LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 28 Part 2 Notes Study Material

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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 28 Notes Study Material

Jurisprudence and Legal Theory Notes Study Material PDF LLB 1st Semester Year

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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 28 Part 2 Notes Study Material
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देव प्रतिमा (Idols)

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भारतीय विधि के अन्तर्गत देवप्रतिमा (Idol) को विधिक व्यक्ति माना गया है। विद्यापूर्ण तीर्थस्वामी बनाम विद्यानिधि तीर्थस्वामी58 के वाद में स्पष्ट किया गया था कि कल्पित व्यक्तियों में सबसे प्राचीनतम व्यक्ति देव-मूर्ति है। हिन्दू देव-प्रतिमा को मानवीकरण के आधार पर विधिक व्यक्ति माना गया है और यह एक ऐसी विधिक सत्ता है जो मानव की हैसियत प्राप्त कर संपत्ति रखने योग्य है।59 चूँकि देव-प्रतिमा को आदर्श विधिक व्यक्तित्व प्राप्त है, इसलिए प्रतिमा के लिए स्थापित किये गये धर्मदाय (endowment) के प्रति शाश्वतता के विरुद्ध नियम (Rule Against Perpetuity) लागू नहीं होता है। 60 तथापि देवकीनंदन बनाम मुरलीधर61 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने विनिश्चित किया कि देव प्रतिमा एक विधिक व्यक्ति अवश्य है लेकिन धर्मदाय में उसका अपना कोई लाभकारी हित नहीं होता तथा वास्तविक हितग्राही पुजारी ही होते हैं।

चित्रदासी न्यास के शासकीय न्यासी बनाम आयकर आयुक्त, पश्चिम बंगाल62 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चूँकि हिन्दू देवता (प्रतिमा) संपत्ति धारण कर सकता है और उसकी आय भी होती है और वह न्यायालय में वाद ला सकता है या उसके विरुद्ध वाद लाया जा सकता है, इसलिए उसकी आय पर कर लगाया जा सकता है। साधारणत: उस पर कराधान सेवायतों के माध्यम से लगाया जाता है, जो उसकी संपत्ति का प्रबंध एवं देखरेख करते हैं।

उच्चतम न्यायालय ने कृष्णा सिंह बनाम मथुरा63 के वाद में अभिनिर्धारित किया कि हिन्दू मन्दिर की सम्पत्ति उसकी देव-प्रतिमा में निहित रहती है। न्यायालय ने ‘मठ’ की वैधानिक स्थिति मन्दिर’ से भिन्न निरूपित करते हुये विनिश्चित किया कि हिन्दू मठ अपने आप में स्वतन्त्र विधिक व्यक्ति होता है परन्तु मन्दिर की स्थिति में प्रमुख तत्व देव-प्रतिमा (Idol) होता है और प्रतिमा को ही वैधानिक प्रास्थिति प्राप्त है। इसके विपरीत, मठ का मुख्य व्यक्ति ‘मठाधीश’ या ‘महन्त’ होता है इसलिये नठ की सम्पत्ति महन्त के पद के साथ जुड़ी रहती है और वह विरासत में उसके उत्तराधिकारी को अन्तरित होती है। मठ के मठाधीश को मठ के न्यासी की प्रास्थिति प्राप्त नहीं है, भले ही वह मठ की सम्पदा को आजीवन धारण किये रहे। मठाधिपति या मठाधीश से यह अपेक्षा की जाती है कि वह प्रथा के अनुसार मठ की अधिकांश सम्पत्ति का विनियोग धार्मिक कार्यों या दान-कार्यों के लिये करे। आशय यह है कि मन्दिर के सन्दर्भ में उसमें प्रतिस्थापित मूर्ति (प्रतिमा) को विधिक व्यक्तित्व प्राप्त है जब कि मठ के सन्दर्भ में मठाधीश या महन्त वैधानिक व्यक्ति होगा।

मस्जिद

उल्लेखनीय है कि मुस्लिम मस्जिद की स्थिति हिन्दू देव प्रतिमा से भिन्न है। मस्जिद में किसी देवता का मानवीकरण नहीं होता है और न ही मुस्लिम विधि के अन्तर्गत इसे जीवित व्यक्ति की भाँति स्वीकार किया गया है। शहीद मौला बक्श बनाम हफीजुद्दीन64 के वाद में उच्च न्यायालय ने मस्जिद को एक विधिक व्यक्ति मानते हुए निर्णय दिया कि इसके विरुद्ध वाद संस्थित किया जा सकता है तथा यह स्वयं अपने नाम से वाद ला सकती है। परन्तु मस्जिद शाहगंज बनाम शिरोमणि, गुरुद्वारा प्रबंधक समिति65 के वाद में प्रीवी कौंसिल ने निर्णय दिया कि मस्जिद को कृत्रिम व्यक्तित्व प्राप्त नहीं है, अत: न तो यह किसी के विरुद्ध वाद ला सकती है और न कोई इसके विरुद्ध वाद ला सकता है।

58. आई० एल० आर० (1914) 27 मद्रास 435.

59. श्रीधर बनाम आयकर अधिकारी, ए० आई० आर० 1966 कलकत्ता 494.

60. विजय नन्द बनाम कालीपद, (1914) 1 कलकत्ता 57.

61. ए० आई० आर० 1955 सु० को० 133.

62. (1974)1 उम०नि०प० 947.

63. ए० आई० आर० 1980 सु० को० 707.

64. ए० आई० आर० 1926 लाहौर 372.

65. (1940) 67 IA 54.

गुरुग्रंथ साहिब

उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति, अमृतसर बनाम सोमनाथ दास66 के वाद में सिक्खों के पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब को विधिक व्यक्ति घोषित किया गया है। यद्यपि न्यायालय ने गुरु ग्रंथ साहिब की तुलना देव प्रतिमा के साथ की जाने की दलील को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि मूर्ति पूजा सिख धर्म से असंगत है, तथापि उच्चतम न्यायालय ने स्वीकार किया कि जो सम्मान हिदू देव प्रतिमा को देता है वही सम्मान एक सिक्ख गुरु ग्रंथ साहिब को देता है।

इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि गुरुद्वारा और गुरु ग्रंथ साहिब का दो अलगअलग व्यक्तित्व नहीं है। इसी प्रकार गुरु ग्रंथ साहिब की स्थिति अन्य धर्मों की पवित्र पुस्तकों, उदाहरणार्थ, मुस्लिमों के लिए कुरान, ईसाइयों के लिए बाइबिल या हिन्दुओं के रामायण; भगवद्गीता आदि से भिन्न है क्योंकि इन्हें विधिक व्यक्ति नहीं माना गया है। इसका कारण यह है कि गुरु ग्रंथ साहिब की पूजा गुरु के समान की जाती है और गुरु ग्रंथ साहिब गुरुद्वारे की आत्मा एवं हृदय है।।

इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने अपने पूर्व निर्णय प्रतिमादास महन्त बनाम शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति67 को उद्धृत करते हुए स्पष्ट किया कि गुरुद्वारे में पूजा का केन्द्र बिन्दु पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब है, जो सिक्खों के गुरु-तुल्य होने के कारण विधिक व्यक्ति है।

भारत संघ एवं राज्यों का विधिक व्यक्तित्व

भारत संघ (Union) तथा राज्यों को भी विधिक व्यक्ति माना गया है।68 भारत के राष्ट्रपति को भी विधिक व्यक्तित्व प्राप्त है क्योंकि वह एक एकल निकाय की भाँति है। राष्ट्रपति के पद पर जीवित व्यक्ति जाते और आते रहते हैं लेकिन विधि द्वारा निर्मित इस पद का अस्तित्व निरंतर बना रहता है, अर्थात् कभी समाप्त नहीं होता। परन्तु उल्लेखनीय है कि भारत के प्रधान मंत्री को विधिक व्यक्ति नहीं माना गया है क्योंकि कुछ परिस्थितियों में यह पद बिना किसी व्यक्ति के भी रिक्त रह सकता है।

केन्द्र या राज्य सरकार के मंत्रियों को भी विधिक व्यक्ति नहीं माना गया है क्योंकि वे एकल निकाय नहीं हैं। इसका कारण यह है कि इनकी नियुक्ति क्रमश: राष्ट्रपति तथा राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती है, अतः वे संविधान के अनुच्छेद 53 एवं 154 के अन्तर्गत ‘शासकीय अधिकारी’ ही माने गये हैं।69 इसका एक अन्य कारण यह भी है कि अपने कृत्यों के लोप के लिए वे वैयक्तिक रूप से उत्तरदायी नहीं होते हैं और न उनके कार्यालयीन कृत्यों के लिए उनके विरुद्ध न्यायालय में सीधे वाद संस्थित किया जा सकता है। मंत्रीगणों के कार्यों के लिए राज्य दायित्वाधीन होता है। इसी प्रकार अपने कार्यालयीन कार्यों के दौरान की गयी किसी संविदा भंग के लिए उन पर व्यक्तिशः कार्यवाही नहीं की जा सकती है।70

भारतीय रिजर्व बैंक को एक विधिक व्यक्ति माना गया है क्योंकि यह एक निगमित निकाय है जिसका स्वतन्त्र अस्तित्व है। लेकिन संघ लोक सेवा आयोग तथा संयुक्त हिन्दू परिवार को विधिक व्यक्ति नहीं माना गया है। इसका कारण यह है कि ये दोनों ही सम्पत्ति धारण नहीं कर सकते और इनके नाम से, इनके द्वारा या इनके विरुद्ध न्यायालय में स्वतन्त्र रूप से वाद संस्थित नहीं किया जा सकता है।

भारतीय विधि के अन्तर्गत भागीदारी फर्म (Partnership Firm) को निगमित निकाय (incorporated body) नहीं माना गया है।71 अत: वह स्वयं के नाम से वाद संस्थित नहीं कर सकती है और न उसके विरुद्ध

66. (2000) 4 ए०सी० सी० 186.

67. (1984) 2 एस० सी० सी० 600.

68. भारत का संविधान अनुच्छेद 300, 32 तथा 226.

69. न्यू मेरिन कोल कंपनी बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1962 सु० को० 15.

70. न्यू मेरिन कोल कंपनी बनाम भारत संघ, ए० आई० आर० 1962 सु० को० 15.

71. बाभा गुजदर बनाम आयकर आयुक्त, ए० आई० आर० 1995 सु० को० 74 (77).

(उसके नाम से) वाद ही लाया जा सकता है। यही कारण है कि भागीदारी फर्म के सदस्य स्वयं अपनी फर्म के साथ कोई संविदा नहीं कर सकते क्योंकि कोई व्यक्ति स्वयं के साथ संविदा करने के लिये सक्षम नहीं होता है। परन्तु एक निगमित कम्पनी का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व होता है जो कि उसके सदस्यों के अस्तित्व से भिन्न है। अत: निगमित कम्पनी स्वतन्त्र रूप से संविदा करने की क्षमता रखती है,यहाँ तक कि उसके सदस्य स्वयं भी उसके साथ स्वतन्त्र संविदा कर सकते हैं।

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