LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 4 Notes Study Material

Bachelor of Law (LLB) 2nd Semester Chapter 4 Principles of Marriage and Marriage – Principles of Marriage Most Important LLB 2nd Semester Notes Study Material for Modern Hindu Law for All University and All Students PDF Download With LLB Question Paper With Answer in Hindi English and All Language Available This Website.

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अध्याय4 (Chapter 4 LLB Notes)

विवाह के संप्रत्यय और विवाह-विच्छेद के सिद्धान्त (Principles of Marriage and Marriage – Principles of Marriage)

अब यह मत स्थापित ही प्रतीत होता है कि आदि मानव विवाह से अनभिज्ञ था। उस युग में मनुष्य अन्य प्राणियों (जीव-जन्तुओं) की ही भांति रहता था। वह अपनी प्राथमिक आवश्यकताओं, भूख और निवास, की परितुष्टि (Satisfaction) में इतना रत था कि उसके पास अन्य किसी विषय पर सोचने का समय ही नहीं था। उस युग में लैंगिक सम्बन्धों (Sex relations) की पूर्ण स्वतन्त्रता थी। ___ प्रगति के पथ पर अग्रसर होते हुये मानव ने दो वस्तुओं की खोज की-दूध देने वाले पशुओं की और अग्नि की। पालतू पशुओं की खोज मानव को अन्य प्राणियों से अपना पृथक् अस्तित्व स्थापित करने में बहुत सहायक सिद्ध हुयी। उसके लिये अब यह अनिवार्य नहीं रहा कि भोजन की खोज में वह दर-दर भटकता फिरे। वह पशु-पालन बन गया था और अपने पशुओं के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमता-फिरता था। सम्भवतः पशु-पालन के साथ ही स्वाधीनम् और स्वामित्व के संप्रत्ययों (Concepts) का जन्म हुआ। मनुष्य ने सभ्यता के युग में प्रवेश किया।

उस युग में पुरुष के लिये अपनी पैतृकता को जानना असम्भव था। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वाधीनम् और स्वामित्व के संप्रत्ययों की स्थापना के साथ ही पुरुष के मस्तिष्क में यह विचार आया कि वह यह जाने कि उसकी संतान कौन है। सम्भवतः मनुष्य की इस इच्छा ने ही विवाह की संस्था को जन्म दिया। जब तक लैंगिक स्वतन्त्रता रहेगी पुरुष के लिये अपनी पैतृकता को जानना असम्भव है। अतः लैंगिक सम्बन्धों का विनियमन (Regulation) आवश्यक हुआ। यदि पुरुष और स्त्री के बीच लैंगिक सम्बन्ध अनन्यतः (Exclusive) हो जाये तो पितृत्व को जाना जा सकता है। अतः विवाह की संस्था के विकास का इतिहास पुरुष की इसी इच्छा की पूर्ति के प्रयत्नों का परिणाम है। यह प्रक्रिया निःसन्देह ही धीमी और लम्बी रही है।

पशु-पालन, कृषि और उद्योग के ज्ञान के साथ-साथ सभ्यता का विकास होता है। जब मानव ने प्राकृतिक वस्तुओं का प्रयोग करना अपने हित में जान लिया, और धातु गलाने की विद्या जान गया, और जब उसे कला और उद्योग का ज्ञान हो गया, तब सभ्यता निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर होती गयी। पारिवारिक जीवन में लैंगिक सम्बन्धों का विनियमन होने लगा। संभवतः यह सामूहिक विवाहों से आरम्भ हुआ। अलग-अलग स्थानों पर, सभ्यता के विकास की पृथक्-पृथक् मंजिल पर, इसका रूप भी पृथक्-पृथक् रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि लैंगिक विनियमन के प्रारम्भिक काल में जन-जाति के भीतर लैंगिक सम्बन्धों की स्वतन्त्रता थी, अर्थात् जनजाति की प्रयेक स्त्री प्रत्येक पुरुष से सम्भोग कर सकती थी, परन्तु जनहित के बाहर किसी भी पुरुष से सम्भोग करना वर्जित था। इसके पश्चात् ऐसा प्रतीत होता है कि लैंगिक सम्बन्धों का यह दायरा घटता गया। सर्वप्रथम निकटतम नातों में लैंगिक सम्बन्धों की वर्जना (Prohibition) की गयी जैसे माँ-बेटे के बीच या भाई-बहन के बीच। वर्जनाओं का यह क्रम चलता रहा और अन्त में हम उस मंजिल पर पहुंच गये जब विवाह एक स्त्री और एक पुरुष का सम्बन्ध बन गया। सम्भवतः आरम्भ में यह बंधन ढीला था, पक्षकारों को विवाह करने और विवाह-विच्छेद करने की एक-सी स्वतन्त्रता थी। रामेन विधि के प्रारम्भिक काल में हम विवाह का यही रूप देखते हैं। पर धीरे-धीरे यह बन्धन कड़ा होता गया और हिन्दुओं और ईसाईयों में यह संस्कार बन गया-विवाह एक न टूटने वाला अटूट बन्धन हो गया।

पितसत्ता के युग में पिता के माध्यम से अवजनन (Descent) गिना जाने लगा। पुरुष सत्तारूढ़ हो गया और वस्तओं की भांति स्त्री को भी अपने अधीन कर लिया। इस युग में विवाह एक अनन्यतः सम्बन्ध

के रूप में स्थापित हो गया, यद्यपि पुरुष के लिये यह संबंध इतनी कठोरता के साथ अनन्य नहीं था जितना कि स्त्री के लिये। पितृसत्ता-युग में पश्चिम में विवाह एकपत्नीत्व विवाह के रूप में और पूर्व में बहुपत्नीत्व विवाह के रूप में स्थापित हो गया। पश्चिम में केवल एक ही विवाह के नियम का पालन स्त्री के लिये अनिवार्य था और उसका पालन कठोरता से किया जाता था। परन्तु पुरुष के लिये यह बन्धना इतना कड़ा नहीं था। इसका कारण यह है कि यदि अवजनन पुरुष के माध्यम से गिना जाता है तो स्त्री के लिये पातिव्रत्य अनिवार्य है; पितृसत्ता-युग में पति अपतिव्रता पत्नी की हत्या भी करने की शक्ति रखता था?

अपने इस ध्येय की पूर्ति के लिये कि अवजनन पुरुष के माध्यम से हो, पुरुष ने एक ओर स्त्री को पातिव्रत्य धर्म पालने के लिये बाध्य किया तो दूसरी ओर उसने विवाह की संख्या का आदर्शीकरण किया जिसके द्वारा उसने स्त्री का हृदय और मस्तिष्क जीतने का प्रयास किया। इन प्रयत्नों का फल यह निकला कि हिन्दुओं और ईसाईयों में विवाह एक संस्कार बन गया।

विवाह के संप्रत्यय

विवाह एक संस्कार के रूप में

सम्भवतः संसार में विवाह का इतना आदर्शीकरण हिन्दुओं के अतिरिक्त अन्य किसी ने नहीं किया है। ऋग्वेद के पितृसत्ता-युग में भी विवाह को संस्कार ही माना जाता था और हिन्दुओं के इतिहास में विवाह को सदैव ही संस्कार माना गया है। आज भी बहुत से हिन्दू अपने विवाह को संस्कार ही मानते हैं। विवाह के समय हिन्दू वर-वधू से कहता है-“मैं तुम्हारा हाथ सौभाग्य के लिये ग्रहण करता हूं, तुम अपने पति के साथ ही वृद्धावस्था की ओर अग्रसर हो, सृष्टिकर्ता ने, न्याय ने, बुद्धिमानों ने तुमको मुझे दिया है।” मनु का कहना है कि स्त्री को पातिव्रत्य धर्म का पालन करना चाहिये। पत्नी पति के गृह की सम्राज्ञी है। ऋग्वेद के एक मन्त्र के अनुसार वर वधू से कहता है-“तुम मेरे वीर पुत्रों की माँ बनो, ईश्वर में श्रद्धा रखो, तुम अपने पति के गृह में रानी बनकर रहो। समस्त देवी-देवता हमारे हृदयों को मिलाकर एक कर दें।”3

यही नहीं, हिन्दुओं के अनुसार पत्नी अर्धांगिनी है,4 पुरुष अपूर्ण है, विवाह द्वारा वह पूर्णता प्राप्त करता है। पति-पत्नी ऐक्यता के सिद्धान्त द्वारा ही आपसी विश्वस्तता (पातिव्रत्य धर्म) का ढांचा रखा गया है। मनु कहते हैं कि पति-पत्नी की आपसी विश्वस्तता परम धर्म है। एक बार विवाह-बन्धन में बंधने के पश्चात् वे एक दूसरे के हो जाते हैं और एकनिष्ठ होना ही उनका धर्म है।

हिन्दू धर्मशास्त्रों में पति-पत्नी के अनेक पर्यायवाची शब्द हैं, पति को भर्तार कहा गया है क्योंकि वह अपनी पत्नी का भरण-पोषण करता है, उसे पति कहा गया है क्योंकि वह पत्नी का रक्षक है; उसे स्वामी कहा गया है क्योंकि पत्नी उसके अधीन है। पति को परमेश्वर कहा गया है क्योंकि पत्नी का सबसे बड़ा धर्म है-पति-सेवा, पति-सेवा द्वारा ही परमेश्वर को प्राप्त कर सकती है। इसी भांति पत्नी को ‘जाया’ कहा गया है क्योंकि पति अपनी सन्तान की उत्पत्ति उसके द्वारा करता है। पत्नी को लक्ष्मी कहा गया है। महाभारत के अनुसार जो व्यक्ति अपनी पत्नी का आदर करता है, वह समृद्धि की देवी लक्ष्मी की पूजा करता है। पत्नी अर्धांगिनी है, पति का आधा भाग है। पत्नी पति की सर्वोत्तम मित्र है, वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मार्ग है। पत्नी पति की आत्मा है। पतिगृह में पत्नी गृहिणी है, सखी है, अनुचरी, वह गृहलक्ष्मी है, अद्धांगिनी है-सब कुछ है।

1. मनुस्मृति 8, 277.

2. मनुस्मृति 8, 278.

3. ऋग्वेद 9,85.

4. सत्पथ ब्राह्मण 5, 1, 6,10.

5. तैत्तिरीय संहिता 3, 1, 2, 57.

6. मनुस्मृति 9, 101, 102.

7. महाभारत, आदि पर्व 46, 1-13.

8. तत्रैव.

9. रामायण 11, 33, 22-24.

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