LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Forth Part Notes Study Material

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LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Forth Part Notes Study Material
LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Forth Part Notes Study Material

सकता है। लेकिन इसमें न्यायालय पर यह प्रतिबन्ध भी अधिरोपित किया गया है कि वह पक्षकारों के मध्य पक्षकारों की सुलह की सम्भावनाओं को सम्भव बनाने के लिए 6 माह की अवधि समाप्त होने के पूर्व ऐसे विवाह-विच्छेद को प्रदान न करे। इसके अलावा उच्चतम न्यायालय ने अनिल कुमार जैन बनाम माया जैन के वाद में यह आज्ञा दी है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के अधीन उच्चतम न्यायालय के सिवाय अन्य किसी भी न्यायालय को पारस्परिक सहमति पर विवाह-विच्छेर, की डिक्री के प्रदान किये जाने हेतु निर्धारित 6 माह की आइपक अवधि को त्यजित करने का क्षेत्राधिकार प्राप्त नहीं है।

समझौते द्वारा विवाह-विच्छेद (LLB Question Paper)

क्या समझौते या राजीनामे द्वारा विवाह-विच्छेद किया जा सकता है? सत्य तो यह है कि पारस्परिक सम्मति द्वारा विवाह-विच्छेद भी समझौते या राजीनामे द्वारा किया गया विवाह-विच्छेद ही है, परन्तु हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत धारा 13-क की औपचारिकतायें पूरी करनी होती हैं।

मुनीश बनाम अनासयम्मा उर्फ पार्वथी, के वाद में विवाह-विच्छेद जो कि आर्डर 23, रूल 3 सिविल प्रोसीजर कोड के अन्तर्गत अभिलिखित किया गया, मान्य नहीं माना गया, क्योंकि वह धारा 13 तथा हिन्दू विवाह अधिनियम के विरुद्ध जाता है।

जोगिन्द्र सिंह बनाम पुष्पा पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने दाम्पत्य अधिकारों के पुन स्थापन की एक डिक्री पक्षकारों को रजामन्दी या समझौते से पास कर दी। पूर्ण पीठ के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या यह डिक्री मान्य है। पूर्णपीठ ने इस डिक्री को मान्य ठहराया। कलकत्ता उच्च न्यायालय के समक्ष शिवनाथ बनाम सुनीताई में पक्षकारों ने राजीनामें द्वारा विवाह-विच्छेद की डिक्री पारित करने की प्रार्थना की। इस वाद में पति ने दाम्पत्य अधिकारों से प्रत्यावर्तन की याचना की थी और पत्नी ने विवाह-विच्छेद की। लम्बी मुकदमेबाजी के पश्चात् पक्षकारों ने यह राजीनामा किया कि पति पत्नी को 15,000 रुपये उसके दहेज और भरण-पोषण के एवज में देगा और वह विवाह-विच्छेद के लिये राजी है। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने राजीनामे के आधार पर डिक्री पारित की दी। अपूर्व बनाम मनीषी6 में कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भिन्न मत प्रतिपादित किया है। उनके अनुसार बिना किसी आधार पर केवल राजीनामें द्वारा विवाह-विच्छेद तथा अन्य किसी वैवाहिक अनुतोष की डिक्री नहीं पारित की जा सकती हैं। पारस्परिक सम्मति द्वारा भी विवाहविच्छेद की डिक्री धारा 13-क की औपचारिकताओं को पूर्ण किये बिना नहीं पारित की जा सकती है।

विवाह का असुधार्य विघटन-जहाँ यह पाया जाता है कि दारों के बीच विवाह असधार्य ढंग से विघटित हुआ है और व्यर्थ हो गया है, स्थिति की आवश्यकता व्यथा और कटुता को समाप्त करने के लिये विवाह-विच्छेद की डिक्री द्वारा ऐसे विवाह के विघटन की मांग करती है। अधित्यजन का प्रश्न प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से निकाले जाने वाले अनुमान का मामला है और इन तथ्यों को उस प्रयोजन के सम्बन्ध में देखा जाना चाहिये, जिसे उन तथ्यों द्वारा या आचरण तथा आशय की अभिव्यक्ति, पथक्करण के वास्तविक कार्य के पूर्ववर्ती और पाश्चात्वर्ती दोनों द्वारा प्रकट किया जाता है।

1. अनिरुद्ध कुमार द्विवेदी एवं एक अन्य बनाम प्रधान न्यायाधीश कुटुम्ब न्यायालय एवं एक अन्य, 2012 (3) ए० डब्ल्यू ० सी० 2264 (इला०).

2. 2009 (10) एस० सी०सी० 415:

3.2001 कनाटक 355.

4. 1969 पं० और ह० 397.

5. 1989 कलकत्ता 84.

6. 1989 कलकत्ता 115.

7. रेनोल्ट बनाम राजरानी, 1982 सु० को 1291 के निर्णय का अनुगमन किया गया है।

8. दुर्गा प्रसन्न त्रिपाठी बनाम अरुन्धती त्रिपाठी, 2006 बी० एन० एस० 159 (एस० सी०) और भी देखें अजना किशोर बनाम पुनीत किशोर, 2002 (46) ए० एल० आर० 238(एस० सी०), श्रीमती स्वाता वर्मा बनाम राजन वर्मा, 2004 (1) एस० सी० सी० 123.

9., उपरोक्त सनत कुमार अग्रवाल बनाम नन्दिनी अग्रवाल. 1990 ए० एल० आर० 182 (एस० साल एल. आर०196 (एस. टार अल्वार बनाम अध्यात्म भटार श्रीदेवी. 2002 (467 ए० एल० आर० सी०). 1० एन० कामेश्वर राव बनाम जी० जबीली, 2002 (46) ए० एल० आर० 383.

जहां पति एवं पत्नी 9 वर्ष से अधिक समय से पृथक् रह रहे हैं और उनके मध्य कई मुकदमे लम्बित हैं। तो यह विवाह-विच्छेद के लिये पर्याप्त आधार है।।

विवाह-विच्छेद का एक वर्ष का निबन्धन (One Year’s Bar to Remarriage) या विवाह का ऋजु-विचारण (Fair Trial Rule) नियम

पंच फैसले (Arbitration) द्वारा विवाह-विच्छेद किसी भी विवाह का विघटन पंच फैसले द्वारा नहीं हो सकता है।

अंग्रेजी विधि का अनुसरण करते हुये हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 14 में विवाहविच्छेद पर तीन वर्ष का निबंधन लगाया गया था। दूसरे शब्दों में विवाह-विच्छेद की याचिका सामान्यतः विवाह के पश्चात् प्रथम तीन वर्ष के दौरान में प्रेषित नहीं की जा सकती। विधि-विवाह (संशोधन) अधिनियम, 1976 के द्वारा यह अवधि घटाकर एक वर्ष की गई है। इस उपबन्ध के पीछे सिद्धान्त यह है कि प्रत्येक विवाह को ऋजु-विचारण का अवसर मिलना चाहिये। बहुधा यह होता है कि विवाह के आरम्भिक जीवन में पक्षकारों के बीच समायोजन की कठिनाई होती है, पक्षकार एक दूसरे को, एक दूसरे की आवश्यकताओं, और माँगों को एक दूसरे के स्वभाव, भावना आचार-विचारों को समझने में कुछ समय लेते हैं। यदि विवाह-विच्छेद की सुविधा उन्हें प्राप्त हो तो एक दूसरे से समायोजित होने का प्रयत्न करने के स्थान पर उन्हें प्रलोभन होता है विवाह-विच्छेद का। वे विवाह-विच्छेद, एक न वापस लिये जाने वाला पग, ले लेते हैं और फिर पछताते है। उस उपबन्ध का यही औचित्य है। परन्तु इस अवधि के व्यतीत होने पर भी यदि पक्षकार यह समझे कि विवाह-विच्छेद के अतिरिक्त उसके लिये अन्य कोई मार्ग नहीं है तो फिर वे विवाहविच्छेद ले सकते हैं। असाधारण परिस्थिति में इस अवधि के भीतर विवाह-विच्छेद लिया जा सकता है। लेखक का निवेदन है कि जहाँ पारस्परिक अनुमति द्वारा विवाह-विच्छेद मान्य है वहाँ जो ऋजु-विचारण नियम का औचित्य समझ में आता है, परन्तु जहाँ वह विवाह दोषिता आधारों पर या विवाह भंग के आधारों पर ही उपलब्ध है, वहाँ ऋजु-विचारण नियम का कोई औचित्य नहीं है। उदाहरण लें, विवाह के एक मास पश्चात् ही पति ईसाई हो जाता है, या जारता में रहने लगता है, तो क्या पत्नी से यह कहना औचित्यपूर्ण होगा कि तुम 11 महीने और विवाह को ऋजु-विचारण दो, या विवाह के तीन माह पश्चात् पत्नी दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री प्राप्त कर लेती है, पति उसका पालन नहीं करता, तो क्या कहना कि “नहीं, नहीं, अभी नौ माह और बाकी हैं, विवाह को ऋजु-विचारण दो,” औचित्यपूर्ण है?

धारा 14 के परन्तुक में दो अपवाद दिये गये हैं। परन्तुक के अन्तर्गत जिला न्यायालय किसी पक्षकार के आवेदन-पत्र दिये जाने पर किसी याचिका को एक वर्ष व्यतीत होने से पहले प्रेषित करने की अनुज्ञा इस आधार पर दे सकता है कि वह मामला याचिकाकार द्वारा असाधारण कष्ट भोगे जाने या प्रतिपक्षी की असाधारण दुराचारिता का है। किन्तु यदि जिला न्यायालय को याचिका की सुनवाई से यह प्रतीत हो कि याचिकाकार ने अर्जी प्रेषित करने की अनुमति किसी दुर्व्यपदेशन (Misrepresentation) द्वारा या मामले की प्रकति को छिपा कर ली थी तब वह डिक्री प्रभावी नहीं होगी, जब तक कि विवाह की तिथि से एक वर्ष का अवसान न हो जाये, अथवा उस अर्जी को किसी अन्य ऐसी अर्जी पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना खारिज कर सकेगा। जा उक्त एक वर्ष के अवसान के पश्चात् उन्हीं या सारतः उन्हीं तथ्यों पर दी जाये जो ऐसी खारिज की गई अर्जी के समर्थन में साबित किये गये थे।

परन्तुक के अन्तर्गत दो निम्न अपवाद हैं-

(1) मामला याचिकाकार द्वारा असाधारण प्रकट भोगे जाने का है, या

(2) मामला प्रतिपक्षी की असाधारण दुराचारिता का है।

असाधारण कष्ट या असाधारण दुराचारिता का क्या अर्थ है, हिन्दू विवाह अधिनियम इस बारे में मौन है। कष्ट और दुराचारिता शब्द ऐसे हैं जिनका वृहत कोई भी रूप लिया जा सकता है। यही कारण है कि उनके

1. श्रीमती पूर्णिमा मिश्रा बनाम सुनील मिश्रा, 2010 विधि निर्णय एवं सामयिकी 620 (एल० बी०).

2. राजकुमार बनाम अंजना 1995 पं० और ह० 18. ‘

3. मेट्रिमोनियल काजेज एक्ट, 1973.

साथ असाधारण शब्द जोड़ा गया है। इसका तात्पर्य यह होता है कि ये वे मामले नहीं हैं जो बहधा न्यायाल परन्त ये मामले हैं जो यदाकदा ही न्यायालय के समक्ष आते हैं। दुराचारिता में कछ नैतिक पतन की भावना निहित है। यदि नैतिक पतन या नतिक दोष का मामला नहीं है तो वह दुराचारिता नहीं कहलायेगा। असाध्य उन्मत्तता (Incurable insanity) दुराचारिता की परिभाषा में नहीं आ सकती है. यद्यपि कष्टप्रद स्थिति तो वह है ही। यह भी हो सकता है कि वह बात दुराचारिता में आ जाये, और वही बात असाधारण कष्ट में भी आ जाये। उदाहरणार्थ मान लें, एक ब्राह्मण स्त्री का पति मुसलमान हो जाता है और इस बात पर अड़ जाता है कि माँस एक ही रसोई में पकेगा तो यह पति की असाधारण दुराचारिता भी है और पत्नी के लिये असाधारण कष्टप्रद स्थिति भी है। कुछ दोषिता का आधार स्वयं असाधारण दुराचारिता है, जैसे बलात्कार, गुदा-मैथुन और पशु-मैथुन। इस भाँति कुछ दौषिता का आधार असाधारण कष्ट है, जैसे विपक्षी का संसार त्याग कर सन्यासी होना, पत्नी ने जारकर्म किया और जारकर्म के फलस्वरूप एक बालक को जन्म दिया है तो वह असाधारण दुराचारिता है। लेखक के निवेदन में जारता में रहना स्वयं असाधारण दुराचारिता है।

अंग्रेजी निर्णय बौमन बनाम बौमन में असाधारण कष्ट और असाधारण दुराचारिता की व्याख्या की गई है। इस व्याख्या को भारतीय न्यायालयों ने भी स्वीकार कर लिया है। अंग्रेजी निर्णय के अनुसार निम्न तीन स्थितियों में मामला असाधारण कष्ट या असाधारण दुराचारिता का होगा।

(क) यदि प्रतपक्षी ने एक से अधिक वैवाहिक अपराध किये हैं,

(ख) यद्यपि प्रतिपक्षी ने वैवाहिक अपराध तो एक ही किया है परन्तु उसका आचरण निन्दनीय है, और

(ग) यद्यपि प्रतिपक्षी ने अपराध तो एक ही किया है परन्तु यह अपराध-मात्र न होकर उससे कहीं अधिक है।

प्रतिपक्षी का याचिकाकार के साथ रहने से इन्कार करना मात्र असाधारण कष्ट की परिभाषा में नहीं आ सकता है। इस लेखक का निवेदन है कि यदि विवाह-विच्छेद की याचिका संपरिवर्तन के आधार पर दी जाये और साथ में यह सिद्ध हो जाये कि प्रतिपक्षी ने याचिकाकार को छोड़ दिया है, और छोड़ देना अभित्यजन की परिभाषा (चाहे वैधानिक कालावधि न भी पूर्ण हो) में आता है तो यह असाधारण कष्ट की संज्ञा में आ जायेगा। सविता बनाम प्राणनाथ के मुकदमे में तथ्य कुछ असाधारण थे। पक्षकारों का विवाह जन 11.1962 को हुआ था। विवाह-विच्छेद की याचिका नवम्बर 11, 1964 को प्रेषित की गई थी। प्रतिपक्षी ने धारा 14 के अन्तर्गत आक्षेप किया। प्रति-उत्तर में याचिकाकार के यह कहने पर कि प्रतिपक्षी ने उसे छोड़ दिया है, न्यायालय ने कहा कि असाधारण कष्ट की स्थिति नहीं है। याचिकाकार ने याचिका में संशोधन करने का प्रार्थना-पत्र दिया। याचिका अक्टूबर 18, जून 1965 तक लम्बित रही। इस समय तक तीन वर्ष परे हो गये। न्यायालय ने कहा कि याचिका खारिज करने का अब कोई औचित्य नहीं है, यदि याचिका खारिज कर भी दी गई तो याचिकाकार तुरन्त ही दूसरी याचिका प्रेषित कर सकता है।

यदि याचिका विवाह सम्पन्न होने की तिथि से एक वर्ष के भीतर प्रेषित की गई है तो धारा 14 (1) के अन्तर्गत यह प्रार्थना-पत्र देना आवश्यक है कि उसकी याचिका अपवादों के अन्तर्गत आती है। यदि एक वर्ष की कालावधि के पूर्व याचिका प्रेषित करने की आज्ञा दुर्व्यपदेशन द्वारा या मामले की प्रकृति छिपाकर ली गई है तो निर्णय देते समय न्यायालय यह शर्त लगा सकता है कि डिक्री एक वर्ष की अवधि पूर्ण होने के पश्चात् ही प्रभावी होगी या न्यायालय चाहे तो याचिका को खारिज भी कर सकता है परन्तु उसी आधार पर या सारतः उसी आधार पर एक वर्ष पश्चात याचिका लाने का प्रथम याचिका के खारिज होने का कोई प्रभाव नहीं होगा।

1. मेघनाद बनाम सुशीला, 1957 मद्रास 423 रेड आन डायवोर्स के आधार पर.

2. बीना बनाम प्रेम, 1972 करेन्ट लॉ जर्नल 93.

3. (1949) 2 आल इंग्लैंड रिपोर्टस 127.

4. मेघनाथ बनाम सुशीला, 1957 मद्रास 423.

5. सविता बनाम प्राणनाथ, 1976 जम्मू कश्मीर 89.

6. 1976 जम्मू एण्ड कश्मीर 89.

7. स्मृति बनाम दिलीप, 1982 कल० 574.

8. धारा 14 (2).

एक वर्ष की कालावधि के पूर्व याचिका प्रेषित करने की आज्ञा देते समय न्यायालय उस विवाद उत्पन्न सन्तान के हितों का और इस बात का ध्यान रखेगा कि क्या पक्षकारों के बीच उक्त एक वर्ष के के पहले पुनर्मिलन की कोई उचित सम्भाव्यता है।

दाम्पत्य अधिकारों की पुर्नस्थापना-वर्तमान मामले में उठाये गये विवाद पति-पत्नी के सम्बन्धों से तथा पुरुष शिशु की पैतृकता से सम्बन्धित हैं, शिशु का न केवल मामले के पक्षकारों के लिये महत्व है अपितु वह समाज के लिये भी सुसंगत है। ऐसे मामले में उठाये गये विवादों की संवेदनशील प्रकति को मस्तिष्क में रखकर अभिलेख पर के साक्ष्य पर सावधानीपूर्वक तथा गम्भीरता से विचार-विमर्श की आवश्यकता है। अभिलेख पर के साक्ष्य के सम्बन्ध में अधीनस्थ अपीलीय न्यायालय तथा उच्च न्यायालय ने अपने-अपने निर्णयों में यह इंगित किया है कि सुसंगत साक्ष्य मौखिक तथा दस्तावेजी साक्ष्य दोनों, जो उपलब्ध थे, अभिलेख पर नहीं है। इसलिये विवाद में ऋजुपूर्ण तथा उचित न्याय-निर्णयन के लिये दोनों पक्षकारों को और साक्ष्य प्रस्तुत करने देने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिये।

पक्षकारों के मध्य साथ रहने के लिये समझौता/करार-विवाह विच्छेद की डिक्री के विरुद्ध अपील-उच्चतम न्यायालय ने भारी संख्या में वादों में इस बात पर बल दिया है कि भारतीय समाज में विवाह को न्यायालय द्वारा बचाने का प्रयास किया जाये और न्यायालयों द्वारा यदि सम्भव हो विवाह के बन्धन में मरम्मत करने के लिये दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की सभी सम्भावना के प्रयास किये जायें। प्रस्तुत वाद में, अवर न्यायालयों द्वारा पक्षकारों को पहले ही तलाक प्रदान किया जा चुका है, तथापि, पक्षकारों द्वारा दाखिल प्रथम अपील में उन्हें सद्बुद्धि आ गयी थी। वे सभी वादों को वापस लेना चाहते हैं एवं एक साथ वैवाहिक जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। उनका विवाह केवल तलाक की डिक्री को अपास्त करके बचाया जा सकता है अन्यथा उन्हें ऐसे सम्बन्ध में रहना पड़ सकता है जिसका समाज द्वारा सामान्यतया अनुमोदन नहीं किया जाता है लेकिन उसे उच्चतम न्यायालय द्वारा किसी अपराध का गठन न करते हुये मानकर स्वीकार किया गया है।

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