LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Five Part Notes Study Material

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LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Five Part Notes Study Material
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साथ उसके पति ने क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया था और वह इस आधार पर तलाक की डिक्री की हकदार है? का क्या अपीलार्थी ने युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना अपने पति के सहचर्य से प्रत्याहरण कर लिया था जैसा कि प्रत्यर्थी ने अपनी याचिका में अभिकथन किया है? अभिनिर्धारित किया गया कि जहाँ हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 (1) (i-क) के अधीन तलाक याचिका में साक्ष्य से साबित था कि पति ने पत्नी के साथ, दुर्व्यवहार किया था एवं उसे शारीरिक एवं मानसिक क्रूरता कारित की थी, वहाँ तलाक याचिका को मंजूर कर लिया जाना चाहिये।

विवाह-विच्छेद की इस आधार पर मांग की गयी थी कि विवाह अप्रतिष्ठाप्य रूप से भंग हो चुका है। भंग केवल पति की ओर से था। पत्नी लगातार इस बात पर अडिग रही थी कि वह अपने पति के साथ अपने भावी सम्बन्ध को लेकर अत्यन्त चिन्तित है और यह कि उसकी सर्वोपरि चिन्ता अपने पति के साथ पनःमिल जाने और दाम्पत्य सम्बन्ध में उसके साथ सामान्य रूप से एक बार पुनः रहने की है। चूंकि पत्नी द्वारा दाम्पत्य सम्बन्धों के पथक्करण पर कोई सहमति नहीं है. अत: पति की ओर से लिया गया आधार स्वीकार्य नहीं है। विवाह के अप्रतिष्ठाप्य रूप से भंग हो जाने के कारण विवाह-विच्छेद की डिक्री प्रदान किये जाने हेतु विधान मण्डल द्वारा विवाह के अप्रतिष्ठाप्य रूप से भंग हो जाने के कारण को आधार के रूप में प्रावधानित नहीं किया गया है। अतः विवाह के अप्रतिष्ठाप्य रूप से भंग हो जाने के लिए लिया गया आधार स्वीकार्य नहीं है।

क्रूरता के आधार पर विवाह के विघटन एवं विवाह-विच्छेद के लिये पत्नी द्वारा याचिका-शीलभ्रष्टता एवं किसी पराये पुरुष के साथ अश्लील मेल-जोल रखने के अरुचिकर अभियोग को एवं विवाहेत्तर सम्बन्धों को रखने के अभिकथनों को अधिरोपित करना पत्नी के चरित्र, सम्मान एवं प्रतिष्ठा पर गम्भीर हमला है एवं वह निकृष्टतम कोटि के अपमान एवं क्रूरता के समतुल्य है। प्रश्न जिसका उत्तर दिया जाना आवश्यक है वह यह है कि क्या अपीलार्थी पति द्वारा पत्नी के बारे में प्रकथन, अभियोग और चरित्रहनन अधिनियम की धारा 13 (1) (i-क) के अधीन विवाह-विच्छेद के दावे का समर्थन करने के लिये मानसिक क्रूरता का गठन करता है। इस सम्बन्ध में विधि की स्थिति सुस्थापित हुई है और यह घोषित किया गया है कि शीलभ्रष्टता और किसी पराये पुरुष के साथ अश्लील मेलजोल तथा विवाहेत्तर सम्बन्ध के अभिकथन पत्नी के चरित्र, सम्मान, प्रतिष्ठा, प्रास्थिति और साथ ही स्वास्थ्य पर गम्भीर प्रहार है। किसी शिक्षित भारतीय पत्नी के प्रसंग में विचार किये जाने और भारतीय दशाओं और मानकों द्वारा जांच किये जाने पर पत्नी को उपारोपित विश्वासघात की ऐसी अपनिन्दा सबसे निकृष्ट प्रकार के अपमान या क्ररता की कोटि में आयेगा, जो स्वयं आने आप में विधिनुसार क्रूरता को सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है जिससे मंजूर किये जा रहे पत्नी के दावे का समर्थन होता है। लिखित काथन में किये गये अथवा परीक्षा के अनुक्रम में संकेतित और प्रतिपरीक्षा के माध्यम से किये गये इन अभिकथनों से विधि की शर्त पूरी होती है, इसे भी इस न्यायालय द्वारा दढतापूर्वक निर्दिष्ट किया गया है। इन अभिकथनों के सुसंगत अंशों का परिशीलन करने पर, कुटुम्ब न्यायालय और साथ ही उच्च न्यायालय द्वारा अभिलिखित निष्कर्षों पर कोई आपत्ति नहीं की जा सकती है। वे ऐसी गणवत्ता, मात्रा तथा परिणाम के हैं जिससे कि ऐसी मानसिक पीड़ा, वेदना और कष्ट कारित हो जो विवाहविषयक विधिनुसार क्रूरता की पुन: निश्चित धारणा की कोटि में आते हैं जिनसे गम्भीर और अन्तिम व्यवधान उत्पन्न होता है, पत्नी गहरा आघात महसूस करने के लिये विवश हो जाती है और वह यक्तियक्त ढंग से यह आशंका करने लगती है कि ऐसे पति के साथ रहना उसके लिये खतरनाक होगा जो उसे इस प्रकार से ताना देता रहा था और दाम्पत्य-गृह को कायम रखना असम्भव हो गया था ।

क्रूरता जिसे परिनियम द्वारा परिभाषित नहीं किया गया है, की विधिक धारणा सामान्यतया ऐसे चरित्र के आचरण के रूप में बतायी गयी है जिससे जीवन, अंग अथवा स्वास्थ्य को (शारीरिक और मानसिक) खतरा उत्पन्न हो सकता हो अथवा उस खतरे की युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न हो सकती हो। क्रूरता के सभी प्रश्नों में सामान्यतया नियम यह होता है कि सम्पूर्ण दाम्पत्य सम्बन्धों पर विचार किया जायेगा. यह कि नियम का उस

1. श्रीमती कला कुमारी बनाम राजभवन आनन्द, 2003 विधि निर्णय एवं सामयिकी 7091 और भी देखें:रमेश चन्द्र बनाम श्रीमती रमेश चन्द्र बनाम श्रीमती सावित्री, 1995 (25) ए० एल० आर० 536 और धर्मेन्द्र कुमार ऊषा कुमारी, 1977 (3) ए० एल० आर० 490.

2. दर्शन गुप्ता बनाम राधिका गुप्ता, 2014 विधि निर्णय एवं सामयिकी 1 (एस० सी०1; विष्णु दत्त शर्मा बनाम मंजू शर्मा, ए० आई० आर० 2009 एस० सी० 2254.

3. विजय कुमार रामचन्द्र भाटे बनाम नीला विजय कुमार भाटे, 2003 विधि निर्णय एवं सामयिकी 634.

समय विशेष महत्व होता है जब करता में न केवल हिंसक कृत्य सम्मिलित हो बल्कि तिकारक झिडकियां शिकायत अभियोग अथवा उपालम्भ भी सम्मिलित हो। यह मानसिक, जैसे कि जीवन के प्रति उदासीनता तथा सहवास की इच्छा का अभाव उसके साथ रहने से इंकारी, पत्नी के लिये घृणा तथा नफरत अथवा भारोरिक हिंसा जैसे काय एवं बिना किसी कारण के लैंगिक मैथुन से दूर रहना हो सकेगी। यह सिद्ध किया जायेगा कि विवाह के एक पक्षकार ने परिणामों को ध्यान में रखे बिना ऐसे ढंग से व्यवहार किया है जिससे किसो पति-पत्नी को विद्यमान परिस्थितियों में बर्दाश्त करने के लिये नहीं कहा जा सकता है और यह कि कदाचार से स्वास्थ्य को क्षति कारति हयो है अथवा उस क्षति की युक्तियुक्त आशंका कारित हुयी है। क्रूरता के बाद में विचार किये जाने वाले दो पक्ष होते हैं। अपीलार्थी के पक्ष से, क्या इस अपीलार्थी को उस आचरण को बदर्शित करने के लिये कहा जाना चाहिये था? प्रत्यर्थी के पक्ष से, क्या यह आचरण क्षम्य था? न्यायालय को विनिश्चित करना आवश्यक है कि क्या कुल मिलाकर दोषी आचरण कर था? यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या संचयो आचरण यह कहने के लिये पर्याप्त रूप से गम्भीर है कि किसी ऐसे प्रति-हेतु, जिसे प्रत्यय विद्यमान परिस्थितियों में रख सकेगा, के सम्बन्ध में विचार करने के पश्चात् किसी प्रज्ञावान व्यक्ति के दुरिकोण से आचरण ऐसा है कि याची को बर्दाश्त करने के लिये नहीं कहा जाना चाहिये था।

डॉ० एन०जी० दस्ताने बनाम श्रीमती एस० दस्ताने,2 के वाद में, इस न्यायालय ने यह सम्प्रेक्षण किया कि सामान्यतया अपने अभिवाक् को स्थापित करने का भार याची पर होता है कि प्रत्यर्थी ने याची के साथ करता की थी और यह कि अधिनियम के अधीन विवाह-विषयक वादों में अपेक्षित सबूत का स्तर युक्तियुक्त सन्देह से परे क्रूरता के आरोप को स्थापित करना नहीं होना चाहिये बलिक यह पता लगाने के लिये विभिन्न अधिसम्भाव्यताओं को प्रभावित करने वाला होना चाहिये कि क्या प्राबल्य अभिकथित उक्त तपको विद्यमानता के पक्ष में है। क्रूरता की प्रकृति क्या है इस बात को भी स्थापित किया जाना आवश्यक है, यह बताया गया है कि अंग्रेजी विधि के अधीन शर्त से भिन्न जो इस प्रकृति की होगी जिससे कि जीवन, अंग या स्वास्थ्य को खतरा उत्पन्न हो ताकि ऐसे खतरे की युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न हो सके, को प्रश्नगत अधिनियम के अधीन न्यायालय को मात्र इतना देखना पड़ता है कि क्या याची ने यह सिद्ध किया था कि प्रत्यर्थी ने याची के साथ ऐसी क्रूरता का व्यवहार किया था जिससे कि मस्तिष्क में युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न हो कि स्वास्थ्य, प्रतिष्ठा, कार्यवृत्ति या उसी प्रकार की बातों की हानि और क्षति की परिणामित सम्भावनाओं पर विचार करते हुये एक साथ रहना हानिकर या क्षतिकर होगा।

वी० भगत बनाम श्रीमती डी० भगत, के वाद में यह सम्प्रेक्षण किया गया है कि धारा 13 (1) (iक) में मानसिक क्रूरता को व्यापक रूप से उस आचरण के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो अन्य पक्षकार को ऐसी मानसिक पीड़ा और कष्ट पहुँचाये जिससे उस पक्षकार के लिये अन्य पक्षकार के साथ रहना सम्भव न हो और पक्षकारों से युक्तियुक्त ढंग से साथ रहने की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती हो या यह कि अपकृत पक्षकार से युक्तियुक्त ढंग से ऐसा आचरण करने और अन्य पक्षकार के साथ रहने के लिये नहीं कहा जा सकता हो। यह सिद्ध करना भी आवश्यक नहीं माना गया था कि मानसिक क्रूरता ऐसी हो जिससे कि अपकृत पक्षकार के स्वास्थ्य को हानि कारित हो। वह ऐसा वाद या जिसमें पति ने पत्नी के विरुद्ध विवाहविच्छेद के लिये याचिका जारकर्म के आधार पर दाखिल की थी। उक्त कार्यवाहियों में पत्नी द्वारा दाखिल लिखित कथन में, उसने यह अभिकथन किया कि पति “मानसिक मतिभ्रम से ग्रसित था और यह कि उसका मस्तिष्क विकृत चित्त का था जिसके लिये उसे विशेषज्ञ मानसिक मन:चिकित्सा की आवश्यकता थी” और यह कि वह चित्तविक्षेपा (paranoid) असन्तुलन से पीड़ित था आदि और यह कि प्रतिपरीक्षा के दौरान उससे अनेक प्रश्न पूछे गये कि याची तथा उसके पितामह सहित उसके परिवार के अनेक सदस्य पागल किस्म के थे और यह कि सम्पूर्ण परिवार में पागलपन का क्रम चला आ रहा था। उक्त प्रसंग में, इस न्यायालय ने यद्यपि पल्ली के विरुद्ध लगाये गये अभिकथनों को सिद्ध नहीं माना था। लेकिन फिर भी पति के विरुद्ध लगाये गये पली द्वारा प्रत्यारोप निश्चित रूप से ऐसी प्रकृति की मानसिक क्रूरता का गठन करते थे कि पति से तत्पश्चात् यक्तियक्त ढंग से पत्नी के साथ रहने के लिये नहीं कहा जा सकता है। यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि

1. बिनीता सक्सेना बनाम पंकज पंडित, 2006 विधि निर्णय एवं सामयिकी 457 (एस० सी०) : 2006 (63) ए०एल० आर० 518 (एस० सी०).

2. एक आई० आर० 1975 एस०सी० 1534.

3. (1994)1 एस०सी० सी० 337.

पति यह कहने में न्यायोचित होगा कि उसके लिये पत्नी के साथ रह पाना सम्भव नहीं है। पत्नी के इस मत को नामंजर करते हुये कि वह अपने पति के साथ रहना चाहती है, न्यायालय ने यह सम्प्रेषण किया कि वह जानबयकर ऐसा हाव-भाव बना रही है जो पूर्णत: अस्वाभाविक तथा किसी विवेकशील व्यक्ति की समझ से परे था तथा न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि ऐसी परिस्थितियों में स्पष्ट निष्कर्ष यह होना चाहिये कि उसने पति के लिये भी जीवन को नर्क बनाने के लिये ही पीडायुक्त जीवन व्यतीत करने का निश्चय किया है।

दर्शन गुप्ता बनाम राधिका गुप्ता के वाद में पति द्वारा लिया गया आधार था कि पत्नी मानसिक बीमारी से ग्रस्त है तथा उसके लिये पत्नी के साथ रहना सम्भव नहीं है। चिकित्सक द्वारा राय दी गयी थी कि पत्नी के स्वास्थ्य में 80% तक का सुधार हुआ था। अत: यह अभिलिखित नहीं किया जा सकता कि पत्नी ऐसे रोग से ग्रस्त है जिसका इलाज सम्भव नहीं है। पति अपनी पत्नी के उग्र व्यवहार को भी सिद्ध करने में सफल नहीं रहा था। अत: विवाह-विच्छेद के लिये, लिये गये आधार को न्यायोचित नहीं माना गया।

विवाह-विच्छेद : शारीरिक एवं मानसिक क्रूरता-अभिव्यक्ति ‘क्रूरता’ का प्रयोग मानवीय आचरण तथा मानवीय व्यवहार के सम्बन्ध में किया गया है। यह विवाह-विषयक कर्तव्यों एवं बाध्यताओं के सम्बन्ध म आचरण ही हैं। क्रूरता किसी व्यक्ति के आचरण का अनक्रम होता है जो अन्य व्यक्ति को प्रतकूल ढंग से प्रभावित कर रहा है। क्रूरता मानसिक या शारीरिक, आशयपूर्ण या आशयरहित हो सकेगी। यदि वह शारीरिक हो तो न्यायालय को उसका अवधारण करने में कोई समस्या नहीं होगी। यह तथ्य और परिमाण का प्रश्न है। यदि वह मानसिक है तो समस्या कठिनाइयों को जन्म देती है। प्रथमतः जांच क्रूर आचरण की प्रकृति के बारे में प्रारम्भ होगी; द्वितीयत: पति या पत्नी के मस्तिक में उस आचरण के प्रभाव से क्या ऐसी युक्तियुक्त आशंका कारित हुई थी कि अन्य पक्षकार के साथ रहना हानिकारक या क्षतिकारक होगा। अन्ततोगत्वा यह आचरण की प्रकृति और शिकायत करने वाले पति पत्नी पर पड़ने वाले उसके प्रभाव पर विचार करके निकाले जाने वाले निष्कर्ष का मामला है। यद्यपि, ऐसा वाद हो सकेगा जहां स्वयं शिकायत किया गया आचरण पर्याप्त रूप से विधिमान्य है और प्रत्यक्षतः अविधिपूर्ण अथवा अविधिक है। तत्पश्चात् अन्य पक्षकार पर प्रभाव या क्षतिकारक के प्रभाव में जांच अथवा विचार किये जाने की आवश्यकता है। ऐसे वादों में, करता तभी स्थापित होगी जब स्वयं आचरण सिद्ध किया गया हो उसे स्वीकार किया गया हो। इस तथ्य को दृष्टिगत रखते हये कि पक्षकार विगत दस वर्ष से अधिक समय से पृथक् रहते आ रहे हैं और भारी संख्या में पूर्वोल्लिखित दाण्डिक एवं सिविल कार्यवाहियां प्रत्यर्थी द्वारा अपीलार्थी के विरुद्ध प्रारम्भ हो गयी हैं, पक्षकारों के मध्य दाम्पत्य बन्धन पूरी तरद से टूट चुका है। पक्षकारों के मध्य विवाह केवल नाममात्र का ही है। विवाह इस कदर टूट चुका है कि उसके ठीक होने की कोई आशा नहीं है। जनहित एवं सभी सम्बन्धित व्यक्तियों का हित तथ्य की मान्यता में निहित है एवं यह विधित: मृत को घोषित करना है जो पहले से ही वस्तुत: मत हो। चुका है। आडम्बर को रखना स्पष्ट रूप से अनैतिकता के लिये बाधक है और वह सम्भावित रूप से विवाह के बन्धन को विघटित करने की अपेक्षा जनहित में अधिक प्रतिकूल प्रभावकारी है।

उच्चतम न्यायालय ने वी० भगत बनाम श्रीमती डी० भगत के मामले के विनिश्चय में निम्नलिखित सम्परीक्षण किया था-

“धारा 13(1)(क) में मानसिक क्रूरता को उस आचरण के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो अन्य पक्षकार को ऐसी मानसिक पीड़ा और व्यथा को कारित करता है, जो उस पक्षकार के लिये दसरे के साथ रहने को सम्भव नहीं बनायेगा। अन्य शब्दों में, मानसिक करता ऐसी प्रकति की होनी चाहिये कि पक्षकारों से यक्तियुक्त रूप से एक साथ रहने की प्रत्याशा नहीं की जा सकती। स्थिति ऐसी होनी चाहिये कि दोषी पक्षकार को युक्तियुक्त रूप से ऐसे आचरण को करने के लिये और अन्य पक्षकार के साथ रहना जारी

1. दर्शन गुप्ता बनाम राधिका गुप्ता, 2014 विधिनिर्णय एवं सामयिकी। (एस० सी०) : (2013) ० एस० सी० सी01.

2. दर्शन गुप्ता बनाम राधिका गुप्ता, 2014 विधिनिर्णय एवं सामयिकी । (एस० सी०) : (2013) १ एस० सी०सी०1.

3. श्रीमती नीलू कोहली बनाम नवीन कोहली, 2006 विधि निर्णय एवं सामयिकी 540 (एस० स०)। 2006 (63) ए० एल० आर० 313,

4. 1994 (23) ए० एल० आर० 77 (एस० सी०) : 1994 विधि निर्णय एवं सामयिकी 532.

रखने कि लिये नहीं कहा जा सकता। यह साबित करना आवश्यक नहीं है कि मानसिक क्रूरता ऐसी है, जो याची के स्वास्थ्य को उपहति कारित करे। ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचते समय पक्षकारों की सामाजिक स्थिति, शैक्षणिक स्तर, समाज, जिसमें वे रहते हैं या पक्षकारों के साथ रहने की सम्भावना या अन्यथा यदि वे पहले से पृथक् रह रहे हैं और सभी अन्य सुसंगत तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करना चाहिये, जिन्हें व्यापक रूप से अपवर्णित करना न तो सम्भव न ही वांछनीय है। जो एक मामले में क्रूरता है, वह अन्य मामले में क्रूरता की कोटि में नहीं आ सकता। यह प्रत्येक मामले में उस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करते हुये अवधारित किये जाने का मामला है। यदि यह अभियोग और अभिकथन का मामला है, तो उस सन्दर्भ पर विचार किया जाना चाहिये, जिनमें वे किये जाते हैं।”

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