LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Notes Study Material

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LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Notes Study Material
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अध्याय 6 (Chapter 6, LLB Notes in Hindi English.

वैवाहिक अनुतोष

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के प्रतिपादित होने के पूर्व हिन्दू विधि में, रूढ़ि के अतिरिक्त, विवाहविच्छेद मान्य नहीं था। विवाह-विच्छेद को मान्यता देने का प्रथम प्रयत्न बड़ौदा रियासत में 1930 में हुआ जब बड़ौदा रियासत में हिन्दू वैवाहिक विधि में सुधार किये गये और विवाह-विच्छेद को मान्यता दी गयी। 1946 में बम्बई प्रान्त ने हिन्दुओं में द्विविवाह की प्रथा को समाप्त कर दिया और उसके फलस्वरूप 1946 में विवाह-विच्छेद का विधान बनाया गया। मद्रास प्रान्त ने 1949 में, सौराष्ट्र ने 1952 में इसी भांति के सुधार हिन्दू विधि में प्रान्तीय स्तर पर किये। ट्रावनकोर और कोचीन रियासतों में भी इसी भांति के सुधार पहले किये जा चुके थे, कुछ रियासती अधिनियम के अन्तर्गत परस्पर अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद भी मान्य था।

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के पूर्व हिन्दू विधि में सही अर्थों में वैवाहिक अनुतोषों का कोई स्थान नहीं था, यद्यपि विवाह के सम्बन्ध में कुछ कार्यवाहियां हो सकती थीं। उदाहरण के लिये सामान्य विधि के अन्तर्गत किसी भी विवाह के सम्बन्ध में शून्यकरणीयता की घोषणा की डिक्री वाद दायर करके प्राप्त की जा सकती थी। इसी भांति दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन का वाद भी दायर किया जा सकता था। हिन्दू विवाहित स्त्री के पृथक् निवास और भरण-पोषण अधिकार अधिनियम, 1946 के अन्तर्गत हिन्दू विवाहित स्त्री, निर्धारित आधारों पर पति से पृथक् रहकर भरण-पोषण के लिये पति के विरुद्ध वाद दायर कर सकती थी। परन्तु इसे न्यायिक पृथक्करण की संज्ञा नहीं दी जा सकती है।

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत वैवाहिक अनुतोषों को मान्यता दी गयी है। वैवाहिक अनुतोष से हमारा तात्पर्य है, विवाह के सम्बन्ध में न्यायालय द्वारा प्राप्त किया गया कोई भी निवारण। अंग्रेजी विधि में इन्हें मैट्रीमोनियल काजेज (या वैवाहिक कार्यवाही) भी कहते हैं। हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के अन्तर्गत सब हिन्दुओं के लिये निम्न चार वैवाहिक अनुतोषों की स्थापना की गयी है

(क) विवाह की अकृतता (Nullity of marriage),

(ख) न्यायिक पृथक्करण (Judicial separation),

(ग) विवाह-विच्छेद (Dissolution of marriage),

(घ) दाम्पत्य अधिकारों का प्रत्यास्थापन (Restitution of marriage)।

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के लागू होने के पूर्व रूढ़ि और विशेष अधिनियमों के अन्तर्गत मान्य विवाह-विच्छेद के आधार पर कार्यवाहियाँ अब भी मान्य हैं।

क्या यह आवश्यक है कि याचिकाकार या प्रत्यर्थी वैवाहिक अनुतोष की याचिका के समय हिन्दू हो- विलायत राज बनाम सुनीला में दिल्ली उच्च न्यायालय ने मत व्यक्त किया है कि यदि विवाह

1. उदाहरणार्थ देखें, ट्रावनकोर नामक ऐक्ट, और देखें, नन्गू बनाम अप्पी, 1966 एस० सी० 68.

2. यह अधिनियम अब निरसित कर दिया गया है, परन्तु इसके मूल उपबन्धों का हिन्दू दत्तक पोषण अधिनियम की धारा 18 (2) में अधिनियमित किया गया है.

3. हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955.

4. हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955, धारा 29 (2).

5. 1983 दिल्ली 351.

हिन्दू विधि के अन्तर्गत हुआ है तो विवाह के पश्चात् याचिकाकार या प्रत्यर्थी के हिन्दू न रहने पर भी वैवाहिक अनुतोष के लिये याचिका प्रेषित की जा सकती है।

(1)

विवाह की अकृतता (LLB Notes in English PDF)

विवाह की अकृतता की विधि सम्बन्ध विवाह की अवबाधाओं (अड़चनों) से है। यदि किसी पक्षकार में कोई अवबाधा है तो वह विवाह के अयोग्य हैं। अवबाधा के होते हुये विवाह करने पर विवाह विधिमान्य नहीं होगा। अधिकांश विधियों में अवबाधाओं को दो भागों में बांटा जाता है।

(क) पूर्ण अवबाधायें (Absolute bars), और

(ख) वैवेकिक अवबाधायें (Discretionary bars)।

पूर्ण अवबाधा के होने पर विवाह पूर्णतया अमान्य और शून्य होता है। यह प्रारम्भ से ही शून्य माना जाता है वैवेकिक अवबाधा के होने पर विवाह अमान्य नहीं होता है, वह शून्यकरणीय होता है, अर्थात् कोई पक्षकार चाहे तो उसका विघटन कर सकता है। कभी-कभी कुछ अवबाधाओं के होते हुये भी विवाह सम्पन्न होने पर विधि विवाह को न ही शून्य और न ही शून्यकरणीय मानती है, बल्कि उन्हें मान्यता देती है, यद्यपि पक्षकार और वैसा विवाह सम्पन्न कराने के लिये उत्तरदायी व्यक्तियों को दण्डित करती है। हिन्दू विवाह अधिनियम में यही बात है। यहां पर हम उन सापेक्षिक अवबाधाओं पर ही विचार करेंगे जिनके कारण विवाह शून्यकरणीय होता है। इन अवबाधाओं ने विवाह की अकृतता के सम्प्रत्यय को जन्म दिया। विवाह की अकृतता के सन्दर्भ में विवाहों को निम्न दो प्रवर्गों में विभाजित किया जाता है

(च) शून्य विवाह, और

(छ) शून्यकरणीय विवाह।

हमारे यहां यह प्रवर्गीकरण (classification) अंग्रेजी विधि से आया है। अंग्रेजी विधि में यह प्रवर्गीकरण कुछ ऐतिहासिक कारणों से हुआ है। इसका जन्म उस युग में हुआ जब वैवाहिक अधिकारिता धार्मिक न्यायालयों को थी। यह दुर्भाग्य है कि हमने इस प्रवर्गीकरण को उसके दोषों सहित अपना लिया है।

शून्य विवाह का अर्थ-शून्य विवाह कोई विवाह नहीं है। यह ऐसा सम्बन्ध है जो विधि के समक्ष विद्यमान है ही नहीं। इसे विवाह केवल इस कारण कहते हैं कि दो व्यक्तियों ने विवाह के अनुष्ठान सम्पन्न कर लिये हैं। परन्तु पूर्ण अवबाधाओं के होने या पूर्णतया सामर्थ्यहीन होने के कारण कोई भी व्यक्ति पति-पत्नी की प्रास्थिति विवाह के अनुष्ठान करके ही प्राप्त कर सकता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई भाई-बहिन विवाह के अनुष्ठान सम्पन्न कर लें तो वे पति-पत्नी नहीं हो सकते हैं। शून्य विवाह, विवाह न होने के कारण किसी भी विधिक सम्बन्ध या प्रास्थिति को जन्म नहीं देता है। वैध विवाह के अन्तर्गत विधिक संस्थितियां और सम्बन्ध जन्म लेते हैं। पक्षकार पति-पत्नी की प्रास्थिति प्राप्त करते हैं, सन्तान वैध सन्तान की संस्थिति प्राप्त करती है और पक्षकारों के पारस्परिक अधिकारों, कर्तव्यों और दायित्वों का जन्म होता है। परन्तु शून्य विवाह के अन्तर्गत ऐसा कुछ नहीं होता है। यदि पक्षकारों में से कोई (या दोनों ही) दूसरा विवाह कर लें तो वह विवाह का दोषी नहीं होगा। यदि पत्नी को कोई रखैल कहकर पुकारे तो वह मानहानि का अपराध या दोषी नहीं होगा। कोई भी व्यक्ति उस विवाह को शून्य मानकर चल सकता है, वह उसे शून्य घोषित कराने का वाद भी प्रेषित कर सकता है या अन्य कानूनी कार्यवाही में उस विवाह को शन्य मानकर चल सकता है 3 हिन्द विवाह अधिनियम का कोई भी उपबन्ध इस कार्यवाही में बाधक नहीं है। शून्य विवाह की सन्तान अधर्मज होती है (धारा 16 के कारण अब हिन्दू विधि में ऐसी सन्तान वैध है)। शन्य विवाह के अन्तर्गत पक्षकारों के

1. देखें, अध्याय 5, ‘मानसिक सामर्थ्य’ शीर्षक के अन्तर्गत.

2. कृष्णा बनाम तुलसान, 1972 पंजाब और हरियाणा 305.

3 राजेश बाई बनाम शान्ताबाई, 1972 बम्बई 231; रामप्रिया बनाम धर्मदास, 1984, ई. 147.

बीच किसी भी कर्तव्य, अधिकार या दायित्व का जन्म नहीं होता है। विवाह शून्य घोषित कराने की याचिका प्रेषित होने पर और डिक्री पास होने के पश्चात् कोई भी पक्षकार भरण-पोषण की मांग कर सकता है, परन्तु यह इसलिये नहीं कि शून्य विवाह के अन्तर्गत वैसा उत्तरदायित्व उत्पन्न होता है, बल्कि इसलिये कि उस सम्बन्ध में हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 में विशिष्ट उपबन्ध (Specific provision) है।

शून्य विवाह को शून्य करार देने के लिये शून्य घोषित करने की डिक्री की आवश्यकता नहीं है । जब न्यायालय वैसी डिक्री पारित करता भी है तो वह केवल इस तथ्य की घोषणा करता है कि विवाह शुन्य है। विवाह न्यायालय की डिक्री द्वारा शून्य नहीं होता है, वह तो वैसे ही शून्य है।

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 11 के अन्तर्गत विवाह शून्य घोषित कराने की याचिका विवाह के दोनों पक्षकारों में से कोई भी एक प्रेषित कर सकता है, अन्य व्यक्ति नहीं । यदि विवाह इस कारण शून्य है पुरुष की पूर्व पत्नी के जीवन काल में विवाह हुआ है तो धारा 11 के अन्तर्गत पूर्व-पली याचिका प्रेषित नहीं कर सकती बल्कि शून्य विवाह की ही पत्नी याचिका प्रेषित कर सकती है। पहली पत्नी वैसी घोषणा का वाद विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम (Specific Relief Act, 1963) के अन्तर्गत ला सकती है। वैसी याचिका पक्षकारों में से एक के मरने के उपरान्त दूसरा पक्षकार प्रेषित नहीं कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी भी विवाह की शून्यता का वाद किसी सिविल न्यायालय में दायर करता है तो हिन्दू विवाह अधिनियम का कोई भी उपबन्ध उसके रास्ते में नहीं आता है।

अकृत एवं शून्य विवाह-यदि पत्नी द्वारा अपने पूर्व पति के साथ प्रथम विवाह को न्यायालय की किसी डिक्री द्वारा विघटित नहीं किया गया है तो इस कारण उसका दूसरा विवाह अधिनियम की धारा (1) के उल्लंघन में है और उसे अधिनियम की धारा 11 के अधीन अकृत किया जाना चाहिये।

शून्य विवाह के आधार-हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 11 शून्य विवाह का आधार निर्धारित करती है। ये आधार अधिनियम के पारित होने के पश्चात् हुये विवाहों पर लागू होते हैं। अधिनियम के पूर्व सम्पन्न शून्य विवाहों पर असंहिताबद्ध हिन्दू विधि के नियम लागू होते हैं। धारा 11 के अन्तर्गत शून्य विवाह के निम्न तीन आधार हैं-

(क) विवाह के समय किसी पक्षकार का पति या पत्नी जीवित था। (देखें; अध्याय 5 ‘द्विविवाह’ शीर्षक के अन्तर्गत),

(ख) पक्षकार एक दूसरे के सपिण्ड हैं (देखें; अध्याय 5, सपिण्ड नातेदारी’ शीर्षक के अन्तर्गत), और

(ग) पक्षकारों के प्रतिषिद्ध कोटि की नातेदारी (देखें, अध्याय 5, ‘प्रतिषिद्धि कोटि की नातेदारी’ शीर्षक के अन्तर्गत)।

उपर्युक्त किसी भी आधार पर पति या पत्नी विवाह के शून्य घोषित कराने की याचिका प्रेषित कर सकते हैं। धारा 11 के अतिरिक्त, दो और आधार हैं जिन पर विवाह शून्य होता है। प्रथम जब पक्षकारों ने विवाह के

1. देखें, हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955, धारायें 24 और 25.

2. लीला बनाम लक्ष्मी, 1968 इलाहाबाद लॉ जर्नल 689..

3. परमास्वामी बनाम सोरनाथाम्मल, 1968 मद्रास 124; शीला बनाम रामनन्दनी, 1981 इला0 42,

4. केदार बनाम सुप्रभा, 1965 पटना 311.

5. (1964) 2 इलाहाबाद वीकली नोट्स 142.

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