UP Police Constable Hindi Language Study Material

UP Police Constable Hindi Language Study Material

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UP Police Constable Hindi Language Study Material

UP Police Constable Hindi Language Study Material

अपठित (UP Constable Police Sipahi Bharti Study Material Question Answer in Hindi)

सामान्य परिचय- कोई ऐसा गध या पध खंड जिसको पाठ्य पुस्तक में न रखा गया हो अपठित कहा जाता है.

श्रेष्ठ विधार्थियों से आशा की जाती है की वे पाठ्यक्रम में निर्धारित सामग्री के अलावा भी विषय से सम्बन्धित सामग्री का अध्ययन करे. प्रतियोगिता परीक्षाओ के विधार्थियो के लिए यही पर्याप्त नही होता की वे परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाएँ अथवा श्रेष्ठ अंक प्राप्त करके अच्छी श्रेणी प्राप्त कर ले. उनके लिए यह आवश्यक है की वे उच्चतम अंक प्राप्त करे जिससे वे प्रतियोगिता में उच्च स्थान प्राप्त कर सके. अतएव यह अनिवार्य है की वे विस्तृत और व्यापक अध्ययन करके अपने ज्ञान का क्षेत्र अधिकाधिक व्यापक एवं विस्तृत बनाएं. अपठित गधंश अथवा पधंश से सम्बन्धित प्रश्नों द्वारा प्रतियोगी के ज्ञान का परिक्षण किया जाता है-यह देखा जाता है की साहित्य और भाषा के सम्बन्ध में उसकी पैठ कितनी गहरी है तथा उसकी द्रष्टि कितनी पैनी है.

अपठित के सन्दर्भ में ज्ञान का परिक्षण करने के लिए प्राय: ये प्रश्न पूछे जाते है-दिए हुए गध या पध के खंड का संपेक्ष्ण किया जाए अथवा लगभग एक तिहाई भाग में उसका सारांश प्रतुत किया जाए, कतिपय शब्दों अथवा वाक्यांशों अथवा वाक्यों के अर्थ लिखे जाए और दिए हुए खंड से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर लिखे जाए, ये प्रश्न सीधे-सादे तथा वस्तुनिष्ठ दोनों ही प्रकार के हो सकते है.

संपेक्षण करना (UP Police Constable Notes in Hindi)

परिभाषा- किसी गध का पध-खंड के मौलिक तथ्यों को अत्यंत सुगठित एवं सार रूप मे पस्तुत करना संपेक्षण अथवा संक्षेपीकरण कहा जाता है. संपेक्षण शब्द अंग्रेजी शब्द Precis का हिंदी रूपान्तर है. सारांशत: मूल कथ्य को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत करना संपेक्ष्ण कहा जाता है.

उपयोगिता- वर्तमान-युग अत्यत्न व्यस्तता का युग है. हर व्यक्ति हर काम को शीघ्र करना चाहता है और चाहता की उससे शुद्ध मतलब की बात की जाए. इस सम्बन्ध में उदाहरन आदि देकर हम अपनी बात को संपेक्ष में ही कहेंगे- हर व्यक्ति हर चीज को पकी-पकाई ही चाहता है. कार्य, विवरण, सुचना आदि की बात छोडिये, परीक्षार्थी अपनी पाठ्य सामग्री भी इस रूप में चाहता है की कम-से कम सामग्री पढ़कर वह परीक्षा के सागर को सरलतापूर्वक पार कर ले. यह बात प्रत्येक क्षेत्र के लिए सार्थक है, विशेषकर प्रशासन एवं व्यापर-सम्बन्धी संदर्भो में. उदाहरण के लिए, मान लीजिये आप किसी उच्च अधिकारी के पास किसी काम को लेकर जाए है और आप 4-5 पृष्ठो वाला लम्बा प्रार्थना पत्र उसके सम्मुख प्रस्तुतु करते है अथवा अपनी पूरी गाथा गाने लग जाते है. ऐसी स्थिति में इस बात की सम्भावना बहुत कम है की वह अधिकारी आपका पूरा प्रार्थना पढ़े अथवा पूरी बात को सुने-कम-से-कम वह उसको ध्यानपूर्वक तो कदापि नही सुनेगा. वह चाहेंगे की आप जल्दी ही अपनी बात समाप्त करे. प्राथना-पत्र को तो वह ‘अच्छा’ कहकर अपने सचिव को दे देगा. दूसरी यह स्थिति बनती है की आप अपनी बात को अत्यन्त संक्षेप में लिखकर प्रस्तुत करे तथा बात कहने का अवसर प्राप्त होने पर अपने मंतव्य को कम से-कम समय में प्रकट करे. इस स्थिति में आप विश्वास रखिये की वह अधिकारी महानुभाव आपका आवेदन-पत्र पढ़ भी लेंगे और आपकी बात को ध्यानपूर्वक सुन भी लेंगे. संक्षिप्तता बुद्धिमता की पहचान है तथा Short and sweet मुहावरा लोक-रूचि का परिचायक है.

श्रेष्ठ संपेक्षण के गुण (UP Police Sample Papers in Hindi)

श्रेष्ठ संपेक्षण के सम्बन्ध में निम्नलिखित बातो का ध्यान रखना आवश्यक होता है-

  1. कथ्य को लगभग 1/3 शब्दों में प्रस्तुत करना- संपेक्षण में सभी बाते उतने विस्तार में नही कही जाती है, जितने विस्तार कम मूल कथ्य होता है. साथ ही इसमें कोई नही बात भी नही जोड़ी जाती है. इसमें गध या पध खण्ड का सार लगभग 1/3 भाग में प्रस्तुत किया जाता है.
  2. समालोचन का आभाव- संपेक्षण का अर्थ है की अवतरण का सार प्रस्तुत कर दिया जाए. उस अवतरण की समालोचना करना अथवा उसमे प्रतिपादित विषय के सम्बन्ध में अपने निजी विचार प्रस्तुत करना नही है, संपेक्षण में गुण-दोष, कथन, प्रशंसा अथवा दोष-दर्शन के लिए कोई स्थान नही होता है, आप लेखक के कथन से भले ही सहमत हो या असहमत हो.
  3. पुनरुक्ति का आभाव-मूल अवतरण में भले ही पुनरुक्ति का आश्रय लिया हो, परन्तु संपेक्षण में पुनरुक्ति के लिए कोई स्थान नही होता है. संपेक्षण में शब्दों की सीमा होती है जिसका पालन करते हुए परीक्षार्थी को वे बाते खनी है, अथवा लिखनी है, जो मूल अवतरण में कही गयी है.
  4. उदाह्र्नो का अभाव- संपेक्षण तथ्यपूर्ण वर्णन होता है, अतएव उसमे उदाहरण नही दिए जाते है. मूल अवतरण में दिए उदाहरणों को यो ही छोड़ दिया जाता है. इसमें मुख्य बाते ही सम्मिलित की जानी चाहिए.
  5. सरल भाषा- अवतरण की भाषा अलंकृत और कठिन हो सकती है, परन्तु संपेक्षण की भषा सीधी, सरल और सुबोध होनी चाहिए. यह स्मरण रहे की भाषा शुद्ध एवं परिमार्जित होनी चाहिए. अवतरण के अंगीकृत रवन दुरूह कथनों को प्रत्याशी अपनी सीधी सरल-भाषा में प्रस्तुत करे.
  6. प्रस्नादी का अभाव- संपेक्षण की शैली वस्तुत: सपाट बयानी की शैली होती है. इसमें व्याख्यात्मक शैली का कोई उपयोग नही होता है और प्रश्नादी से वह शून्य होनी चाहिए.
  7. अन्य पुरुष में प्रस्तुतिकरण- रचनाकार प्राय: अपने कथ्य को उत्तम पुरुष में व्यक्त करते है, परन्तु संपेक्षण अन्य पुरुष में लिखा जाना चाहिए. जैसे-यदि लेखक ने यह लिखा है की “भाग्य को भी मई इसी तरह मानता हूँ. वह तो विधाता का ही दूसरा नाम है”, तो संपेक्षण में इसको इस प्रकार प्रतुत किया जायेगा-“भाग्य तो विधाता का ही दूसरा नाम है.”
  8. अपरोक्ष कथन- संपेक्षण में प्रत्यक्ष कथन को अप्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत किया जाता है. उदाहरण के लिए ‘उनका कहना है’ को “ऐसा कहा जाता है” के रूप में प्रस्तुत किया जायेगा.

संपेक्षण की विधि (UP Police Model Papers in Hindi)

श्रेष्ठ संपेक्षण के लिए सतत प्रत्यत्न अपेक्षित है, यथा-संपेक्षण के लिए निम्नलिखित बातो को ध्यान में रखना आवश्यक है-

  1. अवतरण को भली प्रकार समझ लेना आवश्यक है. इसके लिए सम्पूर्ण आलेख को एकाग्रचित होकर पढ़ना चाहिए. यदि आवश्यक हो तो दो बार अथवा अधिक बार पढ़ना चाहिए.
  2. इसके बाद महत्वपूर्ण अंशो को रेखांकित करके उन पर संख्या डाल लेनी चाहिए. इससे यह स्पष्ट हो जायेगा की लेखक का मूल कथ्य क्या है? साथ ही संपेक्ष्ण का ढांचा भी तैयार हो जायेगा.
  3. तदुपरान्त अवतरण का शीर्षक तैयार करना चाहिए शीषर्क छोटा व आकर्षक हो, साथ ही सारगर्भित हो, यानी उसको पढ़कर यह अनुमान लगाया जा सके की अवतरण में क्या कहा गया है, वह मूल कथ्य का ज्ञान कराने वाला हो.
  4. संपेक्षण अपनी भाषा में हो, भाषा सरल एवं सुबोध हो. विराम चिह्नों का ध्यान पूरी तरह रखा जाए. उसमे उदाहरण, अलंकरण, पुनरुक्ति आदि के लिए कोई स्थान नही होता है. (इन सबकी चर्चा हम संपेक्षण के गुण के अंतर्गत कर चुके है).
  5. संपेक्षण में केन्द्रीभूत विचार को प्रमुखता प्रदान करनी चाहिए.
  6. संपेक्षण में क्रमबद्धता का पूर्ण निर्वाह किया जाना चाहिए.

अभ्यास के लिए उदाहरण UP Police Constable Question Answer in Hindi)

निचे कुछ अवतरण तथा उनके संपेक्ष्ण दिए जा रहे है. इनमे से अनेक प्रतियोगी परीक्षाओ के प्रश्न-पत्रों से उद्धृत किये गये है. पाठक यदि इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़ेंगे,तो उन्हें संपेक्षण की विधि का ज्ञान हो जायेगा और इस विधा में उन्हें निपुणता भी प्राप्त हो जाएगी. यथा-

मनुष्यता के ऊपर की स्थिति को अपना लक्ष्य बनाने में प्राय: मनुष्य देवता की पाषाण प्रतिमा बन कर रहा जाता है और इसके विपरीत मनुष्यता से निचे उतर कर पशु की श्रेणी में आ जाता है. एक स्थिथि मनुष्य के ऊपर होने पर भी निष्क्रिय है, दूसरी इससे नीची होने के कारण मनुष्यता का कलंक है. अत: दोनों ही स्थितियों में मनुष्य का पूर्ण विकास सम्भव नही है. हमारे समाज में अपने स्वार्थ के कारण पुरुष मनुष्यता का कलंक है और स्त्री अपनी आज्ञानमय निस्पंद सहिष्णुता के कारण पाषाण सी उपेक्षणीय है. दोनों के मनुष्यत्व-युक्त मनुष्य हो जाने से ही जीवन की कला विकास प् सकेगी, जिसका ध्येय मनुष्य की सहानुभूति, सक्रियता, स्नेह आदि गुणों को अधिक व्यापक बना देता है.

जीवन को विकृत न बनाकर, उसे सुंदर और उपयोगी रूप देने के इच्छुक अपने को सिद्धान्तों से सम्बन्ध रखने वाली अन्तर्मुखी तथा उन सिद्धान्तों के सक्रिय रूप के सम्बन्ध रखने वाली भुमुर्खी शक्तियों को पूर्ण विकास की सिविधएं देनी ही पड़ेगी. जीवन का चिह्न केवल काल्पनिक स्वर्ग में विचरण नही है, किन्तु संसार के कंटकाकीर्ण पथ को प्रशस्त करना है.

प्रश्न-

(क) उपर्युक्त अवतरण का संपेक्षण अपने शब्दों में लिखिए.

(ख) काले अंशो के अर्थ स्पष्ट कीजिए.

(ग) उपर्युक्त अवतरण को प्रस्तुत शीर्षक दीजिये.

उत्तर

  • प्रस्तुत अवतरण का संपेक्षण-

वही मनुष्य पूर्ण रूप से विकसित हो सकता है जो मनुष्यता को अपना लक्ष्य बनाए. इसके विपरीत वह स्वार्थान्ध होकर देवत्व की कोटि को प्राप्त करना चाहता है जो उसको क्रियाहीन बना देती है. पशुता का आचरण करने पर वह पशु ही बन जाता है. स्त्री त्याग्शील और सहनशील होने के कारण उपेक्षा की पात्र बन गयी है. जीवन को आनद युक्त बनाने के लिए मानव को, प्रेम दया तथा सहानुभूति आदि गुणों की आवश्यकता होती है, जिससे उसका जीवन सुखी हो.

  • काले अंशो का अर्थ-
  • मनुष्य……….. रह जाता है-जिस प्रकार पत्थर की मूर्ति केवल पूजा-अर्चना के ही काम की होती है, वह अन्य किसी काम की नही होती है, उसी प्रकार यदि कोई मनुष्य स्वयं को दोषरहित बना कर देवता बनाना चाहता है, तो वह समाज के किसी काम का नही रह जायेगा.

मनुष्य का कलन है-मनुष्य यदि मनुष्यत्व की प्राप्ति के लिए उचित प्रयास नही करता है और व्यसनों का शिकार बन जाता है, तो वह मनुष्य नाम को कलंकित करता है.

स्त्री अपनी………….पा सकेगी-स्त्री आदि काल से ही पुरुष के प्रति अपनी त्याग-भावना का प्रदर्शन करती आई है. अत: उसमे क्रियाशीलता नही रही है. वह हमेशा मनुष्य द्वारा तिरस्कृत ही रही है. नारी को अपने विकास द्वारा ही पुरुष की सहचारिणी नन्ना चाहिए. नर-नारी दोनों के अपने-अपने गुणों द्वारा युक्त होने पर जीवन-रूपी कला का विअक्स सम्भव होगा.

उन सिद्धानोत.…………दनी ही पड़ेगी-अन्तर्मुखी वृत्ति में चिंतन की प्रधानता है तथा बहिर्मुखी प्रवृत्ति में साहस की. गुणों को कार्य रूप में ढालने के लिए मनुष्य को साहसी बनना पड़ता है. वह अपने जीवन को तभी सुखमय बना सकता है, जब उसमे इन दोनों वृत्तियों का समभाव हो.

  • शीर्षक- मनुष्य जीवन का वास्तविक लक्ष्य.

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