LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 30 Notes Study Material

अध्याय 30 (Chapter 30)

विधिक बाध्यताएं (Legal Obligations)

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Jurisprudence and Legal Theory Notes Study Material PDF LLB 1st Semester Year

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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 30 Notes Study Material
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विधिक संकल्पना के रूप में बाध्यता से आशय बन्धनकारी प्रभाव से है। सामान्य अर्थ में ‘बाध्यता’ (obligation) को कर्त्तव्य का पर्यायवाची माना जाता है। किन्तु वैधानिक दृष्टि से इसका अर्थ कर्त्तव्य से भिन्न है। विधि के अन्तर्गत ‘बाध्यता’ से निम्नलिखित आशय अभिप्रेत है-

(1) वैयक्तिक अधिकार के अनुरूप कर्त्तव्य का होना।

(2) बाध्यता विधिक आवश्यकता का ऐसा बन्धन है, जो दो या दो से अधिक व्यक्तियों को आबद्ध करता है। एक का अधिकार दूसरे का दायित्व होता है। उदाहरणार्थ, ऋण की अदायगी अथवा संविदा का पालन अथवा अपकृत्य के लिए क्षतिपूर्ति करना आदि कर्त्तव्य बाध्यता के अन्तर्गत आते हैं। सामंड ने बाध्यता को vinculum juris कहा है जिसका अर्थ है विधिक आवश्यकता का बन्धन।

(3) बाध्यतायें साम्पत्तिक अधिकारों (preprietory rights in personam) से सम्बद्ध होती हैं।

बाध्यता संबंधी विधिवेत्ताओं के विचार

डॉ० हालैण्ड के अनुसार बाध्यता एक ऐसा बन्धन है “जिसमें एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के हित के लिए कार्य करने के लिए बाध्य रहता है। कुछ मामलों में दोनों पक्ष एक साथ आबद्ध होने के लिए सहमत होते हैं तथा कुछ मामलों में वे बिना अपनी सहमति के भी आबद्ध होते हैं, परन्तु प्रत्येक मामले में विधि ही इस प्रकार का गठबन्धन करती है और वही इसे समाप्त भी कर सकती है।”2 |

पैटन (G.W. Paton) के अनुसार बाध्यता विधि का वह भाग है, जो व्यक्तिबंधी अधिकारों (Rights in personam) का सृजन करता है।

सैविनी के विचार से बाध्यता दूसरे व्यक्ति पर एक प्रकार का नियंत्रण है, जो उसके व्यक्तित्व के सभी कार्यों के प्रति न होकर केवल ऐसे कार्य के प्रति होता है जिसे यह माना जाये उस व्यक्ति की स्वेच्छा से घटाकर हमारी इच्छा के अधीन कर दिया गया है।

कॉन्ट (Kant) के अनुसार किसी व्यक्ति की इच्छा पर किसी अन्य व्यक्ति के आधिपत्य को बाध्यता कहते हैं।

विख्यात विधिवेत्ता आन्सन (Anson) का विचार है कि बाध्यता निश्चित व्यक्तियों द्वारा निश्चित व्यक्तियों के प्रति निश्चित कार्यों के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला नियंत्रण है; या इसे ऐसी सहिष्णुता भी कहा जा सकता है जिसका मूल्यांकन मुद्राओं में किया गया हो।

सामण्ड ने ‘बाध्यता’ को परिभाषित करते हुए कहा है कि यह साम्पत्तिक स्वरूप के वैयक्तिक अधिकारों से उत्पन्न होने वाला कर्त्तव्य है। उनके अनुसार बाध्यता विधिक आवश्यकता का ऐसा बन्धन है जो दो या अधिक व्यक्ति को आपस में आबद्ध करता है। यह केवल कर्त्तव्य का ही द्योतक नहीं है, अपितु सुधारात्मक

1. An obligation is the vinculum juris, or bond of legal necessity, which binds together two or more determinate individuals.–Salmond : Jurisprudence, (12th ed.) p. 446.

2. हालैण्ड : दि एलिमेन्ट्स ऑफ ज्यूरिसप्रूडेन्स पृ० 245.

3. It may be called a forbearance which is valued in terms if money-Anson.

अधिकार का भी प्रतीक है क्योंकि आबद्ध व्यक्ति के लिए यह कर्तव्य का प्रतीक है जबकि जिस व्यक्ति का प्रति बाध्यता उद्भावित होती है, उसके लिए वह अधिकार का द्योतक है।

लेम्बर्ट (Lambert) के शब्दों में विधिक बाध्यताओं का संबंध मानव संबंधों के चल-तत्वों (mobile lements) से है, अर्थात् इसे दैनिक जीवन से संबंधित विधि कहा जा सकता है।

बाध्यता तथा दायित्व में अन्तर

मन विधिशास्त्रियों ने सम्पत्ति और बाध्यता में भेद स्पष्ट करते हुए कहा है कि सम्पत्ति सर्वबन्धक अधिकार होती है जबकि बाध्यता व्यक्तिबन्धी। इसी प्रकार बाध्यता तथा दायित्व एक दूसरे से भिन्न हैं। बाध्यता ऐसा कर्त्तव्य है जिसे व्यक्ति को करना चाहिये जबकि दायित्व ऐसा कर्त्तव्य है जिसे व्यक्ति को करना ही होगा। जब कोई व्यक्ति अपने बाध्यतायुक्त कर्त्तव्य से विमुख होता है, तो उस पर दायित्व अधिरोपित हो जाता है।

वाद-वस्तु (chose in action)

विधिशास्त्र में बाध्यताओं के लिए एक अन्य तकनीकी शब्द प्रयुक्त किया गया है जिसे ‘चोज इन एक्शन’ (chose in action) कहते हैं। इसका अर्थ है-मूल्य के रूप में वस्तु के प्रति वैयक्तिक अधिकार । कम्पनी के अंश, ऋण, किसी अपकृत्य के लिए क्षतिपूर्ति का दावा आदि इसके उदाहरण हैं। इसमें असाम्पत्तिक अधिकारों का समावेश नहीं है।

भोग-वस्तु (Chose in possession)

‘चोज इन एक्शन’ का ठीक उल्टा ‘चोज इन पजेशन’ (chose in possession) होता है, जिसका अर्थ है-किसी व्यक्ति में वस्तु का वास्तविक कब्जा निहित होना। किसी व्यक्ति के पर्स में रखे रुपये-पैसे या किसी ऋणदाता को ऋणी व्यक्ति से प्राप्य ऋण की राशि, ‘चोज इन पजेशन’ के उदाहरण हैं। सामण्ड का विचार है कि वस्तुओं (choses) सम्बन्धी इस भेद का उद्भव प्राचीन विधियों में कब्जे के अत्यधिक महत्व के कारण हुआ है। परन्तु वर्तमान में यह महत्व लगभग समाप्तप्राय हो जाने के कारण इस भेद का आशय केवल यह है कि इससे व्यक्तिबन्धक अधिकार और सर्वबन्धक अधिकार में अन्तर स्पष्ट होता है। सभी व्यक्तिबन्धक साम्पत्तिक अधिकार (Proprietary Rights in personam) ‘चोज इन एक्शन’ कहलाते हैं। है डायस (Dias) के अनुसार सम्पत्ति सम्बन्धी वैयक्तिक अधिकार जिनका प्रवर्तन अनुयोज्य दावे द्वारा किया जा सकता है ‘चोज इन एक्शन’ कहलाते हैं तथा इन्हें भौतिक कब्जे द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इसके विपरीत ‘चोज इन पजेशन’ से आशय उन वस्तुओं से है जो भौतिक कब्जे में रखे जाने योग्य होती है। इनमें सभी मूर्त वस्तुओं का समावेश है।

समेकित बाध्यता (Solidary Obligation)

बाध्यताओं के विषय में धारणा यह है कि जो व्यक्ति बाध्यता (obligation) से लाभान्वित होता है उसे लनदार (creditor) कहते हैं तथा जो व्यक्ति उससे आबद्ध रहता है उसे देनदार (debtor) कहते हैं। लेनदार का दृष्टि से बाध्यता एक व्यक्तिगत साम्पत्तिक अधिकार है।

सामान्यतः बाध्यता में एक लेनदार तथा एक देनदार होता है। परन्तु कभी-कभी दो या अधिक लेनदार । बाध्यता के हकदार होते हैं अथवा दो या अधिक देनदार एक ही दायित्व के अधीन होते हैं। साझेदारी

artnership Firm) इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। फर्म के साझेदारों द्वारा देय ऋण को चुकाने के लिए साकसी को भी बाध्य किया जा सकता है और यदि उनमें से कोई एक भी उस ऋण का भुगतान कर सभा साझेदार उस ऋण से उन्मोचित हो जाते हैं। इस प्रकार की बाध्यता को समेकित बाध्यता

4. It may be said to be the law of everyday life-Lambert.

5. डायस आर० एम० डब्ल्यू० : ज्यूरिसप्रूडेन्स 5वां संस्क० 1994 पृ० 221.

(solidary obligation) कहते हैं क्योंकि इसमें प्रत्येक साझेदार अपने आनुपातिक हिस्से के बजाय परे ऋण के लिए आबद्ध रहता है। इस प्रकार समेकित बाध्यता में दो या अधिक लेनदार उसी देनदार के प्रति उसी वस्तु के लिए ऋणबद्ध होते हैं।

इंग्लिश विधि के अन्तर्गत समेकित बाध्यता तीन प्रकार की हो सकती है-(1) पृथक् (Several), (2) संयुक्त (Joint), (3) पृथक् एवं संयुक्त (Several and Joint)

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