LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Seven Part Notes Study Material

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LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Seven Part Notes Study Material

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समनुषंगी अनुतोषों के सम्बन्ध में पक्षकार आपस में करार भी कर सकते हैं। सामान्यत: ऐसे करारों को न्यायालय मान्यता दे दे, जब तक कि ऐसे करार दबाव द्वारा नहीं किये गये हैं, साथ ही न्यायालय उन्हें लाग करने के लिये बाध्य नहीं है।

भरण-पोषण और निर्वाहिका (Maintenance and Alimony) (LLB Notes in Hindi English)

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 24 के अन्तर्गत अन्तरिम भरण-पोषण और कार्यवाही के व्यय, और धारा 25 के स्थायी निर्वाहिका और भरण-पोषण के उपबन्ध हैं। अंग्रेजी विधि में अन्तरिम और स्थाई निर्वाहिका और भरण-पोषण पत्नी द्वारा ही मांगा जा सकता है। हिन्दू विवाह अधिनियम के अधीन यह पति या पत्नी किसी के भी द्वारा मांगा जा सकता है।

कार्पस जुरिस के अनुसार निर्वाहिका वह भत्ता है जो विधि के अन्तर्गत पति की सम्पत्ति में से पक्षकारों के बीच विवाह सम्पन्न हो जाना सिद्ध होने पर और यह सिद्ध होने पर कि वह पृथक भरण-पोषण की अधिकारिणी है, वैवाहिक कार्यवाही के दौरान या उसकी सम्पत्ति पर पत्नी को दिया जाता है। निर्वाहिका और भरण-पोषण का सिद्धान्त यह है कि पति का पत्नी के भरण-पोषण और निर्वाह का उत्तरदायित्व न केवल उस समय है जब कि वह उसकी पत्नी है, बल्कि उस समय भी जब वह उसकी पत्नी नहीं रहती है जैसे विवाह-विच्छेद के पश्चात् जब तक कि वह दूसरा विवाह न कर ले। प्रारम्भ में यह नियम विवाहविच्छेद पर लागू होता था अब यह नियम विवाह की अकृतता पर भी लागू होता है।

आज स्त्री-पुरुष की समानता के युग में, जहाँ स्त्रियां भी उपार्जन करने लगी हैं, प्रश्न यह उठाया जाता है कि भरण-पोषण और निर्वाहिका पत्नी द्वारा पति को देनी चाहिये, यदि पत्नी उस योग्य है। लगभग सभी साम्यवादी देश इस नियम को मान्यता देते हैं। अन्य देशों में भी यह नियम मान्यता प्राप्त कर रहा है। हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत पति और पत्नी दोनों एक दूसरे से भरण-पोषण की रकम मांग सकते हैं। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 24 और 25 के अन्तर्गत भरण-पोषण और निर्वाहिका का अधिकार हिन्दू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम के उपबन्धों से स्वतन्त्र और पृथक हैं।

धारा 24 की संवैधानिकता-कृष्णामूर्ति बनाम उमादेवी में आन्ध्र उच्च न्यायालय ने मत व्यक्त किया है कि धारा 24 संवैधानिक है।

वादकालीन भरण-पोषण और कार्यवाही का व्यय :

वादकालीन भरण-पोषण को अन्तरिम भरण-पोषण या अस्थाई भरण-पोषण भी कहते हैं। यह वह भरण-पोषण है जो कार्यवाही आरम्भ होने से और डिक्री पास होने तक (चाहे याचिका मंजूरी की डिक्री हो, चाहे खारिजी की) न्यायालय की आज्ञा द्वारा एक पक्षकार दूसरे पक्षकार को देता है। हिन्दू विवाह अधिनियम में इसका उपबन्ध धारा 24 में है। इस धारा के अनुसार यदि इस अधिनियम के अधीन होने वाली किसी कार्यवाही में न्यायालय को यह प्रतीत हो कि यथास्थिति, पति या पत्नी की कोई ऐसी स्वतन्त्र आय नहीं है जो उसके सम्भाल और कार्यवाही के आवश्यक व्ययों के लिये पर्याप्त हो, वहां वह पति या पत्नी के आवेदन पर प्रत्यर्थी को यह आदेश दे सकेगा कि वह अर्जीदाता को कार्यवाही में होने वाले व्यय तथा कार्यवाही के दौरान में प्रतिमास ऐसी राशि संदत्त करे जो अजीदाता की अपनी आय तथा प्रत्यर्थी की आय को देखते हये न्यायालय को यक्तियुक्त प्रतीत हो। यह दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की याचिका में भी दिया जा सकता है। इन तथ्यों के सिद्ध होने पर न्यायालय को भरण-पोषण और कार्यवाही के व्यय का आदेश देना

1.देखें, मनजीत सिंह बनाम सविता, 1984 पं० और ह0 281.

2. इसका एक अपवाद है, यदि पत्नी ने पति की उन्मत्तत्ता के आधार पर विवाह-विच्छेद कर लिया है तो पति भरण-पोषण की मांग कर सकता है।

3. आदिगरल बनाम आदिगरल, 1973 आन्ध्र प्रदेश 31; गोविन्द राव बनाम आनन्दी बाई, 1978 बम्बई 433.

4. 1987 आंध्र प्र० 237.

5. गणेशन बनाम राशमल, 1994 मद० 316.

ही होगा। उसे इस सम्बन्ध में कोई विवेक नहीं है। न्यायालयों को अपत्यों को आवश्यकताओं को पति के लिये भी रकम निर्धारित करने का अधिकार है। इस भाँते धारा 24 निम्न दो बातों के बारे में उपबन्ध बनाती

(1) प्रार्थी का भरण-पोषण और

(2) कार्यवाही का आवश्यक व्यय।

उपर्युक्त कथित दोनों अनुतोषों के लिये विवाह की अवता – विवाह-विच्छेद न्यायिक पृथक्करण और दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की कार्यवाहियों में न्यायालय आदेश दे सकता है।

प्रार्थना-पत्र कौन दे सकता है-पति और पत्नी-धारा 24 के अन्तर्गत प्रश्न उठता है कि पति और पत्नी से ज्या तात्पर्य है। स्पष्ट ही है कि वैध विवाह के पति-पत्नी में से कोई अन्तरिम भरण-पोषण के प्रार्थना-पत्र दे सकता परन्तु यहां पर यह तकनीकी अर्थ नहीं लिया गया है। विवाह के अवैध या शून्य होने पर भी उस विवाह के युगल पति-पत्नी कहलायेंगे और उनमें से कोई भी अन्तरिम भरण-पोषण के लिये प्रार्थना-पत्र दे सकता है।

प्रार्थना-पत्र का आधार है-प्रार्थी के पास उसको सम्भाल और कार्यवाही के आवश्यक व्यय के लिये कोई पर्याप्त स्वतन्त्र आय नहीं है। कुछ मित्र और नातेदार उसको आर्थिक सहायता कर रहे हैं या आर्थिक सहायता करने को तत्पर हैं, यह कोई ऐसा तथ्य नहीं है जिस पर न्यायालय आदेश देते समय ध्यान रखेगा। न्यायालय को प्रार्थी और प्रतिपक्षी की स्वतन्त्र आय को ध्यान में रखना है न कि अनुदान या खैरात को जो उसे दूसरे से मिलती है न्यायालय पक्षकारों की अन्य परिस्थितियों का ध्यान भी रख सकता है जैसे प्रार्थी का बीमार रहना या प्रतिपक्षी का परिवार बड़ा होना आदि।

प्रार्थी की आय-यह सिद्ध होने पर कि प्रार्थी के पास भरण-पोषण के पर्याप्त साधन नहीं है, न्यायालय का यह कर्तव्य है कि वह भरण-पोषण की आज्ञा प्रदान करे। आधार यह है कि भरण-पोषण के लिये उसके पास पर्याप्त आया नहीं है। यदि पत्नी की अस्थाई नौकरी मिल भी गयी है तो यह उसकी आय नहीं कहलायेगी।

यह ध्यान देने योग्य बात है कि धारा 24 में शब्द ‘आय’ है, सम्पत्ति नहीं। गीता बनाम प्रभात में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कहा कि हम ‘आय’ शब्द का कितना भी वहत अर्थ निकालें उसके अन्तर्गत प्रार्थी की चल अचल सम्पत्ति नहीं आ सकती है जब संसद न शब्द ‘साधन नहीं बल्कि ‘आय’ का प्रयोग किया है तो यह प्रयोग जानबूझ कर किया गया है, उस अर्थ में कि ‘आय’ न देने वाली सम्पत्ति आय नहीं है। वह साधन भले ही हो आय नहीं कहला सकती है। अत: धारा 24 के अन्तर्गत उस सम्पत्ति का ब्यौरा नहीं किया जायेगा जिसके द्वारा कोई आय नहीं है। पिता से वसीयत में प्राप्त सम्पत्ति भी ऐसी आय नहीं है।

चित्रा बनाम ध्रुव10 में न्यायालय ने कहा कि पति की क्या आय है इसके सबूत का भार पति पर है यह विशेष कर जबकि पत्नी पति से काफी समय से पृथक रह रही है और पति की आय का ब्यौरा देने में असमर्थ है |

1. ऊषा बनाम सुधीर, (1974) 76 पंजाब ला रिपोर्टर 135; बाबू लाल बनाम प्रेम, 1974 राजस्थान 93; आरती बनाम कवरलाल, 1977 दिल्ली 76..

2. बीबी बलबीर बनान रघुबीर, 1974 पंजाब लॉ रिपोर्टर 135; ऊषा बनाम सुधीर, 1973 पंजाब और हरियाणा 248.

3. शान्ता राम बना- दुर्गाबाई, 1987 बम्बई 184

4. लक्ष्मी बनाम अयोध्या प्रसाद, 1997 मध्य प्रदेश45.

5. राधिका बाई बनाम साधुराम, 1970 मध्य प्रदेश 14; राधाकुमारी बनाम नैय्यर, 1983 केरल 139.

6.हमा बनाम लक्ष्मण, 1986 केरल 130.

7. कृष्णा बनाम वीरा, 1987 उड़ीसा 65.

8. 1988 कल03.

9. प्रेम नाथ बनाम प्रेमलता, 1988 दिल्ली 94.

10. चिन्ना बनाम ध्रव. 1988 कल०49.

मुकदमें के खर्च में प्रार्थी द्वारा जो मुकदमें की पैरवी में आने-जाने का खर्चा भी आयेगा।।

उर्मिला देवी बनाम हरी राम और कंचन बनाम कमलेन्द्र में पति जो काम करने के लिये पूर्णतया स्वस्थ था परन्तु बेकार था, काम नहीं कर रहा था। न्यायालय ने न्यूनतम वेतन को उसकी आय मानकर पत्नी के पक्ष में अन्तरिम भरण-पोषण की राशि निर्धारित कर दी। दूसरी ओर यह मत व्यक्त किया गया है कि पढ़ी-लिखी, डिग्रीयाफ्ता पत्नी जो काम करने में सक्षम है, पर कोई काम नहीं कर रही है, वह भरण-पोषण पाने की अधिकारणी नहीं है।

प्रदीप कुमार बनाम शालिजा5 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने मत व्यक्त किया है कि धारा 24 में भरण-पोषण और गुजारे का अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति को उसके जीवनयापन के लिये रकम देना।

यह धारा शब्द प्रयोग करती है कि प्रार्थी के पास स्वतंत्र आय और अपने को आलम्ब (support) करने का साधन नहीं है। इसका अर्थ केवल मूल अस्तित्व (bare existence) नहीं है। इसका अर्थ है कि प्रार्थी भी उस सुख सुविधा से रहे जैसे अप्रार्थी रह रहा है।

अन्तरिम भरण-पोषण की राशि निर्धारित करते समय न्यायालय पक्षकारों की सामाजिक और आर्थिक संस्थिति, प्रार्थी की औचित्यपूर्ण आवश्यकतायें, प्रार्थी की आय, प्रतिपक्षी की आय, आश्रितों की संख्या उनकी नातेदारी आदि बातों का ध्यान रहेगा।

उन मामलों में, जहां पुरुष, जो लम्बे समय तक महिला के साथ रहता था और यद्यपि वे विधिमान्य विवाह की वैध आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकते, को महिला के भरण-पोषण का भुगतान करने के लिये दायी बनाया जाना चाहिये, यदि वह उसे परित्यक्त करता है। पुरुष को कर्तव्यों और आबद्धताओं को किये बिना वस्तुतः विवाह का उपभोग करके विधिक कमी से लाभ की अनुज्ञा नहीं दी जानी चाहिये। कोई अन्य निर्वचन महिला को आवारा और निराश्रित बना देगा, जिसे दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 में भरणपोषण का प्रावधान निवारित करने के लिये तात्पर्यित है।

किसी भी पक्षकार द्वारा सिद्ध करने पर कि परिस्थितियों में परिवर्तन हो गया है, न्यायालय इन आदेशों को बदल भी सकता है।

न्यायालय का स्वविवेक-प्रार्थी के भरण-पोषण की राशि निर्धारित करना न्यायालय के स्वविवेक पर है, और यह हर मामले के अपने-अपने तथ्यों के आधार पर निर्धारित की जाती है।10 यह ध्यान देने की बात है कि अन्तरिम भरण-पोषण के सम्बन्ध में पक्षकारों का आचरण महत्वहीन है।11 अंग्रेजी न्यायालयों की प्रथा को ध्यान में रखते हये कुछ न्यायालयों ने कहा है कि अन्तरिम भरण-पोषण की रकम प्रतिपक्षी की आय का पांचवा भाग होगा। परन्तु यह कोई कानूनी नियम नहीं है और इसका पालन करना अनिवार्य नहीं है।12 जम्मू

1. सरोज देवी बनाम अशोक कुमार, 1988 राज० 84.

2. 1988 पं० और ह081.

3. 1992 बम्बई 493.

4. कृष्णा बनाम पदमा, 1968 मैसूर 226.

5. 1989 दिल्ली 10.

6 वी० ऊषा रानी बनाम के० एल० एन० राव, 2000 पंजाब एवं हरियाणा 371.

7. देखें; उत्पल कुमार बनाम मंजुला, 1989 कल० 80.

8. चनमुनिया बनाम वीरेन्द्र कुमार सिंह कुशवाहा, 2011 विधि निर्णय एवं सामयिकी 50 (एस० सी०).

9. देवकी बनाम पुरुषोत्तम, 1973 राजस्थान 2; अनुराधा बनाम सन्तोष, 1976 दिल्ली 246.

10.केशव राम बनाम निर्मला, 1972 गुजरात 174; जमनादास बनाम सलिबू, 1975 हि०प्र० 18; प्राप्ति बनाम

रवीन्द्र, 1979 इला० 29; दिनेश बनाम ऊषा, 1979 बम्बई 173.

11. सशीला बनाम धनी, 1965 हिमांचल प्रदेश 12.

12 दिनेश बनाम ऊषा, 1973; बम्बई 173; धीरजबेन बनाम रमेश, 1983 गुज० 213: लता बनाम सिविल जज, 1993 इला० 1333; विनोद बनाम ऊषा, 1993 इला० 160.

और कश्मीर उच्च न्यायालय ने मत व्यक्त किया है कि आय के पांचवे भाग का नियम न ही औचित्य पूर्ण है और न ही विवेकपूर्ण।। परन्तु कुछ न्यायालयों ने इसे माना है।

कृष्णन बनाम थेलाम्बल में एक रोचक प्रश्न न्यायालय के समक्ष आया। न्यायालय द्वारा पत्नी के पक्ष में पास किये गये भरण-पोषण के आदेश की अवहेलना हेतु पति ने अपनी विवाह की अकृतता की याचिका प्रत्याहत कर ली। न्यायालय ने कहा कि पति द्वारा याचिका प्रत्याहत करने पर भी धारा 24 में ऐसा कोई उपबन्ध नहीं है कि जिसके अन्तर्गत न्यायालय द्वारा भरण-पोषण और कार्यवाही के व्यय का पारित किया हआ आदेश समाप्त हो जाये। यदि पति पत्नी को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिये बाध्य करता है।

और न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि पत्नी के भरण-पोषण के लिये पति व्यय दे तो उसे याचिका प्रत्याहत नहीं करने दी जायेगी। अन्यथा यह पत्नी का परिपीडन होगा क्योंकि कुछ व्यय तो वह उठा ही चुकी है। पति द्वारा विवाह-विच्छेद की याचिका वापिस लेने पर भी न्यायालय को उस तिथि तक के लिये वादकालीन भरण-पोषण की आज्ञा पारित करने का अधिकार है।

मैसूर उच्च न्यायालय के अनुसार याचिका खारिज होने तक की तारीख तक अन्तरिम भरण-पोषण का आदेश जारी रहता है और प्रतिपक्षी उस तिथि तक भरण-पोषण प्रार्थी को देने के लिये बाध्य है। अर्जी के खारिज होने के पश्चात् अन्तरिम भरण-पोषण के लिये प्रार्थना-पत्र नहीं दिया जा सकता है।

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