LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Second Part Notes Study Material

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LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Second Part Notes Study Material
LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Second Part Notes Study Material

गुरवन्त रूढ़ि के अन्तर्गत एक परिवार के भाई बहन दूसरे परिवार के भाई-बहन के साथ विवाह करते हैं और होता यह है कि शादी के टूटने पर दूसरी भी टूट जाती है। भाई द्वारा विवाह-विच्छेद कर लेने पर बहन ने अपने पति के घर रहने से इन्कार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि वह अभित्यजन की दोषी है। गुरु बचन कौर वि० प्रीतम सिंह- में सम्मति द्वारा अभित्यजन जैसी चीज को नहीं माना गया।    अभित्यजन में एक पक्षकार का दोषी होना अनिवार्य है। इस केस में पति ने 7 वर्ष पश्चात् याचिका दाखिल की तथा व्यवसायिक पत्नी की स्थिति को कभी समझने का प्रयत्न नहीं किया। पत्नी पति के साथ अपने व्यवसाय के स्थान पर रहने को सदा तत्पर थी।

आन्वयिक अभित्यजन (Constructive Desertion) (LLB Notes in PDF Download)

हम ऊपर देख चुके हैं कि अभित्यजन एक स्थान-मात्र का परित्याग है बल्कि एक स्थिति का परित्याग है। दाम्पत्य जीवन का प्रत्याहरण करने वाला पक्षकार अभित्यजन का दोषी होता है, चाहे वह वैवाहिक घर में ही क्यों न रहता रहे। उदाहरणार्थ : मान लें पति ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर देता है, या ऐसा आचरण और व्यवहार करता है कि पत्नी को घर छोड़ने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं है, तो फिर घर छोड़ने वाली पत्नी नहीं, बल्कि घर छुड़ाने वाला पति अभित्यजन का दोषी होगा। एक दूसरे उदाहरण लें, पति, पत्नी से कहता है कि उनके बीच सब कुछ समाप्त हो गया, कोई सम्बन्ध नहीं रहे हैं, वे आपस में न मिलेंगे, न बातचीत करेंगे, अपने-अपने कमरों में रहेंगे, वे केवल प्रातः काल का नाश्ता करेंगे, परन्तु बोलेंगे नहीं जब तक कि अपत्यों के सम्बन्ध में कोई बात करना आवश्यक न हो। इस स्थिति में पत्नी के लिये दो ही मार्ग हैं। वह वेदनापूर्ण और अपमानजनक जीवन न सह सकने के कारण पति का घर छोड़ कर अन्यत्र चली जाये, या अपत्यों के हित में, या इसलिये कि उसे अन्यथा कहीं जाने का स्थान नहीं है, वह वहीं रहती रहे। कोई भी मार्ग वह अपनाये, दोनों में ही पति अभित्यजन का दोषी है। ये उदाहरण आन्वयिक अभित्यजन के हैं।

अंग्रेजी मुकदमें में लेंग बनाम लेंग में हाउस आफ लाईस ने कहा कि यदि एक पक्षकार शब्दों द्वारा या आचरण द्वारा दूसरे पक्षकार को घर छोड़ने के लिये बाध्य कर दे तो पहला पक्षकार अभित्यजन का दोषी होगा चाहे घर दूसरे पक्षकार ने छोड़ा हो। बोवरन बनाम बोवरन में न्यायालय ने कहा कि जो पक्षकार दाम्पत्य जीवन को समाप्त करने का उत्तरदायी है, वहीं अभित्यजन का दोषी है। ज्योतिष चन्द्र बनाम मीरा में पत्नी ने पति के अभित्यजन के आधार पर न्यायिक पृथक्करण की याचिका प्रेषित की। पत्नी ने कहा कि उनका विवाह सन् 1954 में हुआ था। वह कलकत्ता में पति के साथ वैवाहिक घर में रहने आई परन्तु पति को सदैव ही उदासीन, ठंडा, लैंगिक रूप से असामान्य और विपरीत पाया। विवाह के कुछ समय उपरान्त पति इंग्लैंड चला गया, पत्नी अपनी एम० ए० की परीक्षा की तैयारी में लग गई। इंग्लैंड से लौटकर भी पति उदासीन ही रहा और अधिकांश समय पत्नी से पृथक रह कर व्यतीत करने लगा। वह रात्रि को क्लब में बहुत देर से लौटकर आता कुछ समय पश्चात् पत्नी पति के कहने से पी-एच० डी० करने के लिये लन्दन चली गई, जहाँ वह सन्, 1948 से सन् 1951 के बीच रही। इस बीच वह दो बार भारत आई, परन्तु पति को वैसा ही उदासीन पाया। सन्, 1951 से भारत वापस आने पर कुछ समय वह अपने माता-पिता के पास जयपुर में रही। तत्पश्चात् वह अपने पति के घर कलकत्ता गई। परन्तु पत्नी के भाग्य में मानसिक क्लेश और वेदना के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। सन् 1952 में वह कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रवक्ता हो गई। यह समझ कर कि उसे विफल और अन्धकारमय जीवन ही व्यतीत करना है उसने स्वयं को अपने काम के प्रति समर्पित कर दिया। वह अपने पति-गृह के प्रति बिल्कुल उदासीन हो गई और अपने पति के प्रति मौन, अवज्ञा और अवहेलना का रवैया अपनाया, इसके फलस्वरूप पति-गृह में उसका जीवन कलह, शारीरिक यंत्रणा और मानसिक यातना से परिपूर्ण हो उठा। पत्नी ने अनुभव किया कि पति के मन में उसके प्रति विद्वेष, घृणा और जितणा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है और वह चाहता है कि पत्नी उससे पृथक रहे। एक ही घर में वे

1. सनत कुमार बनाम नन्दिनी, 1990 सु० को० 594.

2. 1998 इलाहाबाद 140.

3. देवी सिंह बनाम सुशीला, 1980 राज० 48; सुखमा बनाम निरंजन, 1983 दिल्ली 469: सनील वि. ऊषा, 1994 म०प्र०1.

4. (1955) अपील केसेज 402.

5. (1925) प्रोवेट 192.

6. (1970) कलकत्ता 266.

अपरचित हो गये। इस भाँति पति-पत्नी 1954 तक उसी घर में रहते रहे। नवम्बर, 1954 में पली ने पनि पर छोड दिया और एक किराये के मकान में रहने लगी। सन् 1955 में पली के पिता ने पति-पलीके समझौता कराने का प्रयल किया परन्तु वह विफल रहा। उसके पति ने पिता को घर से बाहर निकाल दिया और उसे घसीटता हुआ उस गृह में ले गया जहाँ पत्नी रहती थी, वहाँ गर्म तर्क-वितर्क हआ। पति ने कहा किया तो पत्नी विवाह-विच्छेद लेले, अथवा अपने पिता के साथ माण्डला में जाये, जहाँ पर उसका पिता उस समय रह रहा था। पत्नी द्वारा ये शर्त मानने से इन्कार करने पर पति क्रोध से लाल-पीला हो गया और पत्नी को बेंते जडी। जब पिता ने विरोध किया तो उसने पिता को भी मारने का प्रयत्न किया परन्त पिता और पुत्री (पत्नी की बहिन जो उस समय वहाँ थी) ने बेंत पकड़ ली। उसके पश्चात् उसने पिता और पुत्री को तीन चार चांटे मारे और पुत्री की बांह मरोड़ दी। इन तथ्यों के साथ पत्नी से पति की क्रूरता और अभित्यजन (याचिका विशेष विवाह अधिनियम के अन्तर्गत थी, जहाँ क्रूरता और अभित्यजन विवाह-विच्छेद के आधार हैं) के आधार पर विवाह-विच्छेद की याचिका प्रेषित की। कलकत्ता उच्च न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि पति विवाह के पश्चात् पत्नी के प्रति सदैव उदासीन और ठंडा रहा है; पति-पत्नी के बीच सम्बन्ध बहुत ही अस्वाभाविक रहे हैं और पति द्वारा दाम्पत्य उत्तरदायित्व की अवहेलना के कारण ही पक्षकारों के बीच यह दुर्भाग्यपूर्ण और कटु स्थिति उत्पन्न हुई। अन्त में पति ने पत्नी के प्रति पूर्ण उदासीनता, लापरवाही और अशिष्टता का रुख अपनाया; अपने ही घर में वह अपरिचित की तरह रहने लगा, पति के मन में पत्नी के प्रति घृणा और वितृष्णा के अतिरिक्त और कुछ था ही नहीं। न्यायालय ने कहा कि पत्नी के वेदनापूर्ण और एकांकी जीवन के लिये पति ही उत्तरदायी है. उसने ही ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी जिनसे कि पत्नी के लिये घर छोड़ने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं था। इस भांति पति अभित्यजन का दोषी पाया गया। स्नेहलता बनाम केवल- और रंगानायकी बनाम अरुणा गिरि के मामले में पत्नी को बाध्य होकर पति का गृह छोड़ना पड़ा था, अत: वह अभित्यजन की दोषी नहीं थी। अनिल कुमार बनाम शेफाली में पति ने जबरदस्ती पत्नी को घर से निकाल दिया और उसे वापिस लाने की कभी चेष्टा नहीं की। पति की विवाहविच्छेद की याचिका अभित्यजन के आधार पर खारिज कर दी गई तथा पति को आन्वयिक अभित्यजन का दोषी माना गया।

सावित्री पांडे बनाम प्रेमचन्द्र पांडे में उच्चतम न्यायालय ने पुन: मत व्यक्त किया है कि अभित्यजन का अर्थ है वैवाहिक बाध्यतायें (matrimonial obligation) का त्यागना, न कि एक स्थान का त्यागना।

वास्तविक अभित्यजन और आन्वयिक अभित्यजन के तत्व एक ही हैं। दोनों के ही अन्तर्गत अभित्यजन का तथ्य और इच्छा का होना अनिवार्य है अन्तर इतना है कि प्रथम के अन्तर्गत अभित्यजन करने वाला पक्षकार घर का त्याग कर देता है, दूसरे में वह निष्कासन का आचरण करता है। आन्वयिक अभित्यजन में अभित्यजनकर्ता (Deserter) घर का त्याग नहीं करता है, वह घर में ही रहता है परन्तु दाम्पत्य जीवन का परित्याग करने के कारण वह अभित्यजन का दोषी होता है।

जान-बूझकर उपेक्षा करना (LLB Notes PDF)

न्यायाधीश सुब्बाराव के अनुसार जानबूझकर उपेक्षा करना आन्वयिक अभित्यजन है, अत: अभित्यजन के समस्त तत्वों का विद्यमान होना अनिवार्य है। लेखक की राय में जानबूझकर उपेक्षा करना आन्वयिक अभित्यजन का एक रूप हो सकता है या वह आन्वयिक अभित्यजन सदृश हो सकता है। वह आन्वयिक अभित्यजन नहीं है उससे कुछ भिन्न है। यह भारतीय सामाजिक परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में भारतीय संसद का अभित्यजन में एक नया प्रयोग है। कोई आचरण ऐसा हो सकता है कि वह अभित्यजन की परिभाषा पर ता। खरान उत्तरे किन्तु ऐसा आचरण है, जो अभित्यजन के समीप है या सदश है तो उसके होने पर वैवाहिक अनुतोष मिलना ही औचित्यपूर्ण है। उदाहरण के लिए, पति जानबूझकर पत्नी की उपेक्षा या अवहला करता

1. और देखें, श्याम चन्द्र बनाम जानकी, 1966 हिमाचल प्रदेश 70.

2. 1986 दिल्ली 162.

3.1993 मद्रास 174.

4. 1997 कलकत्ता 6 ओम प्रकाश बनाम मधु, 1997 राज० 204,

5..2002 सु०को591.

6. मीना बनाम लक्ष्मण,1964 सुप्रीम कोर्ट40; ताराचन्द बनाम नारायण देवी 197640 और ह० 200.

है, परन्तु उसकी इच्छा पत्नी को त्यागने की या वैवाहिक गृह का अभित्याग करने की नहीं है समस्त दाम्पत्य जीवन का वह अन्त नहीं करता है। न्यायाधीश श्री सुब्बाराव ने कुछ ऐसे ही तर्क का उत्तर देते हुये कहा यदि हम जानबूझकर उपेक्षा करने का यह अर्थ लेंगे तो फिर अभित्यजन के संप्रत्यय की परम्परागत सीमायें समाप्त हो जायेंगी और उसमें क्रान्तिकारी परिवर्तन हो जायेंगे। लेखक का निवेदन है कि भारतीय संसद् ने अभित्यजन के संप्रत्यय में इस भाँति के परिवर्तन करने हेतु ही जानबूझकर उपेक्षा करने की अभित्यजन के संप्रत्यय में जोड़ा है। जानबूझकर उपेक्षा करना कोई नयी बात नहीं है। अंग्रेजी न्यायालयों ने कहा कि आकस्मिक या भूल द्वारा की गई उपेक्षा जानबूझ कर की गई उपेक्षा नहीं है। दूसरी ओर, जानबूझकर की गई उपेक्षा के लिये यह आवश्यक नहीं है कि उपेक्षा स्वेच्छा से या सोच-समझकर ही की जाये। अत: यदि कोई व्यक्ति सचेत होकर अनुचित रूप से अपने दाम्पत्य कर्तव्यों की अवहेलना करता है या उनका पालन करने में असफल रहता है तो वह जानबूझकर उपेक्षा करने का दोषी होगा। संक्षेप में, जानबूझकर अवहेलना करना उपेक्षा के अन्तर्गत आता है। वह अवहेलना तो कर्तव्यच्युत होने के कारण, यह जानते हुये होती है कि इसका फल कर्तव्यों की अवहेलना होगी। परन्तु प्रत्येक दाम्पत्य दायित्व या कर्तव्य की अवहेलना जानबूझकर उपेक्षा नहीं होगी। अवहेलना ऐसे दायित्व या कर्तव्य की होना चाहिये जो मूल दाम्पत्य दायित्वों और कर्तव्यों के प्रवर्गीकरण में आते हैं, मैथुन की अवहेलना या साहचर्य की अवहेलना। भरण-पोषण के दायित्व की अवहेलना भी इसके अन्तर्गत आ सकती है।

लेखक का निवेदन है कि हिन्दू सामाजिक स्थिति को ध्यान में रखकर संसद ने जानबूझकर उपेक्षा को, अभित्यजन के साथ जोड़कर अभित्यजन को एक नयी दिशा देने का प्रयास किया है। 1976 के संशोधन द्वारा धारा 13 (1) के स्पष्टीकरण में जानबूझकर उपेक्षा को अभित्यजन के एक प्रकार के रूप में रखा गया है।

नीलम सिंह बनाम विजय नारायण जानबूझ, कर उपेक्षा करने का वाद है। पति एक बैंक का मैनेजर था, वह पत्नी को अपने पास न रखकर, एक गांव में रहने को बाध्य करता था और उसकी प्रास्थिति के अनुसार उसे कोई सुख-चैन नहीं देता था, न ही पर्याप्त भरण-पोषण के साधन उपलब्ध कराता था। यह जानबूझकर उपेक्षा की संज्ञा में आता है और न्यायालय ने विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित कर दी।

औचित्यपूर्ण कारण

अभित्यजन करने वाले पक्षकार ने यदि अभित्यजन किसी औचित्यपूर्ण कारण से किया है तो वह अभित्यजन का दोषी नहीं है। औचित्यपूर्ण कारण की विवेचना हम ‘दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन’ के साथ करेंगे। पत्नी का अपना अध्ययन समाप्त करने के लिये पिता के घर रहना एक औचित्यपूर्ण कारण है।

विवाह का विघटन-पत्नी द्वारा दुर्व्यवहार, पति के प्रति उदासीनता एवं पति एवं उसके परिवार पर कलंक अधिरोपित करने के आधार पर क्रूरता को साबित किया गया था अतः पति को विवाह के विघटन प्राप्त करने का हकदार पाया गया था।

बिना सम्मति के

अभित्यजन का चौथा तत्व है-अभित्यजन करने वाले पक्षकार ने अभित्यजन दूसरे पक्षकार की सम्मति से नहीं किया है। यदि अभित्यजन दूसरे पक्षकार की सम्मति से है तो वह अभित्यजन का दोषी नहीं होगा। पक्षकार जब पृथक्करण के करार के अन्तर्गत पृथक रह रहे हैं तो उनमें से कोई अभित्यजन का दोषी नहीं होगा भगवती बनाम साधूराम में पत्नी एक समझौते के अन्तर्गत पति से पृथक रह रही थी। न्यायालय ने

1. बलबीर बनाम धीर, 1979 पं० और ह. 300.

2. 1995 इला० 255.

3. इन्दिरा बनाम शैलेन्द्र, 1993 म०प्र०59.

4. श्री बनाम यू० श्रीनिवास, (2013) 2 एस० सी० सी० 114 : ए० आई० आर० 2013 एस० सी० 415: 2013 विधि निर्णय एवं सामयिकी 439 (एस० सी०).

5. सरेश बनाम सुमन, 1983 इला० 225.

6. देखें, वदरनम्मा बनाम कृष्णनम्मा, 1970 आंध्र वीकली रिपोर्टस 13.

7. 1971 पंजाब 181.

कहा कि वह अभित्यजन का दोषी नहीं है। सम्मति अभिव्यक्त हो सकती है या विवक्षित (Implied)। यह उस समय दी जा सकती है जब पक्षकार घर छोड़कर जाता है, यह उसके पश्चात् भी दी जा सकती है। बिपिन चन्द्र बनाम प्रभा में पति ने अपनी सम्मति बाद में दी जब कि उसने तार द्वारा पत्नी के पिता को सूचित किया कि वह पत्नी को न भेजे।

वैधानिक कालावधि (LLB Study Material)

हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 (1) (i-क) के अन्तर्गत यह वैधानिक उपबन्ध है कि अभित्यजन वैवाहिक अनुतोष के लिये तभी आधार होगा जब कि अभित्यजन कम से कम दो वर्ष की कालावधि का है। दो वर्ष की कालावधि पूर्ण होने के पूर्व अभित्यजन का वैवाहिक अपराध गठित नहीं होता है। अभित्यजन एक चालू रहने वाला अपराध है; यह एक अपूर्ण अपराध है। इससे तात्पर्य यह है कि एक बार आपराधिक कृत्य के आरम्भ होने पर चालू रहता है जब तक कि वह अभित्यजन करने वाले पक्षकार के किसी कृत्य या आचरण द्वारा समाप्त न हो जाये। यह अपराध दो वर्ष की कालावधि पूर्ण होने पर भी तब तक अपूर्ण रहता है जब तक कि दूसरा पक्षकार न्यायालय में याचिका न प्रेषित कर दे। दूसरे शब्दों में, न्यायालय में वैवाहिक अनुतोष की याचिका प्रेषित करने पर ही अभित्यजन पूर्ण होता है, उससे पूर्व अपूर्ण रहता है, अतः यदि अभित्यजन करने वाला पक्ष चाहे तो याचिका प्रेषित होने के पूर्व अपने कृत्य या आचरण द्वारा उसे समाप्त कर सकता है। बिपिन चन्द्र बनाम प्रभार और लक्षमण बनाम मीना दोनों ही मामलों में पत्नी ने वैवाहिक गृह का परित्याग किया था दोनों में ही प्रश्न था कि क्या पत्नी समस्त वैधानिक कालावधि से अभित्यजन में रही? प्रथम मामले में उच्चतम न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि पत्नी समस्त कालावधि तक अभित्यजन में नहीं रही और दूसरे में उच्चतम न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि वह रही है। यह आवश्यक है कि दो वर्ष की कालावधि पूर्ण होने पर ही याचिका प्रेषित की जा सकती है।

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