LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Eight Part Notes Study Material

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LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Eight Part Notes Study Material
LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 6 Eight Part Notes Study Material

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यधपि धारा 6 के अन्तर्गत स्पष्ट शब्दा म इस नियम को मान्यता नहीं दी गई है, परन्तु इसमें कोई सन्देड नहीं है कि इस धारा के अन्तर्गत अपत्यों का ही हित सर्वोपरि (Paramount) है। भूपेन्द्र सिंह बनाम जसबीर और में माता पिता पथक रह रहे था माता पुत्री क साथ अपने माता पिता के साथ थी तथा पत्र अलग-अलग सानों पर पढ़ रहे थे। वे अपनी माता तथा बहन के साथ रहने के इच्छुक थे। पिता का मत था कि क्योंकि वह अभिभावक (guardian) है इसलिये कि बेटे कहां पढ़ेंगे इसका फैसला करना उसका अधिकार है, मान्य नहीं है। अपत्यों का हित सर्वोपरि है इसलिये संरक्षण माता को प्रदान किया गया। दिल्ली, मैसूर और राजस्थान उच्च न्यायालयों में मत व्यक्त किया है कि पांच वर्ष से कम आयु के अपत्य की अभिरक्षा सामान्यत: माता के पास होनी चाहिये अब यह भी मान्य नियम है कि अपराधी पक्षकार के पक्ष में भी अभिरक्षा का आदेश दिया जा सकता है।

हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 के अन्तर्गत पांच वर्ष से कम आयु के अपत्यों की अभिरक्षा साधारणतया माता को ही दिये जाने का नियम बनाया गया है। उस माता को जो दुराचरण की दोषी है, को भी पाँच वर्ष से कम आयु के अपत्य की अभिरक्षा दी जा सकती है। विशेषकर जब कि पिता की कुछ भी आय न हो और माता की आय अच्छी हो। परन्तु यदि माता पांच वर्ष से कम पुत्र, की उपेक्षा करती है, तो उसे संरक्षा से वंचित किया जा सकता है।

अपत्यों के मिलन (Access to Children)-जब पक्षकार पृथक हो जाते हैं तो न्यायालय एक पक्षकार को ही अपत्यों की अभिरक्षा दे सकता है। प्रश्न यह है कि क्या दूसरा पक्षकार अपनी सन्तान का मुंह देखने को भी तरस जाये, उनसे मिल भी न सके? क्या यह अपत्यों के हित में होगा कि वे बड़े होते जायें और अपने माता (या पिता) को जाने ही नहीं? इस समस्या का हल विधि ने यह नियम बनाकर किया है कि दूसरे पक्षकार को अपत्यों से मिलने का अवसर दिया जायेगा। किन्तु ऐसा अवसर नहीं दिया जायेगा जबकि वैसा करना अपत्यों के कल्याण में न हो। इस सम्बन्ध में हिन्दू विवाह अधिनियम और हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम में कोई सीधा उपबन्ध नहीं है। बात यह है कि अपत्यों से मिलन अभिरक्षा के संप्रत्यय का ही अंग है। जिस न्यायालय की अभिरक्षा के आदेश देने की अधिकारिता है, उसी न्यायालय को अपत्यों से मिलने का आदेश देने की भी अधिकारिता है। यहाँ भी अपत्यों का कल्याण ही सर्वोपरि है। सुन्दर बनाम गोपाल में न्यायालय ने कहा कि पिता का अपत्यों से मिलने का आदेश इसलिये दिया गया है ताकि अपत्य अपने पिता के विरुद्ध न हो जायें। हमारे न्यायालय इस सम्बन्ध में एक पग और आगे बढ़ गये हैं। उन्होंने न केवल माता-पिता के पक्ष में मिलने के आदेश दिये हैं बल्कि अन्य नातेदारों के पक्ष में भी इस भॉति के आदेश दिये हैं। यह हिन्दू समाज की परिस्थितियों के अनुकूल ही है जहाँ संयुक्त कुटुम्ब अब भी एक बहुत महत्वपूर्ण संस्था है।

अभिरक्षा-संक्षिप्त प्रश्न जो वर्तमान वाद में विचारण के लिए प्रोद्भूत हुआ था, वह दो लड़कियों (पत्रियों) उम्र 17 एवं 11 वर्ष के अभिरक्षा के सम्बन्ध में था। दोनों पुत्रियां वर्तमान में पिता की अभिरक्षा में थीं और माता की पुत्रियों तक कोई भी पहुंच नहीं थी अथवा यहां तक कि उसके साथ संक्षिप्त भेंट भी नहीं हई थी। उच्चतम न्यायालय द्वारा पृथक रूप से लड़कियों के साथ बातचीत करने एवं उनकी आय शिक्षा, उनके भविष्य तथा अब माता के सहचर्य के महत्व के प्रश्नों को पूछने के पश्चात वे दोनों अत्यन्त स्पष्ट तथा

1. 2000 मध्य प्रदेश 330.

2. राधा बनाम सुरेन्द्र, 1971 मैसूर 69; चन्द्र बनाम प्रेम, 1969 दिल्ली 283; धीसी बनाम श्रीराम, 1972राजस्थान 256%; न्यायालयों ने हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम की धारा 6 (क)। सहारा लिया है.

3. वेकटा बनाम कमलाम्मा, 1982 आन्ध्र प्रदेश 369.

4. मोहन बनाम संध्या, 1993 मद्रास 59.

5. कालीधर बनाम बेपियाम्मा, 1949 मद्रास 608; मोहनी बनाम विरेन्द्र, 1977 सुप्रीम काट

6. देखे.; निश्वत बनाम निश्वत, 1935 अवध 133; सुशीला बनाम कनवर 1948 अवध 2007 विपद, 1941 बम्बई 103; ज्वाला प्रसाद बनाम बच्चू लाल, 1942 कलकत्ता 215.

7. 1953 मध्य भारत 190; देखें, मोहिनी बनाम वीरेन्द्र, 1977 सुप्रीम कोर्ट 1359.

8. शान्ति बनाम ज्ञान, 1956 पंजाब 239; कालीपाड बनाम वेलिय्याम्मल, 1949 मद्रास, 608.

दृढ़ निश्चित थीं कि वे अपने पिता के साथ बने रहना चाहती हैं और वे अपनी मां के साथ नहीं जाना चाहती हैं। तथ्य एवं परिस्थितियों के दृष्टिगत यह महसूस किया गया कि यदि लड़कियों को बलपूर्वक पिता से छीन लिया जाता है और उन्हें मां को सौंप दिया जाता है तो इससे नि:संदेह उनकी मानसिक स्थिति पर प्रभाव पड़ेगा और वह उनकी बेहतरी तथा अध्ययन के हित में बिल्कुल ही वांछनीय नहीं होगा। ऐसी स्थिति में बेहतर अनुक्रम यही होगा कि मां को प्रथमत: बच्चियों से प्रारम्भिक सम्पर्क बनाने की अनुमति प्रदान की जाये, उनके साथ सम्बन्ध को बढाने दिया जाये एवं शनैःशनै: मां के रूप में अपनी स्थिति को प्रत्यावर्तित करने दिया जाये। बच्चों की अभिरक्षा से सम्बन्धित मामले में सर्वोपरि विचारण बच्चे का कल्याण तथा हित होता है न कि परिनियम के अधीन माता-पिता के अधिकार। यहां तक कि परिनियम जैसे कि संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 तथा हिन्दू अप्राप्तवयता एवं संरक्षकता अधिनियम, 1956 से भी स्पष्ट हो जाता है कि बच्चे का कल्याण प्रबल विचारण है। इस प्रकृति के मामले में जब पिता और मां बच्चे के कल्याण को संदर्भित किये बिना अपने वाद को लड़ रहे हों तो न्यायालय पर बच्चे के कल्याण को सर्वोपरि विचारण के रूप में मस्तिष्क में रखते हुए न्यायिक रूप से अपने विवकाधिकार का प्रयोग करने का भारी कर्तव्य अधिरोपित किया जाता है। वाद के सुसंगत तथ्यों तथा परिस्थितियों में बच्चियों का सर्वाधिक हित और कल्याण तभी पूरा होगा जब वे पिता की अभिरक्षा में बनी रहती हैं तथा पिता की अभिरक्षा में विक्षोभ कारित करना वांछनीय नहीं है तथापि न्याय के हित की पूर्ति माँ को भेंट करने के अधिकार प्रदान करके हो जायेगी।

सन्तान की अभिरक्षा-इस मामले में पति तथा पत्नी के मध्य पारस्परिक सहमति से विवाह विच्छेद हआ था। सहमति डिक्री के निबन्धनों में दोनों तलाकशुदा पति तथा पत्नी सन्तान के संयुक्त संरक्षक नियुक्त किये गये थे। सन्तान की अभिरक्षा प्रत्येक वैकल्पिक सप्ताह में प्रत्येक याची के पास थी स्थायी अभिरक्षा के लिये दोनों द्वारा परम्परा विरोधी याचिकायें दाखिल की गयी। माँ ने एक से अधिक सप्ताह के लिये सन्तान को विदेश ले जाने के लिये सन्तान की अभिरक्षा की मांग की थी। उच्च न्यायालय ने एक वर्ष के लिये सन्तान की अभिरक्षा माँ के पक्ष में मंजूर की, जो उचित नहीं है। सन्तान की अभिरक्षा को माँ के पास अभिरक्षा के लिये दाखिल याचिकाओं के निस्तारण तक के लिये दिया गया था। याचिकाओं को त्वरित गति से निस्तारण का आदेश दिया गया था, तब तक पिता को अपनी पुत्री से मिलने का अधिकार होगा या उसे प्रत्येक शनिवार और रविवार को प्रात: 10 बजे से 8 बजे रात्रि तक उसे बाहर ले जाने का अधिकार होगा। माँ को सन्तान को देश से बाहर जाने से प्रतिबंधित किया गया, यदि वह देश से बाहर जाती है तब उसे अपनी अनुपस्थिति में सन्तान को पिता की अभिरक्षा में रखना होगा। अभिनिर्धारित किया गया कि अवयस्क सन्तान की अभिरक्षा से सम्बन्धित मामले में सन्तान का हित तथा कल्याण सर्वोच्च महत्ता का होता है न कि माता-पिता की सुविधा या उनकी खुशी

शिश का कल्याण-अभिनियम की धारा 13 में प्रयुक्त शब्द “कल्याण” का शब्दश: निर्वचन किया जाना चाहिए और इसे व्यापक भाव में ग्रहण किया जाना चाहिए। सन्तान के नैतिक तथा शिष्टता सम्बन्धी कल्याण पर भी महत्व दिया जाना चाहिए यद्यपि कि विशेष संविधि के प्रावधान जो माता-पिता और संरक्षक के अधिकारों को शासित करते हैं, पर विचार किया जाना चाहिए। यह संतान का कल्याण तथा हित है न कि माता-पिता का अधिकार है जो अभिरक्षा के प्रश्न को निर्णीत करने के लिये एक निर्णायक तत्व है। संतान के कल्याण के प्रश्न पर विचार तथा निर्णय प्रत्येक मामले के तथ्यों के संदर्भ में किया जाना चाहिए। यदि सन्ताने अपनी माता की अभिरक्षा में रहने से तथा मिलने से इन्कार करती हैं तो उन्हें अकेला छोड़ दिया जाना चाहिए। तथा संतानें जो अपने पिता के साथ रहने की इच्छुक हैं उन्हें वयस्कता की आयु प्राप्त करने तक पिता की अभिरक्षा में रहने की अनुमति प्रदान की जा सकती है।

1. गायत्री बजाज बनाम जीतेन भल्ला, 2012 (2) ए० डब्ल्यू० सी० 1863 (एस० सी०).

2 कुमार वी० जहगीरदार बनाम चेतना के० रामतीर्थ, ए० आई० आर० 2001 एस० सी० 2179 : 2001 विधि निर्णय एवं सामयिकी 404 (एस० सी०).

3. गायत्री बजाज बनाम जीतेन भल्ला, (2012) 12 एस० सी० सी० 471 : ए० आई० आर० 2012 एस० सी० 541 : 2013 विधि निर्णय एवं सामयिकी 164 (एस० सी०).

शिश की अभिरक्षा-शिशु की अभिरक्षा से सम्बन्धित वाद के लम्बित रहने के दौरान पिता को शिश से जो माता की अभिरक्षा में है, सप्ताह में एक बार मिलने का अधिकार है। शिशु की अभिरक्षा में प्रमख विचारण शिशु का कल्याण है; न कि विधिक अधिकार एवं माता-पिता का विधिक अधिकार ।।

अवयस्क की अभिरक्षा-अभिलेख पर उपलब्ध निर्णय एवं डिक्री से यह पाया गया कि अवयस्क जिसकी अभिरक्षा की मांग की गयी थी वाद दाखिल किये जाने के समय 14 वर्ष का था। वह अब वयस्क हो गया है तथा अब किसी संरक्षक की नियुक्ति की आवश्यकता नहीं रही है। उसे उस स्थान का चुनाव करने की स्वतंत्रता प्राप्त है, जहाँ वह निवास कर सके।

अन्तरिम अभिरक्षा (Interim Custody)-अवयस्क बच्चे की अभिरक्षा एक संवेदनशील मामला होता है। यह एक ऐसा मामला भी होता है जिसमें भावनात्मक लगाव रहता है। ऐसे मामलों से अत्यन्त सावधानीपूर्वक निपटना चाहिये। अवयस्क बच्चों के प्रति पक्षकारों के लगाव एवं भावनाओं एवं अवयस्क के कल्याण के मध्य ऐसा सन्तुलन भी रखना चाहिये जो कि अत्यन्त महत्वपूर्ण है। उच्च न्यायालय को इस मामले के तथ्यों में अवयस्क सन्तानों की अन्तरिम अभिरक्षा उसके पिता एवं दादा-दादी ने नाना-नानी की अभिरक्षा में परिवर्तन करने में शीघ्रता नहीं करनी चाहिये।

अभिरक्षा से सम्बन्धित आदेश अपनी प्रकृति से कभी भी अन्तिम नहीं हो सकता है। तथापि कोई भी परिवर्तन के किये जाने से पूर्व उसे सन्तानों के सर्वोच्च हित में होना साबित किया जाना आवश्यक है। इस तरह के संवेदनशील मामले में किसी भी तत्व को निर्णायक नहीं माना जा सकता है। ऐशपूर्ण जीवन के लिये न तो समृद्धि ही और न ही क्षमता, न्यायालय द्वारा विचारण करने की अधिकारिता को बाधित करना चाहिये। यहाँ जयप्रकाश खदरिया बनाम श्यामसुन्दर अग्रवाल एवं एक अन्य,4 के वाद में न्यायालय के विनिश्चय का सन्दर्भ दिया जा सकता है। ऐसे मामलों में सामान्य रूप से, न्यायालय किसी एक पक्ष को अवयस्क बच्चों की अभिरक्षा मंजूर करने के दौरान दूसरे पक्ष को उन बच्चों से मिलने की सुविधा भी प्रदान करते हैं।

अवयस्क शिशु की अभिरक्षा-यह सुस्थापित है कि अवयस्क सन्तान का कल्याण अभिरक्षा के बारे में विवाद का विनिश्चय करते समय सर्वोच्च विचारण का है। यदि पिता की अभिरक्षा समान रूप से थी माता की अपेक्षा वेहतर ढंग से समुन्नत नहीं कर सकता, तो उसे अभिरक्षा की अनुज्ञा नहीं दी जा सकती क्योंकि यह शिशु के कल्याण को प्रतिकूल ढंग से प्रभावित कर सकता है। इस तथ्य पर विचार करते हुये, कि पत्नी की वित्तीय स्थिति, जो पति की वित्तीय स्थिति से उच्च है, जो उसके अभिवचनों के अनुसार बेरोजगार है, शिश अपने जन्म के समय से ही कभी भी पिता या उसके परिवार के साथ नहीं थी और महिला शिश होने के कारण यवती होने के समय माता द्वारा बेहतर ध्यान और मार्ग-निर्देशन दिया जायेगा, इसलिये माता की अभिरक्षा में उसे देना सर्वोत्तम होगा क्योंकि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में यह सर्वोत्तम ढंग से महिला शिशु के कल्याण और हित को पूरा करेगा।

1. विमलेन्दु कुमार चटर्जी बनाम दीपा चटर्जी एवं अन्य, 2001 विधि निर्णय एवं सामयिकी 771 (एस० सी०).

2. राजेश कमार गुप्ता बनाम राम गोपाल अग्रवाल, 2005 विधि निर्णय एवं सामयिकी 609 (एस० सी०); बाल कष्ण रस्तोगी बनाम डॉ० श्रीमती रीना रस्तोगी, 2005 विधि निर्णय एवं सामयिकी 210 (इला०); पूनम दत्ता बनाम कृष्ण लाल दत्ता, 1988 (25) ए० सी० सी० 533 (एस० सी०); राजीव भाटिया बनाम गवर्नमेण्ट आफ एन० सी० टी०, डेलही, 2000 (41) ए० एल० आर० 215 (एस० सी०); वीना कपूर बनाम वी० के० कपूर 1990 (16) ए० एल० आर० 401 (इला०); श्रीमती कहकशां बानो बनाम ए० एम० अंसारी, 1982 (19) एस० सी० सी० 205 (एस० सी०); तेजिन्दर कौर बनाम इन्द्रपाल, 1997 (29) ए० एल० आर० 112; श्रीमती एलिजाबेथ दिनशा बनाम अरविन्द एम० दिनशा, 1987 (13) ए० एल० आर० 24 (एस० सी०); सैयद सलीमुद्दीन बनाम डॉ० रुखसाना, 2001 (45 ए०सी० सी० 367 (एस० सी०).

3. श्रीमती रजिया सुल्तान एवं एक अन्य बनाम मोहम्मद फुरकान, 2005 विधि निर्णय एवं सामायण (इला० पूर्णपीठ).

4. 2000 (6) एस० सी० सी०598. .

5. आर०बी० श्रीनाथ प्रसाद बनाम नन्दामरि जयकष्ण एवं अन्य, 2001 विधि निर्णय एवं सामयिकी 306 (एस० सी०) ; दीप्ती भण्डारी बनाम नितिन भण्डारी, 2012 विधि निर्णय एवं सामयिकी 525 (एस० सी०).

6. राजेन्द्र कुमार मिश्रा बनाम श्रीमती ऋचा, 2006 वी० एन० एस० 175 (इला०).

यह सुस्थापित विधि है कि बच्चे की अभिरक्षा के मामले में सर्वोपरि विचारण बच्चे का कल्याण है। मां जो छोटे से शहर में दरस्थ स्थान पर प्राइमरी पाठशाला में तैनात है अपने बच्चे को वह शिक्षा प्रदान नहीं कर सकती है जिसे पिता उसे बड़े शहर में प्रदान करता रहा है। अत: पिता को बच्चे की अभिरक्षा का हकदार निर्णीत किया गया।

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