LLB 1st Year Semester Law of Contract 1 Rescission of Contracts Notes Study Material

LLB 1st Year Semester Law of Contract 1 Rescission of Contracts Notes Study Material : Hello Friends LLB Law of Contract 1 1st Year / 1st Semester Part 2 (Specific Relief Act, 1963) Chapter 5 Rescission of Contracts Most Important Notes and Study Material Question Paper With Answer Important for LLB Students All University.

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LLB 1st Year Semester Law of Contract 1 Rescission of Contracts Notes Study Material
LLB 1st Year Semester Law of Contract 1 Rescission of Contracts Notes Study Material

अध्याय 5 (Chapter 5, LLB Notes)

संविदाओं का विखण्डन (RESCISSION OF CONTRACTS)

संविदाओं के विखण्डन से सम्बन्धित उपबन्ध विनिर्दिष्ट अनतोष अधिनियम, 1963 के भाग दो के अध्याय 4 की धाराओं 27 से लेकर 30 तक में हैं। इन धाराओं में से पहली धारा 27 में वह दशायें दी गयी हैं जब विखण्डन न्यायनिर्णीत या नामंजूर किया जा सकता है।

विखण्डन कब न्यायनिर्णीत या नामंजूर किया जा सकेगा (When rescission may be adjudged or refused) (LLB Study Material Notes)

धारा 27 के अनुसार

(1) किसी संविदा में हितबद्ध कोई भी व्यक्ति उसे विखण्डित कराने का वाद ला सकेगा और ऐसा विखण्डन निम्नलिखित दशाओं में से किसी में भी न्याय निर्णीत किया जायेगा, अर्थात्

(क) जहाँ कि संविदा वादी द्वारा शून्यकरणीय या पर्यवसेय हो;

(ख) जहाँ कि संविदा ऐसे हेतुकों से विधिविरुद्ध हो जो उसके देखने ही से प्रकट नहीं होते हैं तथा प्रतिवादी वादी से अधिक दोषी है।

(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुये भी, न्यायालय संविदा का विखण्डन निम्नलिखित दशाओं में नामंजूर कर सकता है

(क) जहाँ कि वादी ने अभिव्यक्तत: या विवक्षिततः संविदा अनुसमर्थित कर दिया है, अथवा

(ख) जहाँ कि परिस्थितियों के ऐसे परिवर्तन के कारण, जो संविदा के किये जाने के बाद (स्वयं प्रतिवादी के किसी कार्य के कारण नहीं) हो गई हो कि पक्षकारों को उसी स्थिति में सारतः प्रत्यावर्तित न किया जा सके जिसमें वे सब थे जब संविदा की गई थी; अथवा

(ग) जहाँ कि संविदा के अस्तित्व के दौरान पर-व्यक्तियों ने सद्भावनापूर्वक सूचना के बिना और मूल्यार्थ अधिकार अर्जित कर लिये हों; अथवा

(घ) जहाँ कि संविदा का केवल एक भाग का विखण्डन ईप्सित हो और ऐसा भाग संविदा के शेष भाग से पृथक न किया जा सकता हो।

स्पष्टीकरण-इस धारा में संविदा से उन राज्य क्षेत्रों के सम्बन्ध में, जिन पर सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882 (1882 का 4) का विस्तार नहीं है, लिखित संविदा अभिप्रेत है।

धारा 27 निरसित विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1877 की धारा 35 (क) तथा (ख) के समकक्ष है। धारा 35 (क) तथा (ख) में निम्नलिखित दृष्टान्त थे

(i) ‘क’ एक खेत ‘ख’ के हाथ बेचता है। खेत में एक रास्ता है जिस पर लोगों को जाने का अधिकार है तथा ‘क’ को इसकी व्यक्तिगत जानकारी है परन्तु वह यह बात ‘ख’ से छिपाता है। ‘ख’ संविदा का विखण्डन कराने का अधिकारी है।

(ii) ‘क’ जोकि एक हिन्दू विधवा ‘ख’ का अटार्नी है, ‘ख’ को प्रेरित करता है कि ‘ख’ अपनीसम्पत्ति अपने ऋणदाताओं को कपट-वंचित (defraud) करने हेतु ‘क’ को अन्तरित कर दे। यहाँ दोनों पक्षकारों की व्यतिक्रम या चूक समान नहीं है अत: ‘ख’ अन्तरण के लिखत को विखण्डित कराने की अधिकारिणी है।

जो व्यक्ति संविदा के विखण्डन के लिये वाद करता है विनिर्दिष्ट पालन का वैकल्पिक दावा नहीं कर सकता परन्तु जो व्यक्ति विनिर्दिष्ट पालन का वाद करता है वह विखण्डन के वैकल्पिक अनुतोष का दावा कर सकता है।

यदि संविदा वास्तविक कपट द्वारा प्रेरित है तो वह शून्यकरणीय होगा तथा न्यायालय कपट के आधार पर उसे अपास्त कर देगा। परन्तु जहाँ प्रतिवादी द्वारा मिथ्या व्यपदेशन तो हुआ है परन्तु वह निर्दोष था अथवा उसे वास्तविक तथ्य का ज्ञान नहीं था या उसकी जानकारी में नहीं था तो स्थिति भिन्न होगी। ऐसी संविदा का विखण्डन क्रेता नहीं करा सकेगा।

स्थावर सम्पत्ति के पट्टे पर दिये जाने के लिये ऐसी संविदाओं का, जिनके विनिर्दिष्ट पालन की fcantant el contatonface uffiefiet fagus (Rescission in certain circumstances of contracts for the sale or lease of immovable property ne specific performance of which has been decreed)-धारा 28 के अनुसार

(1) जहाँ कि किसी वाद में स्थावर सम्पत्ति के विक्रय पर पट्टे पर दिये जाने की संविदा विनिदिष्ट पालन की डिक्री की जा चुकी है और क्रेता या पट्टेदार डिक्री द्वारा अनुज्ञात कालावधि के भीतर या ऐसी अतिरिक्त कालावधि के भीतर, जो न्यायालय अनुज्ञात करे, विक्रय धन या अन्य राशि जिसे देने के लिये न्यायालय ने आदेश दिया है, वहाँ विक्रेता या पट्टाकर्ता उसी वाद में जिसमें डिक्री की गई है, संविदा के विखण्डित किये जाने का आवेदन कर सकता है तथा ऐसे आवेदन पर न्यायालय आदेश द्वारा संविदा को, या तो वहाँ तक जहाँ पर व्यतिक्रम करने वाले पक्षकार का सम्बन्ध है, या सम्पूर्णतः, जैसा भी मामले में न्याय द्वारा अपेक्षित हो, विखण्डित कर सकता है।

जहाँ कि उपधारा (1) के अधीन संविदा का विखण्डन कर दिया गया है, वहाँ न्यायालय

(क) यदि क्रेता या पट्टेदार ने संविदा के अधीन सम्पत्ति का कब्जा अभिप्राप्त कर लिया है, न्यायालय उसे निदेश दे सकेगा कि वह विक्रेता या पट्टेकर्ता को कब्जा प्रत्यावर्तित कर दे; तथा

(ख) ऐसे सभी भाटकों एवं लाभों का संदाय जो सम्पत्ति के सम्बन्ध में उस तारीख से जिसको क्रेता या पट्टेदार द्वारा ऐसा कब्जा अभिप्राप्त किया गया था, विक्रेता या पट्टाकर्ता को कब्जे के प्रत्यावर्तन तक प्रोद्भूत हुये हों विक्रेता या पट्टाकर्ता को किये जाने के लिये और यदि मामले में न्याय द्वारा ऐसा अपेक्षित हो, तो संविदा के सम्बन्ध में अग्रिम धन या निक्षेप के तौर पर क्रेता या पट्टेदार द्वारा दी गई किसी राशि के प्रतिदाय के लिये निदेश दे सकता है।

(3) यदि क्रेता या पट्टेदार ऐसा क्रय धन या अन्य राशि जिसको उसे डिक्री द्वारा उपधारा (1) में निर्दिष्ट कालावधि के भीतर देने का आदेश दिया गया हैं, दे दे, तो न्यायालय द्वारा उसी वाद में किये गये आवेदन पर क्रेता या पट्टेदार को ऐसा अतिरिक्त अनुतोष दिला सकेगा जिसका वह हकदार हो और जिसके अन्तर्गत समुचित मामलों में निम्नलिखित में से सब या कोई अनुतोष भी आता है, अर्थात्

(क) विक्रेता या पट्टाकर्ता द्वारा उचित हस्तान्तर पत्र या पट्टे का निष्पादन;

(ख) ऐसे हस्तान्तर पत्र या पट्टे के निष्पादन पर सम्पत्ति के कब्जे का, या विभाजन और पृथक कब्जे का परिदान।

(4) ऐसे अनुतोष के बारे में, जिसका इस धारा के अधीन दावा किया जा सके, कोई पृथक वाद जो, यथास्थिति विक्रेता, क्रेता या पट्टेदार की प्रेरणा पर लाया गया हो, ग्राह्य नहीं होगा।

(5) इस धारा के अधीन किसी भी कार्यवाही के खर्च न्यायालय के विवेकाधिकार में होंगे। धारा 28 निरसित 1877 के अधिनियम की धारा 35 (ग) के समकक्ष है।

यह तय (settled) विधि है कि अपील वाद की वर्तमानता (continuation) है। अत: जहाँ विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री की प्रार्थना को परीक्षण न्यायालय ने अस्वीकार कर दिया है परन्तु अपीलीय न्यायालय ने

1. प्रेमराज बनाम डी० एल० एफ० कं० लि० (1968) ए० आई० आर० 1355; काले बनाम पूले (1863) ई० आर० 23.

2. देखें : वार्डल्ड बनाम गिबसन, (1848) 1 एच० एल० सी० 605, 632-633.

विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री की है, यह माना जायगा कि यह उसी वाद में हुआ है जहाँ डिक्री में डिक्री की शर्तों के पालन का समय निर्देशित है, धन जमा करने में असफल रहने पर, धारा 28 (1) स्वयं न्यायालय को शक्ति प्रदान करती है कि वह उन निबन्धनों पर जिन्हें वह उचित समझे समय का विस्तार कर सकता है तथा क्रय धन या अन्य राशि जिसके भुगतान का न्यायालय ने आदेश दिया, भुगतान कर सके। शेष प्रतिफल का भुगतान करने हेतु समय के विस्तार का आवेदन पहले या परीक्षण न्यायालय में किया जा सकता है अथवा अपील न्यायालय में उसी वाद में किया जा सकता है क्योंकि परीक्षण न्यायालय की डिक्री का विलय अपीलीय न्यायालय की डिक्री में हो जाता है। प्रक्रिया न्याय की दासी है तथा जब कि अधिकारिता के मामले में हस्तक्षेप नहीं करती है इसे सारवान न्याय प्रदान करने के लिये ढाला जाना चाहिये। अत: सारवान न्याय प्रदान करने में तकनीकी बातें अड़चन या बाधा नहीं होंगी।

उपर्युक्त विधि का स्पष्टीकरण उच्चतम न्यायालय ने रमनकुट्टी गुप्तन बनाम अवारा (Ramankutty Guptan v. Avara)3 के वाद में किया।

इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में यह विचार भी व्यक्त किये कि जहाँ डिक्री निष्पादन के लिये दूसरे न्यायालय या अन्तरिती निष्पादन करने वाले न्यायालय को अन्तरित कर दी जाती है तो निश्चित रूप से यह अन्तरिती न्यायालय मूल न्यायालय नहीं है तथा धारा 28 के अर्थों में यह ‘वही न्यायालय’ (“same court”) नहीं है। परन्तु जब आवेदन उस न्यायालय में दिया जाता है जहाँ मल वाद दायर किया गया था तथा निष्पादन किया जाता है तो निश्चित रूप से यह धारा 28 के अर्थों में वही न्यायालय है तथा आवेदन धारा 28 के अन्तर्गत पोषणीय होगा। परन्तु ऐसे मूल न्यायालय न कि निष्पादन न्यायालय में होना चाहिये। धारा 28 के अनुसार यह उसी न्यायालय में होना चाहिये। अत: आवेदन बाद में ही दिया जाना चाहिये न कि निष्पादन कार्यवाहियों में।

यह भी तय विधि है कि विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री करने के पश्चात् न्यायालय की अधिकारिता समाप्त नहीं होती है। डिक्री करने के बाद भी न्यायालय का नियन्त्रण बना रहता है अतः धारा 28 (1) के अन्तर्गत न्यायालय समय का विस्तार करने अथवा संविदा विखण्डित करने की शक्ति का प्रयोग कर सकता है।

जहाँ विनिर्दिष्ट पालन के वाद में शेष प्रतिफल के भुगतान के मामले में समय के विस्तार के प्रश्न पर विक्रेता ने परीक्षण न्यायालय के समक्ष यह कभी अभिवचन नहीं किया कि समय संविदा का सार है वरन् दूसरी ओर क्रेता के पक्ष में विक्रय विलेख निष्पादित करने की इच्छा व्यक्त की कि यदि वह शेष विक्रय प्रतिफल न्यायालय द्वारा निश्चित की गई तिथि पर जमा कर दे, यह नहीं कहा जा सकता कि समय संविदा का सार था। यह निर्णय पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने केदार नाथ डींगरा बनाम कँवल भाटिया (Kedar Nath Dhigra v. Kanwal Bhatia)5 के वाद में दिया। इस वाद में परीक्षण न्यायालय ने विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री करने के साथ यह निदेश दिया कि वादी-प्रत्यर्थी शेष धन 10 सितम्बर, 1996 को या इसके पूर्व जमा कर दे वरना विनिर्दिष्ट पालन का वाद खारिज कर दिया जायगा। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि सार में यह शर्त पक्षकार को संत्रस्त करने हेतु थी। इसका यह आशय नहीं था कि न्यायालय की अन्य पारिणामिक आदेश देने की शक्ति समाप्त हो गई। उक्त शर्त के बावजूद न्यायालय अन्य पारिणामिक आदेश दे सकता है तथा इसमें समय का विस्तार करने का आदेश शामिल है जैसा कि विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 28 में व्यक्त रूप से उपबन्धित है। क्रेता द्वारा शेष धन (5 लाख रुपये) न्यायालय द्वारा निश्चित समय तक न अदा करने पर न्यायालय ने निर्णय दिया कि प्रतिकर या नुकसान के रूप में वह 10,000 रुपये विक्रेता को दे।6

3. ए० आई० आर० 1994 एस० सी० 1699, 1701; के कल्पना सरस्वती बनाम पी० एस० सोम सुन्दरम चेट्टियर, ए० आई० आर० 1980 एस० सी०; (1980) 2 ए० आई० आर० 293 भी देखें।

4. तत्रैव, पृष्ठ 1702; उच्चतम न्यायालय ने बम्बई उच्च न्यायालय के 1967 (2) आन्ध्र डब्ल्य० आर०60 में दिये गये निर्णय को उलट दिया।

5. ए० आई० आर० 1998 पंजाब एवं हरियाणा 86, 88.

6. तत्रैव पृ० 88-89.

यदि क्रेता या पट्टेदार क्रय धन या अन्य राशि जो न्यायालय आदेश दे, का भुगतान धारा 28 (1) में निर्दिष्ट समय के भीतर कर देता है तो न्यायालय उसके आवेदन पर वह अन्य अनुतोष प्रदान कर सकता है जिसका वह हकदार है तथा ऐसे अनुतोष में धारा 28 (3) में उल्लिखित अनुतोष भी शामिल है।

विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री करने के पश्चात् न्यायालय की अधिकारिता समाप्त नहीं हो जाती है। डिक्री करने के बाद भी डिक्री पर न्यायालय का नियन्त्रण बना रहता है। अतः धारा 28 (3) के अन्तर्गत न्यायालय विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री का निष्पादन कर सकता है तथा इसके लिये पृथक याचिका दायर करने की आवश्यकता नहीं है।

विनिर्दिष्ट पालन की डिक्री को प्राथमिक डिक्री कहा गया है। धारा 28 के अन्तर्गत संविदा को विखण्डित करने की शक्ति विवेकपूर्ण होती है तथा साधारणतया न्यायालय द्वारा पारित डिक्री को रद्द नहीं किया जा सकता है परन्तु फिर भी धारा 28 में यह उपबन्ध है कि उसी वाद में न्यायालय दोनों पक्षकारों को पर्ण अनतोष प्रदान करता है। यद्यपि परीक्षण न्यायालय डिक्री में निदेश करता है कि भुगतान एक निश्चित समय तक किया जाय न्यायालय उक्त समय को बता सकता है। यह नियम उच्चतम न्यायालय ने चन्दा (मतक) कानूनी प्रतिनिधियों द्वारा बनाम रत्तनी (Chanda (Dead) through L.Rs. V. Rattni), के वाद में प्रतिधारित किया था।

विनिर्दिष्ट पालन के वाद में विखण्डन की आनुकल्पिक प्रार्थना (Alternative prayer for rescission in suit for specific performance)-धारा 29 के अनुसार, किसी लिखित संविदा के विनिर्दिष्ट पालन का वाद दायर करने वाला वादी अनुकल्पतः यह प्रार्थना कर सकता है कि यदि विनिर्दिष्टतः प्रवर्तित नहीं की जा सकती, तो उसका विखण्डन कर दिया जाय और रद्द किये जाने के लिये न्यायालय को परिदत्त कर दिया जाय और न्यायालय यदि संविदा को विनिर्दिष्टतः प्रवर्तित करने से इंकार कर दे तो तद्नुसार उसके विखंडित और न्यायालय को परिदत्त किये जाने को निर्दिष्ट कर सकेगा।

धारा 29 निरसित 1877 के अधिनियम की धारा 37 के समकक्ष है।

जहाँ संविदा का कोई पक्षकार जो विनिर्दिष्ट पालन के लिये वाद करता है अनुकल्पतः यह प्रार्थना कर सकता है कि यदि संविदा विनिर्दिष्टतः प्रवर्तित नहीं करायी जा सकती; तो उसे विखण्डित कर दिया जाय परन्तु जो व्यक्ति संविदा के विखण्डन के लिये वाद करता है तथा नुकसान प्राप्त करने की प्रार्थना करता है वह यह अनुकल्पतः प्रार्थना नहीं कर सकता कि यदि संविदा विखण्डित न की जा सके तो उसका विनिर्दिष्टतः पालन करवा दिया जाय।

जहाँ संविदा का कोई पक्षकार संविदा के पूर्वानुमानिक भंग का दोषी है तो दूसरे पक्षकार को यह अधिकार प्राप्त हो जाता है कि उक्त भंग को संविदा का अन्त समझे परन्तु उस दशा में वह विनिर्दिष्टतः पालन के लिये नहीं कह सकता है।10

विखण्डित कराने वाले पक्षकारों से न्यायालय साम्य बरतने को कहेगा (Court may required parties rescinding to do equity)-विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 30 न्यायालय को यह शक्ति प्रदान करती है कि जब किसी संविदा का विखण्डन न्यायनिर्णीत हो जाने पर, न्यायालय उस पक्षकार से जिसे ऐसा अनुतोष प्रदान किया गया है, कह सकेगा कि वह दूसरे पक्षकार को ऐसा कोई फायदा, जो उसने उस पक्षकार से प्राप्त किया है यावत्शक्य (So far as may be) प्रत्यावर्तित करे और ऐसा प्रतिकर दे, जो न्याय द्वारा अपेक्षित हो।

धारा 30 निरसित 1877 के अधिनियम की धारा 38 के समकक्ष है। यह धारा अंग्रेजी साम्या के नियमों के अनुरूप है। न्याय तथा साम्या की दृष्टि से जो पक्षकार संविदा का विखण्डन कराता है उसका दायित्व हो जाता है कि जो फायदा उसने दूसरे पक्षकार से उठाया उसे वापस करे।

7. जोसेफ बनाम जोसेफ, ए० आई० आर० 1997 केरल 301, 302.

8. ए० आई० आर० एस० सी० 1514, 1517.

9. प्रेम राज बनाम डी० एल० एफ० एच० कम्पनी लि०, (1968) ए० एस० सी० 1355, 1357.

10. देखें : जवाहर लाल वाधवा बनाम हरीपद चक्रवर्ती, ए० आई० आर० 1989 एस० सी० 606, 610.

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