LLB 1st Year Semester Law of Contract 1 Declaratory Decree Notes Study Material

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अध्याय 7 (Chapter 7) (LLB Notes Study Material)

घोषणात्मक डिक्रियां (DECLARATORY DECREES)

घोषणात्मक डिक्रियों के सम्बन्ध में विधि विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धाराओं 34 तथा 35 में वर्णित है। यह धारायें निम्नलिखित हैं

प्रास्थिति की या अधिकार की घोषणा में न्यायालय का विवेकाधिकार (Discretion of Court as to declaration of status or right)-धारा 34 के अनुसार कोई व्यक्ति, जो किसी विधिक प्रकृति का या किसी सम्पत्ति के बारे में किसी अधिकार का हकदार हो, ऐसे किसी व्यक्ति के विरुद्ध, जो ऐसी प्रकृति का या ऐसे हक का प्रत्याख्यान करता हो या प्रत्याख्यान करने में हितबद्ध हो, वाद संस्थित कर सकता है और न्यायालय स्वविवेक में उस वाद में यह घोषणा कर सकता है कि वह ऐसा हकदार है और वादी के लिये यह आवश्यक नहीं है कि उस वाद में किसी अतिरिक्त अनुतोष की माँग करे :

परन्तु कोई भी न्यायालय ऐसी घोषणा नहीं करेगा जहाँ वादी हक की घोषणा मात्र के अतिरिक्त कोई अनुतोष माँगने के योग्य होते हुए भी वैसा करने में लोप करे।

स्पष्टीकरण-सम्पत्ति का न्यासी ऐसे हक का प्रत्याख्यान करने में “हितबद्ध व्यक्ति है” जो ऐसे व्यक्ति के हक के प्रतिकूल हो जो अस्तित्व में नहीं है और जिसके लिये वह न्यासी होता यदि वह व्यक्ति अस्तित्व में आता।

धारा 34 निरसित विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1877 की धारा 42 के समान है। वास्तव में धारा 34 में निरसित धारा 42 को बिना किसी परिवर्तन के रख लिया गया है। निरसित धारा 42 में निम्नलिखित दृष्टान्त

(क) ‘क’ का कतिपय भूमि पर विधिपूर्ण कब्जा है। पड़ोस के ग्राम के निवासी उस भूमि से होकर जाने के रास्ते के अधिकार का दावा करते हैं। ‘क’ यह घोषणा के लिये वाद कर सकता है कि निवासी भूमिपर रास्ते के अधिकार के अधिकारी नहीं हैं।

(ख) ‘क’ वसीयत या उत्तरदान द्वारा अपनी सम्पत्ति ‘ख’ ‘ग’ तथा ‘घ’ को इस प्रकार देता है कि यदि वह उसकी मृत्यु के समय जीवित हो तो सम्पत्ति बराबर-बराबर उनमें तथा उसके बाद उनके उत्तरजीवी बच्चों में बाँट दी जाय। ऐसे कोई बच्चे जीवित नहीं हैं। ‘क’ के निष्पादकों के विरुद्ध वाद में न्यायालय यह घोषणा कर सकता है कि ‘ख’, ‘ग’ तथा ‘घ’ ने सम्पत्ति पूर्णतः ली अथवा केवल उनके जीवन के लिये तथा वह बच्चों के हितों की भी उसके निहित होने के पूर्व, यह भी घोषित कर सकता है।

(ग) ‘क’ प्रसंविदा करता है, कि यदि वह कभी एक लाख रुपये से अधिक का अधिकारी हुआ तो वह उससे कतिपय न्यास स्थापित करेगा। इसके पूर्व कि उसके पास उक्त सम्पत्ति होती है या न्यास के अन्तर्गत अधिकारी व्यक्ति अभिनिश्चित किये जाते हैं, वह एक वाद यह घोषणा प्राप्त करने के लिये करता है कि प्रसंविदा अनिश्चितता के कारण शून्य है। न्यायालय ऐसी घोषणा कर सकता है।

(घ) ‘क’ ‘ख’ को ऐसी सम्पत्ति का अन्यसंक्रमण (alienate) करता है, जिसमें उसका हित केवल जीवन काल तक है। ऐसा अन्यसंक्रमण ‘ग’ के विरुद्ध अवैध है जो सम्पत्ति के शेष भोगी (reversioner) का अधिकारी है। ‘ग’ द्वारा ‘क’ तथा ‘ख’ के विरुद्ध वाद में घोषित कर सकता है कि ‘ग’ शेषभोगी के रूप में सम्पत्ति का अधिकारी है।

(ङ) पुत्र-विहीन हिंदू विधवा ऐसी सम्पत्ति के एक भाग जिस पर उसका कब्जा है अन्यसंक्रमण करती है। वह व्यक्ति जो ऐसी सम्पत्ति के कब्जे का संभावी या प्रकल्पित अधिकारी है यदि वह विधवा क बाद उत्तरजीवी है, अन्यसंक्रामिती (alienee) के विरुद्ध वाद करके यह घोषणा प्राप्त कर सकता है कि अन्यसंक्रमण बिना विधिक आवश्यकता के कारण किया गया था अतः विधवा के जीवन काल के बाद शून्य है।

(च) एक हिंदू विधवा जिसके कब्जे में सम्पत्ति है, अपने मृतक पति के पुत्र को गोद लेती है। वह व्यक्ति जो उक्त सम्पत्ति के कब्जे का विधवा के मरने पर संभावी अधिकारी है गोद लिये हुये पुत्र के विरुद्ध वाद करके यह घोषणा प्राप्त करता है कि गोद लेना (adoption) अवैध था।

(छ) ‘क’ के कब्जे में कतिपय सम्पत्ति है। ‘ख’ यह अभिकथित करता है कि वह उक्त सम्पत्ति का स्वामी है तथा ‘क’ से अपेक्षा करता है कि वह उक्त सम्पत्ति को उसे परिदत्त कर दे। ‘क’ सम्पत्ति को धारित करने के अधिकार की घोषणा प्राप्त कर सकता है।

(ज) ‘क’ अपनी सम्पत्ति का उत्तरदान ‘ख’ को उसके जीवन के लिये करता है तथा शेष ‘ख’ की पत्नी के बच्चों को, यदि ‘ख’ के हों मिल सकेगा: परन्त ‘ख’ की मत्य बिना पत्नी तथा बच्चों के हो जाता है तो सम्पत्ति ‘ग’ को मिलेगी। ‘ख’ की एक मानित या कल्पित (Putative) पत्नी ‘घ’ तथा उसके बच्चे हैं। परन्तु ‘ग’ इस बात से इन्कार करता है कि ‘ख’ तथा ‘घ’ का कभी भी विधिपूर्ण विवाह हुआ था। ‘घ’ तथा उसके बच्चे ‘ख’ के जीवन काल में ‘ग’ के विरुद्ध वाद लाकर यह घोषणा प्राप्त कर सकते हैं कि वह सत्यतः ‘ख’ की पत्नी तथा उसके बच्चे हैं।

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1877 के पूर्व न्यायालयों को सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 15 से अलग या स्वतंत्र घोषणात्मक डिक्री करने की शक्ति नहीं थी। 1877 के अधिनियम की धारा 42 के पारित हो जाने के पश्चात् यह सोचा गया कि घोषणात्मक डिक्री करने की न्यायालयों की पूर्णता धारा 42 पर आधारित थी परन्तु कुछ वादों में इससे भिन्न मत प्रकट किया गया है। वेरूआरेड्डी राम राघव रेड्डी बनाम कोन्डुरु सेशू रेड्डी (Veruareddi Ramaraghava Reddy v. Kondure Seshu Reddy)2 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने धारित किया है कि विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1877 की धारा 42 उन मामलों के xhaustive) नहीं है जिनमें न्यायालय इस धारा से स्वतंत्र घोषणात्मक डिक्री कर सकते हैं। न्यायमूर्ति रामास्वामी (Ramaswami J) के शब्दों में – “S. 42 of the Specific Relief Act is not exhaustive of the cases in which a declaratory decree may be made and the court have power to grant such a decree independently of the requirements of that section.”

इस वाद के तथ्य निम्नलिखित हैं- अपीलार्थियों ने जिला न्यायालय में मद्रास रेलीजस इनडाउमेन्टस अधिनियम, 1927 की धारा 84 (2) के अधीन एक मूल याचिका इन्डाउमेन्ट्स बोर्ड के आदेश कि मंदिर एक सार्वजनिक मन्दिर है, को अपास्त कराने के लिये दायर की। इस वाद में प्रत्यर्थी इनडाउमेन्ट्स बोर्ड के कमिश्नर तथा पुजारी थे। वाद लम्बित रहने के दौरान 1927 का उक्त अधिनियम निरसित कर दिया गया तथा उसके स्थान पर हिन्दू धार्मिक तथा धर्मार्थ इन्डाऊमेन्ट्स अधिनियम, 1951 आ गया। अधिनियम आने के पश्चात् मूल याचिका संशोधित की गई तथा एक अतिरिक्त प्रार्थना जोड़ी गई कि विवादास्पद सम्पत्ति अपीलार्थी के परिवार की व्यक्तिगत सम्पत्ति है। तत्पश्चात् अपीलार्थी तथा कमिश्नर के मध्य एक समझौता डिक्री की गई जिसके द्वारा यह घोषित किया गया कि मन्दिर सार्वजनिक मन्दिर था तथा सम्पत्तियाँ अपीलार्थियों की व्यक्तिगत सम्पत्ति थीं परन्तु अपीलार्थी मन्दिर के रख-रखाव हेतु वार्षिक नगद आदि भुगतान करने के लिये दायी थे। पुजारी ने जो कि इस डिक्री का पक्षकार नहीं था, प्रस्तुत वाद इस घोषणा को प्राप्त करने हेतु किया था कि उक्त डिक्री मन्दिर पर बाध्यकारी नहीं थी।

1. देखें : काथमा नाचिआर बनाम डोरासिंगा, (1875) 21 आई० ए० 169, 177-180; शिवपर्सन सिंह बनाम रामनन्दन सिंह, (1916) 43; आई० ए० 91, 97.

2. (1966) सप्लीमेन्टरी ए० आई० आर० 270, 277.

उच्चतम न्यायालय ने धारित किया कि विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1877 की धारा 42 (अर्थात् वर्तमान 1963 के अधिनियम की धारा 34) उन मामलों में परिपूर्ण (exhaustive) नहीं जिनमें न्यायालय इस धारा से स्वतंत्र घोषणात्मक डिक्री पारित कर सकते हैं। प्रस्तुत वाद धारा 42 के सीमाक्षेत्र (purview) से परे हैं तथा सिविल प्रक्रिया संहिता सामान्य उपबन्धों से शासित होगा। यह वाद पोषणीय होगा यद्यपि पुजारी किसी विधिक प्रकृति के अधिकार का अधिकारी नहीं था तथा न ही किसी सम्पत्ति के प्रति उसका कोई अधिकार था जैसा कि विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1877 की धारा (या वर्तमान धारा 34) द्वारा अपेक्षित है। प्रस्तुत वाद में वादी का यह दावा कि यह घोषणा की जाय कि समझौता डिक्री देवता (deity) पर बाध्यकारी नहीं है पोषणीय है क्योंकि यह धारा 42 के सीमाक्षेत्र से परे है। अतः उच्चतम न्यायालय ने समझौता डिक्री को शून्य घोषित करके उसे अपास्त करने का आदेश दिया। समझौता डिक्री मन्दिर पर इसलिये बाध्यकारी नहीं थी क्योंकि देवता को पक्षकार नहीं बनाया गया था।

अतः उचित मत यह है कि विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 34 घोषणात्मक डिक्रियों के मामलों पर परिपूर्ण नहीं है।

धारा 34 के अन्तर्गत जहाँ किसी व्यक्ति का किसी विधिक प्रकृति के अधिकार या किसी सम्पत्ति के प्रति कोई अधिकार है तो वह ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध वाद कर सकता है जो उसके अधिकार या हक को प्रत्याख्यान करता या प्रत्याख्यान करने में हितबद्ध तो न्यायालय अपने विवेकानुसार घोषणा कर सकता है कि वह ऐसे अधिकार या हक का अधिकारी है। इस धारा का उद्देश्य तथा परिधि हक के अभिसाक्ष्य को सुदृढ़ करना तथा प्रतिकूल अतिक्रमण से संरक्षित करना है, विद्यमान मतभेद या विवाद को दूर करके भावी मुकदमेबाजी से न केवल बचाना है जिससे वादी के सम्पत्ति पर कब्जा दिलाना है जो उससे दोषपूर्ण रूप से ले लिया गया है वरन् यह भी सुनिश्चित करना है कि वह अपनी सम्पत्ति का शांतिपूर्ण ढंग से उपभोग कर सके। दूसरे शब्दों में, वादी के हक पर बादल उसके विधिक प्रकृति के इन्कार करने से छाया है या किसी दस्तावेज के निष्पादन से छाया है। यदि उसे विद्यमान रहने दिया जाय तो भविष्य में अपना हक या अधिकार सिद्ध करने में कठिनाइयाँ उत्पन्न कर सकता है क्योंकि जो साक्ष्य आज उपलब्ध है हो सकता है कि भविष्य में न मिल सके।

दीपक कुमार विश्वास बनाम डायरेक्टर ऑफ पब्लिक इन्सट्रक्सन (Dipak Kumar Biswas v. Director of Public Instruction)5 के वाद में अपीलार्थी एकाउन्टेन्ट जनरल के कार्यालय में एक पुष्ट (confirmed) आडिटर था। उसने एक महिला कालेज में अंग्रेजी प्रवक्ता (Lecturer) के लिये आवेदन दिया। उसे चुन लिया गया तथा उसे जो नियुक्ति आदेश दिया गया वह इस शर्त के अधीन था कि नियुक्ति डायरेक्टर आफ पब्लिक इन्सट्रक्शन मेघालय के अनुमोदन के अधीन है। अपीलार्थी द्वारा स्पष्टीकरण ईप्सित करने पर प्रधानाचार्य ने उसे आश्वासन दिया कि अनुमोदन की अनुमति केवल एक औपचारिकता है तथा उसकी नियुक्ति के मामले में कोई संकट या अड़चन नहीं है। इस आश्वासन पर विश्वास करते हुये अपीलार्थी ने आडिटर के स्थायी पद से इस्तीफा देकर कालेज में प्रवक्ता का पद ग्रहण कर लिया तपश्चात, लगभग पाँच मास पश्चात् उसे प्रधानाचार्य का पत्र आदेश मिला कि उसकी सेवाएं तत्काल समाप्त की जा रही हैं क्योंकि डायरेक्टर का अनुमोदन प्राप्त नहीं हुआ। अपीलार्थी ने स्थायी व्यादेश तथा यह घोषणा प्राप्त करने के लिये वाद किया कि वह सेवा में विद्यमान है तथा ऐसी घोषणा से होने वाले सभी फायदों का अधि वाद में नियुक्ति के विज्ञापन या अन्यथा कभी भी यह दर्शित नहीं किया गया था कि मेघालय सरकार ने आसाम एडेड कालेज मैनेजमेन्ट रूल्स, 1965 तथा आसाम एडेड कालेज इम्लाईज रूल्स, 1960 को अंगीकार किया हुआ है। डायरेक्टर ने इस त्रुटिपूर्ण प्रकल्पना पर कि उक्त नियम मेघालय राज्य ने अंगीकार कर लिये हैं नियुक्ति का अनुमोदन नहीं किया।

3. (1966) सप्लीमेन्टरी ए० आई० आर०, पृष्ठ 277, 279.

4. श्रीमती नीलिमा बोस बनाम संतोष कुमार घोष, ए० आई० आर० 1997 कलकत्ता 202, 206-207.

5. ए० आई० आर० 1987 एस० सी० 1422.

उच्चतम न्यायालय ने यह धारित किया कि यद्यपि डायरेक्टर का अनुमोदन न देना त्रुटिपूर्ण था परन्तु उसका यह कृत्य किसी अधिनियम, विनियम या प्रक्रिया नियमों का उल्लंघन नहीं था। इसके अतिरिक्त वह महिला कालेज जिसमें अपलार्थी की नियुक्ति हुयी थी कोई कानूनी निकाय नहीं था क्योंकि वह न तो किसी अधिनियम द्वारा स्थापित किया गया था तथा न ही कानूनी उपबन्धों पर निर्भर था अतः अपीलार्थी के पक्ष में ईप्सित घोषणा नहीं की जा सकती।

परन्तु वाद के विशिष्ट तथ्यों तथा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तथा संविधान के अनुच्छेद 136 में प्रदत्त अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुये, उच्चतम न्यायालय ने निदेश दिया कि मेघालय राज्य अपीलार्थी को 3 वर्ष का वेतन दे।

अत: उपर्युक्त वाद में अपीलार्थी को घोषणा की डिक्री का अनुतोष इस कारण नहीं मिल सका क्योंकि उसका अधिकार विधिक प्रकृति का नहीं था।8

जहाँ न्यायालय कोई घोषणात्मक डिक्री करता है तो निष्पादक न्यायालय उसमें कोई परिवर्तन नहीं कर सकता है। निष्पादक न्यायालय डिक्री के निबन्धनों से बाध्य होता है तथा उन्हीं का निष्पादन कर सकता है। उदाहरण के लिये, पंजाब राज्य बनाम क्रिशन दयाल शर्मा (State of Punjab v. Krishan Dayal Sharma)9 के वाद में एक सरकारी कर्मचारी ने यह घोषणा प्राप्त करने के लिये वाद किया कि प्रोन्नति का तथा इससे अनुषंगी फायदों, अधिकारों तथा विशेषाधिकारों का अधिकारी है। न्यायालय ने उसके पक्ष में डिक्री कर दी। वादी ने देय राशि पर ब्याज का दावा नहीं किया था। परन्तु निष्पादक न्यायालय ने देय राशि पर ब्याज भी प्रदान कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि ब्याज प्रदान करना अवैध है। उच्चतम न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि इसमें सन्देह नहीं है कि न्यायालय को ब्याज प्रदान करने का अधिकार है परन्तु इस अधिकार का प्रयोग डिक्री का निष्पादन करने वाला न्यायालय नहीं कर सकता। निष्पादक न्यायालय डिक्री के निबन्धनों से बाध्य होता है। वह ऋजुता या न्याय की अपनी धारणा के कारण डिक्री में न तो कुछ बढ़ा सकता है न घटा सकता है। डिक्रीधारक का अनुतोष प्राप्त करने का अधिकार डिक्री के निबन्धनों से अवधारित होता है।10

यहाँ पर यह भी नोट करना आवश्यक है कि यह घोषणा प्राप्त करने के लिये वाद कि कर्मचारी का सेवाओं से पदच्युत किया जाना या निकाला जाना दोषपूर्ण, अवैध है, मर्यादा अधिनियम के अनुच्छेद 113 से शासित होता है। यह कहना अनुचित होगा कि ऐसा वाद मर्यादा अधिनियम से शासित नहीं होगा।11

जहाँ सम्पत्ति के हक तथा कब्जे की घोषणा के लिये संस्थित वाद में दस्तावेजों के साक्ष्य से ज्ञात होता है कि न केवल वादी वरन सह-हिस्सेदार ने सम्पत्ति का विमोचन किया था अथवा उसे छुड़ाया था तथा इस प्रकार सम्पत्ति भाइयों की संयुक्त सम्पत्ति बन गई थी तथा निचले न्यायालयों के समवर्ती (Concurrent) निर्णयानुसार कोई प्राइवेट विभाजन नहीं हुआ था जिसमें वादी को सम्पत्ति आबंटित की गई हो तथा इस प्रकार वादी द्वारा अनुस्थापन (subrogation) सिद्ध नहीं हुआ, वादी के वाद को इस आधार पर खारिज करना कि वह सम्पत्ति में अपना हक सिद्ध नहीं कर पाया उचित तथा विधिक होगा।12

6. ए० आई० आर० 1987 एस० सी० 1425-1426, 1427

7. तत्रैव, पृष्ठ 1428.

8. बेन्डगमेरेन लोन्गचर बनाम मेराजुलू, ए० आई० आर० 1994 गोहाटी 109, 110 भी देखें।

9. ए० आई० आर० 1990 एस० सी० 2177.

10. तत्रैव, पृष्ठ 2178; मध्य प्रदेश राज्य बनाम माँगी लाल शर्मा, ए० आई० आर० 1998 एस० सी० 743 भी देखें।

11. पंजाब राज्य बनाम गुरूदेव सिंह तथा अशोक कुमार, ए० आई० आर० 1992 एस० सी० 111, 113, 115; जगदीश प्रसाद माथुर बनाम यूनाइटेड प्राविन्सेज गवर्नमेन्ट, ए० आई० आर० 1956 इलाहाबाद 114, तथा अब्दुल वकील बनाम सेक्रेटरी आफ स्टेट, ए० आई० आर० 1943 अवध 368 भी देखें, उच्चतम न्यायालय ने पंजाब राज्य बनाम अजीत सिंह (1988)1 सर्विस ला रिपोर्टर 96%; तथा पंजाब राज्य बनाम राम सिंह (1986)3 सर्विस ला रिपोर्टर 379 को उलट दिया।

12. दौलत राम बनाम सरूप राम, ए० आई० आर० 1996 एस० सी०2421, 2423.

यदि अपीलार्थी की नियुक्ति कुछ शर्तों एवं निबन्धनों के अधीन की गई तथा जिसमें शर्त यह भी है कि प्रारम्भ में अपीलार्थी को 12 मास के परिवीक्षा (probation) पर रखा जायगा तथा यदि परिवीक्षा अवधि के पूर्व उसे परिवीक्षाधीन निरीक्षक की नियुक्ति का पत्र प्राप्त नहीं होता है तो उसकी सेवायें समाप्त हो जायेंगी तथा परिवीक्षा अवधि की समाप्ति के पूर्व अपीलार्थी को नियुक्ति पत्र प्राप्त नहीं हुआ तथा न ही प्रारम्भिक परिवीक्षा अवधि का ही विस्तार किया गया अपीलार्थी इस घोषणा का अधिकारी नहीं होगा कि वह सेवा में लगातार विद्यमान है।13

जहाँ किसी वाद में सम्पत्ति पर हक की घोषणात्मक डिक्री विवादास्पद सम्पत्ति पर प्रतिवादी के पक्ष में रजिस्ट्रीकृत विक्रय लेख की अवहेलना करके की गयी तथा ऐसा कोई रजिस्ट्रीकृत दस्तावेज नहीं है जिसमें यह दर्शित किया गया हो कि वादकृत सम्पत्ति को वादी के पक्ष में निर्मुक्त अथवा छोड़ा गया था अथवा अभ्यर्पित (surrendered) की गई थी, केवल राजस्व उद्धरण (extracts) को हक विलेख मान कर घोषणात्मक डिक्री करना अवैध होगा। इसके अतिरिक्त वादी ने प्रतिकूल कब्जे (adverse possession) का भी दावा नहीं किया था। ऐसी परिस्थितियों में घोषणात्मक डिक्री करना अवैध होगा।14

जहाँ किसी स्वामित्व की उद्घोषणा के लिये वाद में वादी यह प्रार्थना करता है कि नगरपालिका को अवरुद्ध किया जाय कि वह वादी के भूमि के कब्जे के प्रति हस्तक्षेप न करे। नगरपालिका कब्जे के दस्तावेज पेश करने में असफल रहती है अतः उसके विरुद्ध प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जा सकता है परन्तु वादी भरोसेमन्द साक्ष्य द्वारा यह सिद्ध करने में असफल रहता है कि सम्पत्ति उसके पूर्ववर्ती को अन्तरित की गई थी तथा वादी को उससे विक्रय विलेख द्वारा प्राप्त हुई तथा विक्रय के दस्तावेज लिखित सीमायें तथा दान या भेट के विलेख की सीमायें भिन्न हैं, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि ऐसे तथ्य के प्रश्न निचले न्यायालयों द्वारा निर्धारित किये जाते हैं, अतः द्वितीय अपील में तथ्यों के निष्कर्ष में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है।15

यदि किसी वाद में अभिकथित करार के आधार पर अनुतोष की माँग की जाती है परन्तु दावाकृत सम्पत्ति के हक का दावा नहीं किया जाता है तो ऐसा दावा इस आधार पर अवैध नहीं होगा कि घोषणा का अनुतोष ईप्सित नहीं किया गया है।16

जहाँ वादी ने उद्घोषणा एवं अस्थायी व्यादेश के लिये वाद किया परन्तु परीक्षण न्यायालय ने अस्थायी व्यादेश के आवेदन पर विचार किया तथा न केवल उक्त आवेदन को अस्वीकार कर दिया वरन् पूर्ण वाद को ही खारिज कर दिया, उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि यह निर्णय त्रुटिपूर्ण था जबकि उस तारीख तक न तो वादपद (issues) तय किये गये थे तथा न ही कोई साक्ष्य प्रस्तुत किया गया था।17

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