LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 2 Notes Study Material

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LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 2 Notes Study Material
LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 2 Notes Study Material

अध्याय 2 (Chapter 2, LLB Notes Study Material)

हिन्दू विधि के स्त्रोत (Sources of Hindu)

संसार की ज्ञात विधि व्यवस्थाओं में हिन्दू विधि व्यवस्था सबसे प्राचीन है। यदि वेदों का काल हम 4000 से 1000 बी० सी० मानें, तो हिन्दू विधि व्यवस्था 6000 वर्ष पुरानी है। इन छः हजार वर्षों में उतारचढ़ाव आये हैं। यह कभी विकास की चरम सीमा तक पहुंची है, कभी यह स्थिर-सी रह गयी है, कभी गतिहीन-सी प्रतीत हुयी है, कभी पतन की ओर अग्रसर हुयी है परन्तु धारा सदैव प्रवाहित रही है। जीवन की भांति ही विधि भी कभी स्थिर नहीं होती है। विधि का कार्य है सामाजिक आवश्यकताओं और ध्येयों को। पूर्ति करना। यह अनिवार्य है कि विधि बदलती सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप हो। हिन्दू विधि व्यवस्था को श्रेष्ठता इसी में रही है कि बदली हुयी समाज व्यवस्था के साथ-साथ इसका प्रवाह बदलता रहा है।

हिन्दू विधि स्रोतों का अध्ययन हिन्दू विधि के विकास की भिन्न-भिन्न धाराओं का अध्ययन है

(1) प्राचीन या मूल स्रोत, और

(2) आधुनिक या द्वितीय स्रोत।

प्रथम के अन्तर्गत आते हैं-

(क) श्रुति,

(ख) स्मृति,

(ग) टीका एवं निबन्ध, और

(घ) रूढ़ियां।

द्वितीय के अन्तर्गत आते हैं-

(च) साम्या, न्याय और सुआत्मा,

(छ) पूर्व-निर्णय, और

(ज) विधान।

मूल स्त्रोत

श्रुति

हिन्दू विधि दैवी विधान कहलाती है। यह मान्यता रही है कि हमारे ऋषि-मुनियों का आध्यात्मिक ज्ञान इस चरम सीमा तक पहुंचा हुआ था कि वे ईश्वर से सीधा सम्पर्क स्थापित कर सकते थे। धारणा यह है कि ऐसे ही किसी समय ईश्वर ने स्वयं हिन्दू विधि का प्रकटीकरण (Revealation) किया था। इस भांति श्रवण किया गया हिन्दू हमारे ऋषि-मुनियों ने हमें “श्रुति” या वेदों के रूप में दिया।

“श्रुति” शब्द का शाब्दिक अर्थ है, श्रवण किया हुआ। ईश्वर की वह वाणी जो हमारे ऋषि-मुनियों ने श्रवण की और हमें दी, श्रुति कहलाती है। श्रुति का ही दूसरा नाम वेद है। वेदों में ईश्वर की वाणी है। वेद चार हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। वेदों से परिशिष्टों (Appendices) को भाति जुड़ा हुया

पदागनाय (जिन्हें ब्रह्मन्ना भी कहते हैं) वेदांगनायें वेदों की रचना के पश्चात् उनमें पाराशष्टा का भाति जुड़ा हुयी हैं। वे भिन्न-भिन्न प्रकार के अनुष्ठान, कर्मकाण्ड और यज्ञों का वर्णन करती है।

विश्वास यह है कि वेदों में ईश्वर की वाणी है, वे सर्व ज्ञान के स्रोत हैं। अतः विधि-विधान के मल स्रोत भी वेद ही हैं और इस भांति हिन्दू विधान दैवी विधान है। अपितु श्रुति निश्चयात्मक विधि का यथार्थ में। कहा तक स्रोत है, यह संशयात्मक (Doubtful) है। एक मत यह रहा है कि वेदों में निश्चयात्मक विधि का नितान्त अभाव है और निश्चयात्मक विधि के स्रोत के रूप में उनका मत कोई महत्व नहीं रहा है। दूसरा मत (और इस लेखक की राय में अधिक संगत) यह है कि यद्यपि वेदों में विधि के नियमों का क्रमबद्ध वर्णन नहीं और उनमे से विधि के नियमों को ढंढकर निकालना पड़ता है, यह कहना भ्रांतिपूर्ण होगा कि वेदों में विधि के निमय हैं ही नहीं। वेदों में लिखित तथ्य के कथनों का हवाला निश्चयात्मक कानूनी रूढ़ि के रूप में। कहीं-कहीं स्मतियों, निबन्धों और टीकाओं में दिया गया है। वेदों में कई स्थलों पर ब्रह्म, आसर, गांधर्व विवाहों, पुत्र की आवश्यकता, क्षेत्रज, दत्तक, पुत्री का पुत्र, विभाजन, उत्तराधिकार से स्त्री के अपवर्जन (Exclusion) आदि का वर्णन है।

प्रश्न यह है कि वेदों में क्या है? यह जानने के लिये हमें वैदिक काल की समाज-व्यवस्था और उस युग के मानव के विकास को ध्यान में रखना होगा। यह वह समय था जब हमारे आर्य पूर्वज उत्तर-पश्चिम की पर्वत श्रृंखलाओं को पार करके सिन्ध और पंचनद की नदियों में बसते हुये गंगा-यमुना के उर्वर मैदानों तक फैल गये थे। वे आर्य मुख्यतया पशुपालक एवं कृषक थे और उनके पीछे थी एक सभ्यता और परिपक्व विचारों की परम्परा। ये आर्य ओजस्वी, हृष्टपुष्ट और सरल व्यक्ति थे। जो भी कुछ जीवन में प्राप्त हो सकता था उसकी प्राप्ति में वे लगे थे। इन्हीं आर्यों के जीवन, दर्शन, अनुष्ठानों, आकांक्षाओं, और ध्येयों का वर्णन वेदों में मिलता है।

वैदिक दर्शन के अनुसार आत्मा अमर है, परन्तु आत्मा का निवास-स्थान, यह पार्थिव शरीर नश्वर है, जब तक मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है, मनुष्य बार-बार जन्म लेता है। इस जन्म में और आगे आने वाले जन्मों में हमारा अस्तित्व, हमारे सुख-दुख क्लेश, और शांति हमारे कर्मों द्वारा निर्धारित होते हैं। वे कर्म जो हमने पूर्व जन्म में किये हैं, वे कर्म जो हम इस जन्म में कर रहे हैं। सुकर्मों का फल अच्छा होता है, कुकर्मों का फल बुरा । यज्ञ, अनुष्ठान और धर्मपालन द्वारा हम अपनी आत्मा को आवागमन के बन्धन मुक्त करके मोक्ष की प्राप्ति कर सकते हैं। वैदिक हिन्दू चिन्तन के दर्शन से परे था। वह इस जीवन में और आने वाले जीवन में सुख की खोज करता था। उसके लिये जीवन अनेक उद्देश्यों की प्राप्ति का मानव-प्रयास रहा है, जिन्हें तत्वों पर विजय प्राप्त करके उपलब्ध किया जा सकता है। इन तत्वों पर विजय यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों द्वारा प्राप्त की जा सकती है। वैदिक हिन्दू का कर्मकाण्ड यज्ञ कुण्ड से जुड़ा हुआ था। अग्नि, ईश्वर और मनुष्य के बीच में माध्यम थी, अग्नि को जीवन की सबसे प्रिय वस्तुयें जैसे घी, गेहूं, पशु की आहुति देकर वह ब्रह्म तक पहुंचने का, ब्रह्म में लीन होने का प्रयास करता था, जैसे अनेक नदियां सागर की ओर बहती हैं और सागर में विलीन हो जाती हैं, और अपना नाम और अस्तित्व खो देती हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि वैदिक युग में दो भांति के नियम प्रचलित थे-

(1) रूढ़िगत विधि के नियम। ये नियम अधिकार, कर्तव्य, गुण और दोषों से संबंधित हैं। वेदों में इन नियमों के पालन करने के कर्तव्य को महत्व दिया गया है। धर्म का पालन ही परम धर्म है। धर्म से तात्पर्य है, व्यक्ति के विशेषाधिकार, अधिकार और कर्तव्य, आर्य होने के नाते, किसी वर्ण के सदस्य होने के नाते और आश्रम के पालनकर्ता के नाते स्तरमान आचरण का पालन करना।

(2) आर्य दैवी विधि का आवाहन करते थे, जिनके द्वारा (उनके विश्वासानुसार) ब्रह्माण्ड का चक्र घमता है। आवाहन दैवी विधि का था। यज्ञ मुक्ति का पथ था। उनका विश्वास था कि समस्त वैदिक कर्मो और कर्तव्यों के पालन द्वारा, समस्त यज्ञ और अनुष्ठानों को सम्पन करके मनुष्य फिर ब्रह्म को प्राप्त कर सकता। है, मुक्ति प्राप्त कर सकता है। बल कर्मकाण्ड पर था।

अन्त में हम कह सकते हैं कि यद्यपि सिद्धान्त रूप से वेद हिन्दू विधि के मूलभूत स्रोत हैं, वेद हमारे आदि पूर्वज आर्यों के बहुमुखी जीवन, रहन-सहन, रीति-रिवाज, अनुष्ठान, धार्मिक आस्था, आकांक्षाओं और

1. मेन कृत ‘हिन्दू लॉ एण्ड यूसेज’ पृष्ठ 19.

दर्शन का वर्णन करते हैं। विधि के नियमों की क्रमबद्ध विवेचना नहीं करते हैं। विधि के नियमों को वेदों में चुनना पड़ता है उनमे विधि के सब नियम हैं भी नहीं। महामहोपाध्याय डाक्टर काणे के अनुसार वेद “धर्म” पर व्यस्थित ढंग ग से लिखे गये ग्रन्थ नहीं हैं, विधान के कुछ नियम इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। यदि हम यहां धर्म का प्रयोग विधि के अर्थ में है) का व्यवस्थित और क्रमबद्ध रूप देखना चाहते हैं तो हमें स्मृतियों का अवलोकन करना होगा।

वेदोत्तर युग-वेदों और स्मृतियों के बीच विकास का एक युग रहा है। प्रतीत यह होता है कि इस युग में विधि का विकास रूढ़िगत होता रहा। परन्तु इस युग के बारे में हमारा ज्ञान शून्य के बराबर है। हम यह जानते हैं कि वेदों के पश्चात् संहिता सूत्रों और गाथाओं का विकास हुआ। स्मृतियों में अनेक स्थानों पर इन सूत्रों और गाथाओं का उल्लेख मिलता है। परन्तु इस युग का साहित्य उपलब्ध नहीं है। हम नहीं जानते कि संहिता सूत्रों और गाथाओं का कहां और किस रूप में प्रादुर्भाव हुआ। यह स्पष्ट है कि उत्तरवैदिक युग में वेदों का पठन-पाठन अनिवार्य हो गया था और वर्ण-व्यवस्था पूर्णतया स्थापित हो चुकी थी। प्रतीत यह होता है। कि भारत के भिन्न-भिन्न भागों के वेदों का पालन करने वाले आचार्यों ने वेदों की भिन्न-भिन्न व्याख्यायें की हैं, और इसने वेदों की शाखाओं को जन्म दिया। वेदों के पठन-पाठन करने वाले आचार्य कई चरणों में बांट गये। इन आचार्यों ने पठन-पाठन की सुविधा के लिये सूत्रों का निर्माण किया और इस भांति गृहसूत्र, धर्मसूत्र और कल्पसूत्र बने।

स्मृति (LLB 2nd Semester Hindu Law Notes)

स्मृतियों के साथ विधि के क्रमबद्ध और सुव्यवस्थित विकास के युग का आरम्भ होता है। स्मृति-युग भारतीय विधि का स्वर्ण-युग है।

“स्मृति” पद का शाब्दिक अर्थ है, जो कुछ भी स्मरण में है। हमारे ऋषि-मुनियों ने दैवी वाणी का श्रवण किया और इस दैवी वाणी का संकलन उन्होंने वेदों में किया। फिर भी बहुत कुछ उनके स्मरण पटल पर .. रहा मान्यता यह है कि स्मृतियां ऋषि-मुनियों के स्मरण पर ही आधारित हैं।

स्मृतियों को हम दो भागों में बांटते हैं-पूर्व-स्मृतियां और उत्तर-स्मृतियां (प्रथम को धर्मसूत्र की संज्ञा दी गई और द्वितीय को धर्मशास्त्र की, यद्यपि कभी-कभी दोनों को ही धर्मशास्त्र के नाम से पुकारा जाता है)। इस युग में प्रतीत यह होता है कि वेदों को ईश्वर वाणी मानकर उन्हें ही विधि का आधार माना गया। हिन्दू समाज चरम प्रगति के पथ पर अग्रसर हो रहा था, समाज-व्यवस्था बदल रही थी, नई सामाजिक आवश्यकताओं और ध्येयों का प्रादुर्भाव हो रहा था, रूढ़िगत नये नियमों और सिद्धान्तों का विकास हो रहा था, स्वाभाविक ही था कि वेदों की व्याख्या ऐसी हो जो उस युग की सामाजिक आवश्यकता और ध्येयों के अनुरूप हो। संहिता चरणों के युग में हम सूत्र-चरणों के युग में प्रविष्ट करते हैं। इस युग में, संरचित (Composed) सत्रों को लिखित रूप दिया गया। ये सूत्र तीन भागों में बांटे जाते हैं-यज्ञ सम्बन्धी सूत्र, गृहसूत्र और समयचारिका। अन्तिम को धर्मसत्र भी कहते हैं। ये विधि के नियमों और सिद्धान्तों से सम्बन्धित हैं। धर्मसत्रों का यग कछ आगे चलकर धर्मशास्त्र के युग में मिल गया। धर्मशास्त्रों में विधि का सुव्यवस्थित रूप पाया जाता है।

धर्मसूत्र-अधिकांश धर्मसूत्र गद्य में हैं। कुछ गद्य और पद्य दोनों में लिखे गये हैं। धर्मसूत्र पर उनके लेखक के नाम अंकित हैं। कहीं-कहीं लेखक की शाखा का नाम भी लिखा गया है। धर्मसूत्रों का युग लगभग 800 बी० सी० से 200 बी० सी० तक है। सम्भवतः अनेक धर्म सूत्रकार हुये हैं परन्तु हम सब का नाम नहीं जानते हैं। प्रमुख धर्मसूत्रकार हैं-गौतम, बौधायन, आपस्तम्ब, हरित, वशिष्ठ और विष्णु। धर्मसूत्र मनुष्य के बाह्य सम्बन्धों से सम्बन्धित कर्तव्यों को निर्धारित करते हैं। वे मनुष्य द्वारा ही रचित हैं। वैदिक ज्ञान, धर्म एवं विधि में पारंगत विद्वानों और सुआचरण करने वाले आर्यों के रूढ़ियां उनका आधार हैं। इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है कि धर्मसत्र वैदिक शाखाओं के आचार्यों द्वारा अपने शिष्यों की सविधा के लिये लिखे गये ग्रन्थ ह और ये आरम्भ में एक सीमित वर्ग में ही प्राधिकत (Authoritative) माने जाते थे। आगे चलकर उन्ह दवा विधि का स्रोत माना जाने लगा।

1. हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, खण्ड एक, पृष्ठ 9.

देश के विभिन्न भागों और पृथक्-पृथक समय में लिखे जाने पर भी धर्मसूत्रों में कुछ विसंगति नहीं है। बल्कि वे एक-दूसरे से तालमेल खाते हैं। सामान्यतया सभी धर्मसूत्र धार्मिक और नैतिक निमयों का विधिक नियमों के साथ सम्मिश्रण कराते हैं। धर्मसूत्रकारों ने हमें एक विधि-व्यवस्था दी है, चाहे वह इतनी सुव्यवस्थित और क्रमबद्ध न हो, जितनी कि धर्मशास्त्रों में है। हो सकता है कि धर्मसूत्रकारों को हिन्दू विधिव्यवस्था के जन्मदाता कहना उचित न हो। निःसन्देह ही वे प्रथम मार्गदर्शक अवश्य थे।

मुख्य धर्मसूत्रकारों का हम यहां संक्षिप्त परिचय देते हैं।

गौतम-उपलब्ध धर्मसूत्रों में गौतम धर्मसूत्र सबसे प्राचीन है। गौतम सामवेद शाखा से सम्बन्धित है। गद्य में लिखा गया यह ग्रन्थ विधिक और धार्मिक विषयों सम्बन्धी नियमों का सविस्तार वर्णन करता है। अन्य विधिक बातों के अतिरिक्त, उत्तराधिकार, विभाजन, स्त्री-धन पर समुचित प्रकाश डाला गया है। गौतम ने परम्परा, आचरण और प्रथा को महत्व दिया है। उनका कहना है कि अर्वाचीन (Time Honoured) संस्थाओं, नियमों और सिद्धान्तों को मान्यता देना और प्रत्येक वर्ग, जाति और सम्प्रदाय की रूढ़ियों को लागू करना राजा का कर्तव्य है। ईसा की 12वीं शताब्दी में हरदत्त ने गौतम धर्मशास्त्र पर मिताक्षरा नाम से एक टीका लिखी है।

बौधायन-आन्ध्र प्रदेश के पूर्व तट पर रहने वाले बौधायन कृष्ण यजुर्वेद शाखा से सम्बन्धित थे। बौधायन धर्मसूत्र की पूर्ण प्रतिलिपि उपलब्ध नहीं है। विवाह, दत्तक, उत्तराधिकार और अन्य कई विधिक विषयों की विवेचना और अपने क्षेत्र में प्रचलित अनेक रूढ़ियों का संकलन उन्होंने किया है। बौधायन ने उत्तर भारत में बसने वाले लोगों की रूढ़ि का भी उल्लेख किया है। उन्होंने दक्षिण भारत में प्रचलित रूढ़ि जिसके अन्तर्गत मामा की पुत्री से विवाह मान्य है और उत्तरी भारत में प्रचलित रूढ़ि जिसके अन्तर्गत उत्पादक-शुल्क और सीमा-शुल्क लगाया जाता है का भी उल्लेख किया है।

आपस्तम्ब-उपलब्ध धर्मसूत्रों में आपस्तम्ब धर्मसूत्र की पूर्ण प्रतिलिपि प्राप्त है। आन्ध्र प्रदेश के निवासी आपस्तम्ब कृष्ण यजुर्वेद शाखा से सम्बन्ध रखते थे। उनकी भाषा प्रभावशाली एवं स्पष्ट है। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने अपने क्षेत्र में प्रचलित रूढ़ियों का संकलन अपने ग्रन्थ में किया है। उन्होंने कुछ आचरण और रूढ़ियों जैसे नियोग की भर्त्सना की है और उन्हें मान्यता देने से इन्कार किया है। उन्होंने प्रजापति और पिशाच, विवाहों, द्वितीयक पुत्रों (दत्तक-पुत्र सहित), इत्यादि को मान्यता नहीं दी है। उनका कथन है कि वेद सद्ज्ञान के आगार हैं।

वशिष्ठ-ऋग्वेद से सम्बन्धित वशिष्ठ उत्तरी भारत के रहने वाले थे। वशिष्ठ धर्मसूत्र के कुछ ही अंश उपलब्ध हैं। उनका कथन है कि आर्यावर्त की रूढि को सर्वत्र मान्यता मिलनी चाहिये। वे भी पिशाच और प्रजापति विवाहों को मान्यता नहीं देते हैं। कुंआरी विधवाओं के पुनः विवाह को वे मान्यता देते हैं। उनका कथन है कि विवादों को निपटाने के लिये दस व्यक्तियों के परिषद् का गठन करना चाहिये। अन्य विषयों के साथ-साथ वशिष्ठसूत्र में विवाह, दत्तक, उत्तराधिकार, स्त्रीधन, विधि के स्रोत, और न्यायालयों की अधिकारिता की विवेचना की गयी है।

विष्ण-विष्णु द्वारा रचित धर्मसूत्र विष्णुस्मृति के नाम से जाना जाता है। यह गद्य और पद्य दोनों में लिखा गया है। दाण्डिक विधि, सिविल विधि, विवाह, दत्तक, उत्तराधिकार, ऋण, ब्याज इत्यादि विषयों की विवेचना विष्णुस्मृति में की गयी है। विष्णु नास्तिकवाद और अधर्मी साहित्य की भर्त्सना करते हैं।

हरित-हरित द्वारा रचित धर्मसूत्र हरितस्मृति के नाम से विख्यात है। विधि की विवेचना करने वाले प्रारम्भिक आचार्यों में हरित का नाम आता है। दुर्भाग्यवश हरित स्मृति हरित स्मृति की प्रतिलिपि हमें उपलब्ध नहीं है और हमें अन्य स्मृतियों, टीकाओं और निबन्धों में उद्धृत हरित स्मृति के अंशों पर ही संतोष करना पड़ता है। विश्व रूप से लेकर अन्तिम धर्मशास्त्रकार तक हरित स्मृति से उद्धरण लेते रहे हैं। बौधायन, आपस्तम्ब और वशिष्ठ ने भी हरितस्मृति से उद्धरण लिये हैं। धर्म के स्रोत, ब्रह्मचर्य धर्म, स्नातक, गृहस्थी, खानपान की वर्जनायें, जन्म और मरण पर सूतक, राजा के कर्तव्य, शासन, प्रणाली, विधि के सिद्धान्त, पतिपत्नी के कर्तव्य, विभिन्न प्रकार के पाप, प्रायश्चित और अन्य कई विषयों की विवेचना हरित ने की है।

निःसन्देह ही, उपर्युक्त धर्मसूत्रों के अतिरिक्त अन्य धर्मसूत्र भी लिखे गये हैं। इनमें उशना हिरण्यकेशी, कश्यप, शंख और लिखित के नाम उल्लेखनीय हैं। धर्मसूत्रों में न केवल विधिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है बल्कि उनकी सहायता से हम उस काल के विधिक इतिहास को भी समझ सकते हैं। अपने युग की प्रचलित, यद्यपि, अलिखित, रूढ़ियों का वर्णन धर्मसूत्रों में मिलता है, उनके द्वारा हम यह समझने में समर्थ हुये हैं कि रूढ़ियां किस भांति विधि के नियमों में परिवर्तित हो जाती हैं।

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