LLB 1st Year Semester Law of Contract 1 Specific Performance Contract Latter Half Notes Study Material

LLB 1st Year Semester Law of Contract 1 Specific Performance Contract Latter Half Notes Study Material : LLB 1st Year 1st Semester Online Free PDF Download Book Law of Contract 1 (16th Edition) Part 2 Specific Relief Act, 1963) Chapter 3 Specific Performance of Contracts Latter Half Notes Study Material (LLB Question Paper With Answer) in Hindi English Available This Post, LLB 1st Year and 2nd Year and 3rd Year Notes in PDF Download This Site Always Available.

LLB 1st Year Semester Law of Contract 1 Specific Performance Contract Notes Study Material

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का अनतोष प्राप्त नहीं कर सकता है। प्रकथन करना ही यथेष्ठ नहीं है उसे यह भी सिद्ध करना होगा कि पूरे समय संविदा में के अपने भाग का पालन करने को तैयार तथा इच्छुक था।66 जहाँ विनिर्दिष्टतः पालन के वाद में वादी का यह अभिकथन है कि दावाकृत सम्पत्ति का वास्तविक स्वामी वह है क्योंकि सम्पत्ति बेनामी रूप से उसके लड़के के नाम थी, बेनामी संव्यवहार (निषेध) अधिनियम [(Benami Transactions (Prohibition) Act, 1988] की धारा 4(2) के अधीन न्यायालय इस अभिकथन की अनुमति नहीं देगा।67

यदि किसी संविदा में संविदा भंग होने पर अनुबद्धित धन देने का उपबन्ध है तो इससे अपने आप में विनिर्दिष्टतः पालन की डिक्री वर्जित नहीं हो जाती है।68 यह नियम उच्चतम न्यायालय ने एम० एल० देवेन्दर सिंह बनाम सैय्यद खाजा69 के वाद में प्रतिपादित किया था।

श्रीमती शकुन्तला देवी बनाम मेसर्स मोहनलाल अमृत राज जैन मार्केट (Smt. Shakuntala Devi v. Mohanlal Amrit Raj Jain Market, Pali)70 के वाद में राजस्थान उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि विनिर्दिष्टतः पालन के वाद में क्रेता द्वारा शेष धन देने का प्रश्न तब उठता है जब विक्रेता संविदा में के अपने भाग का पालन कर दिया हो। यदि विक्रेता आयकर निकासी प्रमाण-पत्र (Income Tax Clearance Certificate) प्राप्त करने में असफल रहता है तो क्रेता को यह सिद्ध करना आवश्यक नहीं है कि उसकी वित्तीय स्थिति शेष धन का भुगतान करने की है। क्रेता को केवल यह दर्शित करना है वह लगातार शेष धन का भुगतान करने को उपयुक्त अवसर आने पर तैयार तथा इच्छुक था।1

जुगराज सिंह बनाम लाभसिंह (Jugraj Singh v. Labh Singh)72 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि विनिर्दिष्टतः पालन के वाद में वादी द्वारा यह सिद्ध करना आवश्यक है कि करार की तिथि से लेकर सुनवाई की तिथि तक सभी चरणों पर संविदा के अपने भाग का पालन करने को तैयार तथा इच्छुक’ था।73 परन्तु यह प्रकथन विनिर्दिष्टतः केवल क्रेता या उसके कानूनी प्रतिनिधियों को ही उपलब्ध है। यह उसका व्यक्तिगत अधिकार है, तत्पश्चात (Subsequent) क्रेताओं को यह अधिक नहीं है।74

जहाँ साक्ष्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि वादी अपने भाग की संविदा का पालन करने को तैयार तथा इच्छुक नहीं था वह विनिर्दिष्टतः पालन की डिक्री प्राप्त नहीं कर सकता है।75

वादी जहाँ यह अभिकथन करता है कि वह उप-रजिस्ट्रार के कार्यालय में विक्रय लेख निष्पादित करने तथा रजिस्ट्रीकृत करवाने उपस्थित था इससे यह दर्शित होता है कि वह अपने भाग की संविदा का पालन करने के लिये तैयार तथा इच्छुक था परन्तु यह अभिकथन करना आवश्यक नहीं कि उसके पास नगद धन भी तैयार था।76 जहाँ क्रेता यह प्रकथन करता है कि उसने विक्रय विलेख के निष्पादन हेतु रजिस्ट्रीकृत नोटिसें भेजी तथा विक्रय विलेख हेतु फीस लागत आदि का भुगतान तथा विक्रय प्रतिफल का शेष धन भी देने को

66. श्रीमती गोपाल देवी बनाम श्रीमती कान्ता भाटिया, ए० आई० आर० 1994 दिल्ली 349, 358.

67. तत्रैव, पृष्ठ 351.

68. श्रीमती शकुन्तला देवी बनाम मेसर्स मोहन लाल अमृत राज जैन मार्केट पाली, ए० आई० आर० 1994 राज० 259, 263 265.

69. ए० आई० आर० 1973 एस० सी० 2457.

70. ए० आई० आर० 1994 राजस्थान 259.

71. तत्रैव, 265-266%; उच्चतम न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के गनेश प्रसाद बनाम सरस्वती देवी, ए० आई० आर० 1982 इलाहाबाद 47 वाद का अनुसरण किया।

72. ए० आई० आर० 1995 एस० सी० 945.

73. तत्रैव, पृष्ठ 946, न्यायालय ने प्रिवी काउंसिल के वाद अर्देशिर एस० भामा बनाम फ्लोरा सासून, ए० आई० आर० 1928 पी० 208 तथा उच्चतम न्यायालय के वाद गोमाथीनवगम पिल्लई बनाम पलानी स्वामी नादर, ए० आई० आर० 1967 एस० सी० 868 में दिये गये निर्णयों का अनुसरण किया।

74. तत्रैव

75. एन० पी० थिरूगनमन् बनाम डॉ० जगन मोहन राव, ए० आई० आर० 1996 एस० सी० 116, 117-18.

76. सुखवीर सिंह बनाम ब्रिज पाल, ए० आई० आर० 1996 एस० सी० 2510-2511

तैयार है। यही बातें उसने न्यायालय के समक्ष कही, उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि क्रेता ने न केवल प्रकथन किया वरन यह सिद्ध कर दिया कि वह संरिमा के अपने भाग का पालन करने के लिये तैयार तथा इच्छुक है।7

तैयारी (Readiness) के अर्थ होते हैं वादी की पालन करने की क्षमता जिसमें उसकी क्रय कीमत अदा करने की वित्तीय स्थिति भी शामिल है। अतः जहाँ संविदा के पक्षकार दो विभिन्न नगरों में निवास करते हैं तथा करार में यह शर्त या निबन्धन है कि भुगतान रेखांकित (Crossed cheque) बैंक ड्राफ्ट जो विक्रेता के पक्ष में हो, द्वारा होना चाहिये, यह शर्त संविदा की आवश्यक शर्त मानी जायेगी तथा इसके सिवाय किसी अन्य ढंग से तैयार, संविदा का उसके भाग का पालन नहीं माना जायेगा, यह विशेषकर तब जबकि वादी ने यह सिद्ध नहीं किया है कि क्रय कीमत का भुगतान करने की स्थिति में है।78

जहाँ कोई अधिनियम यह विहित करता है कि कोई तथ्य का अभिवचन किया जाय तो यह अभिकथन किसी भी रूप में हो सकता है। जब तक कि अधिनियम कोई विशिष्ट रूप विहित नहीं करता है यह किसी भी रूप में हो सकता है। धारा 16(ग) में कोई विशिष्ट रूप विहित नहीं है। इसके अनुसार, वादी को केवल यह अभिवचन करना है कि उसने संविदा के अपने भाग का पालन किया है या पालन करने में सदैव तैयार एवं इच्छुक’ रहा है। इस आवश्यकता का पालन सार में होना चाहिये न कि अक्षरशः एवं रूप में। यह नियम उच्चतम न्यायालय के तीन न्यायमूर्तियों की खण्ड पीठ ने सैय्यद दस्तगीर बनाम टी० आर० गोपालकृष्णा सेट्टी (Syed Dastgir v. T. R. Gopalkrishna Setty)79 के वाद में किया। इस वाद में वादी ने अभिवचन किया था कि उसने संविदा के अन्तर्गत सभी धन का भुगतान कर दिया था तथा प्रतिवादी ने इसे स्वीकार भी किया सिवाय इसके कि 120 रुपये का भगतान शेष है। इस 120 रुपयों के बारे में विनिर्दिष्ट अभिवचन किया था कि उसने 120 रुपये न्यायालय में निविदत्त किया है। अतः वादी का भिवचन न केवल यह दर्शित करता है कि उसने सविदा में अपने भाग के दायित्व का पालन किया है वरन् संविदा के अन्तर्गत उसके द्वारा पूर्ण धन को निविदत्त करके अपने भाग का पूर्ण पालन किया है। अत: यह धारा 16(ग) की ‘रजामन्द एवं इच्छुक’ की आवश्यकता को पूरा करता है।80

जो वादी यह अभिवचन करने में असमर्थ रहता है कि वह संविदा के अपने भाग का पालन करने के लिये तैयार एवं इच्छुक’ है उसके पक्ष में विनिर्दिष्ट पालन का आदेश नहीं दिया जा सकता है। यह अभिवचन कि वादी संविदा के अपने भाग का पालन करने के लिये तैयार एवं इच्छुक’ नहीं है। विक्रेता/प्रतिवादी तथा तत्पश्चाती क्रेताओं तथा यहाँ तक कि तत्पश्चाती क्रेताओं के विधिक प्रतिनिधियों को भी उपलब्ध है। यह निर्णय उच्चतम न्यायालय के तीन न्यायमूर्तियों की खण्ड पीठ ने राम अवध (मृतक) अपने विधिक प्रतिनिधियों द्वारा बनाम अक्षयवर दुबे (Ram Avadh (dead) by L.R. V. Achhaibar Dubey)81 के वाद में दिया।

जहाँ वादी प्रतिवादी को कुछ धन उधार देता है तथा करार करता है कि वह प्रतिवादी आवंटिती के एवज में सरकार को ब्लाक्स की कीमत, ब्याज तथा किराये का बकाया अदा करेगा तथा इसके एवज में प्रतिवादी वादी को एक ब्लाक देगा। इसके अतिरिक्त, यदि प्रतिवादी उधार धन देने में असफल रहता है तो प्रतिवादी वादी को दूसरा ब्लाक देगा। वादी सरकार को देय सभी धन नहीं अदा करता है। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि वादी संविदा के अपने भाग का पालन करने को तैयार एवं इच्छुक’ है। अतः प्रतिवादी को सारको काफी धन उस धन से देना पड़ा जो उसने वादी से उधार लिया था। यह धन उसे सरकार को ब्लाकों का आवंटन कराने हेतु देना पड़ा था। अतः प्रतिवादी को यह निर्देश नहीं दिया जा सकता कि वह वादी 82 को दसरा ब्लाक अन्तरित इस आधार पर करे कि वह उधार लिया धन देने में असफल रहा |82

77 पाण्डरंग गनपत तानाव डे बनाम गनपत भैरु कदम, ए० आई० आर० 1997 एस० सी० 463, 465.

78. विशम्भर नाथ अग्रवाल बनाम किशन चन्द, ए० आई० आर० 1998 इलाहाबाद 195, 205.

79. ए० आई० आर० 1999 एस० सी० 3029.

80. तत्रैव, 3032-3033.

81. ए० आई० आर० 2000 एस० सी० 860, 861.

82 अजायब सिंह बनाम श्रीमती तुलसी देवी, ए० आई० आर० 2000 एस० सी०2493, 2498-2501.

जहाँ सम्पत्ति के करार के विनिर्दिष्ट पालन के वाद में ऐसा लगा कि वाद वापस ले लिया गया तथा तत्पश्चात् विक्रय के लिये एक नया करार किया गया परन्तु बाद में यह स्पष्ट हुआ कि वाद वापस नहीं लिया गया था वरन् उसे संशोधित किया गया ऐसी परिस्थिति में यह नहीं कहा जा सकता कि वादी करार के अपने भाग का पालन करने के लिये तैयार तथा इच्छुक था 83

संविदा के विनिर्दिष्ट पालन के वाद में जहाँ यह अभिवचन नहीं किया गया है कि यदि विनिर्दिष्ट पालन का अनुतोष दिया जाता है तो कठिनाई होगी तथा यह प्रश्न (issue) नहीं बताया गया है कि वादी क्रेता को विनिर्दिष्ट पालन के स्थान पर धन की डिक्री देकर प्रतिकर दिया जा सकता है तथा नीचे के न्यायालयों का समवर्ती निर्णय यह था कि वादी संविदा के अपने भाग के पालन के लिये तैयार एवं इच्छुक, यह नया अभिवचन स्वीकार किया जा सकता। विनिर्दिष्ट पालन से एवज में धन की डिक्री देकर वादी क्रेता को. प्रतिकर दिया जा सकता है।84

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 16(ग) में यह अभिवचन करना तथा सिद्ध करना आज्ञात्मक (mandatory) है कि वादी संविदा के अपने भाग का पालन करने के लिये तैयार है। जहाँ कोई वादी न तो यह अभिवचन करता है तथा न ही इसे सिद्ध करता है करार की तिथि से तीन वर्ष के अन्दर न ही वादी प्रतिवादी से विक्रय के विलेख को निष्पादित करने को कहता है तथा केवल यह अभिकथित करता है कि नोटिस दिये जाने के बावजूद प्रतिवादी ने विक्रय विलेख निष्पादित नहीं किया, इससे धारा 16(ग) की आज्ञापक आवश्यकता पूर्णतया संतुष्ट नहीं होती है।85

जहाँ किसी विक्रय के करार के मामले में क्रेता विधिक नोटिस द्वारा संविदा को विखण्डित करता है तथा अग्रिम धन की वापसी के लिये वाद करता है, परीक्षण न्यायालय उसके पक्ष में डिक्री पारित करता है, परन्तु वाद में वह स्वयं ही डिक्री के विरुद्ध पुनरीक्षण याचिका दायर करता है, इन परिस्थितियों में यह नहीं कहा जा सकता है कि वह संविदा के अपने भाग का पालन करने को तैयार एवं इच्छुक है, अतः उसके पक्ष में विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री पारित नहीं किया जा सकता है।86

किसी सम्पत्ति को बेचने या पट्टे या किराये पर देने की ऐसे व्यक्ति द्वारा संविदा जिसका सम्पत्ति पर कोई हक न हो, विनिर्दिष्टतः प्रवर्तनीय नहीं है (Contract to sell or let property by one who has no title, not specifically enforceable)-धारा 17 के अनुसार-

(1) किसी स्थावर सम्पत्ति को बेचने अथवा पट्टे या किराये पर देने की संविदा ऐसे विक्रेता अथवा पट्टेदार के पक्ष में विनिर्दिष्टतः प्रवर्तित नहीं की जा सकती-

(क) जिसने यह जानते हुये कि सम्पत्ति पर उसका हक नहीं है, उसे बेचने की या पट्टे पर देने की संविदा की है,

(ख) जिसने यद्यपि इस विश्वास के साथ संविदा की थी कि सम्पत्ति पर उसका हक अच्छा है परन्तु जो विक्रय के या पट्टे के पूरा करने के लिये पक्षकारों या न्यायालय द्वारा नियत समय पर क्रेता या पट्टेदार को युक्तियुक्त संदेह-रहित हक नहीं दे सकता।

(2) उपधारा (1) के उपबन्ध, जंगम सम्पत्ति के विक्रय या अवक्रय की संविदाओं पर भी यावत् शक्य लागू होंगे।

धारा 17 निरसित 1877 के अधिनियम की धारा 25 के समकक्ष है। धारा 17 तथा निरसित धारा 25 में मख्य अन्तर यह है कि क्लाज (ग) को हटा दिया गया है। धारा 25 में निम्नलिखित दृष्टान्त थे

(i) ‘क’ ‘ग’ के प्राधिकार के बिना ‘ख’ को एक ऐसी सम्पत्ति बेचने की संविदा करता है जो ‘क’ जानता है कि ‘ग’ की है। ‘क’ ऐसी संविदा का विनिर्दिष्टतः प्रवर्तन नहीं करा सकता, चाहे ‘ग’ संविदा की पुष्टि ही क्यों न कर दे।

83. बिशन दयाल ऐण्ड सन्स बनाम उड़ीसा राज्य, ए० आई० आर० 2001 एस० सी० 544, 549.

84. ए. मैरिया एन्जिनिलीग (मृतक) बनाम ए० जी० बालकीस बी, ए० आई० आर० 2002 एस० सी० 2385-2386.

85. मंजूनाथ आनन्दप्पा उर्फ शिवप्पा हंसी बनाम तमन्नासा, ए० आई० आर० 2003 एस० सी० 1391, 1394, 1397.

86. दुखराज डी० जैन बनाम जी० गोपाल कृष्णा, ए० आई० आर० 2004 एस० सी० 3504, 3508.

(ii) ‘क’ अपनी भूमि वसीयत द्वारा न्यासियों को देता है तथा साथ में घोषित करता है कि वह ‘ख’ की लिखित सम्मति प्राप्त करके सम्पत्ति को बेच सकते हैं। ‘ख’ ऐसे विक्रय के प्रति एक सामान्य भावी लिखित सम्मति प्रदान कर देता है। तत्पश्चात् न्यासी ‘ग’ के साथ भूमि बेचने की संविदा करते हैं। ‘ग’ संविदा का पालन करने से इन्कार कर देता है। न्यासी इस संविदा के विनिर्दिष्टतः पालन का प्रवर्तन तब तक नहीं करा सकता जब तक वह ‘ग’ से इस विशिष्ट विक्रय के लिये ऐसी सम्मति नहीं प्राप्त कर लेता जो संदेह रहित हो।

(iii) ‘क’ एक ऐसी भूमि को ‘ज’ को बेचने की संविदा करता है जो उसके कब्जे में है। बाद में जाँच से पता चलता है कि ‘क’ का दावा है कि वह ‘ख’ का उत्तराधिकारी है तथा ‘ख’ देश छोड़कर कई वर्ष पहले चला गया था तथा सामान्यतः यह विश्वास किया जाता है कि उसकी मृत्यु हो गई परन्तु इस बात का समुचित साक्ष्य नहीं है। ‘क’ ‘ज’ को विनिर्दिष्टतः पालन के लिये विवश नहीं कर सकता।

फेरफार किए बिना अप्रवर्तन (Non-Enforcement except with variation)-विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 18 में फेरफार किये बिना अप्रवर्तन के सम्बन्ध में निम्नलिखित प्रावधान है___जहाँ कि वादी ऐसी किसी संविदा का विनिर्दिष्टतः पालन कराना चाहता है, जिसमें फेरफार होना प्रतिवादी अभिकथित करता है, वहाँ वादी, ऐसे अभिकथित फेरफार के बिना पालन सिवाय निम्नलिखित दशाओं में अभिप्राप्त नहीं कर सकता, अर्थात्-

(क) जहाँ कि ऐसी लिखित संविदा का पालन ईप्सित है, कपट, तथ्य की भूल अथवा दुर्व्यपदेशन के कारण, अपने निबन्धनों और प्रभाव में उससे भिन्न हो जिसका पक्षकारों ने करार किया था अथवा पक्षकारों के बीच करार किये गये वे सारे निबन्धन अन्तर्विष्ट न हों जिनके आधार पर प्रतिवादी ने संविदा की थी,

(ख) जहाँ कि पक्षकारों का उद्देश्य ऐसा कोई विधिक परिणाम उत्पन्न करना था जो वह संविदा, जैसी वह विरचित की गई है, पैदा करने के लिये परिकल्पित न हो,

(ग) जहाँ कि संविदा के निष्पादन के बाद पक्षकारों ने उसके निबन्धनों में फेरफार कर दिया हो।

उदाहरणार्थ, ‘क’ ‘ख’ के विरुद्ध एक ऐसी लिखित संविदा का विनिर्दिष्टत: पाल करवाने के लिये एक वाद करता है जिसके अन्तर्गत ‘ख’ को निवास हेतु एक मकान का क्रय करना था। ‘ख’ यह सिद्ध करता है कि संविदा में एक अहाता भी सम्मिलित था परन्तु संविदा ऐसी विरचित की गई कि यह संदेहात्मक है कि संविदा में उक्त अहाता सम्मिलित है या नहीं। यदि ‘क’ ‘ख’ द्वारा अभिकथित फेरफार के साथ लागू करवाने को नहीं कहता है तो न्यायालय संविदा का विनिर्दिष्टतः पालन करवाना अस्वीकार कर देगा। दूसरे शब्दों में ऐसी संविदा का विनिर्दिष्टतः पालन उसी दशा में हो सकता है जब ‘क’, ‘ख’ द्वारा अभिकथित फेरफार को, स्वीकार कर ले।87 इसी प्रकार, ‘क’, ‘ख’ एवं ‘ग’ एक लिखित संविदा पर हस्ताक्षर करते हैं जिसके अन्तर्गत वे ‘घ’ को 1000 रुपये देने हेतु, बांड भरते हैं। बाद में, ‘घ’ ‘क’ ‘ख’ एवं ‘ग’ तीनों में से प्रत्येक से 1000 रुपये प्राप्त करने का वाद करता है। ‘क’ ‘ख’ एवं ‘ग’ यह सिद्ध कर देते हैं कि ‘प्रत्येक शब्द भूल से लिख दिया गया था। वास्तव में उनका उद्देश्य ‘घ’ हेतु संयुक्त रूप से 1000 रुपये का बांड भरना था। ‘क’ ‘ख’ और ‘ग’ द्वारा अभिकथित फेरफार के साथ संविदा का विनिर्दिष्टतः पालन हो सकता है अन्यथा न्यायालय विनिर्दिष्ट पालन से इन्कार कर देगा।88

धारा 18 को लाग करने के लिये यह आवश्यक है कि संविदा वैध तथा पूर्ण हो। यदि संविदा स्वयं में ही प्रवर्तनीय नहीं है तो वादी को फेरफार सिद्ध करने का अधिकार नहीं होगा।89

87. निरसित विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1877 में दिया गया दृष्टान्त ।

88. तत्रैव, गार्डन बनाम हर्टफोट (1817) मद्रास 106 को भी देखें।

89. देखें : नारायण पटरी बनाम अँखे नारायण, आई० एल० आर० 12 कलकत्ता 12.

फेरफार सिद्ध करने के लिये यह आवश्यक नहीं है कि फेरफार लिखित संविदा द्वारा हो। उदाहरण के लिये. ‘क’ ‘ख’ को एक मकान किराये पर देने हेतु एक लिखित संविदा करता है जिसके अन्तर्गत वह 100 रुपये महीने पर मकान किराये पर देने का करार करता है तथा करार में यह भी निबन्ध है कि वह काम लायक उसकी मरम्मत करायेगा। लेकिन मकान मरम्मत योग्य नहीं है अत: ‘ख’ की सम्मति से वह मकान गिरा देता है तथा उसके स्थान पर एक नया मकान बनाता है। ‘ख’ एक मौलिक करार द्वारा 120 रुपये प्रति माह किराया देना स्वीकार करता है। तत्पश्चात ‘ख’ लिखित संविदा के पालन हेतु वाद करता है। वह मौखिक फेरफार के बिना ‘ख’ विनिर्दिष्ट पालन नहीं करवा सकता है।90

जहाँ किसी भूमि के विक्रय के करार में भूमि का एक भाग असंक्रमणीय (inalienable) हो जाता है क्योंकि उसे राज्य अभिप्राप्त कर लेता है तथा एक भाग उसमें से अधिकतम सीमा से ज्यादा होने के कारण चला जाता है, क्रेताओं का यह अभिवचन कि वह विक्रय विलेख शेष भूमि के लिये बिना कीमत को निष्पादन करने के लिये तैयार है स्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह स्थितियाँ धारा 18 के अन्तर्गत नहीं आती हैं।91

पक्षकारों के तथा उनसे व्युत्पन्न पश्चात्वर्ती हक के अधीन दावा करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध अनुतोष elief against parties and persons claiming under them by subsequent title)-धारा नुसार, इस अध्याय अर्थात् अधिनियम भाग 2 के अध्याय 2 द्वारा उपबन्धित के सिवाय संविदा के विनिर्दिष्ट पालन का प्रवर्तन निम्नलिखित के विरुद्ध कराया जा सकता है

(क) उसमें का कोई पक्षकार,

(ख) ऐसे मूल्यार्थ अन्तरिती के सिवाय, जिसने अपना धन सद्भावपूर्वक तथा मूल संविदा की सूचना के बिना दिया हो, ऐसा कोई व्यक्ति, जो व्युत्पन्न ऐसे हक के अधीन दावा कर रहा है जो संविदा के पश्चात् उत्पन्न हुआ हो,

(ग) ऐसा कोई व्यक्ति जो ऐसे हक के अधीन दावा कर रहा है जो हक, यद्यपि संविदा पूर्व का और वादी के ज्ञान में था, तथा प्रतिवादी द्वारा विस्थापित किया जा सकता था,

(घ) जब किसी कम्पनी ने कोई संविदा की है और उसके पश्चात् किसी दूसरी कम्पनी में समामेलित हो गई हो तब ऐसे समामेलन से उद्भूत नई कम्पनी,

(ङ) जबकि किसी कम्पनी ने उसके निगमन के पूर्व कोई संविदा कम्पनी के प्रयोजन के लिये की थी और संविदा ऐसी है जो निगमन के निबन्धनों द्वारा समर्थित हो, तब वह कम्पनी :

परन्तु यह तभी होगा जब कम्पनी ने संविदा को स्वीकार कर लिया हो और संविदा के दूसरे पक्षकार को ऐसा स्वीकार करना संसूचित कर दिया हो।

धारा 19 निरसित विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1877 की धारा 27 के समकक्ष है। निरसित धारा 27 के दृष्टान्तों का उल्लेख यहाँ वांछनीय होगा। धारा 27 में निम्नलिखित दृष्टान्त थे-

(क) ‘क’ ‘ख’ से संविदा करता है कि एक निश्चित भूमि को वह एक विशिष्ट दिन हस्तांतरित कर देगा। उक्त दिन भूमि हस्तांतरित किये बिना तथा बिना वसीयत किये ‘क’ की मृत्यु हो जाती है। ‘ख’ ‘क’ के उत्तराधिकार या हित में अन्य प्रतिनिधि को संविदा का विनिर्दिष्ट पालन करने के लिये विवश कर सकता है।

(ख) ‘क’ ‘ख’ के हाथ एक निश्चित भूमि 5000 रुपये में बेचने की संविदा करता है। परन्तु बाद में ‘क’ वही भूमि ‘ग’ को 6000 रुपये में हस्तांतरित कर देता है। ‘ग’ को मूल संविदा की जानकारी है। ‘ख’ ‘ग’ के विरुद्ध विनिर्दिष्ट पालन का प्रवर्तन करा सकता है।92

90. निरसित 1877 के अधिनियम का दृष्टान्त।

91. के० नरेन्द्र बनाम रिवेरा अपार्टमेन्टस लि०, ए० आई० आर० 1999 एस० सी० 2309, 2318.

92. यह दृष्टान्त पाटर बनाम सान्डर्स (1846) 77 आर० आर० 1 के तथ्यों पर आधारित है।

(ग) ‘क’ एक भूमि ‘ख’ के हाथ 5000 रुपये में बेचने की संविदा करता है। ‘ख’ भूमि का कब्जा प्राप्त कर लेता है। बाद में ‘क’ उसी भूमि को ‘ग’ को 6000 रुपये में बेच देता है। ‘ग’ भूमि में ‘ख’ के हित के बारे में कोई पूंछताछ नहीं करता है। ‘ख’ द्वारा भूमि पर कब्जा ‘ग’ के लिये उसके हित को प्रभावित करने के लिये समुचित सूचना है तथा वह ‘ग’ के विरुद्ध विनिर्दिष्ट पालन का प्रवर्तन करा सकता है।93

(घ) ‘क’ 1000 रुपये के प्रतिफल पर कुछ निश्चित भूमि ‘ख’ को उत्तरदान करने की संविदा करता है। इसके तुरन्त बाद ‘क’ की, बिना वसीयत किए मृत्यु हो जाती है तथा ‘ग’ उसकी सम्पत्ति का प्रशासन करता है। ‘ख’ ‘ग’ के विरुद्ध संविदा का विनिर्दिष्ट पालन का प्रवर्तन करा सकता है।

(ङ) ‘क’ कुछ निश्चित भूमि ‘ख’ को बेचने की संविदा करता है। संविदा पूर्ण करने के पूर्व ‘क’ पागल हो जाता है तथा ‘ग’ को उसका संरक्षक नियुक्त किया जाता है। ‘ख’ ‘ग’ के विरुद्ध संविदा का विनिर्दिष्ट पालन का प्रवर्तन करा सकता है।

(च) ‘क’ किसी सम्पत्ति का जीवन पर्यन्त किरायेदार है तथा शेष के लिये ‘ख’ किरायेदार उस व्यवस्थापन के अन्तर्गत होता है जिसके अधीन ‘क’ जीवन भर के लिये किरायेदार होगा। ‘क’ ‘ग’ के हाथ सम्पत्ति को बेचने की संविदा करता है। ‘ग’ को उक्त व्यवस्थापन की जानकारी है। विक्रय पूर्ण होने के पहले ही ‘क’ की मृत्यु हो जाती है। ‘ग’ ‘ख’ के विरुद्ध संविदा के विनिर्दिष्ट पालन का प्रवर्तन करा सकता है।

(छ:) ‘क’ तथा ‘ख’ एक भूमि के संयुक्त किरायेदार या काश्तकार हैं तथा इनमें से कोई भी अपना अविभाजित अर्धांश अपने जीवनकाल में अन्यसंक्रमण (alienate) कर सकता है परन्तु उक्त अधिकार के अधीन, यह अधिकार उत्तरजीवी को मिलेगा। ‘क’ अपने अर्धांश भाग ‘ग’ को बेचने की संविदा करता है तथा उसकी मृत्यु हो जाती है। ‘ग’ ‘ख’ के विरुद्ध संविदा का विनिर्दिष्ट पालन प्रवर्तन करा सकता है।

जहाँ दावाकृत भूमि पर वादी का वास्तविक कब्जा कई वर्षों से है धारा 19(ख) के अन्तर्गत यह माना जायगा कि सम्पत्ति के अन्तरण अधिनियम, 1882 की धारा 3 के स्पष्टीकरण 2 के अनुसार प्रतिवादी को इसकी आन्वयिक (Constructive) सूचना थी। इसके अतिरिक्त विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 19(ख) में दिये गये अपवाद को सिद्ध करने का भार पश्चात्वर्ती क्रेता के ऊपर है।95

जहाँ स्थावर सम्पत्ति के अन्तरण के करार के विनिर्दिष्ट पालन के वाद में अन्तरिती यह दावा करता है कि उसे पूर्व करार की कोई सूचना नहीं थी, यह सिद्ध करने का भार उसी पर होगा लेकिन केवल या अस्वीकार करना ही काफी नहीं है। इस भार का उन्मोचन साक्ष्य द्वारा किया जा सकता है।96 यदि साक्ष्य से यह स्पष्ट हो जाता है कि तत्पश्चातवर्ती अन्तरिती को विक्रय विलेख के निष्पादन के पहले मूल करार की सचना थी तो वह सद्भाव वाला अन्तरिती नहीं माना जायगा तथा वह अपने पक्ष में विक्रय विलेख का विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री प्राप्त नहीं कर सकता है।97 जहाँ क्रेता विक्रेता के कथन पर भरोसा करते हैं तथा किरायेदार के कब्जे के बारे में स्वयं कोई जाँच-पड़ताल नहीं करते हैं यह माना जायगा कि उन्हें पूर्व करार की सूचना थी।98

93. इसके लिये डेनियल्स बनाम डेविड्सन् (1809) 10 आर० आर० 171 का वाद भी देखें।

94. देखें : रि डाइक इस्टेट (1869) एल० आर० 7.

95. मरलीधर बापूजी बाल्वे बनाम यालप्पा लालू चौगुले, ए० आई० आर० 1994 बम्बई 358, 368-370.

96 जोगिन्दर सिंह बनाम निधान सिंह, ए० आई० आर० 1996 पंजाब एवं हरयाणा 120, 128-129..

97. तत्रैव, पृष्ठ 128-129, 132.

98 राम निवास(मतक) विधिक प्रतिनिधियों द्वारा बनाम श्रीमती बानो तथा अन्य, ए० आई० आर० 2000 एस० सी०2921.09. आर० के० मोहम्मद उबेदुल्लाह बनाम हाजी वहाब (मृतक), ए० आई० आर० 2000 एस० सी० 1658 को भी देखें।

इन्डियन बैंक बनाम के० उषा (Indian Bank v. K. Usha)99 के वाद में प्रत्यर्थी अन्तरक बैंक के मतक कर्मचारियों के उत्तराधिकारी तथा विधिक प्रतिनिधि थे। अन्तरक बैंक (बैंक ऑफ थन्जाव्यर लि0) का समामेलन (amalgamation) अन्तरिती बैंक के साथ बैंकिंग रेगुलेशन अधिनियम, 1949 की धारा 45 के अन्तर्गत हो गया था। प्रत्यर्थी अनुकम्पा (compassion) के आधार पर नियक्ति की माँग कर रहे थे। उसकी यह माँग अन्तरक बैंक के कर्मचारी संघ का अन्तरक बैंक प्रबन्धकों के मध्य हुये करार पर आधारित थी। अपीलार्थी बैंक समामेलित बैंक (amalgamated Bank) के रूप में उभरा था। अत: उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 19(घ) के अन्तर्गत समामेलित बैंक अन्तरण बैंक तथा उसके कर्मचारी संघ के मध्य हुये करार से उत्पन्न दायित्व को पूरा करने को बाध्य होगा।100

जहाँ प्रतिवादी ने वादी के साथ सम्पत्ति बेचने का एक करार किया तथा बाद में प्रतिवादी ने उसी सम्पत्ति को बेचने का दूसरा करार किया तथा पश्चात्वर्ती क्रेता बिना सूचना के प्रतिफल देवर सद्भाव में खरीदने वाला था, वादी पश्चात्वी क्रेता के विरुद्ध विनिर्दिष्ट पालन का अनुतोष प्राप्त करने का अधिकारी नहीं है।101

कस्तूरी बनाम ईयामपेरूमल तथा अन्य (Kasturi v. Iyyamperumal and other)102 के वाद में उच्चतम न्यायालय के तीन न्यायमूर्तियों की पीठ ने धारित किया है कि विक्रय की संविदा के विनिर्दिष्ट पालन के वाद में मामला क्रेता एवं विक्रेता के मध्य होता है तथा न्यायालय यह निर्णीत नहीं कर सकता है। तीसरे या अन्य पक्षकार ने स्वामित्व एवं संविदा की सम्पत्ति पर कब्जा किया है क्योंकि विक्रय की संविदा के विनिर्दिष्ट पालन के लिये यह प्रश्न तत्संगत नहीं होगा। विक्रय की संविदा के विनिर्दिष्ट पालन के वाद में कोई व्यक्ति जो जुड़ना चाहता है उसे दो परीक्षण (tests) सन्तुष्ट करने होंगे-(1) ऐसे पक्षकार जिसके सम्बन्ध में विवाद है, उसके विरुद्ध अनुतोष प्राप्त करने का कोई अधिकार होना चाहिये; (2) ऐसे पक्षकार की अनुपस्थिति में कोई प्रभावकारी डिक्री पारित नहीं की जा सकती है। अतः अन्य पक्षकार या अजनबियों के विरुद्ध जिन्होंने संविदा की सम्पत्ति संविदा होने के पश्चात् विक्रेता से नहीं खरीदी है वह आवश्यक पक्षकार नहीं है क्योंकि क्रेता एवं विक्रेता के मध्य करार से उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।103

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