LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Six Part Notes Study Material

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उसे अनुतोष नही मिलेगा। इस अपबन्धन (Bar) के लागू होने के लिये यह आवश्यक है कि प्रत्यर्थी का वैवाहिक अपराध याचिकाकार के दोष या निर्योग्यता में परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जड़ा हुआ है। उदाहरण लीजिये, यदि अजीदार द्वारा प्रत्यर्थी को रतिज रोग लगा है तो अर्जीदार विवाह-विच्छेद या न्यायिक पृथक्करण की डिक्री प्राप्त नहीं कर सकता है। यदि पति ने सदैव ही पत्नी की जानबूझ कर उपेक्षा की है या कुरता का व्यवहार किया है तो पति दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री प्राप्त नहीं कर सकता है। जारकर्म के आधार पर न्यायिक पृथक्करण या विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित नहीं होगी, यदि जारकर्म का प्रोत्साहन, परोक्ष या अपरोक्ष रूप से पति ने दिया है। उन्मत्तता के आधार पर विवाह-विच्छेद या न्यायिक पृथक्करण की याचिका सफल नहीं हो सकती है। यदि यह सिद्ध हो जाये कि अर्जीदार की क्रूरता, उपेक्षा या दुव्यवहार के कारण प्रत्यर्थी विकतचित्त हआ है। क्ररता के आधार पर न्यायिक पृथक्करण या विवाहविच्छेदकी याचिका सफल नहीं होगी, यदि क्रूरता का प्रकोपन अर्जीदार ने दिया था। अभित्यजन के सम्बन्ध में यह स्थापित मत है कि यदि प्रत्यर्थी ने अर्जीदार का अभित्याग उसके दुर्व्यवहार या दुराचरण के कारण किया तो अर्जीदार की याचिका सफल नहीं हो सकती है। स्वच्छ हाथों से आने का तात्पर्य यह है कि अजीदार ने स्वयं कोई वैवाहिक दुराचरण या दुर्व्यवहार नहीं किया है। हरगोविन्द बनाम रामदुलारी में पति ने पत्नी की जारता के आधार पर विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित की। यह पाया गया कि पति ने भी दूसरा विवाह कर लिया था। न्यायालय ने कहा कि यह विवाह ट चका है। अत: इसका विच्छेद करना ही ठीक है। टूटे विवाह को बनाये रखने का कोई औचित्य नहीं है।

यह मत न्यायसंगत है और औचित्यपूर्ण है। दूसरी ओर मीरा बनाम राजेन्द्र कुमार में पति ने दूसरा विवाह कर लिया। उसकी प्रथम पत्नी ने दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की एक तरफा डिक्री प्राप्त कर ली क्योकि पति गैरहाजिर रहा। उसने न ही डिक्री का पालन किया न ही पत्नी को कोई भरण-पोषण दिया। कुछ समय पश्चात् इस आधार पर कि दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री का पालन नहीं हआ है उसने विवाह-विच्छेद की याचिका पेश कर दी। याचिका को खारिज करते हुये न्यायालय ने कहा कि पति के हित में डिक्री पारित करने का तात्पर्य होगा उसे उसी के दोषों का लाभ देना। आदर्श प्रकाश बनाम सरिता में पति ने पत्नी की क्रूरता के आधार पर विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित की थी। यह सिद्ध हो गया है कि उसने पत्नी को दहेज की मांग पेश करके हैरान-परेशान किया था। न्यायालय ने कहा कि यदि उसके पक्ष में डिक्री पारित की जायेगी तो तात्पर्य यह होगा कि उसे अपने दोष का लाभ प्राप्त हो गया। ध्यान देने की बात यह है कि इस वाद में पति पत्नी की क्रूरता सिद्ध नहीं कर सका था।

अशोक कुमार बनाम शबनम में भी पति ने पत्नी को दहेज की मांग द्वारा परेशान करके वैवाहिक गृह छोडने को बाध्य कर दिया था। न्यायालय ने कहा कि अभित्यजन के आधार पर पति के पक्ष में विवाहविच्छेद की डिक्री पारित करना उसे उसके दोष का लाभ पहुँचाना होगा।

‘असमाधेय विवाह भंग का आधार’ शीर्षक के अन्तर्गत हम देख चुके हैं कि हमारे कुछ उच्च न्यायालयों ने यह मत व्यक्त किया है कि यदि दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री की याचिकाकार ने अवहेलना की है या उसके पारित करने में बाधा उपस्थित की है। कुछ निर्णय इनमें कुछ भिन्न है। इन सभी निर्णयों की समीक्षा नहीं की गई है।

यदि अर्जीदार के आचरण का प्रत्यर्थी के दराचरण से कोई सम्बन्ध नहीं है तो वह धारा (23) (1) (क) के अन्तर्गत दोषी नहीं होगा। अत: पति यह तर्क नहीं दे सकता कि पत्नी का उसके साथ न रहना ही इस दूसरे विवाह का कारण है। या दूसरी पत्नी ने उसके साथ विवाह यह जानते हुये किया था

1. शचिन्द्र बनाम नीलिमा, 1970 कल० 38.

2. माती बनाम साधु, 1961 पंजाब 152.

3. 1986 मध्य प्रदेश57.

4. 1986 दिल्ली 136.

5. 1987 दिल्ली 203.

6. 1989 दिल्ली 121.

7. मोहन लाल बनाम मोहन बाई, 1958 राजस्थान 73,

विवाहित पुरुष है। इसी भांति पत्नी के जारकर्म के आधार पर पति की विवाह-विच्छेद की याचिका पत्नी के इस तर्क से कि पति द्वारा उसके साथ सहवास न करने के कारण उसने जारकर्म किया खारिज नहीं की जा सकती है।

एस० बनाम एस० में दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह कहा था कि समनुदेशन का सिद्धान्त हिन्दू वैवाहिक विधि का अंग नहीं है परन्तु सशीला बनाम प्रेम में न्यायालय ने कहा कि अर्जीदार यदि सद्भाविक नहीं है और अर्जी किसी अन्य अभिप्राय से ही दी गयी है तो उसे डिक्री नहीं मिलेगी। न्यायालय ने कहा कि अर्जीदार एक ओर से दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री चाहता है दूसरी ओर वह प्रत्यर्थी पर जारकर्म का दोषारोपण करता है, दोनों बातें साथ-साथ नहीं चल सकती हैं।

विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 के लागू होने के पश्चात् यह उपधारा उन्मत्तता के आधार पर प्रेषित की गई शून्यकरणीयता की अर्जी पर लागू नहीं होगी।

उपसाधकता (Accessory) (LLB Mock Test)

उपसाधकता अंग्रेजी दाण्डिक विधि का शब्द है, इसका अर्थ है अपराधी के अपराध में सक्रिय भाग लेना। कोई व्यक्ति आपराधिक कृत्य के होने के पूर्व, होने के समय, या होने के पश्चात् अपराधी के अपराध में उपसाधक हो सकता है। भारतीय और अंग्रेजी विधि में अपराध के समय सक्रिय भाग लेने वाले व्यक्तियों को सहअपराधी कहते हैं। उदाहरणार्थ, “प”क’ के अपराध में इन स्थितियों में उपसाधक हो सकता है, ‘क’ ‘प’ के साथ जाता है और कहता है कि वह ‘ख’ को मारना चाहता है क्या वह अपनी तलवार उसे दे सकेगा-‘प’ अपनी तलवार उसे दे देता है और ‘क’ ‘ख’ को मारना चाहता है क्या वह अपनी तलवार उसे दे सकेगा। ‘प’ अपनी तलवार उसे दे देता है और ‘क’ ‘ख’ की हत्या कर देता है, या ‘क’ ‘ख’ के छुरा भोंक देता है जबकि ‘प’ ने ‘ख’ को पकड़ा हआ है; या ‘क’ ‘ख’ की हत्या करके ‘प’ के पास आता है और ‘प’ से कहता है कि क्या वह ‘ख’ के शव को छिपाने में उसकी सहायता करेगा? ‘प’ ‘क’ की सहायता कर देता है। तीनों ही स्थितियों में ‘प’ उपसाधकता का अपराधी है। यही स्थितियाँ वैवाहिक अपराधों के सम्बन्ध में भी हो सकती है |

यह ध्यान देने योग्य बात है कि उपसाधक का अपबन्धन केवल जारकर्म पर ही लागू होता है, अन्य वैवाहिक अपराधों पर नहीं। जारकर्म के सम्बन्ध में उपसाधना के उदाहरण लें-यदि पति पत्नी द्वारा जारकर्म करने के लिये अन्य व्यक्तियों को निमंत्रित करता है या उस समय जब पत्नी जारकर्म में रत है पहरा देता है या पत्नी जारकर्म करने जाती है, पति उसे अपनी संरक्षकता में वापस लेने जाता है, इन तीनों स्थितियों में पति उपसाधकता का अपराधी है। उपसाधकता का अपराध तभी गठित होता है जब वैवाहिक अपराध में जान-बूझ कर सक्रिय भाग लिया गया है।

यह सिद्ध करने का भार याचिकाकार पर है कि वह उपसाधकता का अपराधी नहीं है। उपसाधकता का अपराधी होने पर वह अनुतोष की डिक्री प्राप्त नहीं कर सकता है।

मौनानुकूलता (Connivance) (LLB Question Paper)

मौनानुकूलता अंग्रेजी धार्मिक न्यायालयों का पुरातन सिद्धान्त है। मौनानुकूलता के होने पर याचिकाकार को वैवाहिक अनुतोष प्राप्त नहीं हो सकता है। यही नियम अंग्रेजी वैवाहिक विधि में था और वहाँ से भारतीय विधि में आ गया। यह अपबन्धन भी जारकर्म पर ही लागू होता है।

मौनानुकूलता (कन्निवेन्स) कनायवर से बना है जिसका अर्थ है, ‘आंख मारना’ । मौनानुकूलता निम्न दो भाँति से हो सकती है-

1. गोबिन्द राव बनाम अनन्दी बाई, 1976 बम्बई 433.

2. मातो बनाम सन्तराम, 1961 पंजाब 152.

3. 1961 दिल्ली 79.

4. 1976 दिल्ली 321.

(1) प्रत्याशित सम्मति (Anticipatory willing consent); या

(2) आपराधिक उपमति, (Culpable acquiescence) सक्रिय या निष्क्रिय।

मौनानुकूलता और उपसाधकता के बीच मुख्य अन्तर यह है कि उपसाधकता में याचिकाकार प्रतिपक्षी के वैवाहिक अपराध में सक्रिय भाग लेता है, जबकि मौनानुकूलता में वह कोई सक्रिय भाग नहीं लेता है, केवल मौन सम्मति देता है। मौनानुकूलता में भ्रष्ट (आपराधिक) सम्मति का अभित्यक्त या विवक्षित रूप होना आवश्यक है। अपराध में सक्रिय भाग लेना आवश्यक नहीं है। उदाहरण लें, यदि प्रतिपक्षी एक प्रस्ताव रखती है या निर्दिष्ट करती है, कि वह जारकर्म द्वारा धन उपार्जित करना चाहती है और याचिकाकार अपनी स्पष्ट अनुमति देता है, या इस तरह का आचरण करता है जिससे उसकी सहमति निर्दिष्ट होती है, तो फिर वह मौनानुकूलता का दोषी है, यद्यपि सक्रिय रूप से उसने कुछ नहीं किया है। दूसरा उदाहरण लें, पत्नी किसी व्यक्ति को रात्रिभोज पर निमन्त्रित करती है, अतिथि पत्नी के साथ अनौचित्यपूर्ण स्वतंत्रता लेता है। पति अतिथि की नीयत समझ कर किसी बहाने से वहां से बाहर चला जाता है तो यह आचरण मौनानुकूलता की संज्ञा में आयेगा। प्रथम उदाहरण है, प्रत्याशित सहमति का, और दूसरा है आपराधिक उपमति का। अवश्यंभावी रूप से मौनानुकूलता वैवाहिक अपराध से पूर्ववर्ती होती है। यदि प्रथम कृत्य के लिये सहमति सिद्ध हो जाये तो यह कोई प्रतिरक्षा नहीं है कि दूसरे या अन्य कृत्यों के लिये सहमति नहीं दी गई थी। परन्तु यदि पति ने एक व्यक्ति विशेष के साथ जारकर्म करने की सहमति दी हो तो उसका तात्पर्य यह है कि उस आधार पर पत्नी चाहे जिसके साथ, चाहे जितनी बार जारकर्म कर सकती है। एक बार मौनानुकूलता के सिद्ध होने के पश्चात् न्यायालय समस्त तथ्यों और परिस्थितियों की जांच करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुंच सकता है। हो सकता है पृथक कृत्य जिसके लिये सहमति दी गई थी, और अन्य कृत्यों के बीच इतना समय व्यतीत हो चुका हो कि यह कहना अनौचित्यपूर्ण हो कि प्रथम कृत्य के लिये दी गई सहमति वाद के कत्यों के समय भी विद्यमान थी।

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