LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 32 Part 2 Notes Study Material

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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 32 Notes Study Material

Jurisprudence and Legal Theory Notes Study Material PDF LLB 1st Semester Year

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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 32 Part 2 Notes Study Material

Chapter 32 Part 2

लोकहित वादों के लिये उच्चतर न्यायालयों की इपिस्टोलरी अधिकारिता (Epistolary jurisdiction of the higher courts in PIL cases)

उच्चतर न्यायालयों, अर्थात् उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों को लोकहित वादों में प्राप्त इपिस्टोलरी अधिकारिता (epistolary jurisdiction) के फलस्वरूप भारत में लोकहित वादों को नई दिशा प्राप्त हुई है। इपिस्टोलरी अधिकारिता (Epistolary jurisdiction) के अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय उसे सम्बोधित किये गये किसी शिकायती पत्र को जनहित याचिका के समान मानकर उस पर न्यायिक कार्यवाही कर सकेगा। न्यायालय को सम्बोधित पत्र को या समाचार-पत्र में किसी समाचार News item) को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किये जाने हेतु उसमें निम्नलिखित बातों का होना आवश्यक है-

(1) ऐसा पत्र किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा लोकहित में लिखा गया हो जिसमें ऐसे व्यक्तियों के लिये न्याय की मांग की गयी हो, जो अलाभकारी स्थिति में होने के कारण व्यथित होने पर भी स्वयं न्यायालय तक पहुंचने में असमर्थ हो।

(2) उपर्युक्त पीड़ित व्यथित व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह का किसी वैधानिक या विधिक हित का उल्लंघन या हनन हुआ हो, तो पत्र द्वारा इसकी शिकायत उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय में की जाने पर न्यायालय इसे PIL रिट मानकर उस पर कार्यवाही करेगी।

(3) ऐसी स्थिति में न्यायालय नियमित रिट याचिका दायर की जाना आवश्यक नहीं समझेगा और उस पत्र को ही रिट याचिका मानकर उस पर कार्यवाही करेगा।

(4) व्यक्ति,जो न्यायालय को इस प्रकार का शिकायती-पत्र लिखता है, उसका यह कार्य सद्भावनापूर्ण होना चाहिये और इसमें उसका कोई निजी हित, लाभ या निहित स्वार्थ नहीं होना चाहिये और न यह सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करने की नीयत से लिखा गया हो।

सत्तर और अस्सी के दशक में जब भारत में लोकहित वाद का प्रारम्भ हुआ तो ऐसे पत्र न्यायालय को सम्बोधित किये जाने के बजाय प्रायः न्यायमूर्ति पी० एन० भगवती या जस्टिस कृष्णा अय्यर के नाम से सम्बोधित किये जाने थे क्योंकि देश में इनकी ख्याति सक्रिय न्यायाधीशों के रूप में थी। इसी प्रकार राजस्थान न्यायालय के न्यायाधीश गुमानमल लोढ़ा का नाम भी जनहित मामलों के समर्थकों में अग्रणी माना जाता था। परन्तु लोगों की इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के उद्देश्य से इन न्यायालयों में विशिष्ट लोकहित याचिका प्रकोष्ठ (PIL Cell) का गठन किया ताकि सभी जनहित याचिकायें न्यायालय को ही सम्बोधित हों न कि किसी न्यायाधीश विशेष के नाम।

स्वप्रेरणा अधिकारिता के अन्तर्गत माननीय न्यायाधीश भगवती को लोकहित में सम्बोधित किये गये पत्रों में बंधआ मजदरी की मुक्ति और पुनर्वास की समस्या,50 पर्यावरण असन्तुलन से सम्बन्धित मसरी हिल का प्रकरण,51 सम्प्रेक्षण गृह में रह रही बालिकाओं की दुर्दशा,52 जीवन के अधिकार में पहंच मार्ग का

48. ए० आई० आर० 1993 सु० को० 20 (35).

49. ए० आई० आर० 1993 सु० को० 280.

50. नीरजा चौधरी बनाम म० प्र० राज्य, ए० आई० आर० 1984 सु० को० 1099.

51. रूरल लिटीगेशन एण्ड इण्टाइटिलमेण्ट केन्द्र देहरादून बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1985 सु० को० 360.

52. डॉ० उपेन्द्र बक्सी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, क्रि० लॉ ज० (1986) सु० को० 484.

अधिकार,53 म्युनिसिपल द्वारा साफ-सफाई में अव्यवस्था,54 खतरनाक औद्योगिक संयन्त्रों से जहरीली गैस के रिसाव की समस्या5 आदि के प्रकरण विशेष उल्लेखनीय हैं।

प्रवासी श्रमिकों (Migrants Labour) की समस्या से सम्बन्धित सलाल हाइड्रो प्रोजेक्ट56 का जनहित प्रकरण पत्र द्वारा उच्चतम न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश डी० ए० देसाई को सम्बोधित किया गया। राज्य के विरुद्ध लोकहित को संरक्षण

भारत के संविधान के निर्माताओं द्वारा संविधान में मूलभूत अधिकारों का प्रावधान रखे जाने का मुख्य उद्देश्य यह था कि नागरिकों को राज्य की ज्यादतियों के विरुद्ध उचित संरक्षण दिलाया जा सके। इन प्रावधानों को इस प्रकार रखा गया है कि कोई भी दमनकारी सरकार उनमें अनुचित हस्तक्षेप या फेरबदल न कर सके और नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन करने से विरत रहे। मौलिक अधिकारों द्वारा राज्य की मनमानी शक्ति पर उचित अंकुश लगाने का प्रयास किया गया है। अतः इन अधिकारों की संवैधानिक गारंटी द्वारा केन्द्र, राज्य या स्थानीय सरकारों के कार्यों पर युक्तियुक्त प्रतिबंध लगाये गये हैं और उनकी सीमायें निर्धारित की गयी हैं।57 नागरिकों के मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिये राज्य पर अनेक कर्त्तव्य और दायित्व अधिरोपित किये गये हैं। तथापि भारत में लोकहित कार्यवाही की प्रतिस्थापना के पूर्व समाज के गरीब, असहाय और कमजोर वर्ग के लोगों के लिए यह अधिकार केवल कागजी महत्व रखते थे क्योंकि सामाजिक और आर्थिक असमर्थता के कारण इन अधिकारों के प्रवर्तन के लिये उनका न्यायालय तक पहुँच पाना असम्भव था। अतः विवश होकर वे प्रबल सरकारी शक्ति के हाथों शोषण और पीड़न के शिकार बने रहते थे। परिणामतः भारतीय संविधान में प्रावधानित कल्याणकारी राज्य के लक्ष्य के बावजूद सामाजिक न्याय की कल्पना समाज के एक बड़े भाग के लिये निरर्थक थी और इसका लाभ केवल समृद्ध और सम्पन्न लोगों तक ही सीमित था। परन्तु भारत की न्याय प्रणाली में लोकहित कार्यवाही के पदार्पण से अब दलित और शोषित लोगों के लिये मौलिक अधिकार कपोल-कल्पना मात्र न रहकर वास्तविकता में परिवर्तित हो गये हैं। इसीलिये बंधुआ मुक्ति मोर्चा बनाम भारत संघ8 के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि सामाजिक और आर्थिक न्याय को सार्थक रूप देकर समाज के उपेक्षित वर्ग के लोगों को मूलभूत मानवीय अधिकार दिलाना तथा सभी को न्याय के समान अवसर उपलब्ध कराना ही संविधान का मुख्य लक्ष्य है। अत: राज्य द्वारा किया गया ऐसा कोई भी कार्य जो इन निर्बन्धनों का उल्लंघन करता हो, शून्य प्रभावी होगा।

पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ59 के लोकहित मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि अस्पृश्यता निवारण,60 बेगार निषेध61 बच्चों से कठिन श्रम कार्य लिये जाने पर प्रतिबंध आदि ऐसे मौलिक अधिकार हैं जो राज्य पर यह दायित्व अधिरोपित करते हैं कि वह इन अधिकारों का प्रवर्तन करे और निजी व्यक्तियों से भी इनका अनुपालन कराएं। न्यायालय ने इन अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिये लोकहित कार्यवाही को एक सशक्त माध्यम माना है। मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन हेत उच्चतम न्यायालय62 अथवा उच्च न्यायालय63 में याचिका प्रस्तुत की जा सकती है।

अनुच्छेद 32 (2)

53. हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम उमेदराम शर्मा, ए० आई० आर० 1986 सु० को० 342.

54. रतलाम म्युनिसिपल काउन्सिल बनाम वर्धीचन्द्र, (1880) 4 एस० सी० सी० 162.

55. एम० सी० मेहता बनाम भारत संघ, (1871) 1 एस० सी० सी० 398.

56. श्रमिक सलाल हाइड्रो प्रोजेक्ट बनाम जम्मू एवं कश्मीर राज्य, ए० आई० आर० 1984 एस० सी० 177 57. एम० पी० जैन : भारतीय संवैधानिक विधि, (1987) पृ० 702.

58. ए० पी० आर० 1984 सु० को० 811…

59. ए० आई० आर० 1982 सु० को० 1473.

60. संविधान का अनुच्छेद 17.

61. अनुच्छेद 23 व 24.

62. अनुच्छेद 32.

63. अनुच्छेद 226 (1).

के अधीन इस संबंध में उच्चतम न्यायालय को विस्तृत अधिकार शक्ति प्राप्त है। लोकहित की याचिका के लिये भी इन्हीं उपबंधों का प्रयोग किया जाता है। उच्चतम न्यायालय की सदैव यह धारणा रही है कि याचिका से सम्बंधित अधिकारिता (Writ Jurisdiction) का प्रयोग करते समय उपबंधों में वर्णित औपचारिकताओं के अर्थान्वयन पर विशेष ध्यान न दिया जाये बल्कि इन प्रावधानों के उद्देश्यों की ओर अधिक ध्यान दिया जाये तथा संविधान के तीन प्रमुख भागों, उद्देशिका (Preamble), मौलिक अधिकारों तथा नीति निर्देशक सिद्धान्तों से मार्गदर्शन लेते हुये इन्हें वास्तविक रूप से प्रवर्तित कराने की दिशा में प्रयास किया जाये।

उच्चतम न्यायालय के समक्ष लोकहित में लायी गयी विभिन्न रिट याचिकाओं में राज्य को नागरिकों के निम्नलिखित अधिकारों को सुरक्षित कराने के लिए कर्त्तव्याधीन माना गया है-

1. राज्य का यह परम दायित्व है कि वह सुनिश्चित करे कि किसी भी नागरिक, विशेषकर दलित, उपेक्षित और शोषित वर्ग के लोगों के, जो कानूनी लड़ाई की क्षमता नहीं रखते, मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न होने दे। इस हेतु केन्द्र और राज्य सरकार को विभिन्न सामाजिक कल्याण और श्रमिकों के हितों से संबंधित कानूनों का यथोचित अनुपालन करना चाहिये ताकि कामगारों को जीवन की न्यूनतम सुविधायें उपलब्ध करायी जा सकें और वे मानवीय गरिमा के अनुकूल जीवन यापन कर सकें 64

2. विधिसम्मत शासन (Rule of Law) की स्थापना करना राज्य का परम दायित्व है और लोकहित वाद का आंदोलन राज्य को इस कर्त्तव्य के प्रति सतर्क करते हुये इसे इस संवैधानिक उत्तरदायित्व को निभाने के लिये बाध्य करता है। उल्लेखनीय है कि निःशुल्क विधिक सहायता इसी दिशा में एक प्रगतिशील कदम है। इसके अतिरिक्त अनेक वादों में ‘सुने जाने के अधिकार’ (Locus Standi) को शिथिल बनाते हुए उसके प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाया जाना भी विधिसम्मत शासन को सार्थक बनाने की दिशा में एक प्रयत्न है जिससे ऐसे लोगों को विधिक उपचार सुलभ हो सके, जो धनाभाव के कारण अब तक न्याय प्राप्त करने के अधिकार से वंचित रहे हैं।

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