The Constitution of India The Union Judiciary LLB Law Study Material in Hindi

The Constitution of India The Union Judiciary LLB Law Study Material in Hindi

The Constitution of India The Union Judiciary LLB Law Study Material in Hindi :  The Constitution of India Most Important Part of LLB Low Judge All Semester Study material Notes Question Paper Previous Year Mock Test In Hindi (English)

The Constitution of India The Union Judiciary LLB Law Study Material in Hindi

The Constitution of India The Union Judiciary LLB Law Study Material in Hindi

अध्याय 4

संघ की न्यायपालिका (The Union Judiciary)

  1. उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन,—(1) भारत का एक उच्चतम न्यायालय होगा जो

ब्य न्यायमूर्ति और, जब तक संसद् विधि द्वारा अधिक संख्या विहित नहीं करती है तब तक, सात-से अनधिक अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा।

भारत के मुख्य न्यायमूर्ति आर,

  1. संविधान (अड़तीसवां संशोधन) अधिनियम, 1975 की धारा 2 द्वारा खंड (4) अंत:स्थापित किया गया और संविधान Sinासवा संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 15 द्वारा (20-6–1979) से उसका की धारा 15 द्वारा (20-6–1979) से उसका लोप किया गया।
  2. उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) याधीशों की संख्या) (संशोधन) अधिनियम, 2008 (2009 का 11) की धारा 2 के अनुसार अब यह संख्या तीस है।

(2) || अनुच्छेद 124क में निर्दिष्ट राष्ट्रीय याशि हस्ताक्षर और आदी सहित अधिएर हा शायाधीश तब तक पद धारण करेगा जब तक वह पैंसठ वर्ष की 2[* * *] [

परन्तु यह कि]—

(क) कोई न्यायाधीश, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग | सकेगा;

(ख) किसी न्यायाधीश को खंड (4) में उपबंधित रीति से उसके पद से हटाया जा सकेगा। 4r (क) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की आयु ऐसे प्राधिकारी द्वारा और ऐसी रीति से अवधारित की जाएगी जिसका संसद् विधि द्वारा उपबंध करे।]

१२) कोई व्यक्ति, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह भारत का नागरिक है और

(क) किसी उच्च न्यायालय का या ऐसे दो या अधिक न्यायालयों का लगातार कम से कम पांच

वर्ष तक न्यायाधीश रहा है; या

(ख) किसी उच्च न्यायालय का या ऐसे दो या अधिक न्यायालयों का लगातार कम से कम पांच

वर्ष तक अधिवक्ता रहा है; या

(ग) राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता है। स्पष्टीकरण 1.-इस खंड में, “उच्च न्यायालय” से वह उच्च न्यायालय अभिप्रेत है जो भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में अधिकारिता का प्रयोग करता है, या इस संविधान के प्रारंभ से पहले किसी भी समय प्रयोग करता था।

स्पष्टीकरण 2.-इस खंड के प्रयोजन के लिए, किसी व्यक्ति के अधिवक्ता रहने की अवधि की संगणना करने में वह अवधि भी सम्मिलित की जाएगी जिसके दौरान किसी व्यक्ति ने अधिवक्ता होने के पश्चात् ऐसा न्यायिक पद धारण किया है जो जिला न्यायाधीश के पद से अबर नहीं है।

(4) उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को उसके पद से तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक । साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर ऐसे हटाए जाने के लिए संसद् के प्रत्येक सदन द्वारा अपनी कुल | सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा समर्थित समावेदन, राष्ट्रपति के समक्ष उसी सत्र में रखे जाने पर राष्ट्रपति ने आदेश नहीं दे दिया है।

(5) संसद् खंड (4) के अधीन किसी समावेदन के रखे जाने की तथा न्यायाधीश के कदाचार या असमर्थता के अन्वेषण और साबित करने की प्रक्रिया का विधि द्वारा विनियमन कर सकेगी।

  1. संविधान (निन्यानबेवां संशोधन) अधिनियम, 2014 की धारा 2 द्वारा (13-4-2015 से) “उच्चतम न्यायालय के और राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायधीशों से परामर्श करने के पश्चात्, जिनसे राष्ट्रपति इस प्रयोजन के लिए परामर्श करना आवश्यक समझे” शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित। यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स आन रिकार्ड एसोसिएशन वि० भारत संघ, ए० आई० आर० 2016 एस० सी० 117 वाले मामले में उच्चतम न्यायालय के तारीख 16 अक्टूबर, 2015 के आदश द्वारा अभिखंडित कर दिया गया है। इस प्रकार उच्चतम न्यायालय द्वारा पूर्व स्थिति को बनाए रखा गया है।
  2. सविधान (निन्यानबेवां संशोधन) अधिनियम, 2014 की धारा 2 द्वारा (13-4-2015 से) पहले परन्तुक का लोप किया गया। यह संशोधन संप्रीम कोर्ट एडवोकेटस अन रिकार्ड एसोसिएशन वि० भारत संघ, ए० आई० आर० 2016 एस० सी० 11 वाले मामले में उच्चतम न्यायालय के तारीख 16 अक्टूबर, 2015 के आदेश द्वारा अभिखंडित कर दिया गया है। संशोधन के पूर्व, यह निम्नानुसार थापरन्तु मुख्य न्यायमूर्ति से भिन्न किसी न्यायाधीश की नियुक्ति की दशा भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से सदैव परामर्श किया।

स्थान पर प्रतिस्थापित। यह साधन । इस प्रकार उच्चतम न्यायालय द्वारा पूर्व स्थिति को बनाए रखा गया है।

  1. अचान (निन्यानवेवां संशोधन) अधिनियम 2014 की धारा 2 द्वारा (13-4-2015 से) “परन्तु यह और कि” शब्दों के

(6) उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति, अपना पद ग्रहण करने के पहले राष्ट्रपति या उसके द्वारा इस निमित नियुक्त व्यक्ति के समक्ष, तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्ररूप के अनुसार, शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा।

(7) कोई व्यक्ति, जिसने उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पद धारण किए हैं, भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर किसी न्यायालय में या किसी प्राधिकारी के समक्ष अभिवचन या कार्य नहीं करेगा।


Posted in All, LLB, The Constitution of India Tagged with: , ,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*