LLB Hindu Law Part 2 Vivah Post 2 Book Notes Study Material PDF Free Download

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विवाह की अर्वाचीन विधि (LLB Hindu Law Notes)

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955इस अधिनियम ने हिन्दू विवाह की विचारधारा में बहुत ही महत्वपूर्ण परिवर्तन किया। सामाजिक विधानों के इतिहास में यह विधान एक मेरुदण्ड है।

यह अधिनियम 18 मई, 1955 को लाग हआ। धारा 2 के अनुसार यह अधिनियम हिन्दुओं पर लागू होता है वे चाहे जिस वर्ग के हो, अथवा जिस किसी प्रगतिशील मान्यता के हों। इस प्रकार यह लिंगायत, ब्रह्म तथा आर्यसमाजियों पर लागू होता है, भले ही वे रूढ़िवादी हिन्दू पद्धति से अलग हो गये हों। इसी प्रकार अधिनियम जैन, सिक्ख तथा बौद्धों पर भी लागू होता है एवं इन उपरोक्त धर्मों में दूसरे धर्म से परिवर्तन करके आये हुए व्यक्तियों पर भी लागू होगा। इस सन्दर्भ में अधिनियम अत्यन्त व्यापक प्रभाव का है तथा इन उपरोक्त धर्मावलम्बियों के बीच विवाह की अनुमति प्रदान करता

सोनदूर गोपाल बनाम सोनदूर रजनी,1 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने इस अधिनियम के क्षेत्राधिकार को स्पष्ट करते हुये यह अभिनिर्धारित किया कि जहाँ पति एवं पत्नी तथा उसके कुटुम्ब भारत के मूल अधिवासी होना पाये गये हों और वह विश्व के किसी भी भाग में निवास करते हों तो ऐसी परिस्थिति में भी वह हिन्दू विधि के द्वारा ही शासित होंगे।

यह अधिनियम विवाह सम्बन्धी समस्त विधियों, पाठों, रूढ़ियों एवं नियमों को जो इसके पूर्व लागू थे, निरस्त करता है। धारा 4 में अधिनियम के प्रावधानों की पूर्व विधि के निरस्तकारी प्रभाव को स्पष्ट कर दिया गया है।

वर्तमान विधि में विवाह का स्वरूप

इस अधिनियम ने विवाह के धार्मिक स्वरूप को बदल दिया। विवाह को अब पुनीत संस्कार के अर्थ में नहीं माना जा सकता जैसा कि पूर्व विधि में माना जाता था। पूर्व विधि में विवाह पति-पत्नी में एक अविच्छिन्न सम्बन्ध उत्पन्न करता था, जिस सम्बन्ध को किसी भी स्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता था। विवाह का संस्कारात्मक (Sacramental) स्वरूप अधिनियम के अन्तर्गत समाप्त हो गया है। पिनिती वेन्कटरमन बनाम स्टेट के मामले में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने हिन्दू विवाह के विषय में निम्नलिखित मत व्यक्त किया है

“इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि हिन्दू विवाह एक धार्मिक संस्कार है। सभी पाठों के अनुसार यह एक संस्कार है, और यही एक संस्कार है जो स्त्रियों के लिए भी विहित किया गया है। यह एक मुख्य धार्मिक अनुष्ठान है जो आत्मा की पवित्रता के लिये आवश्यक बताया गया है। जीवन में यह बाध्यकारी है, क्योंकि जैसे ही वैवाहिक अग्नि के समक्ष सप्तपदी द्वारा विवाह पूरा हो जाता है, उससे एक वैवाहिक धार्मिक बन्धन बन जाता है जो एक बार बन जाने के बाद तोड़ा नहीं जा सकता है। यह एक संविदा मात्र नहीं है जिसमें सहमति देने वाले पक्षकार वयस्क होते हैं। विवाहित व्यक्ति अवयस्क हो सकता है, अथवा अस्वस्थ मस्तिष्क का

1. ए० आई० आर० 2013, एस० सी० 2678.

2. ए० आई० आर० 1977 आंध प्र० 43।

हो सकता है। यदि विवाह धार्मिक क्रियाओं को सम्पन्न करके पूरा किया गया है तो वह मान्य विवाह माना जायेगा।”

आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय का उपर्युक्त मत अधिनियम में दिये गये विवाह के स्वरूप के सम्बन्ध में न्यायसंगत नहीं है क्योंकि अब यह धार्मिक बन्धन नहीं रह गया है और न ही एक ऐसा सम्बन्ध कहा जा सकता है जो नहीं तोड़ा जा सकता। अधिनियम के अन्तर्गत ऐसे अनेक अनुतोष जैसे कि विच्छेद, न्यायिक पृथक्करण तथा विवाह की अकृतता की घोषणा आदि प्रदान किये गये जिससे प्राचीन विधि के अनुसार विवाह की पवित्रता तथा मान्यता भी समाप्त हो गई।

अधिनियम के प्रावधानों के अधीन विवाह को संविदात्मक रूप प्रदान कर दिया गया है-अब हिन्दू विवाह अधिनियम की धाराओं के अन्तर्गत एक संविदा के समान हो गया है जिसको वैवाहिक जीवन की अवस्था में भग्न किया जा सकता है। वर्तमान अधिनियम में विवाह-विच्छेद विवाह की अकृतता तथा न्यायिक पृथक्करण के जो अनुतोष प्रदान किये गये हैं, उससे विवाह के मूल रूप में परिवर्तन हो गया है। इस सम्बन्ध में विवाह-विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 के द्वारा और अधिक क्रांतिकारी परिवर्तन लाये गये जिसमें सहमति से विवाह-विच्छेद, न्यायिक पृथक्करण तथा विवाह-विच्छेद के आधारों का एकीकरण अत्यन्त प्रमुख हैं। इससे विवाह का संस्कारात्मक स्वरूप पूर्णतया मलिन हो गया है। विवाह अधिनियम, 1955 के मूल पाठ में विवाह-विच्छेद के प्रावधान से संस्कारात्मक स्वरूप प्रभावित अवश्य हुआ था किन्तु नष्ट नहीं हुआ था। कुछ विशेष परिस्थितियों में धारा 13 के अधीन कठिनता से विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति प्राप्त की जा सकती थी, किन्तु 1976 के विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम ने विवाह को एक संविदात्मक रूप ही प्रदान कर दिया है तथा विवाह-विच्छेद को अत्यन्त सरल बना दिया। मूल अधिनियम में विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति शीघ्रता में पास करने का प्रावधान नहीं था, इसीलिये विवाह से एक वर्ष बाद ही कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर (जब कि एक वर्ष बीतने के पूर्व ही विच्छेद की याचिका दायर करने का अधिकार प्रदान कर दिया गया है) विवाह-विच्छेद की याचिका दायर की जा सकती थी। इसके पीछे उद्देश्य यह था कि विवाह के पक्षकारों को इस बात का अवसर दिया जाय कि वे अपने विवाह समाप्त करके पुनः सुखमय जीवन व्यतीत करें। इस उद्देश्य की पूर्ति की धारणा न्यायिक पृथक्करण के अनुतोष के पीछे थी। किन्तु अब संशोधन अधिनियम, 1976 में ये सारी बातें समाप्त कर दी गईं। न्यायिक पृथक्करण एवं विवाह-विच्छेद के आधार एक समान हो गये। इससे वस्तुत: न्यायिक पृथक्करण के अनुतोष की उपयोगिता ही समाप्त हो गयी। उन्हीं आधारों पर विवाह के पक्षकार विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति लेना चाहेंगे, न कि न्यायिक पृथक्करण की। संशोधन अधिनियम, 1976 के बाद जारता (Adultry) के एक ही कृत्य पर अथवा यौन-सम्बन्धी बीमारी तथा मस्तिष्क की विकृतता का कोई साक्ष्य उत्पन्न होने पर विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति प्राप्त की जा सकती है जब कि इससे पूर्व जारता की दशा में रहने पर, अर्थात् जारता के अनेक कृत्य किये जाने पर इस प्रकार का अनुतोष प्रदान किया जाता था। यौन सम्बन्धी बीमारी एवं मस्तिष्क की विकृतता कुछ निश्चित अवधि तक रहने पर ही विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति प्राप्त की जा सकती थी। अब इन बातों के अभाव में विच्छेद का अनुतोष अत्यन्त सरल बना दिया गया है। इसके अतिरिक्त विवाह के पक्षकार आपसी सहमति से विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति प्राप्त कर सकते हैं। परस्पर सहमति से विच्छेद की आज्ञप्ति प्राप्त करने का प्रावधान विवाह में दोषिता का सिद्धान्त’ (Fault Theory), (जिसके अन्तर्गत विच्छेद की याचिका पक्षकार के दोषी होने पर ही दायर की जा सकती है। निष्प्रभावी हो गया। अब पक्षकारों में दोष न होने की दशा में भी विवाह का कोई पक्षकार दूसरे पक्षकार की सहमति से विवाह-विच्छेद की याचिका दायर करके आज्ञप्ति प्राप्त कर सकता है।

उपर्युक्त संशोधन के पश्चात् ‘दोषिता का सिद्धान्त’ गौण हो गया है तथा पाश्चात्य दर्शन से उत्प्रेरित ‘विवाह की विफलता’ (Breakdown theory of Marriage) के सिद्धान्तों को प्रमुख स्थान। प्रदान किया गया है। ऐसी स्थिति में विवाह के पक्षकार मुख्य रूप से पारस्परिक सहमति के ही आधार

पर विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति लेना पसन्द करेंगे न कि धारा 13 में दिये गये किसी दोष को साबित करके। विवाह की विफलता (Breakdown Theory) के सिद्धान्त को अपनाकर हिन्दू विवाह की अवधारणा को एक घातक ठेस पहुंची थी किन्तु परस्पर सहमति से विवाह-विच्छेद का प्रावधान बनाकर उसकी पहचान एवं गरिमा ही समाप्त कर दी गई।

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इस प्रकार विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 के उपबंधों के ही आधार पर प्रो० डेरेट ने यह निष्कर्ष निकाला कि भारत में एक विवाह-विधि की हत्या कर दी गई। हिन्दू विवाह के मूल स्वरूप में आमूल परिवर्तन हो गया है। विवाह अधिनियम, 1955 के प्रावधानों में विवाह के किसी एक पक्षकार के दोषी होने पर न केवल न्यायिक पृथक्करण बल्कि विवाह-विच्छेद का भी अनुतोष प्राप्त किया जा सकता था, किन्तु 1976 के संशोधन के बाद बिना किसी दोष के पारस्परिक सहमति से

वैवाहिक सम्बन्ध को समाप्त किया जा सकता है। इस प्रकार के प्रावधान ने विवाह के शेष बचे हुये मूल स्वरूप को समूल नष्ट कर दिया।

पारस्परिक सहमति से विवाह-विच्छेद के प्रावधान की उपयोगिता एक विवादित विषय है। भारत जैसे देश में जहाँ अब भी प्राचीन वैवाहिक मूल्य एवं परम्पराएँ एक विशिष्ट स्थान रखते हैं तथा अधिनियम में दिये गये प्रावधानों का नगण्य प्रयोग किया जाता है, जबकि केवल कुछ महानगरों तथा शिक्षित समाज को छोड़कर इनका प्रयोग नहीं होता, वहाँ यह सोचना कि पारस्परिक सहमति से विवाह-विच्छेद का प्रयोग सामान्य रूप से हो सकेगा, यह एक संदिग्धपूर्ण बात है। भले ही समाज के बदलते हुए परिवेश में इन वैवाहिक उपचारों की अतीव आवश्यकता थी, फिर भी इनके प्रयोग के सम्बन्ध में कोई स्पष्ट रूप नहीं विकसित हो सका है। श्रीमती गुरु वचन कौर बनाम प्रीतम सिंह, के वाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने पारस्परिक सहमति के विवाह-विच्छेद के प्रावधान को, अत्यन्त निर्बल आधार बताया साथ में यह भी मत अभिव्यक्त किया कि यह आधार हिन्दू संस्कृति के अनुरूप नहीं है।

___ भारतीय समाज के आधुनिक परिप्रेक्ष्य में इस बात का भी भारी भय है कि पारस्परिक सहमति स्वेच्छापूर्ण होगी तथा न्यायालय स्वेच्छापूर्ण सहमति का पता आवश्यक रुचि लेकर लगायेगा।

इसके अतिरिक्त बाल-विवाह अवरोध अधिनियम, 1978 के अधीन वर और कन्या की वैवाहिक आय को बढ़ा दिया गया है। अब विवाह के लिए कन्या की न्यूनतम आयु 18 वर्ष तथा वर की आय 21 वर्ष होनी चाहिये। कन्या का विवाह 18 वर्ष से पूर्व करने का प्रश्न ही नहीं उठता, अतएव उसको विवाह के लिए स्वीकृति देने की सक्षमता-सम्बन्धी उपबन्ध समाप्त कर दिया गया। इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव यह होगा कि कन्या 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने पर वयस्क हो जायेगी और वह अपना जीवनसाथी स्वयं चुनने में समर्थ हो जायेगी। ऐसी स्थिति में उसके संरक्षक की स्वीकृति अर्थहीन हो जायेगी। हिन्ट विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 6 में संरक्षकों की एक सूची प्रदान की गई थी किन्त उपर्यक्त संशोधन के कारण धारा 6 निरस्त कर दी गई है। इस प्रकार संशोधित उपबन्ध के सन्दर्भ में यह कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि इससे संरक्षक द्वारा कन्या को दान दिये जाने की बात, जो पूर्व हिन्दू विवाह की सार थी, अब गौण हो गयी है। इससे कन्या को अपना विवाह स्वयं तय करने की प्रेरणा मिलती है और यदि वह स्वयं इस प्रकार के अधिकार का प्रयोग करती है तो विवाह पूर्णरूप से एक संविदा ही होगी, संस्कार नहीं।

इन सभी बातों के रहते हुए यह तथ्य उल्लेखनीय है कि विवाह का धार्मिक अनुष्ठान-सम्बन्धी स्वरूप अधिनियम के अन्तर्गत कायम रखा गया है। धारा 7 के अनुसार विवाह की वैधता के लिए धार्मिक क्रियाओं का किया जाना आवश्यक है। यदि विवाह में उचित धार्मिक क्रियाएँ उदाहरणार्थ ‘सप्तपदी-गमन’ नहीं की गयीं तो विवाह विधिमान्य नहीं माना जायेगा। विवाह में धार्मिक अनुष्ठान

1. देखिए प्रो० जे० डी० एम० डेरेट : “दी डेथ आव ए मैरिज लॉ’।

2. ए० आई० आर० 1998 इला० 141|

सम्पन्न कराये जाने की आवश्यकता पर बल देने के परिणामस्वरूप यह कहना कि इसका संस्कारात्मक स्वरूप अवशेष रह गया है गलत होगा क्योंकि इन अनुष्ठानों मात्र से विवाह को संस्कारात्मक नहीं कहा गया था। धारा 7 में इस प्रकार के प्रावधान की मौजूदगी में हम केवल यही निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि विवाह का संस्कारात्मक स्वरूप तो नष्ट हो गया है किन्तु धार्मिक अनुष्ठान सम्बन्धी स्वरूप कायम रखा है।

विवाह विधि में परिवर्तनविवाह-विधि को संहिताबद्ध करने के साथ-साथ जो महत्वपूर्ण परिवर्तन इस अधिनियम में लाये गये, वे इस प्रकार हैं-

(1) अन्तर्जातीय विवाह निषिद्ध नहीं किया गया। अधिनियम की धारा 29 के अनुसार पूर्व-सम्पन्न अन्तर्जातीय विवाह को भी वैध करार दिया गया।

(2) एक-विवाह (Monogamy) को विधिमान्य बनाया गया। धारा 5 में यह कहा गया कि यदि कोई विवाह इस अधिनियम के बाद सम्पन्न हुआ है और विवाह के पक्षकारों का कोई स्त्री अथवा पति जीवित है तो वह विवाह शून्य समझा जायगा।

(3) बहु-विवाह को भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत अपराध घोषित कर दिया गया।

(4) वैध-हिन्दू विवाह की शर्तों एवं आवश्यकताओं को सरल बना दिया गया। सपिण्ड के सीमा-क्षेत्र को कम कर दिया गया एवं प्रतिषिद्ध सम्बन्धों को परिभाषित करके सीमित कर दिया गया।

(5) न्यायिक बिलगाव, विवाह-विच्छेद तथा विवाह की अकृतता की सुविधायें प्रदान की गयीं।

(6) शून्य तथा शून्यकरणीय विवाहों से उत्पन्न सन्तानों को भी वैधता प्रदान की गयी।

(7) वैवाहिक मामलों में नये अनुतोष (Matrimonial reliefs) प्रदान किये गये।

(8) न्यायालयों द्वारा सन्तानों के संरक्षण तथा भरण-पोषण के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण अधिकार प्रदान किये गये। इस अधिनियम को सर्वोपरि प्रभाव प्रदान किया गया है। धारा 4 के अनुसार हिन्दू-विधि का कोई पाठ, नियम या प्रथा, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ होने के पूर्व प्रचलित थी, उन सभी बातों के विषय में शून्य हो जायेगी जिनके लिए इस अधिनियम में उपबन्ध प्रदान किये गये। इसके अतिरिक्त अन्य विधियाँ, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ होने के पूर्व प्रचलित थीं, उस सीमा तक प्रभाव-शून्य हो जायेंगी जहाँ तक वे अधिनियम में उल्लखित उपबन्धों में से किसी से असंगत हैं।

(9) सगोत्र विवाह के निषेध को स्वीकार नहीं किया गया, परिणामतः सब सगोत्रों के साथ विवाह विधिक रूप से हो सकता है।

विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद के लिये और भी अतिरिक्त आधार प्रदान कर दिये गये, उदाहरणार्थ अभित्याग, क्रूरता आदि। इसी प्रकार स्त्रियों को पति के विरुद्ध तलाक प्राप्त करने के लिये धारा 13(2) के अधीन अतिरिक्त आधार प्राप्त हो गये हैं। तलाक और भी अधिक सरल बना दिया गया है। धारा 13(b) के अन्तर्गत परस्पर सहमति से विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति प्राप्त करने का अधिकार प्रदान कर दिया गया। इसके अतिरिक्त विवाह से एक वर्ष की अवधि व्यतीत हो जाने के बाद ही तलाक की याचिका दायर करने का अधिकार प्रदान कर दिया गया। धारा 16 के सम्बन्ध में पूर्वविधि में जो भी विधायी दोष थे, दूर कर दिया गया तथा वैवाहिक अनुतोष के अनेक आधारों को सरल बना दिया गया। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इस मत ङ्केकी अभिपुष्टि की कि विवाह दम्पत्ति का व्यक्तिक अधिकार है जिसके द्वारा परिवार, समुदाय, परिक्षेत्र के सदस्यों के ज्ञान में निवास करने का उसे अधिकार होता है तथा वह दाम्पत्य प्रास्थिति को भी

1. श्रीमती कृष्णा देवी बनाम श्रीमती तुलसा देवी, ए० आई० आर० 1972 पंजाब तथा हरियाणा 3051

करता है। पुनः उच्चतम न्यायालय ने इन्द्रशर्मा बनाम वी० के० वी० शर्मा, के वाद में यह अभिनिर्धारित किया कि हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 5 के अन्तर्गत सामान्यतया विवाह में तीन तत्व मौजूद रहते हैं जिसमें प्रथम रूप से विवाहित होने का करार, द्वितीय पति-पत्नी के रूप में पक्षकारों का एक साथ रहना और तृतीय, लोगों के बीच इस आशय को प्रकट करना कि वह विवाहित हैं साथ ही न्यायालय ने उपरोक्त वाद में इस बात की भी अभिपुष्टि कि कोई भी विवाहित व्यक्ति के बीच विवाह के पश्चात् इस तरह का सम्बन्ध स्थापित होता है कि वह एक दूसरे को हर परिस्थितियों में सहयोग करे और अपने कर्तव्यों का निर्वहन पति पत्नी के रूप में करे और इस सम्बन्ध का मजबूती से पालन करे और जहाँ पक्षकारों के बीच ऐसा करना सम्भव नहीं है वहाँ पक्षकारों को हिन्दू विवाह (संशोधन) अधिनियम, 1976 के अन्तर्गत उन्हें विवाह समाप्त करने का अधिकार दे दिया गया है।

अभी हाल में उच्चतम न्यायालय ने पुन: इस बात की अभिपुष्टि की कि जहाँ कोई स्त्री पुरुष काफी समय से पति-पत्नी की तरह रह रहे हों और समाज के लोग उन्हें पति-पत्नी समझते हों और उन्होंने अपने बीच कोई विवाह सम्पन्न न किया हो बल्कि उस स्त्री का नाम बैंक खाते व अन्य दस्तावेजों में अपने साथ पत्नी के रूप में दर्शाया हो वहाँ ऐसी परिस्थितियों को देखते हये न्यायालय ने ऐसी स्त्री को पत्नी का दर्जा दे दिया। न्यायालय का यह मानना था कि यद्यपि कि ऐसे मामले में हिन्दू रीति-रिवाज का पालन नहीं किया गया था लेकिन वह मानसिक रूप से उसको पत्नी मानता था, ऐसी परिस्थिति में ऐसी स्त्री को पत्नी की उपधारणा की जायेगी।

विवाह की आवश्यक शर्ते (अधिनियम की धारा 5 के अन्तर्गत)-अधिनियम के अन्तर्गत विवाह के लिये सजातीयता आदि को आवश्यक नहीं माना गया। बाल-विवाह (अवरोध) अधिनियम, 1978 के पास होने के उपरान्त वैध विवाह के लिये पाँच शर्ते उल्लिखित की गई हैं जो इस प्रकार हैं

(1) एक विवाह-विवाह के दोनों पक्षकारों में किसी का पति अथवा पत्नी विवाह के समय जीवित नहीं होना चाहिए। (धारा 5-1)

(2) अमूढ़ता-विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 के अन्तर्गत दूसरी शर्त को निम्न प्रकार से बताया गया है-

विवाह के समय विवाह का कोई भी पक्षकार

(क) मस्तिष्क-विकृति के परिणामस्वरूप एक विधिमान्य सहमति देने के अयोग्य नहीं है, अथवा

(ख) यदि वह सहमति देने के योग्य है, किन्तु वह इस प्रकार की अथवा इस सीमा तक की मानसिक विकृति से पीड़ित नहीं है कि विवाह तथा सन्तान उत्पत्ति के अयोग्य हो, अथवा

(ग) पागलपन +[* * *] के दौरे से बार-बार पीड़ित न रहता हो। (धारा 5-4) मिरगी शब्द के लोप होने के पश्चात् अब कोई भी पक्षकार इस आधार पर विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति न्यायालय से नहीं प्राप्त कर सकता। ___

(3) आयुविवाह के समय वर 21 वर्ष का हो तथा कन्या 18 वर्ष की हो (धारा 5-3)। एक विधिमान्य विवाह के लिये वर तथा कन्या की आयु के सम्बन्ध में संसद् ने हिन्दू विवाह संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा संशोधन कर दिया है।

(4) प्रतिषिद्ध सम्बन्धों के परे होदोनों पक्षकार प्रतिषिद्ध सम्बन्ध के अन्तर्गत न आते हों। (धारा 5-4)

(5) सपिण्ड न हों-विवाह के पक्षकार एक-दूसरे के सपिण्ड न हों। (धारा 5-5)

हिन्दू विवाह की वैध शर्ते अब अधिनियम सं० 2 बाल-विवाह (अवरोध) अधिनियम, 1978 के संशोधन के परिणामस्वरूप कुछ परिवर्तित हो गई हैं। अब वैध विवाह के लिये कुल पाँच शर्ते ही आवश्यक

1. बालसम्मा पाल बनाम कोचीन वि० वि०, ए० आई० आर० 1996 एस० सी० 1011.

2. ए० आई० आर० 2014 एस० सी० 309.

3. करेदला पार्थ सारथी बनाम गाँगूला रामानम्मा, ए० आई० आर० 2015 एस० सी० 891.

4. शब्द “अथवा मिरगी” का अधिनियम संख्या 39 वर्ष 1999, धारा 2 द्वारा लोप किया गया।

5. जलागम कान्ता राव बनाम जलागम उमा महेश्वरी, ए० आई० आर० 2014 ए० पी० 53.

रह गई हैं। कन्या की आयु के सम्बन्ध में जो यह प्रावधान था कि 18 वर्ष की आय न प्राप्त करने की अवस्था में उसका विवाह बिना उसके संरक्षक की स्वीकृति के नहीं किया जा सकता है, अब समाप्त कर दिया गया है। जहाँ किसी कन्या का विवाह 15 वर्ष की आयु पूरी होने के पूर्व हो गया हो और उसने विवाह का विखण्डन कर दिया हो तो 18 वर्ष की आयु पूरी करने के पूर्व तक वह विवाह-विच्छेद का आज्ञप्ति प्राप्त कर सकती है।

धारा 5 में दी गई शर्ते विवाह की वैधता के लिये आवश्यक है। यदि ये शर्ते पूरी नहीं की गई है तो विवाह विधिमान्य नहीं समझा जायेगा। धारा में वर्णित शर्ते आवश्यक तथा निश्चित हैं, जिनके अभाव में विवाह की वैधता संदिग्धपूर्ण है।’

इस सम्बन्ध में हिन्दू विवाह के लिये कुछ अन्य शर्तो के उल्लंघन के लिये दण्ड देने की व्यवस्था अधिनियम में की गयी। धारा 5 के खण्ड (3) में उल्लिखित शर्त के उल्लंघन की अवस्था में यदि कोई . व्यक्ति अपना विवाह सम्पन्न करता है तो ऐसी अवस्था में उसे दो वर्ष के कठोर कारावास या एक लाख रुपये तक के जुर्माने की राशि से या दोनों से दण्डित किया जा सकेगा’ तथा यदि वह धारा 5 के खण्ड (4) या खण्ड (5) में उल्लिखित शर्तों का उल्लंघन करता है तो ऐसी अवस्था में एक महीने के साधारण कारावास अथवा एक हजार रुपये तक जुर्माना अथवा दोनों हो सकता है।’

(1) एक विवाह-धारा 5 (1) के अन्तर्गत यह कहा गया है कि हिन्दू अब केवल एक ही विवाह कर सकता है। इस अधिनियम के पूर्व कोई हिन्दू एक से अधिक विवाह कर सकता था, चाहे उसकी स्त्री जीवित हो अथवा नहीं। अब वैध विवाह के लिए आवश्यक है कि एक स्त्री अथवा पति के जीवित रहने पर कोई दूसरा विवाह नहीं कर सकता। यदि कोई इस प्रकार विवाह करता है तो वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 494 एवं 495 के अन्तर्गत दण्डनीय होगा। लीला थामस बनाम भारत संघ के वाद में पति ने अपनी प्रथम पत्नी के रहते हुए दूसरा विवाह सम्पन्न किया और वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 494 एवं 495 के प्रावधानों से बचने के लिए उसने अपना धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम धर्म स्वीकार कर लिया। प्रस्तुत वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि धर्म परिवर्तन द्वारा प्रथम विवाह की उपस्थिति में किसी हिन्दू विवाह के पक्षकार के द्वारा द्वितीय विवाह करना हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 17 के अन्तर्गत दण्डनीय होगा और इस हेतु भारतीय दण्ड संहिता की धारा 494 एवं 495 तथा दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 198 को निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता। हिन्दू विवाह के किसी पक्षकार के धर्म परिवर्तन करने से पूर्व हिन्दू विवाह समाप्त नहीं होता बल्कि दूसरे पक्षकार को विवाह समाप्त करने का अधिकार प्रदान करता है। इस वाद में न्यायालय ने यह भी सम्प्रेक्षित किया कि जहाँ पक्षकार इस तरह का कोई कृत्य करता है वह भा० द० सं० की धारा 494 एवं 495 का दोषी होगा। [धारा 17] श्रीमती यमुनाबाई अनन्तराव आधव बनाम अनन्तराव शिवराम आधव के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि धारा 5 की इस प्रथम शर्त के उल्लंघन में वह विवाह अकृत एवं शून्य हो जाता है और इस प्रकार के विवाह प्रारम्भत: एवं स्वत: शून्य होते हैं तथा शून्य विवाह में पत्नी दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अन्तर्गत भरण-पोषण का भी दावा नहीं कर सकती।

गुलबिया बनाम सिताबिया के वाद में पति ने अपनी पहली पत्नी के रहते हुये एक अन्य स्त्री से दूसरा विवाह रचाया और उस विवाह के परिणामस्वरूप उसकी दूसरी पत्नी से सन्ताने भी उत्पन्न हुयीं। प्रस्तुत मामले में न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि पति के द्वारा किया गया दूसरा

1. देखिये बाल विवाह अवरोध (संशोधन) अधिनियम, 1978 (अधिनियम संख्या 2, 1978)।

2. धारा 7-सी (iv) विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 19761

3. श्रीमती राजेशबाई बनाम शान्ताबाई, ए० आई० आर० 1982 बा० 2311

4. 2007 के अधिनियम संख्या 6 की धारा 20 द्वारा प्रतिस्थापित।

5. 1978 के अधिनियम संख्या (2) के द्वारा संशोधित।

6. वीरास्वामी बनाम अप्पास्वामी (1863) 1 मद्रास एच० सी० 341

7. ए० आई० आर० 2000 एस० सी० 16501

8. ए० आई० आर० 1988 एस० सी० 6441

9. ए० आई० आर० 2006 एन० ओ० सी० 1379 इलाहाबाद। देखिये नीलेश नारायन राजेश लाल बनाम कश्मीरा भूपेन्द्र बाई बंकर, ए० आई० आर० 2010 गुज० 31

विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 5(1) के विपरीत था, जो कि प्रारम्भत: शून्य है। ऐसी परिस्थितियों में पत्नी को पति की सम्पत्ति में भी किसी प्रकार का कोई अधिकार नहीं होगा। पुन: मद्रास उच्च न्यायालय ने स्वामीनाथन बनाम पलानी अम्मल के वाद में भी इस मत की अभिपुष्टि की।

महावीर बनाम सुकुमार तुला जोगन्डा, के वाद में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने यह मत अभिव्यक्त किया कि पति का दूसरी पत्नी के साथ विवाह को विधि मान्य नहीं माना जायेगा जिसने अपनी प्रथम पत्नी के विरुद्ध विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त किये बिना ही दूसरा विवाह रचाया।

उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों ने यह मत अभिव्यक्त किया है कि किसी विवाह के पक्षकार को बहुविवाह के अपराध के लिए तभी दण्ड दिया जा सकता है, यदि प्रथम विवाह धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से सम्पन्न किया गया हो। दूसरा विवाह, विवाह के किसी पक्षकार की स्वीकृति मात्र से नहीं मान लिया जायेगा। आवश्यक धार्मिक कृत्य तथा रीति-रिवाजों का सिद्ध किया जाना विवाह की वैधता के लिए आवश्यक है। बहुविवाह का अपराध तभी माना जायेगा जब कि बहुविवाह के समय विवाह का दूसरा पक्षकार जीवित हो और पहला विवाह शून्य एवं अकृत न रहा हो। यदि वर्तमान विवाह शून्यकरणीय है तो भी बहुविवाह का अपराध पूरा हो जाता है। किन्तु प्रत्येक दशा में अपराध तभी दण्डनीय होगा यदि विवाह के आवश्यक धार्मिक अनुष्ठान पूरे कर लिए गये हों।

इसी मत का पुष्टीकरण न्यायालय ने पुनः शान्ति देव वर्मा बनाम श्रीमती कंचन प्रसाद के मामले में किया और यह कहा कि मौखिक साक्ष्यों तथा इस आशय के पत्रों द्वारा कि वे पति-पत्नी जैसे रह रहे हैं, से यह साबित नहीं किया जा सकता है कि उनका विधिवत् विवाह (धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से) सम्पन्न हो गया था।

धार्मिक अनुष्ठान के पूरा किये बिना विवाह विधिमान्य नहीं माना जायेगा। जहाँ धार्मिक अनुष्ठान ठीक तरीके से नहीं किया जाता अथवा पक्षकारों में उनकी मान्य प्रथा के अनुसार सम्पन्न नहीं किया जाता वहाँ विवाह को विधि-विहित नहीं माना जायेगा। डॉ० डी० एन० मुकर्जी बनाम स्टेट के वाद में डॉ० मुकर्जी को द्विविवाह के अपराध के आरोप में अभियोजित किया गया। डॉ० मुकर्जी की पहली पत्नी जीवित थी जब कि उन्होंने प्रणय क्रीड़ा दूसरी स्त्री के साथ प्रारम्भ किया और उसके साथ विवाह का स्वांग रचाया। दूसरा विवाह तीन प्रकार के धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से पूरा हआ बताया जाता है। तीनों धार्मिक अनुष्ठान अलग-अलग तरीकों से भिन्न-भिन्न समयों पर सम्पन्न किये गये। प्रथम, चन्द्र अनुष्ठान अर्थात् पूर्णिमा की रात्रि में चन्द्रमा को साक्षी करके विवाह करना, द्वितीय, कालीजी के मन्दिर में मति के समक्ष एक दूसरे के गले में हार डालकर सात पग साथ-साथ चलना. ततीय गरुग्रंथ साहब के समक्ष इस आशय की शपथ लेना कि वे आपस में विवाह कर रहे हैं। इन तीनों धार्मिक अनष्ठानों में कोई भी ऐसा नहीं था जो वर अथवा वधू के यहाँ मान्य वैवाहिक अनुष्ठानों के अनकल हो। परिणामस्वरूप यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने इस विवाह को विधि के अनुसार किया हो। अतः दसरे विवाह को विधि की दृष्टि में विवाह नहीं माना जा सकता था और द्विविवाह का अपराध साबित न हो सका। इस प्रकार इस अधिनियम के तहत धार्मिक अनुष्ठानों को पूरा न करके अथवा विधिवत सम्पन्न न करके कोई हिन्दू दूसरी पत्नी पहली पत्नी के ही जीवन-काल में रख सकता है। जिसके लिये इस अधिनियम के अन्तर्गत कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती।

1. ए० आई० आर० 2009 एन० ओ० सी० 221 मद्रास। देखिये मेधा प्रसाद बनाम भाग्यवंती बाई, ए० आई० आर० 2010 छत्तीसगढ़ 251

2. ए० आई० आर० 2013 (एन० ओ० सी०) 331 कर्नाटक।

3.  रदराजन बनाम स्टेट ऑफ मद्रास, ए० आई० आर० 1965 एस० सी० 50 : ए० आई० आर० 1963 पं० 2351

4. प्रियलता बनाम सुरेश, ए० आई० आर० 1971 एस० सी० 1153।

5. ए० आई० आर० 1991 एस० सी० 8161

6. ए० आई० आर० 1969 इला० 4891

धारा 5 (1) के अनुसार, प्रथम विवाह के पक्षकार के जीवित रहने पर कोई भी दूसरा विवाह विधि के प्रतिकूल तथा निष्पभ होगा, चाहे वह दूसरा विवाह भारत के बाहर ही किया गया हो। विवाह का पक्षकार उस दशा में बहुविवाह का अपराध करता है, चाहे विवाह संसार के किसी कोने में किया गया हो। विवाह के पक्षकारों के आशय मात्र से, चाहे वह कितने ही सच्चे भाव से हो, उनमें पति-पत्नी का सम्बन्ध नहीं उत्पन्न हो जाता।

सोना रक्साल बनाम विनोद कुमार नायक, के मामले में न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि जहाँ पति का पहला विवाह अस्तित्व में है और वह अपना दूसरा विवाह किसी स्त्री से इस आधार पर सम्पन्न करता है कि उसने अपने पहले विवाह का विवाह-विच्छेद अपने जाति के प्रथागत रीति से कर लिया है, वहाँ उसका दूसरा विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 5(1) के विपरीत शर्तों के अन्तर्गत होगा और न्यायालय को ऐसे मामले में यह अधिकार होगा कि ऐसे सम्पन्न किये गये विवाह को शून्य एवं निरस्त घोषित करे।

श्रीमती सन्तोष कुमारी बनाम सुरजीत सिंह के मामले में न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि यदि पत्नी ने वाद दायर कर इस आशय की घोषणा प्राप्त कर लिया कि पति उसके जीवन-काल में दूसरा विवाह कर सकता है, वहाँ पत्नी की इस सहमति के बावजूद पति द्वारा दूसरा विवाह किया जाना अवैध होगा और न्यायालय द्वारा इस प्रकार का निर्णय दिया जाना कि पति दूसरा विवाह कर सकता है गलत एवं अवैध होगा।

अभी हाल में देरवा व अन्य बनाम गंगवा व अन्य के मामले में न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि अगर कोई व्यक्ति अपनी पहली पत्नी की मौजूदगी में किसी अन्य स्त्री से दूसरा विवाह करता है तो ऐसे विवाह का कोई अस्तित्व नहीं होगा अर्थात वह विवाह प्रारम्भतः शून्य समझा जायेगा। इसके साथ ही न्यायालय ने यह भी अभिनिर्धारित किया कि ऐसी पत्नी को मृतक की सम्पत्ति में किसी भी प्रकार का कोई प्रतिफल प्राप्त नहीं होगा।

धारा 5 की इस प्रथम शर्त के उल्लंघन होने पर दो परिणाम उत्पन्न होते हैं—(1) धारा 11 के अनुसार विवाह अकृत एवं शून्य हो जायगा, तथा (2) धारा 17 के अनुसार जो भी पक्षकार शर्त का उल्लंघन करेगा, भारतीय दण्ड संहिता (धारा 494 एवं 495) के अनुसार दण्ड का भागी होगा। पुनः यह प्रश्न उठता है कि विवाह का कोई पक्षकार क्या दूसरे पक्षकार को निषेधाज्ञा द्वारा विवाह करने से रोक सकता है? उमाशंकर बनाम राजदेवी वाले वाद में न्यायालय ने इसका उत्तर सकारात्मक दिया और कहा कि हिन्दू विवाह अधिनियम में इस सम्बन्ध में किसी खास प्रावधान के न होते हए भी विवाह का कोई पक्षकार निषेधाज्ञा द्वारा दूसरे पक्षकार को विवाह करने से रोक सकता है। मैसूर उच्च न्यायालय ने शंकरप्या बनाम वसप्पा वाले वाद में स्पष्ट रूप से यह निर्णय दिया की पत्नी पति को निषेधाज्ञा द्वारा दूसरा विवाह करने से रोक सकती है। विवाह के पक्षकारों का, किसी एक पक्षकार के द्वारा दूसरा विवाह करने की आशंका में निवारक अनुतोष (Preventive remedy) प्राप्त करने का सामान्य अधिकार समाप्त नहीं हो जाता। धारा 5 (1) में जो बहुविवाह का प्रतिषेध है, वह संविधान के अनच्छेद 25 का उल्लंघन नहीं करता। यदि विवाह धारा 5 (1) के उल्लंघन में हुआ है। तो ऐसे पक्षकारों के अतिरिक्त कोई भी तीसरा व्यक्ति जो किसी भी रूप से इस प्रकार के विवाह से

1. माइल्स बनाम चिलतन, 1 राव० 6841

2. ए० आई० आर० 2012 छत्तीसगढ़ 100।

3. 1967 पटना 201

4. ए० आई० आर० 2006 एन० ओ० सी० कर्नाटक 5351

5. मो० इकराम बनाम स्टेट ऑफ यू० पी०, ए० आई० आर० 1964 एस० सी० 19251

6. 1987 पटना 201

7. 1964 मैसूर 2471

८ राम प्रसाद बनाम स्टेट ऑफ यू० पी०, ए० आई० आर० 1961 इला० 3341

पीड़ित हुआ है विवाह की वैधता को चुनौती दे सकता है और न्यायालय ऐसे विवाह को शून्य एवं निष्प्रभावी घोषित कर सकता है। इसी आशय का वाद पंजाब उच्च न्यायालय ने सुरजीत सिंह बनाम मोहिन्दर पाल सिंह के मामले में निर्णीत किया और इस बिन्दु पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा निर्णीत वाद रामप्यारी बनाम धरमदास का पुष्टिकरण किया।

लेकिन डॉ० सूरजमणि बनाम दुर्गाचरण हंसदा, के मामले में उच्चतम न्यायालय में यह अभिनिर्धारित किया कि हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत कोई ऐसा पक्षकार जो अनुसूचित जनजाति का है यदि उसने दूसरा विवाह अपनी प्रथा एवं रूढ़ि के अनुसार किया है तो ऐसा पक्षकार हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 2 (2) एवं धारा 11 तथा भा० द० सं० की धारा 494 के अन्तर्गत बहु विवाह का दोषी नहीं ठहराया जायेगा। प्रस्तुत मामले में न्यायालय ने यह भी अभिमत व्यक्त किया कि यदि अनुसूचित जनजाति में प्रथा एवं रीति-रिवाज के अन्तर्गत बहु विवाह को मान्यता प्रदान की गयी है तो ऐसी स्थिति में रूढ़ि एवं प्रथा सर्वोच्च होगी।

(2) अमूढ़ता-धारा 5(2) विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 के अन्तर्गत यह आवश्यक है कि विवाह के समय विवाह का कोई पक्षकार

(क) मस्तिष्क-विकृति के परिणामस्वरूप एक विधिमान्य सहमति देने के अयोग्य नहीं है, अथवा (ख) यदि सहमति देने के योग्य है, किन्तु वह इस प्रकार की मानसिक विकृति अथवा इस

सीमा तक की मानसिक विकृति से पीड़ित नहीं है कि विवाह तथा सन्तान उत्पत्ति के अयोग्य हो, अथवा

(ग) पागलपन अथवा मिरगी के दौरे से बार-बार पीड़ित रहता हो।

(घ) जो व्यक्ति बौद्धिक शक्ति में इतना कमजोर हो कि वह सही बात न समझ सकता हो।

इस बात के उल्लंघन होने पर धारा 12 के अनुसार विवाह शून्यकरणीय हो जाता है। (धारा 12-ब)। इस धारा में “विवाह के समय” का यह अर्थ होता है कि यदि पक्षकार विवाह के समय स्वस्थ मस्तिष्क था, किन्तु बाद में अस्वस्थ-मस्तिष्क का अथवा पागल हो गया है तो इस बात से विवाह की वैधता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

इस बिन्दु पर एक वाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है जिसमें न्यायमूर्ति श्री देवकी नन्दन ने यह मत व्यक्त किया है कि विवाह के पक्षकार में मस्तिष्क की विकृतता इस सीमा तक होनी चाहिये कि विवाह का दूसरा पक्षकार सामान्य जीवन उसके साथ न व्यतीत कर सके। इस सन्दर्भ में यह साबित किया जाना आवश्यक है कि मानसिक विकृति विवाह के समय अथवा विवाह के पूर्व से थी। यदि विवाह के बाद मानसिक विकृति विवाह के किसी पक्षकार में आ गई है तो धारा 13 के अन्तर्गत विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति दी जा सकती है।

यदि विवाह के पूर्व यह बात छिपाई गई कि विवाह का पक्षकार अस्वस्थ मस्तिष्क का था और देर से इस तथ्य का प्रकटीकरण न तो कन्या ने और न ही उसके माता-पिता ने किया तो उस स्थिति में विवाह को धारा 12 (1) (सी) के अधीन अकृत घोषित कराया जा सकता है। इस सन्दर्भ में यह नहीं कहा जा सकता कि वर का यह कर्त्तव्य था कि वह स्वयं उसके बारे में पता लगाता।

1. ए० आई० आर० 1988 पं० एवं हरि० 1561

2. ए० आई० आर० 1984 इला० 1471

3. ए० आई० आर० 2001 एस० सी० 9381

4. शब्द “अथवा मिरगी’ अधिनियम संख्या 39 वर्ष 1999, धारा 2 द्वारा लोप किया गया।

5. टाइटल बनाम जोन्स, 1934 ए० 273।

6. श्रीमती किरन बाला बनाम भैरव प्रसाद, ए० आई० आर० 1982 इला० 242, देखिये श्रीमती प्रवीनकुमारी बनाम मनमोहन कुमार, ए० आई० आर० 1984 दिल्ली 139।

इस बिन्द पर राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है जिसमें न्यायालय यह अभिनिर्धारित किया कि जहाँ पत्नी मिरगी की बीमारी से पीड़ित थी, उसने और उसके माता-पिता ने यह बात छिपाकर यदि उसका विवाह कर दिया था, तो पति को इस बात का अधिकार है कि जब भी उसे इस तथ्य का पता चले वह अपने वैवाहिक सम्बन्ध को धारा 12 (1C) के अधीन अपने विवाह को अकृत घोषित करा सकता है।

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अधीन यह नियम था कि विवाह के समय वर या वधू को जड़ (Idiot) या पागल नहीं होना चाहिये। परन्तु ऐसा विवाह शून्य नहीं था। यह केवल शून्यकरणीय था। जिसका अर्थ है कि जब तक न्यायालय द्वारा शून्यकरणीय की डिक्री पारित न हो जाये, विवाह वैध रहता था।

976 के संशोधन द्वारा इस खण्ड का गठन इस प्रकार किया गया है-विवाह के समय वर और वधू दोनों में से कोई भी (क) चित्त-विकृति के परिणामस्वरूप विधिमान्य सम्मति देने में असमर्थ न हो; अथवा (ख) विधि मान्य सम्मति देने में समर्थ होने पर भी इस हद तक मानसिक विचार से ग्रसित न

हो कि वह विवाह और सन्तानोपत्ति के अयोग्य हो, अथवा (ग) उसे उन्मत्तता (मिरगी) का दौरा बार-बार न पड़ता हो।’

सन् 1976 के संशोधन का तात्पर्य यह है कि अब वर या वधु जड़ बुद्धि या पूर्ण पागल होने पर ही विवाह के योग्य नहीं है बल्कि पागलपन की कुछ स्थितियों में भी वे विवाह करने के योग्य हैं। जिसमें पागलपन में मस्तिस्क की दुर्बलता, या सनकी होना, सम्मिलित नहीं है और इस तरह मूढ़ता, बेवकूफी, अक्खड़पन तथा अत्यधिक भावुकता, पागलपन की परिभाषा में नहीं आते।

इस सन्दर्भ में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने यह सम्प्रेक्षित किया कि यदि पति न्यायालय के समक्ष मानसिक विकृति एवं सन्तान उत्पत्ति की अयोग्यता के साक्ष्य को प्रस्तुत करने में विफल रहता है। तो वह विवाह-विच्छेद की आज्ञप्ति पाने का अधिकारी नहीं होगा।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने श्रीमती अलका शर्मा बनाम अविनाश चन्द्र के मामले में उपरोक्त उपधारा (2) का निर्वचन करते हुये यह संप्रेक्षित किया कि विवाह के अयोग्य तथा सन्तान उत्पत्ति के अयोग्य इन दोनों अभिव्यक्तियों के बीच ‘तथा’ शब्द का जो प्रयोग किया गया है उसका तात्पर्य ‘अथवा’ से है। इस प्रकार न्यायालय ऐसे विवाह को निरस्त कर सकता है जहाँ विवाह का कोई पक्षकार मानसिक विकृति के कारण विवाह के अयोग्य हो अथवा सन्तानोत्पत्ति के अयोग्य हो अथवा दोनों के अयोग्य हो। यहाँ “सन्तानोत्पत्ति” शब्द के अन्तर्गत सन्तान के पालन-पोषण की समर्थता भी शामिल है। यदि वह सन्तानोत्पत्ति के साथ उसके पालन-पोषण के लिए भी असमर्थ है तब भी सन्तानोत्पत्ति के अयोग्य माना जायेगा। प्रस्तुत मामले में विवाह के बाद पहली रात पत्नी एकदम घबराई, निष्प्राण एवं संवेग रहित पाई गयी उसने पति के साथ रतिक्रिया में किसी प्रकार का सहयोग नहीं दिया। वह घरेलू बर्तनों का भी प्रयोग नहीं कर सकती थी तथा अन्य असामान्य व्यवहार जैसे परिवार के सदस्यों की उपस्थिति में लघुशंका कर देना आदि की दोषी थी। ऐसी परिस्थिति में उसे मानसिक विकृति के दोष से युक्त समझा गया और इस आधार पर पति को उपचार पाने का अधिकारी मान लिया गया।

1. श्रीमती सरस्वती बनाम गोपाल, ए० आर० आर० 2007 राज० 331

2. धारा 5(1)

3. देखें, धारा 12 हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955.

4. हिन्दू विवाह विधि संशोधन अधि०, 1999 की धारा 2 द्वारा ‘मिरगी’ शब्द को हटा दिया गया है।

5. मिथलेश श्रीवास्तव बनाम किरन श्रीवास्तव, ए० आई० आर० 2012 छत्तीसगढ़ 21।

6. ए० आई० आर० 1991 एम० पी० 2051

पागलपन अधिनियम की धारा 3 (5) के अनुसार, प्रत्येक अस्वस्थ मस्तिष्क वाला व्यक्ति मढ़ और पागल होता है तथा यह अधिनियम विभिन्न-कोटियों के पागलपन पर विचार नहीं करता। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 (2) के दृष्टिकोण से यह प्रमाणित करना पर्याप्त होगा कि विवाह का पक्षकार विवाह के समय अस्वस्थ चित्त का था। अस्वस्थ मस्तिष्क की बात प्रमाणित करने का भार याची पर होता है जो उस आधार पर याचिका दायर करता है। अस्वस्थचित्तता का निष्कर्ष इस बात से नहीं निकाला जा सकता कि प्रत्युत्तरदाता न्यायालय के समक्ष साक्षी के रूप में नहीं उपस्थित हुआ।

विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 के अधीन मस्तिष्क की अस्वस्थता के सम्बन्ध में पूर्व खण्ड को समाप्त करके एक नया खण्ड जोड़ दिया गया, जिसके पीछे यह धारणा थी कि मूढ़ता तथा पागलपन जैसी मानसिक अस्वस्थता को और भी अधिक स्पष्ट कर दिया जाय और मानसिक अस्वस्थता के आधार पर विवाह के पक्षकारों को विवाह शून्य एवं अकृत घोषित करने का अवसर मिल सके। किन्तु धारा 5 में इस धारणा को अभिव्यक्त करने के सम्बन्ध में प्रयुक्त वाक्य वाक्-दोषयुक्त हैं। कोई भी व्यक्ति जो मस्तिष्क विकृतता से युक्त है विवाह के लिए वैध स्वीकृति किसी भी दशा में नहीं दे सकता। धारा 5(2) (क) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति कि “विवाह के समय दोनों पक्षकारों में से कोई पक्षकार चित्तविकृति के परिणामस्वरूप विधिमान्य सम्मति देने में असमर्थ न हो” अनावश्यक शब्दों के प्रयोग से दोषयुक्त प्रतीत होता है। इसी प्रकार धारा 5 (2) (ख) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति कि “यदि पति या पत्नी सहमति देने के योग्य हैं किन्तु मानसिक विकृति से इस प्रकार तथा इस सीमा तक पीड़ित हैं कि विवाह तथा सन्तान उत्पत्ति के अयोग्य हैं” पुन: इस उपधारा में गलत एवं अनावश्यक शब्दों के प्रयोग के कारण गम्य नहीं है और उससे गलत निष्कर्ष निकलता है। किसी व्यक्ति की मानसिक अस्वस्थता आवश्यक रूप से उसे सन्तानोत्पत्ति के अयोग्य नहीं बना देती। मानसिक अस्वस्थता से पुंसकता का कोई सम्बन्ध नहीं है। सामान्यत: यह जानना सम्भव नहीं है कि जो व्यक्ति मानसिक अस्वस्थता से पीड़ित है क्या वह सन्तानोत्पत्ति के अयोग्य है। विवाह के अयोग्य होना एक बात है, सन्तानोत्पत्ति के अयोग्य होना भिन्न बात है। इन दोनों पदों को एक साथ रखने से पूरे वाक्य का अर्थ ही दूषित हो गया है।

इसी प्रकार धारा 5 (2) का उपखण्ड (ग) भी संदिग्धपूर्ण अर्थ देता है। कोई व्यक्ति जो पागलपन अथवा मिरगी से विवाह के पूर्व कुछ वर्षों के लिए पीड़ित रहा है अथवा कभी मिरगी के दौरे से पीड़ित रहा है तो सदैव के लिए क्या वह विवाह के अयोग्य हो जायेगा? यह अत्यन्त आश्चर्य की बात है कि उपखण्ड (क) में एक मान्य सहमति देने की क्षमता की बात कही गई, किन्तु उपखण्ड (ग) में इस प्रकार की कोई भी बात नहीं पायी जाती। इन बातों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इस उपधारा में किसी प्रकार के संशोधन की आवश्यकता नहीं थी। इस प्रकार के संशोधन से अनिश्चितता भी आ गई है।

(3) तीसरी शर्त-आय : धारा 5 (3) इस अधिनियम के अन्तर्गत विवाह की आयु निर्धारित कर दी गयी है। वर की आयु अब बाल विवाह अवरोध (संशोधन) अधिनियम, 1978 के बाद 21 वर्ष तथा कन्या की आयु 18 वर्ष होनी चाहिये। 1978 के संशोधन अधिनियम के पूर्व वर की आयु 18 वर्ष तथा कन्या की आयु 15 वर्ष विहित की गई थी। इस शर्त का उल्लंघन विवाह को किसी भी रूप में प्रभावित नहीं करता, किन्तु धारा 18 के अनुसार यह अपराध है। पूर्व में अपराधी पक्षकार को इसका दण्ड सादा कारावास 15 दिन तक का, अथवा 1,000 रु० का जुर्माना अथवा दोनों हो सकता था। किन्तु वर्तमान में इस सम्बन्ध में अधिनियम संख्या 6 की धारा 20 के द्वारा प्रतिस्थापित संशोधन में यह प्रावधान दिया गया कि यदि कोई व्यक्ति जो धारा 5 के खण्ड (3) में उल्लिखित शर्तों का उल्लंघन करेगा तो ऐसी शर्तों के उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को 2 वर्ष के कठोर

1. प्रनव बनाम कृष्णा, 1975 कल० 1091

कारावास से अथवा एक लाख रुपये तक के जुर्माने से या दोनों से दण्डित किया जा सकेगा। धारा 12(1) के अन्तर्गत उपर्युक्त संशोधन के पूर्व यदि विवाह में संरक्षक की अनुमति बल दिखा कर, धोखे से अथवा छल से प्राप्त कर ली गयी थी तो पीड़ित पक्षकार इस प्रकार के विवाह को प्रभावशून्य घोषित करवाने के लिए याचिका प्रस्तुत कर सकता है [धारा 12(1)(सी)||

श्रीमती नौमी बनाम नरत्तम तथा मोहिन्दर कौर बनाम मेजर सिंह के वादों में न्यायालय ने यह निरूपति किया कि ऐसे दो व्यक्तियों के बीच का विवाह, जो निर्धारित आयु से कम है, शून्य नहीं होता। किन्तु वह व्यक्ति जो इस प्रकार विवाह अपने लिए रचाता है वह धारा 18 (अ) के अनुसार दण्ड का भागी होगा।

पुनः इस बात की पुष्टि अभी हाल में मनीष सिंह बनाम स्टेट गवर्मेन्ट ऑफ एन० सी० टी० व अन्य के वाद में न्यायालय ने यह निरूपित किया कि जहाँ पर कोई विवाह निर्धारित आयु सीमा से कम उम्र में पक्षकारों द्वारा किया जाता है, वहाँ ऐसा विवाह उम्र की सीमा पूरा न करने से अधिनियम की धारा 11 एवं 12 के अन्तर्गत न तो शून्य होगा और न ही शून्यकरणीय माना जायेगा। बल्कि अधिनियम की धारा 18 के अन्तर्गत अवयस्क विवाह को सम्पन्न कराने वाले अपराधी पक्षकारों को 1,000/- रुपये के जुर्माने से अथवा 15 दिन के सादा कारावास से दण्डित किया जा सकता है अथवा दोनों से दण्डित किया जा सकेगा।

कोकुला सुरेश बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य व अन्य के वाद में आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस बात की सम्पुष्टि की कि यदि अवयस्क कन्या का विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 5(3) के उल्लंघन में सम्पन्न किया गया है वहाँ ऐसा विवाह न तो शून्य होगा और न ही शून्यकरणीय होगा और उस स्थिति में विवाहिता का पति ही नैसर्गिक संरक्षक माना जायेगा न कि उसका पिता।

प्राचीन हिन्दू-विधि के अनुसार कन्या की विवाह योग्य आयु 8 वर्ष से 12 वर्ष के अन्तर्गत होनी चाहिये तथा पुरुष की आयु 25 वर्ष के अन्तर्गत होनी चाहिये। किन्तु बाल-विवाह अवरोध अधिनियम, 1929 में जैसा कि 1949 ई० में संशोधित किया गया, विवाह के लिए आयु का निर्धारण पुन: किया गया, जिसके अनुसार 18 वर्ष से कम आयु वाले बालक तथा 15 वर्ष से कम आयु वाली कन्या के विवाह का निषेध कर दिया गया। जहाँ कन्या की आयु 18 वर्ष से कम हो, वहाँ कन्या के संरक्षक की सहमति आवश्यक है। सहमति का प्रावधान अभिदेशात्मक (Mandatory) था जिसका अभाव फैक्टम वैलेट के सिद्धान्त द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता। किन्तु जहाँ पक्षकारों के विवाह सम्पन्न होने के पश्चात् कुछ समय तक स्वेच्छापूर्वक, पति-पत्नी ने ऐसा रहने का चयन कर लिया है, सहमति की आवश्यकता गौण मानी जाती थी। ।

मोहिन्दर कौर बनाम मेजर सिंह के मामले में न्यायालय ने कहा कि धारा 5 में दी गई तीसरी शर्त, जो वर कन्या की आयु के सम्बन्ध में नियम बताती है, यदि पूरी नहीं हुई है तो विवाह अकृत नहीं हो जाता। इस प्रकार का आधार दाम्पत्य जीवन की पुनर्स्थापन की याचिका के उत्तर में नहीं लिया जा सकता। किन्तु विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 13 की उपधारा (2) के खण्ड

1 2007 के अधिनियम संख्या 6 की धारा 20 द्वारा प्रतिस्थापित।

2. 1963 हिमाचल प्र० 151

3. (1970) करेन्ट लॉ ज० 93 (पंजाब, एस० बी०) देखिये दुर्योधन प्रधान बनाम बंगावती दा, ए० आई० आर० 1977 उड़ीसा 361

4. ए० आई० आर० 2006 दि० 37, देखें मैकमला शैलु बनाम सुप्रिटेन्डेन्ट ऑफ पुलिस, ए० आई०

आर० 2007 ए० पी० डी० ओ० सी० 135; भुखन बनाम कौशल्याबाई, ए० आई० आर० 2012, एन० ओ० सी० 223 छत्तीसगढ़।।

5. ए० आई० आर० 2009 आन्ध्र प्रदेश 521 17

6 कुन्था देवी बनाम श्रीराम, 1963 पंजाब 2351 —

7. ए० आई० आर० 1972 पंजाब तथा हरियाणा 1841

(4) के अधीन यह उपबन्ध किया गया है कि यदि किसी कन्या का विवाह 15 वर्ष के पूर्व कर दिया गया है और उसने उस आयु को पूरा करने के बाद, किन्तु 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने के पूर्व ही विवाह को निराकृत कर दिया था तो उस स्थिति में उसे तलाक की आज्ञप्ति पाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है।

प्रतिषिद्ध सम्बन्ध की नातेदारी और सपिण्ड

हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार समीप के नातेदारों जैसे माता, बहन, पुत्री, पुत्रवधू के मध्य वैवाहिक तथा लैंगिक सम्बन्ध महापाप माना गया है। हिन्दू विधि में प्रतिषिद्ध कोटि की नातेदारी के सम्बन्ध में शतपथ ब्राह्मण के युग में प्रतिषिद्ध कोटियाँ तीसरी व चौथी कोटि के पूर्वजों तक ही सीमित थीं। ग्रहसूत्रों के युग में यह पूर्णतया स्थापित हो गया था कि सपिण्ड और गोत्रजों से विवाह निषिद्ध है तत्पश्चात् यह सिद्धान्त प्रतिपादित हुआ कि कोई भी व्यक्ति अपनी माता की ओर से पाँच पीढ़ी तक तथा पिता की ओर से सात पीढ़ी तक के पूर्वजों से विवाह नहीं कर सकता है और यह नियम हिन्दू विवाह अधिनियम लागू होने के पूर्व तक मान्य था।’

(4) प्रतिषिद्ध सम्बन्ध के भीतर नहीं : धारा 5 (4)—इस धारा के अन्तर्गत प्रतिषिद्ध सम्बन्ध के भीतर आने वाले व्यक्तियों के बीच विवाह-सम्बन्ध का निषेध कर दिया गया है। धारा 3 में प्रतिषिद्ध सम्बन्ध में आने वालों की सूची दी गई है, जो इस प्रकार है-

यदि दो व्यक्तियों में से-

(1) एक दूसरे का परम्परागत अग्रपुरुष हो, या

(2) एक-दूसरे का परम्परागत अग्रपुरुष या वंशज की पत्नी या पति हो, या

(3) एक-दूसरे का परम्परागत भाई की या पिता के भाई की, या पितामह या मातामही एवं पितामही के भाई की पत्नी हो।

(4) भाई और बहिन या चाचा और भतीजी, चाची या भतीजा, या भाई और बहिन की या दो भाइयों या दो बहिनों की सन्तति हो। यह बात उल्लेखनीय है कि प्रतिषिद्ध सम्बन्ध निम्नलिखित को भी सम्मिलित करता है

(1) सहोदर, सौतेला अथवा अन्य सगा-सम्बन्धी।

(2) अवैध तथा रक्त-सम्बन्धी।

(3) रक्त अथवा दत्तक से सम्बन्धित।

अपवाद-यदि विवाह के पक्षकार ऐसी प्रथा से प्रशासित होते हैं जिसके अनुसार उपर्युक्त प्रतिषिद्ध सम्बन्धों के बीच विवाह सम्बन्ध हो सकता है, तब यह शर्त लागू नहीं होगी। किन्तु ऐसी प्रथा दोनों पक्षकारों में प्रचलित होनी चाहिये।

प्रतिषिद्ध सम्बन्ध के क्रम-धारा 3 (ज) में विवाह से सम्बन्धित प्रतिषिद्ध सम्बन्धों का विवरण दिया गया है, जिसके अनुसार कोई व्यक्ति निम्नलिखित सम्बन्धियों से विवाह नहीं कर सकता है

(1) परम्परागत अग्र स्त्री।

(2) परम्परागत उत्तरापेक्षी स्त्री।

(3) भाई की स्त्री।

(4) पिता के भाई की स्त्री।

(5) माता के भाई की स्त्री।

(6) पितामह के भाई की स्त्री।

(7) पितामही-माँ के भाई की स्त्री।

(8) बहिन।

(9) भाई की बहिन।

(10) बहिन की लड़की।

(11) पिता की बहिन।

(12) माता की बहिन।

(13) पिता की बहिन की लड़की।

इस प्रकार कोई भी लड़की निम्नलिखित सम्बन्धियों से विवाह नहीं कर सकती-

(1) परम्परागत अग्र पुरुष, जैसे पिता या पितामह।

(2) परम्परागत अग्र स्त्री के पति।

(3) परम्परागत उत्तरापेक्षी स्त्री के पति, जैसे दामाद अथवा पुत्र की लड़की का पति।

(4) भाई।

(5) पिता के भाई।

(6) माता के भाई।

(7) भतीजा।

(8) बहिन का लड़का।

(9) चचेरा भाई।

(10) फुफेरा भाई।

(11) ममेरा भाई।

(12) मौसेरा भाई।

प्रतिषिद्ध सम्बन्धियों के साथ विवाह शून्य होगा। धारा 11 के अन्तर्गत प्रतिषिद्ध सम्बन्धियों के साथ विवाह शून्य करार किया गया है तथा धारा 18 (ब) के अधीन इस प्रकार विवाह करने के दोष में दोषी पक्षकार को एक महीने का साधारण कारावास अथवा एक हजार रुपये तक जुर्माना अथवा दोनों हो सकता है।

जहाँ दो प्रतिषिद्ध सम्बन्धियों में विवाह को उस जाति में प्रचलित प्रथा द्वारा अनुज्ञा प्रदान कर दी गई है वहाँ विवाह विधिमान्य समझा जायेगा। उदाहरणार्थ, दक्षिणी भारत में बहन की पुत्री के साथ एवं मामा की पुत्री के साथ विवाह प्रथाओं द्वारा स्वीकार कर लिया गया है।

इस प्रकार की प्रथाओं का आधार लिये जाने पर न्यायालय उसकी वैधता का परीक्षण अधिनियम की धारा 3 (अ) के अधीन दी गई शर्तों के अनुसार करेगा। श्रीमती शकुन्तला देवी बनाम अमरनाथ के निर्णय में पंजाब उच्च न्यायालय ने यह कहा है कि धारा 5 (iv) में दी गई विवाह-वैधता की शर्त प्रथाओं के प्रमाणीकरण से बाधित है अर्थात् प्रथाओं की स्थिति में दो प्रतिषिद्ध सम्बन्धियों के बीच वैध विवाह हो सकता है। इन प्रथाओं को अतिप्राचीन तथा मानवस्मृति के परे होना चाहिये।

सपिण्ड सम्बन्ध के परे हों : धारा 5 (5)-इस धारा के अन्तर्गत जब व्यक्ति एक-दूसरे के सपिण्ड होते हैं तो उनके बीच विवाह वर्जित किया गया है। इस धारा के प्रतिकूल यदि कोई विवाह सम्पन्न हुआ है तो वह प्रभावशून्य समझा जायगा। अधिनियम की धारा 18 (ब) के अन्तर्गत यह कहा

1.सुब्बा बनाम सीथारमन, (1972) 1 एम० एल० जे० 4971

2. ए० आई० आर० 1982 पं0 और हरि० 221

गया है कि जो व्यक्ति धारा 5 के खण्ड (v) में दिये गये उपबन्ध के प्रतिकूल विवाह करेगा, उसे एक महीने का साधारण कारावास अथवा एक हजार रुपये तक का जुर्माना अथवा दोनों हो सकता है। इस प्रकार के नियन्त्रण इस अधिनियम के पूर्व भी लागू थे।

यदि विवाह के पक्षकार ऐसी प्रथा से शासित होते हों जिसके अनुसार सपिण्ड सम्बन्धियों में भी विवाह हो तो उपर्युक्त शर्त नहीं लागू होती और विवाह मान्य समझा जायगा। उदाहरणार्थ, पंजाब हाईकोर्ट ने वैश्य अग्रवालों के मध्य सगोत्र विवाह को मान्यता प्रदान करते हुए उपर्युक्त विचार अभिव्यक्त किया था। इसी प्रकार की कुछ प्रथाएँ मद्रास प्रान्त में भी प्रचलित हैं (भाई और बहिन की सन्तानों में विवाह मान्य समझा जाता है)।

अरुण लक्ष्मण राव नावलकर बनाम मीना अरुण नावलकर के मामले में बम्बई उच्च न्यायालय ने यह कहा कि धारा 5(5) के अन्तर्गत ऐसे विवाह को मान्यता दी जा सकती है यदि विवाह के पक्षकार ऐसे कोई प्रथा से शासित होते हैं जिसके अनुसार सपिण्ड सम्बन्धियों में भी विवाह हो तो उपर्युक्त शर्त नहीं लागू होती और विवाह मान्य समझा जायेगा। प्रस्तुत मामले में पति द्वारा सपिण्ड सम्बन्धों के आधार पर विवाह को शून्य घोषित कराये जाने के लिए न्यायालय में वाद प्रस्तुत किया गया। पत्नी का यह कथन था कि उसका विवाह शून्य नहीं है क्योंकि उसके समाज में सपिण्ड नियमों के विपरीत भी विवाह रूढ़ि (प्रथा) के अन्तर्गत ऐसे विवाहों को मान्यता दी गयी है लेकिन इस अपवाद का लाभ प्राप्त करने के सम्बन्ध में कोई उचित साक्ष्य न्यायालय के समक्ष पत्नी द्वारा प्रस्तुत नहीं किया गया जो कि सन्तोषजनक हो। इस मामले में न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि पति एवं पत्नी सपिण्ड श्रेणी में आते हैं और पत्नी रूढ़ि के आधार पर अपने समाज में ऐसे विवाह की वैधता सिद्ध करने में असक्षम रही अत: न्यायालय द्वारा विवाह को शून्य घोषित कर दिया गया।

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