LLB 1st Year Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 5 Notes Study Material

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Jurisprudence and Legal Theory Notes Study Material PDF LLB 1st Semester Year

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अध्याय 5 विश्लेषणात्मक विचारधारा

(Analytical School)

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में अध्यात्मवाद के स्थान पर प्रयोगात्मक प्रवृत्ति प्रबल हो जाने के कारण विधि-दर्शन (legal philosophy) में परिकल्पना (speculation) की बजाय घटनाओं के सूक्ष्म अवलोकन पर आधारित निष्कर्षों को अधिक महत्व दिया जाने लगा तथा प्राकृतिक जगत पर इनकी प्रक्रिया के आधार पर परिणामों तक पहुँचने की पद्धति अपनाई गई। यहीं से विश्लेषणात्मक विचारधारा का शुभारम्भ हुआ जिसके परिणामस्वरूप अन्तर्राष्ट्रीय संगठन के स्थान पर वर्तमान राष्ट्रवादी राज्यों की स्थापना होने लगी। इन राष्ट्रों की विशेषता यह थी कि राजनीतिक तथा वैधानिक सत्ता राज्य में ही केन्द्रित रखी गई। फलत: विधिव्यवस्था को अधिक सुव्यवस्थित बनाने तथा विधि-सामग्री को क्रमबद्ध रूप में संकलित करने की आवश्यकता बढ़ने लगी और प्रमाणवादी विधिशास्त्रियों का ध्यान प्रचलित वास्तविक विधि के सिद्धान्तों के विश्लेषण की ओर आकृष्ट हुआ।’ विधि’ या ‘कानून’ को राज्य के समादेश मानते हुए उन्होंने इन कानूनों के प्रति निश्चयात्मक तथा तात्विक दृष्टिकोण अपनाया। विश्लेषणात्मक विचारधारा के प्रवर्तका में जर्मी बेन्थम, ऑस्टिन, सामंड, हालैंड और केल्सन आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में प्राकृतिक विधि के सिद्धान्तों (Natural Law Theories) के विरुद्ध जोरदार अभियान शुरू हो गया था। इस आन्दोलन के प्रवर्तक प्रमाणवादी विधिवेत्ता (Positivist Jurist) ही थे जिन्होंने विधि-सम्बन्धी आध्यात्मिक या पारलौकिक विचारधारा का खण्डन करते हुए इस बात पर जोर दिया कि विधिशास्त्र का मुख्य उद्देश्य वास्तविक विधि (अर्थात् ऐसी विधि जो किसी काल-विशेष में प्रचलित हो) के मूलभूत सिद्धान्तों का विश्लेषण करना है। अब तक विधिक दार्शनिकों ने कानून के अन्तिम उद्देश्य पर ही अधिक महत्व दिया था तथा उनके अनुसार विधि में ऐसे आदर्शों का समावेश आवश्यक था जिन्हें समाज उचित समझता था। परन्तु विधिशास्त्र की विश्लेषणात्मक विचारधारा (Analytical School) के समर्थकों ने वास्तविक प्रचलित विधि के विश्लेषणात्मक अध्ययन को ही महत्व दिया तथा वे निराधार परिकल्पनाओं (speculations) तथा आदर्शों (ideals) पर आधारित भूतकालीन विधि के अध्ययन को निरर्थक समझने लगे। विधि के प्रति विश्लेषणात्मक प्रमाणवादी दृष्टिकोण (Analytical Positivism) अपनाने वाले विधिशास्त्रियों के अनुसार विधि (कानून) के निम्नलिखित पाँच प्रमुख लक्षण हैं :

1. विधि मानव द्वारा निर्मित आदेश है।

2. विधि और नैतिकता एक-दूसरे से पूर्णतः भिन्न हैं। इसका आशय यह है कि विधि, ‘जैसी कि

वह है’ तथा ‘ जैसी कि वह होनी चाहिए’ में अन्तर है। प्रमाण-वादियों ने जैसी कि वह है’

(अर्थात् वास्तविक विधि को) ही अपने अध्ययन का केन्द्र बिन्दु बनाया।

3. उन्होंने विधिक सिद्धान्तों का परीक्षण तथा अर्थान्वयन किया जाना आवश्यक समझा। परन्तु उनका विचार था कि ऐसा करते समय इन सिद्धान्तों के ऐतिहासिक उद्गम तथा विकास, नैतिक या सामाजिक ध्येय तथा सामाजिक प्रभाव पर विचार करना आवश्यक नहीं है, अर्थात् विधि की भूतकालीन स्थिति पर विचार करना प्रमाणवादियों (Positivists) का कार्यक्षेत्र नहीं है।

4. उनका मानना था कि किसी देश की विधि-व्यवस्था स्वयं में परिपूर्ण होती है तथा तर्क के आधार पर उस विधि के निश्चित अर्थान्वयन तथा निर्णयों तक पहुँचा जा सकता है।

विधि का आदेशात्मक सिद्धान्त (Imperative Theory of Law) ।

जॉन ऑस्टिन ने विधि सम्बन्धी जो सिद्धान्त प्रतिपादित किया है उसे विधि का आदेशात्मक सिद्धान्त कहा जाता है। इस सिद्धान्त के मुख्य तत्व इस प्रकार हैं

1. संप्रभ शक्ति (Sovereign Power)—ऑस्टिन ने विधि को संप्रभुताधारी का आदेश कहा है। उन्होंने

भता शक्ति के दो लक्षण बताये हैं। प्रथम यह कि वह सर्वोच्च शक्ति होनी चाहिए जिस पर किसी अन्य सादा शक्ति का प्रभुत्व न हो तथा दूसरे यह कि सम्प्रभु-शक्ति ऐसी होनी चाहिए जिसके आदेशों का प्रजा स्वेच्छा से अनुपालन करने की इच्छुक हो।

2. समादेश (Command)-ऑस्टिन ने विधि को संप्रभुताधारी का ‘समादेश’ माना है। उनके मतानुसार समादेश राज्य की उस इच्छा की अभिव्यक्ति है जो प्रजा से किसी कार्य को करने’ या न करने की आकांक्षा करे। इस इच्छा की अभिव्यक्ति प्रार्थना के रूप में नहीं होती । संप्रभुताधारी का समादेश (command) दो प्रकार का हो सकता है-(1) सामान्य समादेश और (2) विशिष्ट समादेश।

सामान्य समादेश वह है जो सभी व्यक्तियों के प्रति सभी समय समान रूप से जारी किया जाता है तथा यह तब तक प्रभावशील रहता है जब तक कि उसका निरसन न किया जाये या उसे समाप्त न किया जाए। विशिष्ट समादेश कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के प्रति सभी समय के लिए या सभी व्यक्तियों के प्रति कुछ समय के लिए जारी किया जाता है। ऑस्टिन ने सामान्य समादेश (general command) को ही निश्चयात्मक विधि (Positive Law) माना है।  

ऑस्टिन ने ‘समादेश’ (command) तथा कर्तव्य’ को परस्पर-सम्बन्धित और अविभाज्य निरूपित किया है। उनके अनुसार संप्रभुताधारी की इच्छा की अभिव्यक्ति का नाम समादेश है। समादेश की अवहेलना को ही ‘कर्तव्य-भंग’ कहते हैं तथा इन दोनों के परिणामस्वरूप जो हानि उत्पन्न होगी, उसे ऑस्टिन ने ‘शास्ति’ (Sanction) कहा है। उल्लेखनीय है कि ‘आदेश’ का तत्व विधि को नैतिक नियमों से अलग रखता है। क्योंकि नैतिक नियमों का पालन न किया जाने पर शास्ति का भय नहीं होता है। ऑस्टिन के अनुसार निश्चयात्मक विधि (Positive Law) की निम्नलिखित विशेषताएँ होती हैं

  • प्रत्येक कानून एक प्रकार का समादेश होता है,
  •  निश्चयात्मक कानून संप्रभुताधारी के प्रत्यक्ष या परोक्ष आदेश होते हैं,
  •  प्रत्येक विधि आचरण-सम्बन्धी क्रम प्रस्तुत करती है,
  •  सम्प्रभु द्वारा प्रवर्तित विधि की पृष्ठभूमि में राज्य की भौतिक शक्ति (Physical force of the State) निहित होती है जिसके अनुसार समादेश को न मानने वाले व्यक्ति को दण्डित किया  जाता है।  

3. शास्ति (Sanction)-ऑस्टिन ने अपने आदेशात्मक विधि सिद्धान्त में यह स्पष्ट किया कि संप्रभुताधारी के आदेश मात्र ही कानून का रूप धारण नहीं कर लेते जब तक कि उनके पीछे कोई शास्ति (Sanction) न हो। ऐसे आदेश को जिसका अनुपालन न किये जाने पर या जिनका उल्लंघन होने पर दोषी व्यक्ति को दण्ड देने की व्यवस्था न हो, सही अर्थ में ‘कानून’ नहीं कहा जा सकता है। ऑस्टिन के अनुसार आदेश के साथ शास्ति जुड़ी रहने पर ही उसे ‘निश्चयात्मक विधि’ (Positive Law) कहा जा सकेगा।

ऑस्टिन के अनुसार संप्रभुता की तीन विशेषतायें हैं-– अविभाज्यता (indivisibility), असीमितता

htability) तथा अपरिहार्यता (essentiality) । ऑस्टिन सम्प्रभुता में किसी प्रकार के सीमा-बन्धन को स्वीकार नहीं करते तथा उनके मतानुसार प्रत्येक राज्य के लिए सम्प्रभुता अनिवार्य है।

आस्टिन के अनुसार निश्चयात्मक विधि में सम्प्रभुता, आदेश, कर्तव्य तथा शास्ति’ ये चार तत्व होना आवश्यक है। उन्होंने विधि के औचित्य या अनौचित्य को कोई महत्व नहीं दिया है। उनके विधि-सम्बन्धी सिद्धान्त में दो बातों पर विशेष बल दिया गया है–(1) विधि की सामान्यता (generality of law); तथा

घि का प्रवर्तनीयता (enforce ability of law) । विधि राजनीतिक प्राधिकारी द्वारा प्रवर्तित की जाती है तथा इसे सभी व्यक्तियों के प्रति समान रूप से बिना किसी भेदभाव के लागू किया जाता है। विधि – पति करने वाली संप्रभ शक्ति में लोगों से अपने आदेशों का अनिवार्य रूप से पालन करा सकने की क्षमता होती है।

ऑस्टिन के अनुसार विधियों के प्रकार

जॉन ऑस्टिन ने विधियों के दो प्रकार बताये हैं-(1) दैवी विधियाँ (Devine law), (2) मानव विधियाँ (Human Laws) । मानवीय-विधियाँ दो प्रकार की हो सकती हैं। प्रथम, निश्चयात्मक विधि (Positive Law) जिसे राज्य के सम्प्रभु द्वारा अपने अधीनस्थ व्यक्तियों के अनुपालन हेतु आदेश के रूप में निर्मित किया गया हो। द्वितीय ऐसी विधि जो वस्तुतः विधि नहीं है क्योंकि उसका मूल आधार सम्प्रभुताधारी का आदेश न होकर असंख्य व्यक्तियों की राय या भावनाओं की अभिव्यक्ति मात्र है। ऑस्टिन इस प्रकार की विधि को लाक्षणिक विधि (Metaphorically Laws) कहना अधिक उपयुक्त समझते हैं। उनका स्पष्ट मत है। कि इस विधि को विधि कहा जाना अनुचित है। उनके अनुसार फैशन सम्बन्धी विधियाँ या गुरुत्वाकर्षण सम्बन्धी विधियाँ इसी कोटि में आती हैं।

जॉन ऑस्टिन को विश्लेषणवादी शाखा (Analytical School) का प्रवर्तक माना गया है। वे चार वर्ष तक लन्दन विश्वविद्यालय में विधिशास्त्र के अध्यापक रहे। उनकी सुप्रसिद्ध कृति ‘दि प्राविन्स ऑफ ज्यूरिसपूडेन्स डिटरमिन्ड’ सन् 1832 में प्रकाशित हुई। इस कृति से यह स्पष्ट होता है कि ऑस्टिन की विचारधारा हॉब्स; ब्लैकस्टोन तथा बेन्थम आदि पूर्ववर्ती विधिशास्त्रियों के विचारों से प्रभावित हुए बिना न रह सकी। ऑस्टिन ने कुछ समय जर्मनी में रहकर रोमन विधि के अध्ययन में बिताया। रोमन विधि के सुव्यवस्थित वैज्ञानिक निरूपण (scientific treatment) से वे इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने जर्मनी से वापस लौटने पर इंग्लैण्ड की आंग्ल-विधि के प्रति विश्लेषणात्मक पद्धति अपनाई जाने पर बल दिया। ‘ऑस्टिन’ की अन्य कृतियों में ‘ए प्ली फॉर कान्स्टीट्यूशन’ (A Plea for Constitution) भी एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है।

उल्लेखनीय है कि ऑस्टिन के विश्लेषणात्मक प्रमाणवाद (analytical positivism) की अनेक विधिवेत्ताओं ने आलोचना की है। प्रो० एलेन ने इसे आध्यात्मिक रीति मात्र निरूपित किया है।

यद्यपि हॉब्स (Hobbes) ने भी सम्प्रभु-शक्ति को ही विधि का स्रोत माना है तथा उनके विचार में विधि। सम्प्रभताधारी का समादेश है, परन्तु ऑस्टिन ने हॉब्स के सामाजिक संविदा के सिद्धान्त को निराधार माना। तथापि हॉब्स की सम्प्रभु-शक्ति की अविभाज्यता तथा अपरिमितता को स्वीकार करते हुए उन्होंने व्यक्त किया। कि विधि ऐसी ही सम्प्रभु-शक्ति का समादेश है।

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