LLB 1st Year Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 6 Notes Study Material

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Jurisprudence and Legal Theory Notes Study Material PDF LLB 1st Semester Year

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LLB 1st Year Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 6 Notes Study Material
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अध्याय 6 (Chapter 6)

विश्लेषणात्मक विचारधारा की प्रतिक्रियास्वरूप विधि का विशुद्ध सिद्धान्त (Rectification of analytical ideology as a pure principle of law)

विधिशास्त्र की विश्लेषणात्मक विचारधारा के समर्थकों में केल्सन का नाम भी उल्लेखनीय है। उन्होंने अपने विधि-सिद्धान्त द्वारा विश्लेषणात्मक प्रमाणवाद (Analytical Positivism) की विवेचना नये ढंग से की तथा इसे मनोवैज्ञानिक तत्वों पर आधारित किया। केलसन तथा उनके समर्थकों को सामूहिक रूप में ‘विधिशास्त्र की वियना शाखा” (Vienna School) के नाम से संबोधित किया जाता है। केल्सन का विधि सिद्धान्त विधिशास्त्र में दो बिन्दुओं से महत्वपूर्ण माना गया है। प्रथम यह कि इसे विश्लेषणात्मक पद्धति के विकास की चरम सीमा माना गया है तथा द्वितीय यह कि इस सिद्धान्त में उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम तथा बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में विधि के प्रति अपनाई जाने वाली नीति का स्पष्ट दिग्दर्शन होता है। वस्तुत: केल्सन और ऑस्टिन के विधि-सम्बन्धी विचारों में निकट साम्य है। परन्तु केल्सन ने अपनी विचारपद्धति को काण्ट (Kant) के विधि-दर्शन पर आधारित किया जब कि ऑस्टिन की विश्लेषणात्मक पद्धति मूलत: उपयोगितावाद पर आधारित थी।

हेन्स केल्सन (Hans Kelson : 1881-1973)

केल्सन का विधि-सिद्धान्त काण्ट की विचारधारा पर आधारित होते हुए भी अनेक बातों में उनके विचारों से भिन्न है। केल्सन काण्ट के इस विचार से सहमत थे कि निश्चयात्मक विधि स्वयं में पूर्ण नहीं है। परन्तु वे इतना कहकर ही चुप नहीं रहे अपितु विज्ञान (Science) की शक्ति को स्वीकारते हुए उन्होंने कहा कि विश्व की सभी वस्तुओं का ज्ञान विज्ञान द्वारा अर्जित किया जा सकता है। इस दृष्टि से केल्सन का स्थान काण्ट की तुलना में कहीं अधिक ऊँचा है। केल्सन का मत है कि समस्त ज्ञान विज्ञान द्वारा ग्राह्य है जबकि काण्ट के अनुसार अधिकांश निरपेक्ष सत्य मानवीय ज्ञान के परे है। इस प्रकार केल्सन ने ज्ञान (knowledge) और नैतिकता (morality) में अन्तर बताया जब कि काण्ट ऐसा नहीं मानते थे। तथापि इस दृष्टि से केल्सन और स्टेमलर के विचारों में बहुत कुछ साम्य है।

इमेन्युअल कॉण्ट (Immanuel Kant : 1724-1804)

काण्ट ने ‘अनुभव’ (experience) और ‘निर्णय’ (Judgment) तथा अस्तित्व’ (existence) और ‘नीति’ (normative) के बीच अन्तर स्थापित किया था P उनके अनुसार ‘निर्णय’ अनुभव पर आधारित रहते हैं। इसी प्रकार उनका कहना था कि नीति-वचन के बिना कोई भी संकल्पना व्यर्थ होती है। परन्तु केल्सन के विचार से नैतिक आदेशों (normative) को बाह्य भौतिक जगत् से प्राप्त नहीं किया जा सकता, अर्थात् “जो होना चाहिये” को “जो है” से प्राप्त नहीं किया जा सकता है। केल्सन के इस तर्क को एक उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। मान लीजिये कि ‘अ’ नामक व्यक्ति ने ‘ब’ नामक व्यक्ति की हत्या कर दी। अब ‘ब’ जो कि मत ”है”, से यह कैसे जाना जा सकता है कि उसकी हत्या की जानी चाहिये” थी अथवा नहीं, या

1. केल्सन का विधि-सम्बन्धी विशुद्ध सिद्धान्त (Pure Theory of Law) लॉ क्वार्टरली रिव्यू (1934) में प्रकाशित हुआ था (50 LQR 474).

2 ” अस्तित्व” से काण्ट का आशय वर्तमान, अर्थात् “जो है” से था, जबकि “नीति” से उनका तात्पर्य भविष्य, अर्थात् “जो होना चाहिये” से था।

3. Concept without precept is empty.

“अ को दण्डित किया जाना चाहिये” अथवा नहीं। इसका कारण यह है कि केल्सन के अनुसार चाहिये’ को चाहिये” से प्राप्त किया जा सकता है, न कि ”है” से। उनके विचार में ‘ज्ञान’ और ‘नैतिक इच्छा (volition) में अन्तर है। प्राकृतिक विज्ञान भौतिक पदार्थों के कार्य-कारण के सम्बन्धों का वर्णन करता है। किन्तु नैतिक आदेशों का विज्ञान (Normative Science) उन आचरणों का वर्णन करता है जो ‘‘चाहिये” से। सम्बन्धित हैं।

उल्लेखनीय है कि केल्सन के पूर्व स्टेमलर ने भी विधि का एक ऐसा विशुद्ध सिद्धान्त (Pure Theory) प्रतिपादित किया था जो सार्वभौमिक रूप से मान्य हो और उन सभी तत्वों से मुक्त हो, जो परिवर्तनशील होते हैं। परन्तु केल्सन ने स्टेमलर के विशुद्ध विधि-सिद्धान्त को दोषपूर्ण निरूपित करते हुए कहा है कि इसमें कुछ। ऐसे आदर्शों का समावेश है जो विधिवेत्ताओं का मार्गदर्शन अवश्य करते हैं किन्तु उन्हें विधि के अन्तर्गत अपनाया जाना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता है। केल्सन का निश्चित मत था कि किसी शुद्ध विधि-सिद्धान्त में न्याय-सिद्धान्त का समावेश करना उचित नहीं है। केल्सन के अनुसार विशुद्ध विधिसिद्धान्त को राजनीति, नीतिशास्त्र, दर्शनशास्त्र, समाजशास्त्र तथा इतिहास आदि से अप्रभावित रखा जाना चाहिये। विधि के ज्ञान को इच्छा, स्पृहा (volition) तथा प्रवृत्ति (instinct) आदि के प्रभावों से मुक्त रखना आवश्यक है। केल्सन के विचार से वि!ि में आदर्शवाद का समावेश नि:सन्देह ही अवैधानिक होगा।

केल्सन के विधि के विशद्ध सिद्धान्त के मलभूत तत्व (Essential Elements of Kelson’s Pure Theory of Law)

केल्सन द्वारा प्रतिपादित विधि का विशुद्ध सिद्धान्त निम्नलिखित मूलभूत तत्वों पर आधारित है–

1. विधि के सिद्धान्त के अन्तर्गत वास्तविक विधि, अर्थात् ‘‘विधि जैसी कि वह है’ का वर्णन होना चाहिये न कि आदर्शात्मक विधि अर्थात् “जैसी कि वह होनी चाहिये” का। इस दृष्टि से केल्सन के विचार ऑस्टिन से मिलते-जुलते हैं। इसीलिए उनकी गणना पाजिटिव विचारधारा के समर्थकों में की गयी है न कि प्रकृतिवादी (naturalists) विचारधारा के पोषकों में।।

2. केल्सन के अनुसार विधि के सिद्धान्त” और ‘‘विधि” में अन्तर है। यद्यपि विश्व की प्राकृतिक वस्तुओं में कोई भी तार्किकता नहीं है परन्तु ऐसा वैज्ञानिक सिद्धान्त जो इन वस्तुओं का वर्णन करता है, तार्किक होता है। ठीक इसी प्रकार यद्यपि विधि के अन्तर्गत विभिन्न परस्पर विरोधी नियमों का वर्णन रहता है फिर भी विधि के सिद्धान्त का कार्य यह होता है कि वह उन सभी विरोधाभासी नियमों में तार्किक दृष्टि से ताल-मेल बैठाये और संयमित रूप से उनका एकीकरण करे। केल्सन ने अपना शुद्ध विधि-सिद्धान्त केवल क्षणिक स्फूर्ति के प्रभाव में आकर नहीं किया, बल्कि उन्होंने विधि के तथ्यों (facts of the law) के वास्तविक स्वरूप के सूक्ष्म अध्ययन के पश्चात् अपना विशुद्ध विधि-सिद्धान्त प्रतिपादित किया। केल्सन ने स्पष्ट किया कि वे विधि के विशुद्ध सिद्धान्त का निरूपण इस प्रकार कर रहे हैं ताकि विधि के माध्यम से समस्त विषय-वस्तुओं को प्रस्तुत किया जा सके।

3 विधि का सिद्धान्त ऐसा होना चाहिये जो सभी समय तथा स्थानों में समान रूप से लागू किया जा सके। दसरे शब्दों में, विधि के सिद्धान्त को समय और स्थान की परिसीमाओं से मुक्त रखा जाना चाहिये। इस दृष्टि से केल्सन को सामान्य विधिशास्त्र का समर्थक माना जा सकता है।

4. विधि का सिद्धान्त विशुद्ध’ (Pure) होना चाहिये; अर्थात् उसे नीतिशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, इतिहास आदि से अप्रभावित रखा जाना चाहिये। केल्सन के विचार से किसी भी सिद्धान्त की शुद्धता के लिए यह परम आवश्यक है कि वह उपर्युक्त प्रभावों से मुक्त रहे। परन्तु इसका आशय यह कदापि नहीं है कि केल्सन ने नीतिशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र या इतिहास को व्यर्थ तथा महत्वहीन माना। उनका कहना तो केवल यह था कि विधि के सिद्धान्त को इन विषयों के प्रभाव से मुक्त रखा जाना चा

5. केल्सन ने विधिशास्त्र को एक सिद्धान्तमूलक विज्ञान माना है न कि प्राकृतिक विज्ञा विज्ञानों से सम्बन्धित विधियाँ कारण और परिणामों के तालमेल का कथन मात्र होती है। उदाहरणार्थ, यदि

हाइड्रोजन और आक्सीजन को दो और एक के अनुपात में मिला दिया जाये, तो पानी बन जायेगा। इस नियम का उल्लंघन हो ही नहीं सकता और यदि उल्लंघन होता है, तो यह नियम व्यर्थ हो जायेगा। परन्त विधिशास्त्र में विधियों का सम्बन्ध कार्य-कारण पर आधारित नहीं होता बल्कि सिद्धान्त मूलक (normative) होता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई व्यक्ति हत्या करता है, तो उसे फाँसी का दण्ड दिया जाना चाहिये। ऐसी विधियाँ उस स्थिति में भी विधिमान्य रहती हैं जब कि उनका उल्लंघन कर दिया जाता है और जो परिणाम निर्दिष्ट हैं, वे नहीं निकलते।

विधि का  विशुद्ध सिद्धन्त (Kelson’s Pure Theory of Law)

केल्सन के विशुद्ध विधि-सिद्धान्त का केन्द्रबिन्दु मानकों की व्युत्पत्ति है। उन्होंने विधिक क्रम (legal order) को मानकों का स्तूप (pyramid of norms) माना है। उनके विधि सिद्धान्त को भली भाँति समझने के लिये सर्वप्रथम विज्ञान और विधि के आधार-स्रोत (proposition) के भेद को समझ लेना परम आवश्यक है। ‘विज्ञान का आधार-स्रोत’ प्राकृतिक विज्ञान (natural science) है जबकि विधि का आधार-स्रोत विधिशास्त्र है। विज्ञान का आधार-स्रोत हमें कार्य और कारण के सम्बन्धों का ज्ञान कराता है। यह उन बातों से सम्बन्धित है जो कार्य और कारण के रूप में घटित हुआ करते हैं। उदाहरण के लिये न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त (Newton’s law of gravitation) यह बतलाता है कि ऊपर फेंकी गयी कोई भी वस्तु नीचे अवश्य गिरती है; अर्थात् विज्ञान का आधार-वाक्य किसी भी कार्य का अनिवार्य रूप से ‘‘घटित होना” सूचित करता है इसे केल्सन ने ‘‘जो है” (stern) कहा है। इसके विपरीत विधि के आधार-स्रोत का सम्बन्ध इस विषय से है कि किस परिस्थिति में क्या होना चाहिए’ अर्थात् किससे क्या घटित होना चाहिये। इस ‘चाहिये” को केल्सन ने sollen कहा है। उदाहरण के लिये यदि, कोई व्यक्ति चोरी करता है, तो उसे दण्ड मिलना चाहिये। केल्सन के सिद्धान्त का निचोड़ यह है कि यह प्राकृतिक विज्ञान ‘‘कारणता” (casuality) से सम्बन्धित है, जबकि विधि, जो एक सामाजिक विज्ञान है मानकत्व (normativity) से सम्बन्धित है। परन्तु केल्सन आगे स्पष्ट करते हैं कि विधि के इस ‘‘चाहिये” और नैतिकता (morality) के ‘‘चाहिये” में अन्तर है। विधि के अन्तर्गत ‘‘चाहिये” के पीछे राज्य की शक्ति कार्य करती है। इस प्रकार केल्सन के अनुसार विधिक मानक (legal norms) और नैतिक मानक (moral norm) में अन्तर है। नैतिक मानक का एक उदाहरण यह है कि सभी को सदैव सच बोलना चाहिए।6।

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