LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 32 Notes Study Material

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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 32 Part 2 Notes Study Material

Jurisprudence and Legal Theory Notes Study Material PDF LLB 1st Semester Year

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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 32 Notes Study Material
LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 32 Notes Study Material

अध्याय 32 (Chapter 32)

भारतीय विधिशास्त्र के नये आयाम (New Trends in Indian Jurisprudence)

LLB Notes Study Material

मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ व्यक्ति के कार्य-कलापों में भी उल्लेखनीय अभिवृद्धि हुई, जिसके परिणामस्वरूप सामाजिक जटिलताओं का प्रादुर्भाव हुआ। उन समस्याओं को सुलझाने हेतु राज्य द्वारा विधि का प्रयोग किया जाने लगा। इसीलिए सामण्ड ने विधि को मानव आचरण को नियंत्रित करने वाला साधन निरूपित किया है। मानव को अपने संव्यवहारों के औचित्य या अनौचित्य का निर्धारण करने के लिए विधि की जानकारी होना आवश्यक है। यही कारण है कि वर्तमान जीवन की सामाजिक जटिलताओं से जूझने के लिए जनसाधारण को विभिन्न कानूनों की जानकारी कराना राज्य का परम कर्त्तव्य है। भारत में कानून (विधि) की स्थिति

वर्तमान समय में विधि को सामाजिक परिवर्तन के साधन के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है। यह कार्य मुख्यतः विधायन द्वारा नियोजित होता है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में यह सर्वविदित है कि धनी और धनहीनों के बीच की खाई अभी भी बढ़ती जा रही है यद्यपि इसे विभिन्न कानूनों द्वारा पाटने के भरसक प्रयास किये जा रहे हैं। संविधान के अनुच्छेद 39 (ख) के नीति-निर्देशक तत्व द्वारा राज्य से यह अपेक्षित है कि वह गरीबों तथा साधनहीनों के शोषण तथा दमन के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करे तथा भौतिक साधनों का साम्यिक वितरण सुनिश्चित करें ताकि जनसाधारण के हितों में संवर्धन हो सके। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु राज्य द्वारा अनेक सामाजिक एवं आर्थिक कानून पारित किये गए जो देश की बदलती हुई सामाजिक परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए राष्ट्रीय विकास की ओर लक्षित हैं।

ज्ञातव्य है कि उपर्युक्त प्रयासों के बावजूद भारतीय समाज आज भी अनेक गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है जिनमें गरीबी, बेरोजगारी, सामाजिक एवं आर्थिक पिछड़ापन, साम्प्रदायिकता, राजनीतिक दुराचरण, आतंकवाद आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। निरन्तर बढ़ती हुई भौतिकवादी प्रवृत्ति, शिक्षा के बाजारीकरण तथा राष्ट्रीय चरित्र के हास के कारण प्रत्येक व्यक्ति स्वार्थ एवं धन-लोलुपता में लिप्त है। अत: ऐसी परिस्थिति में विधि और विधायन का महत्व और भी बढ़ जाता है क्योंकि केवल इनके माध्यम से ही समाज के विभिन्न घटकों के हितों में टकराव की स्थिति का निवारण करते हुए इनमें सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है। यहाँ यह उल्लेख कर देना भी आवश्यक है कि केवल कानून पारित कर देने मात्र से ही इन समस्याओं का निदान संभव नहीं है जब तक कि उन्हें प्रभावी ढंग से लागू किये जाने हेतु सार्थक प्रयास नहीं किये जाते। वर्तमान में भ्रष्टाचार निवारण, अस्पृश्यता निवारण, दहेज निषेध, बाल विवाह निषेध, बँधुआ मजदूरी उन्मूलन, मद्य निषेध आदि ऐसे अनेक कानून वर्षों से प्रचलित हैं लेकिन समाज में इनका उल्लंघन सरेआम हो रहा है जिसके कारण ये कानून केवल एक औपचारिकता मात्र बनकर रह गए हैं। संभवत: राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी इन कानूनों के प्रभावी ढंग से प्रवर्तन में मुख्य रुकावट है।

इस संदर्भ में उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश कृष्णा अय्यर ने अभिमत प्रकट किया है कि कानून तथा प्रणाली में आदर्शवादिता के बजाय नैतिकता को प्रथम स्थान दिया जाना चाहिए। नैतिकता व्यक्ति के सदाचार की ओर प्रेरित करती है जिससे उसे समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का बोध होता है।

  1. उदाहरणार्थ, दहेज निषेध (संशोधन) अधिनियम 1986, दण्ड विधि (संशोधन) अधिनियम, 1983, मादक द्रव्य एवं मनः प्रभावी पदार्थ (संशोधन) अधिनियम, 1989, कम्पनी (संशोधन) अधिनियम, 2002, पंचायती राज्य अधिनियम, 1993, उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 1993. माध्यस्थम अधिनियम, 1996, किशोर न्याय (बालका संरक्षण और देखरेख) अधिनियम, 2000, महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम 2005, मातावरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 आदि.

भारत में न्यायपालिका की सर्वोच्चता (Supremacy of Judiciary in India)

न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को भारतीय संविधान का एक मूल आधार (basic structure) माना गया है। संविधान के मूल ढांचे के आधार स्तम्भ अपरिवर्त्य (immutable) होने के कारण उनका निबंधन संविधानिक अधिदेशों (mandates) के अनुरूप किया जाना आवश्यक होता है। अत: न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि न्यायाधीश संविधान की नीतियों से हटकर विधि की व्याख्या करने के लिये स्वतन्त्र है। प्रत्येक स्थिति में संविधानिक नीतियों के अनुरूप निर्णय देना उनका परम कर्तव्य है। चूंकि न्यायाधीशों की सत्यनिष्ठा, ईमानदारी और सद्चरित्रता ही न्यायपालिका की स्वतन्त्रता का आधार-स्तम्भ है, इसलिये न्यायाधीशों से अपेक्षा की जाती है कि वे न्याय-निर्णय में निष्पक्षता, निर्भीकता तथा पारदर्शिता बरतें और किसी प्रकार के राजनीतिक, सामाजिक या आर्थिक प्रलोभन से मुक्त रहें। उन्हें अपने निर्णयों के परिणामों को ध्यान में रखते हुये न्याय-दान करना चाहिये ताकि किसी के प्रति भी वह अन्यायपूर्ण न हो लोकनीति के अनुकूल हों। विशेषतः न्यायाधीशों को स्वतः की सस्ती लोकप्रियता तथा अनावश्यक साहसिकता (Undue adventurism) से बचना चाहिये ताकि समाज में उनकी प्रतिष्ठा बनी रहे। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सबसे अहम बात यह है कि न्यायपालिका के सदस्यों को भ्रष्टाचार रूपी दानव (monster of corruption) से स्वयं को दूर रखना नितान्त आवश्यक है जिसने भारतीय लोकतन्त्र को खोखला करके विश्व में लज्जा-पात्र बना दिया है। 

न्यायपालिका के लिये यह परम आवश्यक है कि वह अपनी गरिमा और स्वतन्त्रता सतत् बनाये रखे ताकि लोगों का न्यायालयों के प्रति विश्वास बना रहे और यह तभी सम्भव है जब न्यायाधीशगण स्वयं को सभी प्रलोभनों से पूर्णतः मुक्त रखें।

भारत का संविधान-एक सामाजिक दस्तावेज (Constitution of India–A Social Document)

जन सामान्य की आकांक्षाओं के कार्य रूप में परिणित करने की दृष्टि विधि को एक सशक्त माध्यम या साधन माना जाता है। अतः उसकी पवित्रता और महत्व को बनाये रखने के लिये सभी भारतीयों को दढसंकल्पित रहना चाहिये। संविधान को सामाजिक दस्तावेज इसलिये कहा गया है क्योंकि इसमें उन सभी बातों का समावेश है जो एक स्वस्थ एवं विकासशील समाज के लिये आवश्यक होती हैं जैसे विधि की सर्वोपरिता (Supremacy of Law), सामाजिक-आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता, प्रजातान्त्रिक व्यवस्था आदि। संविधान के भाग-III में नागरिकों को प्राप्त मौलिक अधिकार स्वतन्त्र एवं प्रजातान्त्रिक समाज को सुनिश्चित करते हैं। इन अधिकारों को मौलिक इसलिये कहा गया है क्योंकि राज्य के तीनों अंगों, अर्थात, कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका द्वारा इनका उल्लंघन किये जाने पर नागरिकों को इनके विरुद्ध सांविधानिक संरक्षण प्राप्त हैं। अपने अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों द्वारा उच्चतम न्यायालय ने मौलिक अधिकारों की सर्वोपरिता को मान्यता प्रदान की है।

संविधान के भाग-IV में वर्णित नीति निदेशक सिद्धान्त राज्य को निर्देशित करते हैं कि वह राज्य उपाय करे जिससे लोक कल्याण सुनिश्चित हो। संविधान में विधिसम्मत शासन (Rule of law) को विशेष महत्व दिया गया है तथा लोगों के वैयक्तिक अधिकारों तथा विधिक उत्तरदायित्व में समचित सन्तलन बना रहे।

संविधानिक विधि के सन्दर्भ में यह उल्लेख किया जाना आवश्यक है कि भारत जैसे विशाल देश में केवल अधिनियमों तथा संविधियों को पारित किए जाने मात्र से सामाजिक सुधारों की अपेक्षा करना उचित नहीं होगा जब तक कि इन विधियों के पारित किये जाने के पूर्व आवश्यक जनमा संग्रहीत नहीं कर लिया जाता। विधि निर्माण की प्रक्रिया के साथ-साथ विधि के क्रियात्मक पहलू पर भी उचित ध्यान दिया जाना

  • केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य, ए० आई० आर० 1973 सु० को० 1461; मेनका गांधी बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1978 सु० को० 759; उन्नीकृष्णन बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य, ए० आई० आर० 1993 सु० को० 2178 आदि.

आवश्यक होता है क्योंकि किसी भी विधि की सफलता उसे प्राप्त जनाधार पर निर्भर करती है। सामान्यतः । देखा गया है कि विधि निर्माता, अर्थात् संसद या विधान मण्डल कोई विधि पारित करते समय जनता से उसके समर्थन और अनुपालन की जो अपेक्षा करते हैं, वास्तव में वैसा होता नहीं है क्योंकि समाज से उसे अपेक्षित । प्रत्युत्तर (Response) नहीं मिलता है जिसके फलस्वरूप उस कानून को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाती है। राजनीतिक दलों के सदस्यों सम्बन्धी दल-बदल कानून, दहेज प्रतिषेध कानून, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण कानून, आरक्षण सम्बन्धी कानून आदि इसके उदाहरण हैं। इन कानूनों के वर्षों से प्रचलित होने के बावजूद ये अपराध प्रायः घटित होते रहते हैं क्योंकि जनता को इनके प्रति विशेष आस्था नहीं है। अत: यह परम आवश्यक है कि किसी भी विधान या विधि के पारित करने के पूर्व विधायिका को समाज की वास्तविकताओं तथा जनता की सम्भावित प्रतिक्रिया की और अवश्य ध्यान देना चाहिये।

इस सन्दर्भ में न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने कहा है कि “हम अपनी पुरानी विधायनी गरिमा को तब तक पुनः प्राप्त नहीं कर सकते जब तक कि हमारी वर्तमान प्रणाली में नैतिकता को महत्व नहीं जाता है।” किसी भी विधि में नैतिकता का तत्व उस विधि को बल प्रदान करता है। यदि हम कर अपवंचको का कालाधन उजागर करने पर छुट देते रहेंगे तो इससे ईमानदार करदाता पर अवांछित भार पड़ेगा तथा उसे हताशा हागा, जो विधिक दृष्टि से न्यायसंगत नहीं है। ए० आर० अन्तले बनाम भारत संघ के प्रकरण में भी अपीलों, प्रति अपीलों, याचिकाओं तथा पुनर्विलोकन पिटीशनों के कारण भ्रष्टाचार का अपराध दबा दिया गया जो उचित नहा कहा जा सकता है।

तथापि भारत की वर्तमान सामयिक परिस्थितियों तथा सामाजिक परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए भारतीय विधि-क्षेत्र में भी अनेक जनकल्याणकारी प्रगतिशील कदम उठाये गये हैं जिनमें (1) विधिक साक्षरता; (2) निर्धनों को निःशुल्क विधिक सहायता; (3) लोक अदालतें; तथा (4) लोकहित-वादों की पद्धति विशेष उल्लेखनीय हैं। इनके द्वारा जनसाधारण को सामाजिक न्याय दिलाने में सुविधा हुई है तथा वितरणात्मक न्याय (distributive justice) की कल्पना का क्रियान्वयन संभव हो सका है।

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