LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 5 Notes Study Material

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अध्याय 5 (Chapter 5, LLB Notes)

विवाह (Marriage)

विवाह चाहे संस्कार माना जाये, चाहे अनुबन्ध, यह प्रास्थिति (Status) को जन्म देता है। विवाह के पक्षकार पति-पत्नी की प्रास्थिति प्राप्त करते हैं। विवाह की सन्तान धर्मज की प्रास्थिति प्राप्त करती है। लगभग सभी विधि-व्यवस्थाओं में वैध विवाह के लिये दो शर्तों का होना अनिवार्य है

(क) वैवाहिक सामर्थ्य का होना, और

(ख) वैवाहिक अनुष्ठानों का सम्पन्न करना।

वर्तमान संसार के अधिकांश देश दोनों ही शर्तों को विधि द्वारा निर्धारित करते हैं। दोनों शर्तों के पालन करने पर ही विवाह वैध होता है।

हिन्दुओं ने विवाह की संस्था का आदर्शीकरण (Idealization) किया और उसे शालीनता प्रदान की। इस प्रक्रिया में उन्होंने विवाह के प्रत्येक अंग के सम्बन्ध में विस्तृत नियम निर्धारित किये। वे बहुत विस्तार और सूक्ष्मता में गये।

अब हिन्दू वैवाहिक विधि संहिताबद्ध कर दी गयी है। विवाह-विच्छेद और अन्य वैवाहिक अनुतोषों को भी मान्यता दी गयी है।

हिन्दूकौन है [हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955-धारा 2 (2) की प्रयोज्यतायें]-हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 की प्रयोज्यता के प्रयोजन के लिये कौन ‘हिन्दू’ है? यह विधि का प्रश्न है।

अधिनियम की धारा 2 उन व्यक्तियों को निर्दिष्ट करती है, जिनको अधिनियम लागू है। धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड (क), (ख) और (ग) अधिनियम को उन व्यक्तियों के लिये प्रयोज्य बनाती है, जो अपने किसी रूप में धर्म द्वारा हिन्दू है या वैष्णव, लिंगायत, ब्रह्म, प्रार्थना या आर्य समाज के अनुयायी को शामिल करके विकास के किसी रूप में हिन्दू है और उस व्यक्ति को लागू है, जो धर्म द्वारा बौद्ध, जैन या सिक्ख है। यह भारत के राज्य क्षेत्र में निवास करने वाले किसी ऐसे व्यक्ति को लागू है, जो धर्म से मुसलमान, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं है। इसलिये, अधिनियम की प्रयोज्यता व्यापक है और भारत के राज्य क्षेत्र में निवास करने वाले उन सभी व्यक्तियों को लागू है, जो धर्म से मुसलमान, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं।

‘हिन्दू’ शब्द को या तो अधिनियम या भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम या विधान मण्डल की किसी अन्य अधिनियमिति के अधीन परिभाषित नहीं किया गया है। पूर्व में 1903 में प्रीवी कौन्सिल ने भगवान कुंवर बनाम जे० सी० बोस एवं अन्य में सम्परीक्षण किया था-

“हम यहां सामान्य परिभाषा अधिकथित करने का प्रयास नहीं करेंगे कि हिन्द शब्द का क्या तात्पर्य है। और उसी समय पर्याप्त रूप से व्यापक और विभेद करना अत्यधिक कठिन है। हिन्द धर्म आश्चर्यजनक रूप से उदार और लचीला है। इसके ईश्वर मीमांसा को संकलवाद और सहनशीलता तथा व्यक्तिगत पूजा का असीमित स्वतन्त्रता द्वारा चिन्हित किया गया है। इसकी सामाजिक संहिता अत्यधिक कठोर है किन्तु इसका विभिन्न जातियों और उपजातियों के बीच प्रथा की व्यापक विभिन्नता परिलक्षित होती है। गाय के मांस का प्रयोग करने के भय से सामान्यतया हिन्दू समाज में कोई विशेषता चिन्हित नहीं की गयी है। फिर भी चमार, जा हिन्दुत्व को स्वीकार करते हैं, किन्तु जो गाय का मांस और मृत पशुओं का मांस खाते हैं, इसमें निम्न श्रेणी

1. आई० एल० आर० (31) कल० सीरीज 11.

में आते हैं। यह कहना आसान है कि कौन हिन्दू नहीं है, व्यावहारिक रूप से नहीं और गैर-हिन्दुओं से हिन्दुओं का पृथक्करण इतनी कठिनाई का मामला नहीं है। लोग अन्तर को भलीभांति समझते हैं और आसानी से बता सकते हैं कि कौन हिन्दू है और कौन नहीं।”

इसलिये अधिनियम लागू है”-

(1) सभी हिन्दुओं को, जिनमें वीर शैव, लिंगायत, ब्रह्म, प्रार्थना समाजी, और आर्यसमाजी शामिल हैं।

(2) बौद्ध,

(3) जैन,

(4) सिक्ख।”

इस मामले में पक्षकार स्वीकृततः जनजातीय हैं, अपीलार्थी उरांव है और प्रत्युत्तरदाता संथाल हैं। संविधान के अनुच्छेद 342 के अधीन अधिसूचना या आदेश के अभाव में, उन्हें हिन्दू होना माना जाता है। यदि संविधान के अधीन अधिसूचना जारी की जाती है, तो अधिनियम अनुसूचित जनजातियों को लागू किया जा सकता है और अधिनियम की धारा 2 की उपधारा (2) के निबन्धनों में पुनः अधिसूचना जारी की जाती है। यह विवादास्पद नहीं है कि संविधान (अनुसूचित जनजाति) अध्यादेश, 1995 में, जैसा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (संशोधन) अधिनियम (अधि० सं० 63 वर्ष 1956), (108 वर्ष 1976), (18 वर्ष 1987) और (15 वर्ष 1990) द्वारा संशोधित है. दोनों जनजातियां, जिनसे पक्षकार सम्बन्धित हैं, भाग 18 में विनिर्दिष्ट हैं। अपीलार्थी द्वारा भी यह स्वीकार किया गया है कि “याचिका के पक्षकार दोनों जनजातीय हैं, जो अन्यथा हिन्दुत्व को मानते हैं किन्तु इस प्रकार हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 के परिक्षेत्र में उनका विवाह बाहर होने के कारण अधिनियम की धारा 2 (2) के परिप्रेक्ष्य में अपनी संथाल प्रथा और रूढ़ि द्वारा शासित होते हैं।”

लेकिन, अपीलार्थी ने जनजाति में अभिकथित प्रथा पर विश्वास किया है, जो नियम के रूप में एक विवाह का समादेश देता है। यह तर्क दिया गया है कि चूंकि प्रत्युत्तरदाता ने अपीलार्थी के साथ प्रथम विवाह के अस्तित्व के दौरान दूसरा विवाह किया है, इसलिये दूसरे विवाह के शून्य होने के कारण प्रत्युत्तरदाता भारतीय दण्ड संहिता की धारा 494 के अधीन दण्डनीय अपराध के लिये अभियोजित किये जाने हेतु दायी

कोई प्रथा अपराध सजित नहीं कर सकती, क्योंकि यह आवश्यक रूप से पक्षकारों के सिविल अधिकारों के सम्बन्ध में प्रावधान करती है और कोई व्यक्ति आरोपित कार्य के किये जाने के समय प्रवर्तित विधि के उल्लंघन के सिवाय किसी अपराध के लिये दोषसिद्ध नहीं किया जा सकता। पक्षकारों की प्रास्थिति को शामिल करके उनके सिविल अधिकारों के निर्धारण के लिये प्रथा को साबित किया जा सकता है, जिनका साबित किया जाना अपराध के तत्वों के प्रयोजन के लिये प्रयुक्त किया जा सकता है, जिसका अधिनियम की धारा 3 (33) के अधीन जुर्माना या कारावास से किसी विधि द्वारा दण्डनीय कार्य या लोप होगा। संविधान का अनच्छेद 20, जो अपराध की दोषसिद्धि के सम्बन्ध में संरक्षण को प्रत्याभूत करता है, प्रावधान करता है कि कोई व्यक्ति अपराध के रूप में आरोपित कार्य को करने के समय प्रवर्तित विधि के उल्लंघन के सिवाय किसी अपराध के लिये दोषसिद्ध नहीं किया जायेगा। संविधान के अनुच्छेद 13 खण्ड (3) के अधीन विधि का तात्पर्य ऐसी विधि से है, जो विधान मण्डल द्वारा निर्मित की गयी है और जिसमें कानूनी नियमों द्वारा प्रदत्त। शक्तियों के प्रयोग में कि या गया आदेश या कानूनी आदेश है।।

(1)

विवाह के प्रकार

हिन्दू विवाह का आदर्श हमेशा उच्च रहा है। वैदिक युग से आज तक वैवाहिक सम्बन्ध को हमेशा पवित्र और पावन माना गया है। पत्नी की विधिक स्थिति कुछ भी रही हो, परिवार में उसका स्थान हमेशा

1. डॉ० सरजमणि स्टेला कुजूर बनाम दुर्गाचरण हंसदह एवं अन्य, ए० आई० आर. 2001 एस सी : 2001 विधि निर्णय एवं सामयिकी 604 (सु० को०).

आदर और सम्मान का था। बहुपत्नीत्व विवाह मान्य था, परन्तु हिन्दू विवाह के इतिहास में बहुपत्नीत्व विवाह को हेय माना गया है। व्यवहार में बहुत कम लोग एक से अधिक विवाह करते थे। भारत के कुछ भागों में बहुपतित्व विवाह का भी प्रचलन रहा है, परन्तु यह सीमित क्षेत्र में ही प्रचलित था।

प्राचीन हिन्दू विधि में विवाह के आठ रूप प्रचलित थे; जिनमें से सन् 1955 के पूर्व केवल तीन ही मान्य थे; ब्रह्म, असुर और गंधर्व।

ब्रह्म विवाह-मनु के अनुसार जब पिता वेदों में पारंगत और सच्चरित्र वर को निमन्त्रित करके हीरेजवाहरातों का दान देकर, कन्या को बहुमूल्य आभूषणों से सजा कर दान में वर को देता है तो उसे ब्रह्म विवाह कहते हैं

ब्रह्म विवाह सबसे उच्च विवाह माना गया है। यह विवाह पूर्ण रूप से पिता द्वारा अपनी पुत्री का दान है। दूसरे शब्दों में, पुत्री पर अपने आधिपत्य का हस्तान्तरण पिता वर को अपनी स्वेच्छा से और बिना किसी अनुदान के करता है। प्रारम्भ में द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) ही इस भांति का विवाह कर सकते थे। अंग्रेजी शासन-काल में वर का वेदों में पारंगत होना अनिवार्य नहीं रहा और ब्रह्म विवाह शूद्रों को भी उपलब्ध हो गया। इस विवाह की अन्य शर्ते जैसे बहुमूल्य आभूषणों से सजाना और हीरे-जवाहरात दान देना भी अनिवार्य नहीं रहा। सन् 1955 के पूर्व ब्रह्म-विवाह के लिये आवश्यक शर्त केवल यही रह गयी कि इसमें अवश्यम्भावी रूप से कन्या-दान होना चाहिये।

गान्धर्व विवाह-मनु के अनुसार एक कन्या का अपनी स्वेच्छा से अपने प्रेमी के साथ गठबन्धन, जिनका जन्म वासना से होता है और जिसका ध्येय सम्भोग है, गांधर्व विवाह कहलाता है। मित्रमिश्र के अनुसार जब वर-वधू आपस में स्वेच्छा से विवाह-बन्धन में यह कहकर-“तुम मेरे पति हो” “तुम मेरी पत्नी हो” बंध जाते हैं तो उसे गांधर्व के नाम से पुकारा जाता है। इस विवाह में भी अन्य विवाह की भांति वैवाहिक अनुष्ठानों का सम्पन्न करना आवश्यक है। यह एक अभूतपूर्व बात है कि उस समाज में जहां विवाह अवश्यम्भावी रूप से पिता द्वारा पुत्री पर अपने आधिपत्य का पति को हस्तान्तरण करता था, भी स्वेच्छा से किये गये विवाहों को मान्यता दी गयी। स्पष्ट ही है कि उस समाज और समाज की विधियों के अन्तर्गत ऐसे विवाहों को अनियमित ही माना जा सकता था। आधुनिक युग में स्वेच्छा से किया गया विवाह ही सबसे श्रेष्ठ विवाह माना जाता है और अनेक देशों की विधि में स्वेच्छारहित विवाह शून्य (Void) है।

असुर विवाह-मनु के अनुसार जब वर अपनी इच्छा से वधू और वधू के नातेदारों को इतनी सम्पत्ति देकर जितनी कि वह दे सकता है,वधू को प्राप्त करता है तो वह विवाह असुर विवाह कहलाता है। असुर विवाह पिता द्वारा कन्या का विक्रय ही लगता है, अनुदान में पिता चाहे चल सम्पत्ति ले या अचल सम्पत्ति या रोकड़ ले। अनेक प्राचीन समाजों में क्रय द्वारा विवाह प्रचलित थे। हिन्दू आचार्यों ने इस भांति के विवाह का कभी अनुमोदन नहीं किया है और हिन्दू समाज में इस विवाह को हेय ही माना जाता रहा है। इसका प्रचलन निम्न वर्गों के लोगों में ही था। सन् 1955 के पूर्व सभी जातियों के लिये यह विवाह मान्य और वैध था। यह ध्यान देने की बात है कि वर और वधू पिता या अन्य नातेदारों के बीच विवाह अनुदान के रूप में कछ देने का अनबन्ध लोकनीति के विरुद्ध होने के कारण प्रवर्तित नहीं किया जा सकता है, चाहे उस अनबन्ध के अन्तर्गत विवाह सम्पन्न भी हो गया हो। यदि अनुदान की रोकड़ या सम्पत्ति का भुगतान कर दिया गया हो तो उसे वापस वसूल नहीं किया जा सकता है।

वर्तमान हिन्दू विधि में विवाह का रूप-हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 किसी भी प्रकार के विवाह का विनिर्दिष्ट उपबन्ध नहीं बनाता है। अधिनियम के अन्तर्गत सम्पन्न प्रत्येक विवाह “हिन्दू

1. हिन्दू विवाहों को दो भागों में बांटा गया था-अनुमोदित विवाह इसके अन्तर्गत आते हैं. ब्रह्म आर्ष देव और प्रजापत्य और नियमित इसके अन्तर्गत आते हैं, गांधर्व, असुर, राक्षस और पैचाश विवाह

2. मनुस्मृति

3, 27. 3. मनुस्मृति 2, 32.

4. मनुस्मृति 177.

5. मनुस्मृति 3,31.

विवाह” कहलाता है। परन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि अब ब्रह्म, असुर, गान्धर्व विवाह नहीं हो सकते हैं। विवाह अब भी हो सकते हैं, इन सब विवाहों के लिये अधिनियम में निर्धारित अनुष्ठानों का सम्पन्न करना आवश्यक है। अब ये सब, विवाह अनुमोदित विवाह ही होंगे। अधिनियम के अन्तर्गत अनुमोदित और अनियमित विवाहों का प्रभेद मान्य नहीं है।

दूसरे दृष्टिकोण से हम पाते हैं कि हिन्दू विवाह दो भांति के हैं-एक वे जो वर-वधू की स्वेच्छा से सम्पन्न होते हैं और दूसरे वे जो माता-पिता या अन्य नातेदारों द्वारा व्यवस्थित किये जाते हैं। वर-वधू का स्वेच्छा द्वारा विवाह गांधर्व-विवाह ही कहलायेगा। व्यवस्थित विवाह ब्रह्म विवाह हो सकता है या असुर विवाह । उच्च वर्ग में दहेज-प्रथा प्रचलित है। वर्तमान युवा पीढ़ी में गांधर्व विवाह का प्रचलन बढ़ रहा है।

हिन्दू विवाह में अनुष्ठानों का सम्पन करना अब भी आवश्यक है। आडम्बर, ठाट-बाट, धूमधाम, सजावट और प्रदर्शन हिन्दू विवाह का अब भी अभिन्न अंग है, परन्तु अनिवार्य नहीं है। अनिवार्य अंग केवल कुछ अनुष्ठानों का सम्पन्न करना ही है, और इन्हें बिना किसी आडम्बर और ठाटबाट के भी किया जा सकता है। इस दृष्टिकोण से हिन्दू विवाह बड़े ही साधारण रूप से सम्पन्न किया जा सकता है।

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