) ऐसे आचरण का अभाव जिसके द्वारा पक्षकार के अलग रहने का औचित्यपूर्ण कारण हो।

(3) अभित्याग का वैवाहिक अपराध उस क्षण प्रारम्भ होता है जब पृथक् रहने की बात तथा उस आशय की इच्छा एक साथ शुरू होती है। इस सम्बन्ध में यह आवश्यक नहीं है कि आशय पृथक् रहने की बात से पहले उत्पन्न हो। वस्तुत: पृथक्करण आवश्यक इच्छा के बिना भी शुरू हो सकता है।

रोहिणी कुमार बनाम नरेन्द्र सिंह के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह निरूपित किया कि हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत अभित्याग का अर्थ केवल पृथक् आवास तथा पृथक् निवास से ही नहीं है। इसके साथ यह भी आवश्यक है कि वैवाहिक सम्बन्धों को समाप्त करने की तथा सहवास को सदैव के लिए समाप्त करने की दृढ़ इच्छा होनी चाहिये। इस प्रकार की इच्छा के अभाव में अधिनियम की धारा 10 में अभित्याग नहीं हो सकता। उपर्युक्त वाद के अनुसार पति ने अपनी प्रथम पत्नी की उपस्थिति में दूसरा विवाह कर लिया। ऐसी स्थिति में पत्नी के पृथक् निवास एवं भरण-पोषण का अधिकार उत्पन्न हो जाने की बात अभित्याग का कारण नहीं हो सकती। यह कहना ठीक न होगा कि पति द्वारा दूसरा विवाह कर लेने मात्र से अभित्याग का आधार उत्पन्न हो जाता है। इस सम्बन्ध में यह प्रश्न अत्यन्त ही न्यायसंगत है कि पति के दूसरे विवाह का पत्नी के मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ा। यदि पति का पुनर्विवाह पत्नी के मस्तिष्क पर कोई दुष्प्रभाव नहीं उत्पन्न करता तो इस बात से अभित्याग का कोई युक्तियुक्त कारण नहीं होता।

पी० वी० वीरराघवम् बनाम टी० एस० पार्वती के वाद में केरल हाईकोर्ट ने यह निर्धारित किया कि जहाँ अलग रहने का आशय नहीं साबित किया जाता, वहाँ न्यायिक पृथक्करण की आज्ञप्ति नहीं प्रदान की जा सकती। इस वाद में अपीलार्थी पति एक निर्धन व्यक्ति था और इतना कम वेतन पाता था कि वह अपना अलग घर नहीं बना सकता था। उसने अपनी पत्नी से यह निवेदन किया कि वह उसके माता-पिता तथा भाइयों के साथ रहे। पत्नी ने इस बात का घोर विरोध किया और उनके साथ रहने से अस्वीकार कर दिया। पति के अनुसार पत्नी द्वारा यह अभित्याग है, अत: उसने न्यायिक पथक्करण की याचिका प्रस्तुत की। न्यायालय ने अपील खारिज करते हुए यह कहा कि पत्नी को अलग रहने का कोई स्थायी आशय नहीं था।

अभित्याग के अपराध के लिए पृथक् निवास तथा अभित्याग का आशय दोनों का होना आवश्यक है. हालाँकि यह आवश्यक नहीं है कि दोनों एक ही साथ शुरू हुये हों। पृथक निवास बिना किसी अभित्याग के आशय के शुरू हो सकता है अथवा परिस्थितिवश दोनों एक ही समय शुरू हो सकते है। अभित्याग करने का तथ्य तथा सहवास को सदैव के लिए समाप्त करने के आशय, दोनों बातों का होना आवश्यक है। यदि केवल यही बात साबित की जाती है कि पत्नी ने पति का घर बिना

1. ए० आई० आर० 1972 एस० सी० 4591

2. ए० आई० आर० 1974 केरल 431

3. देवी सिंह बनाम श्रीमती सुशीला देवी, ए० आई० आर० 1972 राज० 3031

उसकी स्वीकृति तथा औचित्यपूर्ण कारण के छोड़ दिया किन्तु पत्नी घर छोड़ने का स्थायी विचार नहीं रखती थी तो पत्नी अभित्याग की दोषी नहीं मानी जायेगी।

इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय ने श्याम सन्दर कोहली बनाम सुषमा कोहली के मामले में यह अभिनिधारित किया कि अगर पति गलत आधार बताकर पत्नी से विवाह विच्छेद की आज्ञप्ति चाहता है किन्त पत्नी पति के घर को छोडने का स्थायी विचार नहीं रखती तथा उसके साथ रहना चाहता ह ता ऐसी स्थिति में पति को पत्नी के विरुद्ध अभित्याग करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।

पुनः आन्ध प्रदेश उच्च न्यायालय ने श्रीमती स्वर्ण लता बनाम पी० रवि कुमार, के वाद में यह आभानधारित किया कि जहाँ पति ने अभित्याग के आधार के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद की कोई याचिका न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया हो और जहाँ पत्नी ने भी कोई वाद हिन्दू विवाह अधिनियम का धारा 9, दाम्पत्य अधिकार के पुनर्स्थापन के सम्बन्ध में न्यायालय के सामने प्रस्तुत किया हो वहाँ पति के द्वारा प्रस्तुत की गई विवाह विच्छेद की याचिका विफल हो जायेगी।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक वाद में यह कहा था कि यदि पति-पत्नी को भरण-पोषण प्रदान करने में असफल रहा है तो वह अभित्याग का युक्तियुक्त कारण नहीं हो सकता।

उपरोक्त मत की सम्पुष्टि करते हये छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि यदि न्यायालय ने भरण-पोषण के लिये पति को आदेश दिया है और पति भरण-पोषण करने में असफल रहा है तो ऐसी स्थिति में पति को पत्नी के विरुद्ध अभित्याग का आदेश नहीं दिया जा सकता।’

अभित्याग के लिए निम्नलिखित बातों का होना आवश्यक है-

(1) बिना युक्तियुक्त कारण के अभित्याग।

(2) बिना सहमति के।

(3) याची (Petitioner) की इच्छा के विरुद्ध।

(4) याची की स्वेच्छापूर्वक उपेक्षा के बिना।

(5) यह याचिका देने के समय से पूर्व शीघ्र व्यतीत होने वाले दो वर्ष से होना चाहिये।

जहाँ पत्नी ने पति की सहमति के बिना घर छोड़ दिया और पति दो वर्ष पूरा होने के पूर्व ही विवाह भंग करने की याचिका दायर करता है वहाँ याचिका इस आधार पर खारिज कर दी गई कि पति ने पत्नी को दो वर्ष के भीतर घर लौटने का इन्तजार किये बिना ही याचिका दायर कर दी।

अध्यतम्मा भट्टर अलवर बनाम श्री देवी के वाद में पति एवं पत्नी ने अपना विवाह हिन्द्र रीति के अन्तर्गत किया था। विवाहोपरान्त पत्नी का आचरण पति के प्रति ठीक नहीं था, वह हमेशा पति की उपेक्षा करती थी तथा विवाह के कुछ दिनों पश्चात् वह अपने माता-पिता के घर वापस चली गयी और वहां उसने अपने बच्चों को जन्म दिया। इस दौरान पति हमेशा इस बात का प्रयास करता रहा कि वह उसके साथ रहे लेकिन पत्नी अपने पति के घर वापस नहीं लौटी। तत्पश्चात् पति ने हिन्द विवाह अधिनियम की धारा 10 के अधीन न्यायिक पृथक्करण का वाद दायर किया। प्रस्तुत मामले में न्यायालय ने सम्प्रेक्षित किया कि पति हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 10 के अन्तर्गत विवाह विच्छेद की आज्ञप्ति पाने का अधिकारी है।

1. एनबी० रुक्मनी बनाम पी० एम० श्रीनिवास, ए० आई० आर० 1984 कर्ना० 1311

2. ए० आई० आर०2004 एस० सी० 5111

3. ए० आई० आर० 2014 ए० पी० 64. .

4. जार्जियान बनाम एडवर्ड, ए० आई० आर० 1957 इलाहाबाद 31

5. श्रीमती शशिकला पाण्डेय बनाम रमेश पाण्डेय, ए० आई० आर० 2009 छत्तीसगढ़ 011

6. श्रीमती शकुन्तला कुमारी बनाम ओम प्रकाश घई, ए० आई० आर० 1981 देहली 531 देखिये ललिता देव नाथ नीमज बनाम देव नाथ गोपीचन्द नीमज, ए० आई० आर० 2011 बम्बई 291 7. ए० आई० आर० 2002 एस० सी० 89.

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