LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Third Part Notes Study Material

LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Third Part Notes Study Material : LLB (Bachelor of Law) 2nd Semester Year Wise Hindu Law Books Chapter 6 Third Part Notes and Online Study Material All LLB University for Students, LLB Question Paper With Sample Model Paper in PDF Download available on this Post in Hindi English Language.

LLB Book Notes Study Material All Semester Download PDF 1st 2nd 3rd Year Online

LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Third Part Notes Study Material
LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Third Part Notes Study Material

छिपा कर करा लिया। न्यायालय ने निर्णय दिया कि वह क्रूरता है। इसी भाँति सत्या बनाम श्रीराम में पत्नी ने अकारण ही दो बार बिना पति को बताये गर्भपात करा लिया जबकि पति और उसका परिवार सन्तान के बहत इच्छुक थे। न्यायालय ने कहा कि यह क्रूरता है। परन्तु यदि स्वास्थ्य के कारण गर्भपात कराया जाता है या उन कारणों से गर्भपात कराया जाता है, जो गर्भपात अधिनियम, 1957 के अन्तर्गत मान्य है तो फिर यह क्रूरता नहीं होगी।

पारिवारिक जीवन की उपेक्षायदि पत्नी पारिवारिक जीवन की उपेक्षा करती है, समय पर खाना बनाकर नहीं देती है, बिना पति की अनुमति के बहुधा अपने पिता के घर चली जाती है तो यह क्रूरता की संज्ञा में आयेगा

काम विकृति-काम विकति करता है। पत्नी और अन्य महिला के बीच समलिंग संभोग काम विकृति है और क्रूरता की संज्ञा में आती है। पत्नी या पति का समलिंगामी होना क्रूरता है। इस भाँति अत्यधिक संभोग की माँग विकृति रूप से संभोग की माँग करता है। पत्नी के साथ पति द्वारा गुदा मैथुन करना या उसकी मांग करना भी करता है। पत्नी द्वारा ढीले पड़े हुये पति के लिंग को खींचना भी क्रूरता है। इस तरह पति द्वारा कोई बात न मानने पर अपने अपत्य द्वारा पति की अंड ग्रन्थियों को खिंचवाना क्रूरता भी है और विकृतता

पत्नी को वेश्यावृत्ति के लिये बाध्य करना-पत्नी को वेश्यावृत्ति के लिये बाध्य करना क्रूरता है और पतितता भी। पति पत्नी को वेश्यावृत्ति के लिये बाध्य करता है, या उसे अन्य व्यक्तियों से मैथुन करने के लिये फुसलाता है या कायल करता है तो यह क्रूरता है।

गाली-गलौच करना, अभद्र भाषा का प्रयोग करना, लड़ना-झगड़ना-गाली-गलौच करना लड़ना-झगड़ना, अभद्र भाषा का प्रयोग करना भी क्रूरता है ऐसे अभद्र व्यवहार और आचरण से भयानक मानसिक व्यथा पहुँचती है। परन्तु सास-ससुर व अन्य रिश्तेदारों के साथ बुरा बर्ताव क्रूरता नहीं कहलायेगी।10

राजन बसन्त बनाम शोभा1 पत्नी द्वारा पति से अभद्र व्यवहार करने का अच्छा दृष्टान्त है। विवाह की पहली रात्रि को ही पत्नी ने पति से कहा कि उसका चेहरा बहुत ही बदसूरत है और बदसूरत चेहरे वाले व्यक्तियों का दिमाग वैसा ही होता है। इसी भाँति वह पति की माता उसकी दो विवाहित बहिनों से अभद्र व्यवहार करती रही। झूठे-मूठे लांछन वह लगाती थी और ये लांछन उसने पत्रों द्वारा भी लगाये। यह भी कहा कि उसका पति उसे दहेज की मांग करता है। पत्नी के माता-पिता द्वारा पति को पीटने की भी कोशिश की गई। याचिका प्रेषित होने के पश्चात् भी पत्नी झूठे लांछन लगाती रही, गाली-गलौच करती रही। यह सब करता ही है। न्यायालय ने कहा कि इस प्रकार के व्यवहार द्वारा विवाह पूर्णतया टूट चुका है, अत: विवाहविच्छेद की डिक्री पारित करना ही उचित है। (इस निर्णय में न्यायाधीश अरविन्द सामन्त ने पूर्व निर्णयों की समीक्षा की है। इस निर्णय को पढ़ना चाहिये)।

त्यागपत्र की मांग-पति द्वारा पत्नी से अपनी नौकरी के त्यागपत्र देने के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करना, क्रूरता नहीं है।12

1. 1983 पंजाब और हरियाणा 252.

2. कटारी बनाम कटारी, 1994 आन्ध्र 364.

3. काफर बनाम काफर, (1964) सो० ज० 465.

4. कसुमलता बनाम कामता, 1965 इलाहाबाद 280.

5. सावित्री बनाम मूलचन्द, 1987 दिल्ली 52; विनीत जोगलेकर बनाम वैशाली जोगलेकर, 1998 बम्बई

6. अशोक बनाम सन्तोष, 1987 दिल्ली 63.

7. डान बनाम हेन्डरसन, 1979 मद्रास 104.

8. ‘ओनील बनाम ओनील, (1975) बी० लॉ रि० 1118.

9. गंगाधरण बनाम थंकम, 1988 केरल 224.

10. रेणु बनाम संजय सिंह, 2000 इलाहाबाद 201.

11. 1995 बम्बई 246.

12. विमला बनाम दिनेश, 1991 म०प्र०346; अल्का बनाम भास्कर 1968 बाम्बे, 164.

दहेज मांगना-आज दहेज माँगना दाण्डिक विधि के अन्तर्गत भी अपराध है और वैवाहिक विधि के अन्तर्गत यह क्रूरता है। आदर्श बनाम सरिता पति को दहेज पाने की आकांक्षा द्रौपदी के चीर जैसी थी। वे लगातार दहेज मांगते रहे, विवाह के दो वर्ष पश्चात भी। पत्नी के माता-पिता की सामर्थ्य के बाहर होने के कारण वे दहेज की मांग पूरी नहीं कर सके तो पति और उसके माता-पिता ने उसे सताना आरम्भ कर दिया। न्यायालय ने कहा कि पति का यह आचरण क्रूरता है। यही बात शोभारानी वि० मधुकर2 में थी। न्यायालय ने निर्णय दिया कि यह करता है। न्यायालय ने कहा कि क्रूरता के दाण्डिक अपराध से भिन्न यह वैवाहिक अपराध है जिसके आधार पर पत्नी विवाह-विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकती है।

पति के परिवार के सदस्यों का पत्नी से अभद्र व्यवहार करना और पति द्वारा पत्नी की रक्षा न करना–हिन्दू संयुक्त परिवार में यह होता है कि किसी भी कारण से या अकारण ही परिवार के सदस्य पत्नी को तिरस्कृत करते हैं, क्रूरता का व्यवहार करते है, लांछन लगाते हैं और पति उसे सुरक्षा प्रदान नहीं करता है या असमर्थ होता है। कई बार स्थिति यह हो जाती है कि पत्नी आत्महत्या पर उतारू हो जाती है। पति का यह आचरण क्रूरता की संज्ञा में आता है। इसके विपरीत भी स्थिति हो सकती है जब पत्नी के आचरण के कारण पति आत्महत्या का प्रयास करता है। यह भी क्रूरता होगी।

एक पक्षकार द्वारा दूसरे पक्ष की पूर्ण अवहेलना-रमेश चन्द्र बनाम सावित्री में पति ने विवाह के 25 वर्ष के दौरान पत्नी की उपेक्षा की, अवहेलना की। पति ने पत्नी के प्रति अपने दायित्व को कभी नहीं निबाहा। ऐसे विवाह को जीवन रखना क्रूरता होगी और उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ऐसे विवाह को जीवित नहीं रखा जा सकता है और जो विवाह पूर्णतया टूट चुका है उसे जीवित रखने का प्रयत्न करना क्रूरता होगी। यही मत उच्चतम न्यायालय ने चन्द्रकला बनाम त्रिवेदी में व्यक्त किया है।

वैवाहिक जीवन की कठिनाईयां-वैवाहिक जीवन की हर समस्या, हर कठिनाई और हर-बाधा को या पति-पत्नी के घर अनुचित आचरण, व्यवहार या स्वाभाव को हम क्रूरता की परिधि में नहीं ला सकते हैं। अपने स्वाभाविक रूप में हर विवाह की कुछ-न-कुछ कठिनाईयां और कारण (टूट-फूट) होते हैं, पति या पत्नी में कुछ न कुछ कमी होती ही है, कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है, कोई भी विवाह आदर्श नहीं है। हो सकता है कि पति या पत्नी का कोई आचरण दूसरे को ठेस पहुँचाता है, दुःख पहुंचाता है, विपन्न बनाता है या उसके सुखी जीवन में बाधक है तो इसे क्रूरता नहीं कह सकते हैं। इसलिये रोजमर्रा की वैवाहिक कठिनाइयों को क्ररता की परिभाषा नहीं दी जा सकती। अंग्रेजी न्यायाधीश, लार्ड डेनिंग ने ठीक ही कहा है कि करता की परिधिहीन व्याख्या करने के प्रलोभन से हमें बचना चाहिये, अन्यथा उस स्थिति में पहुंच जायेंगे जहाँ विवाह की संस्था ही संकट में पड़ जायेगी। अत: पति या पत्नी का सनकी या झक्की होना, कमीना या नीच व्यवहार करना, स्वार्थी, उजड्ड, कंजूस, चिड़चिड़ा या जंगली स्वभाव का होना, स्वयं में केन्द्रित होना, दूसरे के सुख-सुविधा का ध्यान न रखने वाला होना, लापरवाह होना, दूसरे की भावना को ठेस पहुंचाने वाला होना, शिष्टाचार से अनभिज्ञ होना, अशिष्ट और अश्लील भाषा का प्रयोग करने वाला होना, या दूसरे के प्रति घृणा और वितृष्णा प्रदर्शित करने वाला होना। ये तथ्य स्वयं में क्रूरता गठित नहीं करते हैं। परन्तु उनमें कुछ तथ्यों का एक साथ होना या उनका कुछ अन्य तथ्यों के साथ होना क्रूरता को गठित कर सकता है। राजकमार सारामपकाश में पति द्वारा अपने माता-पिता को रुपया भेजने के प्रतिवाद में पत्नी ने दो या तीन बार पति के लिये खाना बनाने से इन्कार कर दिया और पति के मन में उसके माता-पिता के प्रति घृणा जगाने के

1. 1987 दिल्ली 203; और देखें; मन्यम बनाम मन्यम 1990 केरल 1.

2. 1988 सु० को 124.

3. देव कुमार बनाम थिलागवती, 1995 मद्रास 116.

4. सुशीला बनाम ओमप्रकाश, (1993) 1 डी० एम० सी० 358.

5.1995 सु० को० 890.

6. (1993) 4 एस० सी० सी० 232; और देखें, भगत बनाम भगत, (1994) 1 एस० सी०सी०137

7. सावित्री पांडे बनाम प्रेमचन्द्र पांडे, 2002 सु० को0591.

8. (1968) 70 पंजाब लॉ रिपोर्ट्स 879.

लिये वह किसी फकीर से ताबीज भी लाई। नारायण बनाम प्रभा में पत्नी हमेशा ही अपनी सास की अवहेलना करती थी जबकि सास चाहती थी कि वह उसकी हर आज्ञा का पालन करे, उसके इशारों पर चले। परन्त पत्नी सदैव ही उलटा आचरण करती थी। राजस्वला होने पर सास बहू से किसी भी वस्तु को छने से मना करती तो वह हर वस्तु को छू लेती, सास नहीं चाहती थी कि वह ठंडे पानी से स्नान करे, परन्तु वह हमेशा ही ठन्डे पानी से ही स्नान करती थी। सास चाहती थी कि वह पास-पड़ोस में न जाये, सिनेमा न देखे, परन्तु वह पास-पड़ोस में भी जाती और सिनेमा भी देखती। वह सास की खाने की तम्बाकू की डिबिया भी छिपा देती। अन्ना बनाम ताराबाई में पत्नी को शिकायत यह थी कि पति चाहता था कि कुछ अवसरों पर पत्नी उसके साथ-साथ जाये, परन्तु पत्नी यह नहीं चाहती थी। एक-दो बार पति ने उसे साथ चलने के लिये बाध्य किया इसके फलस्वरूप पति-पत्नी में मनमुटाव हो गया। न्यायालय ने तीनों ही वादों में याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि उपरोक्त कोई भी आचरण क्रूरता की संज्ञा में नहीं आता है। यही बात नीलम बनाम विनोद’ में थी। न्यायमूर्ति सोधी ने कहा कि विवाह एक अत्यन्त सामीप्य सम्बन्ध है जब वर-वधू साथ-साथ रहना आरम्भ करते हैं तो प्रारम्भ में समायोजना की कठिनाई होती है। इस समय थोड़ा बहुत मनमुटाव होना, क्रूरता नहीं है। केवल चार-पांच दिन ही पति के पास रह कर यदि पत्नी, क्रूरता की शिकायत करती है तो यह बात समायोजना की कमी है, क्रूरता नहीं है। गृहस्थ जीवन में मनमुटाव साधारण लड़ाई-झगड़े आपसी कहना-सुनना, क्ररता की परिधि में नहीं आते हैं। न ही गलतफहमियां क्रूरता की सत्ता में आयेगी।

कृत्य और आचरण-कौन से कृत्य या आचरण क्रूरता गठित करते हैं यह कहना कठिन है। प्रत्येक मामले में पृथक-पृथक कृत्य और आचरण क्रूरता गठित करते हैं। किसी मामले के आचरण या कृत्य क्रूरता की परिधि में आते हैं या नहीं इसके लिये न्यायालय पक्षकारों की सामाजिक प्रास्थिति, परिवार और समाज का वातावरण जिसमें वे रहते हैं उनकी शिक्षा, मानसिक और मौलिक संवेदनायें और दया, इत्यादि पर ध्यान देगा। संक्षेप में उन समस्त आचरणों और कृत्यों को जिनके आधार पर याचिका प्रस्तुत की गई है, पूरे वैवाहिक जीवन और संबन्धों की पृष्ठभूमि के आधार पर आंकना होगा। सम्भवतः पृथक-पृथक रूप से उनमें से कोई भी आचरण या कृत्य क्रूरता की संज्ञा में न आये, परन्तु उन्हें एक श्रृंखला में देखने पर वे क्रूरता गठित कर सकते हैं। सामान्यतया क्रूरता एक संचयी (Cumulative) अपराध है। अनेक आचरण और कृत्य क्रूरता की संज्ञा में नहीं आते हैं। परन्तु यह भी हो सकता है कि कोई एक ही आचरण या एक ही कृत्य ऐसा हो जो एकाकी रूप से ही क्रूरता की संज्ञा में आ जाये । सत्य नारायण बनाम ममता में पति को शुरू से पत्नी पसन्द न थी तथा वह जारता का जीवन व्यतीत कर रहा था। उसका पुनर्विवाह क्रूरता मानी गयी।

सामान्य नियम यह है कि न्यायालय समस्त वैवाहिक सम्बन्धों पर विहंगम दृष्टि डालता है, और यह नियम उस समय अधिक महत्वपूर्ण है जब क्रूरता का गठन हिंसा के कृत्यों के द्वारा नहीं होता है बल्कि छोटी-छोटी बातों के संकलन द्वारा होता है, जैसे तानाकशी, गाली-गलौज, झूठे आरोप, तिरस्कार, अपमान आदि के वैवाहिक जीवन में फैले हुये दृष्टान्तों द्वारा। अत: एक पक्षकार का आचरण जिसके द्वारा दूसरे पक्षकार पर कलंक लगता है या अपमान होता है या दूसरा पक्षकार तिरस्कृत जीवन व्यतीत करने को बाध्य होता है, क्रूरता कहलाता है। संकट की आशंका मानसिक वेदना पहुंचाती है, जो शारीरिक कष्ट से भी अधिक दुःख

1. 1964 मध्य प्रदेश 28.

2. 1970 मध्य प्रदेश 36.

3. 1986 पंजाब और हरियाणा 253..

4. सन्तोष कुमारी बनाम परवीन, 1987 पंजाब और हरियाणा 33; नन्दा बनाम बीना, 1988 सु० को० 407. |

5. तपन बनाम अंजली, 1993 कल० 10.

6. इन्दिरा बनाम शैलेन्द्र 1993 मध्य प्रदेश 59; तपन बनाम अंजली, 1993 कल० 10.

7. देखें; रूप लाल बनाम करतारी, 1970 जम्मू और काश्मीर 158.

8. सप्तमी बनाम जगदीश, 73 कलकत्ता वीकली नोटस 502; कुसुम बनाम कामता, 1965 इलाहाबाद

9. 1997 राज० 118.

दायी होती है। संभोग से इन्कार करना मात्र करता का आचरण नहीं है, परन्तु यदि वह इन्कार स्थाई हो जाये तो यह क्रूरता का आचरण होगा, क्योंकि स्वाभाविक वासना भी अतृप्त स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालती है। हिन्दुओं में पुत्र आत्मा की मुक्ति के लिये आवश्यक है कि और यदि एक पक्ष स्थाई रूप से सम्भोग करने से इन्कार कर दे या स्थाई रूप से गर्भ-निरोधकों के साथ ही सम्भोग करे तो यह क्रूरता होगी।

क्रूरता के कृत्य याचिका दायर करने के पूर्व के होने चाहिये।

हमारे उच्च न्यायालयों में एक नई विचारधारा (trend) चली है। जो याचिकायें क्रूरता के आधार पर डाली जाती हैं तथा तथ्य यह बताते हैं कि विवाह पूरी तरह से टूट चुका है वहां वे याचिका मंजूर (allow) कर लेते हैं।

Posted in All, Hindu Law, LLB, LLB 1st 2nd 3rd All Semester Study Material Tagged with: , , , , ,

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*