LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 1 Notes Study Material

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LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 1 Notes Study Material
LLB 2nd Semester Hindu Law Chapter 1 Notes Study Material

अध्याय 1 (Chapter 1 LLB Notes)

हिन्दू कौन है? (Who is Hindu)

आज भारत वैयक्तिक (Personal) विधि की विविधता का देश है। हर धार्मिक सम्प्रदाय अपनी पृथक वैयक्तिक विधि द्वारा शासित होता है। हिन्दुओं पर हिन्दू विधि, मुसलमानों पर मुसलमान विधि, ईसाइयों पर ईसाई विधि और पारसियों पर पारसी विधि, यहूदियों पर यहदी विधि लागू होती है। लगभग प्रत्येक सम्प्रदाय को वैयक्तिक विधि में कुछ-न-कुछ धार्मिक अंश विद्यमान हैं। हिन्दू और मसलमान अपनी विधियों को दैवी (Divine) मानते हैं । सम्भवत: यही भारतीयों की वैयक्तिक विधि के एकीकरण में प्रमुख बाधा है।

एक युग था, मुसलमानों के आगमन से पूर्व, जब ‘हिन्दू’ शब्द का प्रयोग एकमत के अनुयायियों के लिये नहीं होता था, अपितु ‘हिन्दू’ शब्द का प्रयोग प्रादेशिकता (Territorial) के रूप में होता था। भारत के रहने वाले सब व्यक्ति ‘हिन्दू’ कहलाते थे। उस समय ‘हिन्दू’ शब्द राष्ट्रीयता का भी द्योतक था। ऐसा प्रतीत होता है कि ‘हिन्दू’ शब्द का प्रचलन ग्रीकों के आगमन के साथ हुआ। ग्रीक लोग सिन्ध (इण्टम) नदी की घाटी में रहने वाले व्यक्तियों को ‘इन्डोई’ कहते थे। धीरे-धीरे इस शब्द का प्रयोग सिन्ध नदी की घाटी परे रहने वाले व्यक्तियों के लिये भी होने लगा। सिन्ध नदी की वादी में रहने वाले व्यक्तियों को मुसलमान ने भी हिन्दू का नाम दिया। मुसलमान राज्य स्थापित होते-होते हिन्दू शब्द न ही राष्ट्रीयता का द्योतक रहा और न ही प्रादेशिकता का। उसका प्रयोग एकमत के अनुयायियों के लिये होने लगा। वे सब जो हिन्दू धर्म को मानते हैं हिन्दू कहलाने लगे। अंग्रेजी राज्य के स्थापित होने पर भी ‘हिन्दू’ शब्द का प्रयोग इसी रूप में होता रहा।

परन्तु हिन्दू शब्द की व्याख्या के विकास में एक विचित्र बात यह हुयी कि यद्यपि हिन्दू शब्द का प्रयोग हिन्दू धर्म के अनुयायियों के लिये होता रहा, परन्तु यह आवश्यक नहीं रहा कि हिन्द वही कहलायेगा जो हिन्दू धर्म का पालन करता है। अत: सन् 1955 में, हिन्दू विधि के कुछ अंशों के संहिताबद्ध (Codification) होने के पूर्व, स्थिति ने यह मोड़ लिया कि हिन्दू धर्म का पालन करने वाला हिन्दू कहलाता रहा, परन्तु यह आवश्यक नहीं रहा कि जो व्यक्ति हिन्दू धर्म का पालन नहीं करता है, वह हिन्दु न हो। कुछ व्यक्ति ऐसे रहे हैं जो हिन्दू धर्म की कसौटी पर खरे नहीं उतरते हैं, परन्तु फिर भी हिन्दू विधि उन पर लागू होती थी और इसलिये वे हिन्दू कहलाते थे। सन् 1955 के पूर्व हम उस अवस्था पर पहुंच गये हैं जहां सकारात्मक रूप से हिन्द शब्द की परिभाषा देना कठिन था। नकारात्मक रूप से हम कह सकते थे कि वे व्यक्ति जो मसलमान, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं, हिन्दू हैं। धार्मिक मापदण्ड के अनुसार हिन्दू की परिभाषा हिन्दू धार्मिक और पूर्त (पुण्यार्थ) न्यासों के सम्बन्ध में ही महत्वपूर्ण रह गयी है।

आज स्थिति यह है कि ‘हिन्दू’ की परिभाषा देना कठिन है। सत्य तो यह है कि न कोई इसकी सुतथ्य परिभाषा है और न ही देना सम्भव है। संहिताबद्ध हिन्दू विधि के किसी भी विधेयक में ‘हिन्दू’ शब्द की परिभाषा देने का प्रयत्न नहीं किया गया है। परन्तु विधि व्यवहारिक विषय है, अत: परिभाषा की कुछ भी कठिनाई क्यों न हो, यह जानना आवश्यक है कि हिन्दू विधि किन व्यक्तियों पर लागू होती है। यह कहना सहज है कि हिन्दू विधि सभी हिन्दुओं पर लागू होती है, लेकिन प्रश्न फिर भी यही रहता है कि हिन्दू किसे कहते हैं। इसका उत्तर हम (हिन्दू) की परिभाषा द्वारा नहीं बल्कि जिन व्यक्तियों पर हिन्दू विधि लागू होती।

1. देखें, राधाकृष्णन-हिन्दु व्यू ऑफ लाइफ, गजेन्द्रगडकर न्यायाधीश, शास्त्री यज्ञपुष्प दासजी बनाम मूलदास, 1966 सु० को० 1119.

है उनक प्रवीकरण द्वारा जान सकते हैं। यह कार्य सम्भवतः इतना कठिन नहीं है। लगभग यही संहिताबद्ध हिन्दू विधि के विधेयकों में अपनायी गयी है।

हिन्दू विधि जिन व्यक्तियों पर लागू होती है, उन्हें हम तीन मुख्य प्रवर्गों में बांट सकते हैं

(1) वे व्यक्ति जो धर्मतः हिन्दू, जैन, बौद्ध या सिक्ख हैं;

(2) वे व्यक्ति जो हिन्दू, जैन, बौद्ध या सिक्ख माता-पिता (या दोनों में से एक) की सन्तान हैं; और।

(3) वे व्यक्ति जो मुसलमान, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं।

धर्मतः हिन्दू

प्रथम प्रवर्ग में आने वाले हिन्दुओं को हम निम्न दो उप-प्रवर्गों में बांट सकते हैं

(अ) जो जन्म से, धर्म द्वारा हिन्दू, जैन, बुद्ध या सिक्ख हैं; और

(ब) जो सिक्ख, बुद्ध या जैन संपरिवर्तन (Conversion) या प्रतिसंपरिवर्तन (Reconversion) द्वारा हैं।।

हिन्दू धर्म प्रव्यंजना (Profession) या आचरण द्वारा हिन्दू धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति धर्म से हिन्दू है।

हिन्दू धर्म (LLB Study Material in Hindi)

इतनी विविधता से पूर्ण है कि यथावत् रूप से उसकी व्याख्या करना या उसकी परिभाषा देना बहुत कठिन है। कुछ समय पूर्व उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश श्री गजेन्द्रगडकर ने हिन्दू धर्म की परिभाषा देने का साहसिक प्रयत्न किया था,2 यद्यपि यह प्रयत्न पूर्णतया धार्मिक पृष्ठभूमि में किया गया था। न्यायालय के समक्ष प्रश्न था कि क्या बम्बई हिन्दू मन्दिर प्रवेश विधेयक के अन्तर्गत सत्संगियों के मन्दिर में हरिजन (शूद्र) प्रवेश कर सकते हैं? महागुजरात दलित संघ के सभापति श्री मूलदास ने स्वामी नारायण मत के प्रवर्तकों, जिन्हें सत्संगी के नाम से पुकारा जाता है, के अहमदाबाद स्थित मन्दिर में प्रवेश करने की नोटिस मन्दिर के प्रबन्धकों को दिया। इस पर स्वामीनारायण मत के अनुयायियों ने महागुजरात दलित सभा के विरुद्ध व्यादेश का वाद प्रेषित किया। इस मुकदमें की रोचक बात यह है कि स्वामीनारायण सम्प्रदाय के प्रवर्तकों ने अपने वाद में कहा कि स्वामीनारायण सम्प्रदाय एक अहिन्दू सम्प्रदाय होने के नाते हिन्दू-मन्दिर प्रवेश अधिनियम उन पर लागू नहीं होता है। उच्च न्यायालय में अपील होने पर न्यायाधीश, गजेन्द्रगडकर ने हिन्दू धर्म और दर्शन के पंडितों (जैसे कि राधाकृष्णन, तिलक, मोनी विलियम और मैक्समूलर) द्वारा लिखित ग्रन्थों में से मुक्त उद्धरण लिये। उन्होंने तिलक के ‘गीता रहस्य’ में से निम्न उद्धरण लिया-

हिन्दू धर्म के उल्लेखनीय लक्षण हैं, वेदों को आदर के साथ ग्रहण करना, यह मानना कि मुक्ति के पथ अनेक और विधिक हैं, और यह समझना कि पूज्यनीय देवी-देवता अनेक हैं।

हिन्दू धर्म और दर्शन के मुख्य ग्रन्थों को हवाला देते हुये माननीय न्यायाधीश ने अपना विचार इस प्रकार व्यक्त किया-

‘हिन्दू धर्म-प्रवर्तकों और दार्शनिकों द्वारा व्यक्त किये गये विचारों, सिद्धान्तों मान्यताओं की विभिन्नता के परे कुछ विचार, सिद्धान्त और मान्यतायें ऐसी भी हैं जिन्हें सब हिन्दू स्वीकार करते हैं। इन सिद्धान्तों में सर्वप्रथम है, यह स्वीकार करना कि धार्मिक और दार्शनिक मामलों में वेद सर्वोपरि हैं, इस सिद्धान्त की स्वीकृति का अर्थ है यह मानना कि हिन्दू धर्म की सभी व्यवस्थायें और पद्धतियां और मूल सिद्धान्त विचार और ज्ञान के भंडार वेदों से ही लेती हैं। …..दूसरा मूल सिद्धान्त, जो हिन्दू दर्शन की छहों पद्धतियों में से एक

1. देखें, हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955, हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 और हिन्दू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 2 और हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 3.

2. शास्त्री यज्ञपुरुष दासजी बनाम मूलदास, 1966 सु० को० 1119; और देखें; अशीम बनाम नरेन्द्र, (1978) 76 के० वी० नो० 1116.

है, यह कि ब्रह्माण्ड के महान चक्र में उत्पत्ति, पालन और विघटन के वृहत् काल पुनर्जन्म और पूर्वजन्म में। विश्वास करती है।’ माननीय न्यायाधीश ने यह जानने के लिये कि स्वामी नारायण मत हिन्दू-धर्मावलम्बियों की शाखा है या नहीं, स्वामीनारायण मत के मूल सिद्धान्तों का पर्यवेक्षण किया। उन्होंने कहा कि हिन्दु धर्म और दर्शन की उत्पत्ति और विकास के इतिहास पर दृष्टि डालने पर भी यह विदित होता है कि समय-समय पर जब भी किसी महात्मा या सुधारक ने हिन्दू धर्म में सुधार लाने या हिन्दू धर्म को युक्तिहीन, भ्रष्ट या दूषित आचरणों से मुक्त करने का प्रयास किया है, एक नये मत का जन्म हुआ है जिसने अपने पृथक् सिद्धान्त प्रतिपादित किये हैं, परन्तु ऐसा करने के लिये उन्होंने हिन्दू धर्म और दर्शन के मूल सिद्धान्तों का ही सहारा लिया है। यह कभी नहीं कहा गया कि उस मत के प्रवर्तक और अनुयायी हिन्दू नहीं हैं जो मन्दिर उन्होंने स्थापित किये हैं वे हिन्दू मन्दिर नहीं हैं। इस लेखक की राय में हिन्दू की व्याख्या करने का यह सराहनीय प्रयास है, सम्भवतः धार्मिक दृष्टिकोण से हिन्दू शब्द की इससे अच्छी परिभाषा नहीं की जा सकती है। उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या स्वामीनारायण मत के अनुयायी हिन्दू हैं। अत: उसका कार्य अपेक्षाकृत सरल था। यदि तर्क यह दिया गया होता कि हरिजन (जिसमें चमार, भंगी और अन्य सब शूद्र आते हैं) हिन्दू नहीं हैं तो उच्चतम न्यायालय का कार्यभार इतना आसान नहीं होता। किसी धार्मिक पंथ या सम्प्रदाय के बारे में यह कहना कठिन नहीं है कि वह हिन्दू पंथ या सम्प्रदाय है या नहीं। परन्तु यह कह पाना इतना आसान नहीं है कि चमार (या हरिजन) हिन्दू हैं, क्योंकि वे न ही हिन्दू धर्म के ज्ञाता हैं और न ही हिन्दू दर्शन में पारंगत हैं (उस भांति जिस भांति के माननीय न्यायाधीश हैं) उसके बारे में यह ही कह सकते हैं कि शूद्र इसलिये हिन्दू हैं क्योंकि हिन्दुओं के चार वर्गों में से वे एक हैं। अत: इस लेखक की राय में धर्म के आधार पर हिन्दू शब्द की कोई भी परिभाषा अपूर्ण ही रहेगी यह ठीक है कि जो भी व्यक्ति हिन्दुत्व की कसौटी पर खरा उतरता है, वह हिन्दू है, परन्तु हम यह नहीं कह सकते हैं कि जो व्यक्ति हिन्दुत्व की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है, वह हिन्दू नहीं है। यही समस्या की कठोर कड़ी है। हम कह सकते हैं कि कोई व्यक्ति जो हिन्दू धर्म का पालन करता है, प्रव्यंजना करता है या हिन्दू धर्म पर आचरण करता है, हिन्दू धर्म में आस्था रखता है, हिन्दू है। परन्तु केवल इस कारण से हम किसी व्यक्ति को हिन्दू कहने से इन्कार नहीं कर सकते हैं कि वह न हिन्दू धर्म का पालन करता है, न उसकी प्रव्यंजना करता है, न ही उसका आचरण करता है और न ही उसमें आस्था रखता है। तथ्य की बात तो यह है कि जब तक वह व्यक्ति किसी अन्य धर्म का अनुयायी नहीं है या हो जाता है (धर्म-परिवर्तन द्वारा) वह हिन्दू ही है और रहेगा। उदाहरण के लिये, मान लीजिये कि कोई किसी अन्य धर्म (जो हिन्दू धर्म की शाखा, पंथ या सम्प्रदाय नहीं है, जैसे ईसाई मत) का पालन करने लगता है, उसकी प्रव्यंजना करने लगता है या उस पर आस्था रखने लगता है, तो वह हिन्दू, हिन्दू ही रहेगा जब तक कि वह धर्म परिवर्तन न कर ले। इसी भाँति यदि कोई हिन्दू नास्तिक हो जाये तो भी वह हिन्दू ही रहेगा। यही बात प्रीवी कौन्सिल ने 1909 में रानी भगवान कौर बनाम जे० सी० बोस2 में कही थी। उसने कहा था कि हिन्दू धर्म के मूल सिद्धान्तों से विमुख होने या विसम्मत होने या कट्टर हिन्दू धर्म के आचरण को छोड़ देने से, जैसे कि पश्चिमी ढंग से रहने में, या हिन्दू धर्म की निन्दा करने, या गाय का मांस खाने मात्र से कोई व्यक्ति अहिन्दू नहीं हो जाता है। संक्षेप में जब तक हिन्दुत्व का अंकुर उसमें रहेगा, वह हिन्दू ही रहेगा। यह अंकुर उसके द्वारा दूसरा धर्म स्वीकार करने पर ही समाप्त होगा।

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