LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 31 Notes Study Material

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Jurisprudence and Legal Theory Notes Study Material PDF LLB 1st Semester Year

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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 31 Notes Study Material
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अध्याय 31 (Chapter 31)

प्रक्रिया-विधि (The Law of Procedure)

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न्याय-प्रशासन में विधि की महत्वपूर्ण भूमिका है। न्याय संपादन की दृष्टि से विधि के दो प्रमुख कार्य हैं। प्रथम, विधि उन अधिकारों को विनिश्चित करती है जिनके उल्लंघन के लिए विधिक उपचार दिलाया जा सकता है। दूसरे, वह विधिक अधिकारों के प्रवर्तन की कार्यवाही या प्रक्रिया (Procedure) को विनिर्दिष्ट करती है। अधिकारों का सृजन व निर्धारण करने वाली विधि को सारभूत विधि (Substantive Law) कहते हैं जबकि अधिकारों के उपचार हेतु अपनायी जाने वाली कार्यवाही को प्रक्रियात्मक विधि (Procedural Law) कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, सारभूत विधि अधिकारों को विनिश्चित करती है जबकि प्रक्रियात्मक विधि उपचारों का निर्धारण करती है। प्रक्रियात्मक विधि को कार्य-विधि भी कहा गया है। सामण्ड के अनुसार विधि की वह शाखा जो मुकदमेबाजी की प्रक्रिया को अनुशासित करती है, प्रक्रियात्मक विधि कहलाती है।

प्रक्रियात्मक विधि के अन्तर्गत दीवानी तथा फौजदारी दोनों ही प्रकार के मामलों की कार्यवाही सम्बन्धी प्रक्रिया सम्मिलित है। इसमें विभिन्न प्रकार के न्यायालयों के गठन, उनकी अधिकारिता तथा साक्ष्य आदि सम्बन्धी प्रक्रिया का समावेश है। प्रक्रिया विधि में वे समस्त कार्यवाहियां शामिल रहती हैं जो किसी पक्षकार द्वारा अपने अधिकारों के प्रवर्तन के लिए न्यायालय की सहायता पाने हेतु अपनाई जानी चाहिये। प्रक्रिया विषयक विधि का सम्बन्ध उस कार्यवाही से है जिसके द्वारा अधिकार के प्रवर्तन के लिए उपचार उपलब्ध कराया जा सके।

सारभूत विधि तथा प्रक्रियात्मक विधि में अन्तर

सामण्ड के अनुसार सारभूत विधि तथा प्रक्रियात्मक विधि में निम्नलिखित भेद हैं

(1) सारभूत विधि मुकदमे से सम्बन्धित पक्षकारों के पारस्परिक सम्बन्धों तथा संव्यवहारों का निर्धारण करती है जबकि प्रक्रियात्मक विधि के अन्तर्गत मुकदमे से सम्बन्धित न्यायालयों तथा पक्षकारों के आपसी आचरणों को विनियमित किया जाता है।

(2) सारभूत विधि उन उद्देश्यों का वर्णन करती है जिन्हें प्राप्त करने के लिए न्याय-प्रशासन की स्थापना हई है। प्रक्रियात्मक विधि का सम्बन्ध उन साधनों से है जो न्याय-प्रशासन के उद्देश्य को पूरा करते हैं। उदाहरणार्थ, न्याय-प्रशासन का एक उद्देश्य है कि किसी व्यक्ति से छीनी गई सम्पत्ति उसे वापस दिलाई जाए। ऐसी सम्पत्ति को प्राप्त करने के लिए किस न्यायालय में किस प्रकार का वाद प्रस्तुत किया जाए यह प्रक्रियात्मक विधि से सम्बन्धित विषय है।

(3) सारभूत विधि में विवादियों के अधिकारों तथा प्रतिकारों का वर्णन दिया रहता है जबकि प्रक्रियात्मक विधि अधिकतर न्यायालयीन प्रक्रिया तथा कार्य-प्रणाली का वर्णन करती है।

उपर्यक्त भेदों के होते हए भी यह कहना पूर्णतः सही नहीं है कि सारभत विधि केवल अधिकारों को विनिश्चित करती है और प्रक्रिया विधि उपचारों का निर्धारण करती है क्योंकि अपील का आधकार अथवा

1. The law of Procedure may be defined as the branch of the law which governs the process of litigation. Salmond : Jurisprudence (12th ed. p. 461).

दूसरे पक्ष से पूछताछ करने का अधिकार सारभूत विधि से सम्बन्धित होने पर भी प्रक्रियात्मक विधि की विषय-वस्तु है। इसी प्रकार उपचारों का निर्धारण करने वाले अनेक नियम प्रक्रियात्मक विधि की विषयवस्तु होने पर भी सारभूत विधि का भाग है; जैसे-भारतीय दण्ड विधि में अपराधों के वर्णन के साथ-साथ इनके लिए दण्ड का उल्लेख भी किया गया है।

भारतीय दण्ड प्रक्रिया संहिता (The Code of Criminal Procedure) तथा साक्ष्य विधि (Law of Evidence), अधिकांशतः प्रक्रियात्मक विधि के रूप में हैं जबकि भारतीय दण्ड संहिता (Indian Penal Code), भारतीय संविदा विधि (Indian Contract Act), सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम (Transfer of Property Act) आदि सारभूत विधि के उदाहरण हैं। सिविल प्रक्रिया संहिता (Civil Procedure Code) का प्रथम भाग अधिकतर सारभूत विधि से सम्बद्ध है क्योंकि इसमें सारभूत सामान्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। किन्तु द्वितीय भाग में संकलित किये गये आदेशों (Orders) का सम्बन्ध उन सामान्य सिद्धान्तों से है जो प्रक्रियात्मक स्वरूप के होने के कारण प्रक्रिया-विधि के भाग हैं।

सामण्ड ने प्रक्रिया विधि के तीन ऐसे उदाहरणों का उल्लेख किया है जो व्यावहारिक प्रवर्तन में सारभूत विधि के समान हैं

(1) साक्ष्य का प्रक्रियात्मक नियम यह है कि संविदा केवल लिखित रूप में ही साबित की जा सकती है। यह नियम संविदा की उस सारभूत विधि के समरूप है जिसमें यह कहा गया है कि अलिखित संविदा शून्य-प्रभावी होगी।

(2) साक्ष्य विधि की सभी उपधारणाएँ प्रक्रियात्मक स्वरूप की होती हैं किन्तु इनका क्रियान्वयन सारभूत विधि के समान ही होता है। उदाहरणार्थ, साक्ष्य (evidence) सम्बन्धी यह नियम कि सात वर्ष से कम आयु के बालक आपराधिक आशय के लिए असमर्थ (doli incapex) होते हैं, प्रक्रियात्मक विधि का अंग होने पर भी सारभूत विधि के उस भाग के अनुरूप हैं जिनमें यह कहा गया है कि सात वर्ष से कम आयु का बालक किसी अपराध के लिए दण्डित नहीं किया जा सकता है।

(3) अनुयोजनों (Actions) का परिसीमन (limitation) प्रक्रियात्मक विधि का अंग होते हुए भी वह चिरभोगाधिकार (Right of Prescription) के समरूप है, जो सारभूत विधि की विषय-वस्तु है।

न्यायिक प्रक्रिया के मुख्य चरण (Various Stages of Judicial Procedure)

न्यायिक प्रक्रिया के आवश्यक तत्वों का उल्लेख करते हुए सामण्ड ने कहा है कि प्रत्येक न्यायिक कार्यवाही में निम्नलिखित तत्वों का होना अनिवार्य है :

1. समन (Summons)

समन का उद्देश्य मुकदमे में हित रखने वाले पक्षकारों को न्यायालय में उपस्थित होने के लिए आदेश देना है ताकि वे न्यायालय के समक्ष अपना वाद प्रस्तुत कर सकें तथा न्यायालय उसकी सुनवाई करके अपना निर्णय दे सके।

2. अभिवचन (Pleadings)

ये विवादियों द्वारा न्यायालय के समक्ष उठाये गये तथ्य-सम्बन्धी अथवा विधि सम्बन्धी विवादास्पद पान होते हैं जिनके आधार पर न्यायालय मुकदमे को विनिश्चत करता है। दीवानी कार्यवाही में वादी द्वारा वाद-पत्र (Plaint) प्रस्तुत किया जाता है। तत्पश्चात् प्रतिवादी अपना जवाब-दावा (Written Statement) प्रस्तत करता है और इसके बाद प्रत्युत्तर (replication) कार्यवाही शुरू होती है। इस प्रकार वादपत्र, जवाबदावा तथा प्रत्युत्तर, ये दीवानी कार्यवाही के तीन प्रमुख अंग हैं। परन्तु आपराधिक कार्यवाही इससे भिन्न है। इसमें कार्यवाही परिवाद (Complaint) अथवा पुलिस रिपोर्ट से प्रारम्भ होती है।

2. भा० द० सं०, धारा 82.

3. सामण्ड: ज्यूरिसप्रूडेन्स (12वाँ संस्करण), पृ० 464.

3. सबूत (Proof)

मुकदमे में हित रखने वाले पक्षकार न्यायालय के समक्ष विचाराधीन प्रश्नों के विषय में साक्ष्य तथा सामग्री प्रस्तुत करते हैं जिनके आधार पर न्यायालय अन्तिम निर्णय पर पहुँचता है। मामलों से सम्बन्धित साक्ष्य या सामग्री न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किये जाने की प्रक्रिया को ‘सबूत पेश करना’ कहते हैं।

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