LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 29 Notes Study Material

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Jurisprudence and Legal Theory Notes Study Material PDF LLB 1st Semester Year

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अध्याय 29 (Chapter 29

दायित्व (Liability)

LLB Notes Study Material

विधिशास्त्र के अन्तर्गत दायित्व एक ऐसी संकल्पना (concept)1 है जिसके विषय में विधिवेत्ताओं के विचार भिन्न-भिन्न रहे हैं। व्यापक अर्थ में दायित्व से आशय ‘न्यायिक बंधन’ से है। मनुष्य का दायित्व उस समय उत्पन्न होता है जब वह किसी व्यक्ति के प्रति अपने विधिक कर्त्तव्य का उल्लंघन करता है। यह सर्वविदित है कि अपकार-कर्त्ता (wrongdoer) अपने अपकृत्य (wrong) के लिए दायी होता है। इसीलिए सामण्ड ने कहा है कि “दायित्व आवश्यकता का ऐसा बन्धन है, जो अपकारकर्ता और उसके द्वारा किये गये अपकार के उपचार के बीच विद्यमान है।”2 दायित्व का उद्भव राज्य की प्रभुता-शक्ति से होता है। उल्लेखनीय है कि दायित्व की संकल्पना बाध्यता (obligation) से भिन्न है। बाध्यता का सम्बन्ध उन कर्त्तव्यों से है, जो वैयक्तिक अधिकार के अनुरूप होते हैं जबकि दायित्व के अन्तर्गत कोई व्यक्ति अपने किसी अपकृत्य के परिणाम का भुगतान अथवा उसके लिए हानिपूर्ति करने के लिए दायित्वाधीन रहता सम्बन्ध उन कलेखनीय है कि चार के बीच विद्यमापकता का ऐसा बन्ध है।

जब व्यक्ति कोई ऐसा कार्य नहीं करता है जो उसे करना चाहिये था, तो इसके लिये उसे जो कुछ करना पड़ता है या भुगतना पड़ता है, उसी को ‘दायित्व’ कहा जाता है।

दायित्व के प्रकार

सामण्ड ने दायित्व के निम्नलिखित प्रकार बताये हैं

(1) सिविल दायित्व तथा आपराधिक दायित्व (Civil and Criminal Liability);

(2) उपचारात्मक दायित्व तथा शास्तिक दायित्व (Remedial and Penal Liability)

सिविल दायित्व (civil liability) में प्रतिवादी के विरुद्ध दीवानी कार्यवाही द्वारा वादी के अधिकार का प्रवर्तन कराया जाता है जबकि आपराधिक दायित्व (criminal liability) का सम्बन्ध अपराधी को अपराध कृत्य के लिए दण्डित करने की कार्यवाही से है।

उपचारात्मक दायित्व (remedial liability) के अन्तर्गत वादी के अधिकार का विनिर्दिष्ट अनुपालन (specific enforcement) कराया जाता है तथा इसका मूल उद्देश्य अपकारी को दण्डित कराना न होकर वादी के अधिकारों की रक्षा करना है। शास्तिक दायित्व (penal liability) में अपराधकर्ता को दण्डित करने की भावना प्रमुख रूप से विद्यमान रहती है। उदाहरणार्थ, किसी ऋणी व्यक्ति का ऋण चुकाने का दायित्व उपचारात्मक दायित्व होता है, परन्तु किसी अपमान-लेख के प्रकाशित करने वाले व्यक्ति को कारावासित किये जाने का अथवा क्षतिपूर्ति करने का दायित्व शास्तिक दायित्व (penal liability) कहा जायेगा।। उल्लेखनीय है कि आपराधिक दायित्व (criminal liability) प्रत्येक दशा में शास्तिक (penal) होता है। जबकि सिविल दायित्व अधिकांशत: उपचारात्मक (remedial) स्वरूप का होता है, तथापि वह शास्तिक भा हो सकता है।

1. इसे vinculum juris कहा गया है.

2. “Liability is the bond of necessity that exists between the wrongdoer and the wrong.”- almond : Jurisprudence (12th ed.), p. 349.

उपचारात्मक दायित्व का सिद्धान्त (The Theory of Remedial Liability)

जैसा कि कथन किया जा चुका है कि उपचारात्मक दायित्व का एकमात्र उद्देश्य वादी के अधिकारों का विनिर्दिष्ट प्रवर्तन कराना है। जब कभी कानून किसी कर्त्तव्य का सृजन करता है, तो वह उस कर्त्तव्य के विनिर्दिष्ट पूर्ति का प्रवर्तन कराता है। जो व्यक्ति इस कर्त्तव्य का पालन नहीं करते उन पर विधि के अन्तर्गत उपचारात्मक दायित्व (remedial liability) अधिरोपित किया जाता है, अर्थात् कानून अपकारी को कर्त्तव्य की पूर्ति करने के लिए बाध्य करता है। दूसरे शब्दों में, यदि किसी व्यक्ति ने किसी विधि के नियम का पालन उस प्रकार नहीं किया है जैसा कि उसे करना चाहिए, तो राज्य अपनी भौतिक शक्ति के बल पर कानून का विनिर्दिष्ट प्रवर्तन करा सकेगा। उपचारात्मक दायित्व सम्बन्धी इस सामान्य सिद्धान्त के कुछ अपवाद हैं। जिनका उल्लेख किया जाना आवश्यक है। निम्नलिखित दशाओं में विधि द्वारा कर्तव्यों का विनिर्दिष्ट अनुपालन नहीं कराया जाता है

1. अपूर्ण बाध्यता के कर्त्तव्य (Duties of imperfect obligations)

किसी अपूर्ण कर्त्तव्य का अनुपालन न किये जाने पर विधि के अन्तर्गत दायित्व उत्पन्न नहीं होता है। उदाहरणार्थ, अवधि सीमा अधिनियम द्वारा बाधित ऋण की अदायगी के लिये ऋणी व्यक्ति के विरुद्ध कोई विधिक कार्यवाही नहीं की जा सकती, भले ही वह ऋण कितना ही वैध क्यों न हो।।

उल्लेखनीय है कि यद्यपि अवधि बाधित ऋण (Time barred debt) न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय (enforceable) नहीं होता है, परन्तु इसका आशय यह कदापि नहीं है कि न्यायालय इस बात को स्वीकार करने से इन्कार करता है कि ऋणी व्यक्ति ऋणदाता का कर्जदार है। दूसरे शब्दों में, यदि अवधि सीमा से बाधित हो जाने के पश्चात् ऋणी व्यक्ति ऋणदाता को ऋणराशि का संदाय (भुगतान) कर देता है, तो यह पूर्णत: विधिमान्य होगा। आशय यह है कि अवधि बाधित ऋण का विधि या न्यायालय द्वारा प्रवर्तन नहीं कराया जा सकता लेकिन इससे ऋणी व्यक्ति का ऋण राशि को वापस पाने का अधिकार (Right) समाप्त नहीं हो जाता है, और यदि ऋणी व्यक्ति उसकी ऋणराशि का भुगतान करता है, तो यह संव्यवहार पूर्णतः वैध एवं विधिमान्य होगा।

2. ऐसे कर्त्तव्य जिनका विनिर्दिष्ट प्रवर्तन नहीं कराया जा सकता कोतवारी (Duties which cannot be specifically enforced after a breach has taken place)

कुछ परिस्थितियों में कृत्य के स्वरूप को देखते हुए उसका उल्लंघन होने पर उसका विनिर्दिष्ट अनुपालन कराना संभव नहीं होता है।

यदि किसी व्यक्ति द्वारा अपमान-लेख (libel) प्रकाशित किया जा चुका है या हमला किया जा चुका है, तो उस दशा में अपकार-कर्ता को घटित कार्य से विरत रहने के लिए विवश करना व्यर्थ होगा क्योंकि अपकार घटित हो जाने पर अपकारी के विरुद्ध अपमान-लेख प्रकाशित न करने या हमला न करने के कर्त्तव्य का विनिर्दिष्ट प्रवर्तन कोई अर्थ नहीं रखता है।

3. ऐसे कर्त्तव्य जिनका विनिर्दिष्ट प्रवर्तन अनुपयुक्त या अयुक्तियुक्त हो (Where the specific enforcement of the duty is inadvisable or inexpedient)

अनेक कर्त्तव्य ऐसे होते हैं जिनका विनिर्दिष्ट प्रवर्तन कराना संभव होते हुए भी वह समयोचित (expedient) नहीं होता। उदाहरणार्थ, कानून के अन्तर्गत विवाह-सम्बन्धी वचनबद्धता का विनिर्दिष्ट प्रवर्तन कराने के बजाय क्षतिपर्ति दिलाना ही उचित माना जाता है। इसी प्रकार किसी व्यक्ति द्वारा वैयक्तिक सेवा का करार को भंग किया जाने पर उसके विनिर्दिष्ट अनुपालन के बजाय क्षतिपूर्ति दिलायी जाना ही अधिक उपर एवं कालोचित होगा।

3. विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 की धारा 14.

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