LLB 1st Year Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 4 Part 2 Notes Study Material

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Jurisprudence and Legal Theory Notes Study Material PDF LLB 1st Semester Year

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बीसवीं सदी में प्राकृतिक विधि-सिद्धान्तों का पुनरुद्धार (Twentieth Century Revival of Natural Law Theories)

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बीसवीं शताब्दी को प्राकृतिक विधि-सिद्धान्तों के पुनरुद्धार (revival) का काल कहा जाता है। उन्नीसवीं शताब्दी के राष्ट्रवाद तथा विज्ञान वाद के कारण पाश्चात्य जगत में विधिदर्शन की प्रगति में गतिरोध उत्पन्न हो गया। लोगों में यह भ्रम फैल गया कि विज्ञान की सहायता से आर्थिक प्रगति करने में ही उनका वास्तविक सरत है कैविनी (Savigny) और हीगल (Hegal) की विचारधाराओं के परिणामस्वरूप लोगों में राज्य के प्रति अटल विश्वास उत्पन्न हो गया जिसे राष्ट्रीय संप्रभुता के सिद्धान्त ने अधिक सुदृढ़ कर दिया। विधि के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाये जाने के कारण औपचारिकताओं से युक्त अनम्य विश्लेषणात्मक विधिशास्त्र का उदय हुआ।

बीसवीं सदी के प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्धों ने पाश्चात्य देशों की आँखें खोल दीं। वस्तवाद तथा आर्थिक प्रगति के साथ-साथ लोगों में आपसी ईष्र्या, द्वेष एवं वैमनस्य की भावना दिनों-दिन बढ़ती गई । केवल आर्थिक प्रगति उन्हें शान्ति न दे सकी, फलतः उनका भ्रम दूर होने लगा। चारों ओर अशान्ति और अराजकता का वातावरण व्याप्त हो गया। जब भौतिकवाद से मानव ऊब गया, तो वह पुन: आदर्शवादी दर्शन की ओर आकर्षित हुआ। यही कारण थी कि बीसवीं शताब्दी में प्राकृतिक विधि-सिद्धान्तों का पुनरुद्धार हुआ। मार्क्सवादी तथा हुक्मशाही शासन व्यवस्था की निरंकुशता भी इसके लिए कारणीभूत हुई| प्राकृतिक विधि का पुनरुद्धार तीन प्रकार की विचारधाराओं के प्रसार के कारण हुआ। प्रथम, मध्यकालीन धर्मप्रधान प्राकृतिक विधि का आधुनिकीकरण करके प्राकृतिक विधि सिद्धान्तों को परिमार्जित रूप में स्वीकार किया गया। द्वितीय, यह कि विधिक दार्शनिकों ने विधि को सार्वभौमिक अपरिवर्तनशील शक्ति के रूप में। स्वीकार करना अमान्य कर दिया तथा तृतीय, निरपेक्ष न्याय के आदर्श को अस्वीकार किया गया। दूसरे शब्दों में, प्राकृतिक विधि को अब समय और स्थानानुसार परिवर्तनशील माना जाने लगा तथा वह बाह्य एवं सापेक्ष मानी गयी। प्राकृतिक विधि की इस नई और परिवर्तित संकल्पना को ‘परिवर्तनीय तत्वयुक्त प्राकृतिक विधि (natural law with variable contents) कहा गया है। अब प्राकृतिक विधि का कार्य वास्तविक विधि को निरपेक्ष न्याय के अधिक निकट पहुँचाना ही रह गया। आधुनिक विधिशास्त्रियों का मत है कि कोई भी ‘आदर्श’ (ideal) निरपेक्ष (absolute) नहीं होता है तथा वह समय एवं स्थान के अनुसार परिवर्तनशील है।19. उन्होंने प्राकृतिक विधि को ऐसे विकासशील आदर्श के रूप में मान्य किया कि जो वास्तविक विधि की प्रगति में मार्ग-निर्देशक का कार्य कर सके। 

प्राकृतिक विधि के पुनरुद्धार के सन्दर्भ में आधुनिक विधिवेत्ताओं के प्राकृतिक विधि विषयक विचारों का उल्लेख करना उपयुक्त होगा। इन विचारकों में डेल वेक्हियो (Del Vecchio), गेनी (Geny), ली फर (Lee Fur), फुलर (Fuller), स्टेमलर (Stammler) तथा कोहलर (Kohler) आदि प्रमुख हैं।

डेल वेहियो (Del Vecchio) के अनुसार प्राकृतिक विधि कानून के विकास से सम्बन्धित एक ऐसा सिद्धान्त है जो मानव जाति को अधिक स्वायत्तता की ओर विकासोन्मुख करता है।

फ्रेंकॉइस गेनी (Francois Geny : (1861-1944) | गेनी ने प्राकृतिक विधि के सिद्धान्त का समर्थन वास्तविक विधि-सिद्धान्त के प्रति विरोध प्रकट करने के लिये किया। उनके विचार से प्राकृतिक विधि में अनेक तार्किक सिद्धान्त समाविष्ट हैं तथा इसमें स्थिरता है। जबकि वास्तविक विधि (positive law) गतिशील (dynamic) है और इसमें ऐसे विचारों का समावेश है जो किसी समाज-विशेष में किसी विशिष्ट समय में विद्यमान रहे होंगे।

 गेनी एक समाजशास्त्री-अधिवक्ता होने के कारण उन्होंने प्राकृतिक विधि को एक ऐसा सामाजिक कारक निरूपित किया जो न्यायाधीशों और विधायकों को प्रभावित करता है और उन्हें नियंत्रण में रहने के लिए बाध्य करता है। गेनी के अनुसार विधि-निर्माण या न्याय निर्णय सुनाते समय निम्नलिखित कारकों को ध्यान में रखा जाना आवश्यक होता है ताकि इस प्रकार निर्मित होने वाले कानून सामाजिक आवश्यकताओं को पूरा कर सकें–

(1) समाज में विद्यमान भौतिक एवं पारिस्थितिक परिवेश;

(2) समाज की रीतियाँ या परम्पराएं तथा इनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि;

(3) ऐसे मूलभूत सिद्धांत जो मानवीय जीवन एवं स्वतंत्रता को संवर्धित करने में सहायक हों;

(4) समाज के आदर्श एवं अभिलाषाएँ ।

इस प्रकार गेनी ने कतिपय विधि संबंधी सार्वभौमिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने का प्रयास किया। जिन्हें प्राकृतिक विधि सिद्धान्त के रूप में लागू किया जा सके।

19. स्टेमलर आर : दि थ्योरी ऑफ जस्टिस (1925) पृ० 32.

एक अन्य विधिशास्त्री ली फर (Lee Fur) ने प्राकृतिक विधि को नितांत आवश्य, माना है क्योंकि यह न्याय की धारणा के बहुत निकट है। प्राकृतिक विधि मानव-स्वभाव पर आधारित है तथा इसमें मनुष्य को यह अनुभूति होती है कि वह किसी वरिष्ठ शक्ति की उपज है जिसे ‘ईश्वर’ कहा गया है।

लॉन ल्यूयिस फुलर20 (Lon Luvois Fuller : 1902-1978)

फुलर (Fuller) ने प्राकृतिक विधि को ‘विचार करने की एक विशिष्ट पद्धति’ निरूपित किया है। उन्होंने प्रो० हार्ट के साथ हुए विधि की नैतिकता पर वाद-विवाद में प्राकृतिक विधि संबंधी रूढ़िवादी विचारधारा से हटकर इस बात पर जोर दिया कि नैतिक मूल्य सामाजिक व्यवस्था के अनुसार परिवर्तनशील हैं, अत: वे अनम्य नहीं हैं।21

फुलर ने नैतिकता की अवधारणा तथा विधि से उसके संबंधों के बारे में विस्तृत विश्लेषण करने के पश्चात् नैतिक कर्तव्य के दो प्रकार बताए–(1) सकारात्मक कर्तव्य; तथा (2) नकारात्मक कर्तव्य जो प्रविरत (forebearance) रहने से संबंधित होते हैं।

फुलर के अनुसार विधि एक प्रयोजन-मूलक पद्धति है जो नियमों द्वारा मानव-आचरण को नियंत्रित करती है। उन्होंने प्रत्येक विधि-प्रणाली में निम्नलिखित तत्वों का होना आवश्यक माना :

(1) विधि के नियम निश्चित (definite) होने चाहिए।

(2) इन नियमों का पर्याप्त प्रचार-प्रसार होना आवश्यक है;

(3) पूर्ववर्ती विधायन का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए;

(4) नियम बोधगम्य एवं सरल हों; ।

(5) विधि के नियम किसी प्रवर्तमान विधि से प्रतिकूल या असंगत न हों;

(6) विधि के नियम व्यावहारिक होने चाहिये, तथा वे ऐसे न हों कि जिसके कारण व्यक्ति को कुछ ऐसा करना पड़े जो उसकी शक्ति या क्षमता के परे हो;

(7) इनमें बार-बार परिवर्तन को टाला जाना चाहिए;

(8) विधि के नियमों तथा उनके वास्तविक प्रवर्तन एवं प्रशासन में उचित तारतम्य होना चाहिए।

फुलर ने जोर देकर कहा कि समाज में विधि-सम्मत शासन (Rule of Law) स्थापित करने के लिए विधि के नियमों में उपरोक्त बातों का होना नितांत आवश्यक है। वे इन्हें विधि की अन्तरिक नैतिकता’ मानते है  जेरोम हॉल (Jarome Hall : 1901-1987)

जेरोम हॉल ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि विधि में नैतिक, सामाजिक, भौतिक एवं औपचारिक तत्वों का समावेश होना आवश्यक है। इस दृष्टि से उन्हें प्राकृतिक विधि का एक प्रबल समर्थक माना गया है। उन्होंने विश्लेषणात्मक विधि और प्राकृतिक विधि में ताल-मेल बैठाने का भरसक प्रयास किया तथा विधि के नियमों, नैतिक मूल्यों एवं सामाजिक आचरण के सम्मिश्रण से एक नई विधिशास्त्रीय प्रणाली विकसित की जिसे ‘एकीकृत विधिशास्त्र’ (Integrative jurisprudence) कहा गया है। उन्होंने प्रथाओं को विधि के रूप में मान्यता दिये जाने को उचित ठहराया क्योंकि यह मानव के पूर्व अनुभवों पर आधारित होती है। हॉल के विचार से विधि में छ: तत्वों का होना आवश्यक है, जो-(1) नैतिक मान्यता, (2) क्रियात्मकता (functional), (3) नियमितता (regularity), (4) प्रभावशीलता (effectiveness), (5) लोकहित (public interest), तथा (6) श्रेष्ठता (supremacy) हैं।

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