LLB 1st Year Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 4 Notes Study Material

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Jurisprudence and Legal Theory Notes Study Material PDF LLB 1st Semester Year

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अध्याय 4 (Chapter 4)

प्राकृतिक विधि-सिद्धान्त (Natural Law Theory)

समाज में व्यक्ति को न्याय दिलाने की दिशा में विधि की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही कारण है कि सदियों से विधिवेत्तागण विधि की सार्थकता के बारे में अपनी-अपनी धारणाएँ व्यक्त करते चले आ रहे हैं। इस सम्बन्ध में एक धारणा की अभिव्यक्ति हमें प्राकृतिक विधि-सिद्धान्त में मिलती है। फ्रीडमैन के अनुसार प्राकृतिक विधि का इतिहास वस्तुत: मानव द्वारा शुद्ध न्याय की खोज तथा इसमें उसकी असफलता की कहानी मात्र है। राष्ट्रों के सामाजिक तथा राजनीतिक परिवर्तनों के साथ प्राकृतिक विधि सम्बन्धी धारणा में भी परिवर्तन होते रहे हैं। तथापि विचारकों ने सदैव ही यह स्वीकार किया है कि प्राकृतिक विधि के नियम वास्तविक सूत्रबद्ध विधि से कहीं अधिक उत्कृष्ट तथा ग्राह्य होते हैं।

प्राकृतिक विधि का महत्व

विधि के क्षेत्र में प्राकृतिक विधि के सिद्धान्त का पर्याप्त महत्व रहा है। रोम की सिविल विधि (Roman civil law) को सर्वदेशीय (cosmopolitan) व्यवस्था के रूप में परिवर्तित करने के लिये प्राकृतिक विधि का ही सहारा लिया गया था। इसी प्रकार मध्य युग (medieval period) में जर्मनी में चर्च और राज्य के बीच आपसी संघर्ष के समय इन दोनों ही पक्षों ने प्राकृतिक विधि का उपयेाग एक शास्त्र के रूप में किया तथा स्वयं को दूसरे पक्ष की तुलना में श्रेष्ठतर सिद्ध करने का प्रयास किया। अन्तर्राष्ट्रीय विधि की वैधता तो पूर्णत: प्राकृतिक विधि-सिद्धान्त पर ही आधारित है। व्यक्ति स्वातन्त्र्य के लिये राज्य की असीमित अधिकार-शक्ति के विरुद्ध आवाज उठाने वाले विचारकों ने प्राकृतिक विधि को ही अपनी विचारधारा को आधार बनाया। अमेरिका के न्यायाधीशों ने अमेरिकी संविधान के निर्वचन (interpretation) में प्राकृतिक विधि के नियमों का सहारा लेते हुए विधान-मण्डल द्वारा मनुष्य की आर्थिक स्वतंत्रता पर लगाये गये प्रतिबन्धों का विरोध किया।

विभिन्न राष्ट्रों के विकास में भी प्राकृतिक विधि-सिद्धांत का पर्याप्त योगदान रहा है। इस विधि के प्रति व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए विधिवेत्ताओं ने महत्वपूर्ण राजनीतिक, समाजशास्त्रीय तथा वैज्ञानिक सिद्धान्त प्रतिपादित किये जो समयानुकूल परिवर्तन लाने के लिये आवश्यक थे। जब कभी समाज में अशांति या अराजकता फैलने लगी तो लोगों का विश्वास प्रचलित विधि-व्यवस्था से उठने लगा। ऐसी कठिन परिस्थितियों में मनुष्य को आवश्यक सामाजिक संरक्षण दिलाने के प्रयत्नस्वरूप विद्वानों ने प्राकृतिक विधि के आदर्शतम नियमों को तत्कालीन प्रचलित विधि में समाविष्ट किये जाने पर बल दिया तथा प्रचलित विधि में तदनुसार परिवर्तन किये। | विधिशास्त्रियों ने प्राकृतिक विधि को अपनी विचारधाराओं के अनुसार अनेक भागों में विभक्त किया है। तदनुसार प्राकृतिक विधि को प्राधिकारिक तथा व्यक्तिवादी (Authoritarian and Individualistic), प्रगतिशील तथा रूढ़िवादी (progressive and conservative), धार्मिक तथा विवेकशील (Religious and Rationalistic), निरपेक्ष तथा सापेक्ष (absolute and relative) आदि वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। परन्तु न्यायिक दृष्टि से प्राकृतिक विधि से तात्पर्य ऐसे आदर्श नियमों से है, जो राज्य की वास्तविक सूत्रबद्ध विधि की तुलना में कहीं अधिक उत्कृष्ट और व्यावहारिक हों तथा जिनका वास्तविक विधि द्वारा अनुकरण किया जाना अपेक्षित है। जेरोम हॉल के अनुसार विधि के विकास में सामाजिक भूल्यों (social values) की। परिहार्य भूमिका रहती है जो विधि को नैतिकता से पूर्णत: पृथक किये जाने से रोके रहती है।

1. फ्रीडमैन : लीगल थ्योरी (पांचवाँ संस्करण), पृ० 95.

2. जेरोम हॉल : फाउंडेशन्स ऑफ ज्यूरिसपूडेंस अध्याय 2 पृ० 22.

इसमें संदेह नहीं कि विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के समर्थकों ने अपनी धारणाओं की पुष्टि के लिए। प्राकृतिक विधि-सिद्धान्त से प्रेरणा ली। परन्तु प्राकृतिक विधि-सिद्धान्त में सामान्यत: दो महत्वपूर्ण विचारों का समावेश प्रमुखता से दिखलाई देता है। प्रथम, यह एक ऐसी सर्वव्यापी व्यवस्था है जो सभी मनुष्यों के प्रति समान रूप से लागू होती है। दूसरे, इसके अनुसार मनुष्यों के अधिकार अन्तरणीय नहीं हैं। इस दृष्टि से विधिक मान्यताओं के क्रम में प्राकृतिक विधि सिद्धान्त की भूमिका महत्वपूर्ण है। अन्तर्राष्ट्रीय विधि के उद्गम का मूल स्रोत होने के कारण प्राकृतिक विधि सदैव ही विकासोन्मुख रही है।

प्राकृतिक विधि का अर्थ

विधिक-क्षेत्र में यह धारणा प्रारम्भ से ही चली आ रही है कि मानव द्वारा निर्मित विधि स्वयं में पूर्ण नहीं हो सकती; अत: प्राकृतिक विधि के आधार पर विद्वानों ने कुछ ऐसे आदर्श नियम बनाने का प्रयास किया जो वास्तविक जीवन में लागू किये जा सकें। प्राकृतिक नियम की धारणा का उदय प्राचीन यूनान से हुआ। सोफोक्लीज के अनुसार कुछ ऐसे अलिखित कानून भी हैं जो सभी प्राणियों के प्रति समान रूप से लागू होते हैं। अरस्तू के पश्चात् यूनान में स्टोइक विचारधारा (Stoic philosophy) ने जोर पकड़ा। इस विचारधारा के समर्थकों के अनुसार कुछ ऐसे नियम होते हैं जो प्रकृति, जीव और मनुष्य, सभी के प्रति समान रूप से लागू होते हैं। उन्होंने इन सर्वव्यापी और सर्वकालिक नियमों को प्राकृतिक विधि” की संज्ञा दी । उनका विश्वास था कि समस्त विश्व ऐसे ही व्यापक बुनियादी नियमों से बंधा हुआ है। स्टोइक्स के अनुसार ये नियम तर्क या विवेक पर आधारित हैं और इन्हें ‘‘दैवी नियम” भी कहा जा सकता है क्योंकि ये ईश्वर के ऐसे आदेश हैं जो मानव पर लागू हैं। मानव अपनी बुद्धि के आधार पर ऐसे नियमों का सृजन कर सकता है। कालांतर में। मध्यकालीन तथा आधुनिक विचारकों ने प्राकृतिक विधि के विषय में अपनी अलग-अलग व्याख्यायें दीं।।

प्राकृतिक विधि के सम्बन्ध में एक विचारधारा यह भी रही है कि जिस प्रकार शासक किसी निश्चित समुदाय पर शासन करता है तथा अपनी व्यावहारिक विवेक-बुद्धि (practical reason) से कुछ आदेशों को निर्मित करता है, उसी प्रकार ईश्वर समस्त ब्रह्माण्ड पर शासन करता है तथा ईश्वरीय बुद्धि से उत्पन्न कुछ प्राकृतिक नियम होते हैं, जो सभी प्राणियों के प्रति समान रूप से लागू होते हैं। शासक द्वारा निर्मित आदेशों को वास्तविक या सूत्रबद्ध विधि कहा जाता है जबकि ईश्वरीय नियमों को दैवी या प्राकृतिक विधि की संज्ञा दी गयी है। जीवों की सामान्य प्रवृत्तियों के आधार पर प्राकृतिक विधि की कल्पना साकार हुई। इसे विद्वानों ने व्यावहारिक जीवन में लागू किये जाने पर बल दिया, अर्थात् उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मानव-निर्मित समस्त विधियों को प्राकृतिक नियमों के अनुकूल होना चाहिए। तात्पर्य यह है कि विधिवेत्ताओं ने प्राकृतिक नियमों को विधि के आदर्श मानते हुए यह व्यक्त किया कि मानव द्वारा निर्मित ऐसे सभी सूत्रबद्ध कानन्। (अर्थात वास्तविक विधि या राजकीय विधि) जो प्राकृतिक विधि के विरुद्ध हैं, अनुचित होंगे। इसका अर्थ यह हुआ कि प्राकृतिक विधि (natural law) ही सामान्य विधि (ordinary law) को मान्यता या अमान्यता प्रदान करती है।

प्राकृतिक विधि की परिभाषा

प्राकृतिक विधि की परिभाषा के विषय में विधिशास्त्री एक-मत नहीं हैं तथा उन्होंने अपनी-अपनी । धारणाओं के अनुसार इसे परिभाषित किया है। तथापि इस बात से प्रायः सभी विधिशास्त्री सहमत हैं कि परिवर्तनों के साथ स्वयं को अनुकूलित (adapt) करना प्राकृतिक विधि का सर्वश्रेष्ठ गण है क्योंकि अन्तर्गत मुल धारणा यह अन्तर्निहित है कि समाज सदैव परिवर्तनशील है और ऐसा ही बना देगा।

विधिवेत्ताओं का मानना है कि प्राकृतिक विधि जैसा कि नाम से ही स्पष ३ अन्तर्निहित होने के कारण इसके लिये राज्य या विधायन जैसे किसी बाह्य सर्जनकर्ता की आवश्यकता नही होता होती है अपित यह स्वयमेव विकसित होती रहती हैं। डायस के अनुसार मानव स्वभाव में निहित मूल्य । यया विधायन जसे किसी बाह्य सृजनकर्ता की आवश्यकता नहीं (values) ही प्राकृतिक विधि को वैधता प्रदान करते हैं ।

3. डायस आर० एम० डब्ल्यू० : ज्यूरिसपूडेन्स (5वां संस्करण) पृ० 65

कोहेन के मतानुसार प्राकृतिक विधि कोई अधिनियमित या संकलित विधि न होकर कार्यों या घटनाओं को मानव दृष्टि से देखने और परखने की पद्धति मात्र है जिसमें नैतिकता, न्याय, औचित्य (Reason) सदाचरण, समता, स्वतन्त्रता आदि के तत्व विद्यमान रहते हैं।

विधिशास्त्रीय दृष्टिकोण से प्राकृतिक विधि से आशय ऐसे नियमों तथा सिद्धान्तों से है जिनका उद्भव किसी ऐसे बाह्य दैवी स्रोत से हुआ है जो राजनीतिक या सांसारिक संस्थाओं से परे है। कुछ विधिवेत्ता इसे दैवी प्रदत्त नियम मानते हुये इन्हें न्याय-प्रशासन में उचित महत्व दिये जाने पर बल देते हैं। यहां तक कि वर्तमान यथार्थवादी विधिक विचारधारा के समर्थकों ने विधि की समाजशास्त्रीय शाखा को विकसित करने में प्राकृतिक विधि के नियमों का सहारा लिया है ताकि समाज में मानवों के बीच टकरावों को टाला जा सके।

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