LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 28 Notes Study Material

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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 28 Part 2 Notes Study Material

Jurisprudence and Legal Theory Notes Study Material PDF LLB 1st Semester Year

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LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 28 Notes Study Material
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अध्याय 28 (Chapter 28)

विधिक व्यक्ति (Juristic Persons)

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विधि का प्रमुख उद्देश्य समाज में व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्धों को विनियमित करना है। विधि द्वारा व्यक्तियों के कार्यों (acts) तथा कार्य-लोपों (omissions) का निर्धारण ‘औचित्य’ के आधार पर किया जाता है। मनुष्य के ऐसे कार्य जिनका अन्य व्यक्तियों के हितों (interests) पर प्रतिकूल परिणाम नहीं पड़ता, विधि के अन्तर्गत उचित या विधिमान्य’ कार्य माने जाते हैं जबकि ऐसे कार्य जो अन्यों के हितों में बाधक होते हैं, विधि में अनुचित या ‘अवैध’ कार्य कहलाते हैं। समाज में मानव हितों के संरक्षण के लिए विधि द्वारा व्यक्ति पर कुछ कर्त्तव्य अधिरोपित किये गये हैं। कर्त्तव्यों के परिणामस्वरूप विधि के अन्तर्गत मानव अधिकारों को मान्यता प्राप्त है। सारांश यह है कि व्यक्ति के कार्यों की वैधता का निर्धारण, कर्त्तव्यों तथा अधिकारों के आधार पर ही किया जाता है। अनौचित्यपूर्ण ‘अवैध’ कार्य करने वाले व्यक्ति पर विधि द्वारा ‘दायित्व’ अधिरोपित किया जाता है जिसका प्रवर्तन विधिक शास्तियों (legal sanctions) द्वारा कराया जाता है। तात्पर्य यह है कि विधि का मुख्य कार्य मानव आचरण (human conduct) को नियंत्रित करने से सम्बन्धित होने के कारण विधिक व्यक्ति (legal persons) को विधि का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है।

विधिक व्यक्ति की संकल्पना की उत्पत्ति (Origin of the concept of juristic person) –

अंग्रेजी भाषा में ‘व्यक्ति’ के लिए ‘पर्सन’ (person) तथा ‘व्यक्तित्व’ के लिए ‘पर्मोनेलिटी’ (personality) शब्द प्रयुक्त होते हैं। पर्सन शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द ‘पर्सेना’ (persona) से हुई है, जो यूनानी भाषा के ‘प्रोसोपोन’ शब्द का पर्यायवाची है। ‘प्रोसोपोन’ से यूनानियों का आशय उन मुखौटों से था जिनका प्रयोग नाटकों के पात्रों द्वारा देवता, नायक, खलनायक आदि की भूमिका खेलने के लिए किया जाता था। कालान्तर में इस शब्द का प्रयोग नाटक के पात्रों के द्वारा खेली जाने वाली भूमिका के अर्थ में किया जाने लगा जिसे बाद में विधिक कार्यवाहियों में पक्षकारों की भूमिका के लिए भी प्रयुक्त किया गया। लगभग छठी शताब्दी तक ‘पर्योना’ शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में किया जाता रहा, परन्तु इसी समय बोथियस ने ‘पर्योना’ को ‘विचारशील प्राणी के व्यक्तित्व’ के रूप में परिभाषित किया जिसके परिणामस्वरूप इसके पहले अर्थ का प्रचलन समाप्त हो गया।

अनेक विधिवेत्ताओं ने ‘व्यक्ति’ (person) शब्द को केवल मानवों (human beings) के प्रति ही लागू किया है क्योंकि उनके अनुसार विधि का मूल उद्देश्य मानव-आचरणों को विनियमित करना तथा उनके हितों का संरक्षण करना है। अतः केवल मनुष्य ही ‘विधिक व्यक्ति’ (juristic person) हो सकते हैं। परन्तु उल्लेखनीय है कि विधि के अन्तर्गत ‘व्यक्ति’ शब्द के अर्थ को केवल मानवों तक ही सीमित रखना उचित नहीं है; क्योंकि देवता, मूर्ति2, निगमित निकाय आदि ऐसी अनेक निर्जीव संस्थायें हैं, जो वास्तविक मनुष्य न होते हुए भी विधिक दृष्टि से, ‘व्यक्ति’ माने जाते हैं, अर्थात् जिन्हें विधिक व्यक्तित्व प्राप्त है। इसके ठीक विपरीत, कुछ ऐसे वास्तविक व्यक्ति भी हो सकते हैं जिन्हें विधि के अन्तर्गत विधिक व्यक्तित्व प्राप्त नहीं है जसे-दास-प्रथा के प्रचलन के समय दासों (slaves) को विधिक व्यक्तित्व प्राप्त नहीं था क्योंकि उनका जास्तत्व निजी वस्तुओं के समान था तथा ऐसी मान्यता थी कि उनमें अधिकार तथा दायित्व धारण करने की क्षमता नहीं होती।

1. विधिक दृष्टि से ‘कार्य’ में ‘लोप’ का समावेश भी है (legally speaking ‘acts’ also include omissions). प्रमथनाथ मलिक बनाम प्रद्युम्न कुमार मलिक, (1925) इण्डियन अपील्स 245.

2.  प्रमथनाथ मलिक बनाम प्रधुम्न कुमार मलिक, (1825) इंडियन अपील्स 245,

3. Soloman V. Soloman. (1897) A C 22.

इसी प्रकार हिन्दू विधि के अन्तर्गत वानप्रस्थी संन्यासी के सभी सांपत्तिक अधिकार समाप्त हो जाते हैं तथा उसकी सम्पत्ति उसके उत्तराधिकारियों को अन्तरित हो जाती है मानो कि उसका पूर्ण अस्तित्व ही समाप्त हो गया हो।

इसमें सन्देह नहीं है कि समाज की इकाई के नाते मानव का अस्तित्व समाज और विधि, दोनों से पूर्ववर्ती है और चूंकि विधियों की निर्मिति मानवों द्वारा और उनके स्वयं के लिये की जाती है, मानवों के परस्पर विधिक सम्बन्धों को विधि द्वारा मान्यता प्रदान की गयी है।

अत: एक जीवित व्यक्ति होने के नाते मानवों को विभिन्न अधिकार, स्वत्व, उन्मुक्तियां आदि प्रदान की गयी हैं और साथ ही उन पर कतिपय दायित्व तथा कर्तव्य अधिरोपित किये गये हैं।

तथापि सामाजिक प्रगति एवं विकास के साथ यह अनुभव किया गया है कि अधिकार और कर्तव्यों को केवल जीवित व्यक्तियों (मानवों) तक ही सीमित रखने से अनेक जटिलतायें उत्पन्न होने की सम्भावनायें रहती हैं जिनका निवारण कतिपय निर्जीव निकायों या संस्थाओं को कृत्रिम व्यक्तित्व प्रदान करके किया जा सकता है। इसी को ध्यान में रखते हुये विधिशास्त्र में कृत्रिम व्यक्तित्व या विधिक व्यक्तित्व की संकल्पना का समावेश किया गया।

विधिक व्यक्तित्व विधि की परिकल्पना मात्र है | (Legal Personality is a fiction of Law)

कतिपय निर्जीव निकायों तथा बेजान वस्तुओं (inanimate objects) को कृत्रिम व्यक्तित्व प्रदान किया जाना विधि की एक परिकल्पना मात्र (fiction of law) है जिसका कि इन्हें विधिक व्यक्ति मानते हुये इनके अधिकार और दायित्वों के निर्धारण हेतु प्रयोग किया जाता है। विधिक परिकल्पना (legal fiction) से आशय है कि कुछ ऐसा वास्तव में सत्य नहीं है, लेकिन विधि उसे सत्य उपधारित (presume) करते हुये सत्य के रूप में स्वीकार करती है। उदाहरणार्थ एक कम्पनी, निगमित निकाय या देवमूर्ति वास्तव में प्राकृतिक व्यक्ति नहीं होते हुये भी विधि के प्रयोजनों के लिये इन्हें कृत्रिम व्यक्ति या विधिक व्यक्ति माना गया है ताकि उनके अधिकारों, कर्तव्यों, दायित्वों, उन्मुक्तियों आदि का निर्धारण किया जा सके।

व्यक्तिशब्द की विधिक परिभाषा (Legal definition of the term ‘person’)

विधिवेत्ताओं ने विधि के अन्तर्गत ‘विधिक व्यक्ति’ की व्याख्या अलग-अलग ढंग से की है। इनमें कुछ विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषा विशेष उल्लेखनीय है

सामण्ड के अनुसार विधिक दृष्टि से ‘व्यक्ति’ से तात्पर्य “किसी ऐसे प्राणी से है जिसे विधि के अन्तर्गत अधिकार या कर्त्तव्य धारण करने योग्य समझा जाता है।” अत: जो प्राणी अधिकार और कर्त्तव्य धारण करने की क्षमता रखते हैं, उन्हें विधि के अन्तर्गत ‘व्यक्ति’ (person) कहा जायेगा भले ही वे वास्तव में मनुष्य न हों। सारांश यह है कि अधिकार और कर्त्तव्य से युक्त अस्तित्व को विधिक व्यक्तित्व (legal personality) माना जाता है, चाहे वह वास्तविक मनुष्य हो या न हो।

ग्रे (Gray) के अनुसार ‘व्यक्ति’ एक ऐसा अस्तित्व (entity) है जिस पर कर्त्तव्य और अधिकार अधिरोपित किये जा सकते हैं। ग्रे ने सामण्ड के इस विचार से सहमति व्यक्त की है कि विधि के अन्तर्गत मानव-शरीर धारण करने वाले प्रत्येक मनुष्य को व्यक्तित्व (personality) प्राप्त नहीं होता है, किन्तु जहाँ एक

ओर सामण्ड अधिकार या कर्त्तव्यों में से केवल एक के अस्तित्व को ही विधिक व्यक्तित्व के लिए पर्याप्त मानते हैं. ग्रे इन दोनों के अस्तित्व को आवश्यक समझते हैं। उल्लेखनीय है कि ग्रे द्वारा दी गई ‘व्यक्ति’ की परिभाषा सामण्ड की परिभाषा से कहीं अधिक व्यापक और तर्कसंगत प्रतीत होती है।

ऑस्टिन (Austin) ने ‘व्यक्ति’ की परिभाषा देते हुए कहा है कि अवस्था अथवा प्रास्थिति से निहित मनुष्य (human being invested with condition or status) ही विधिक दृष्टि से व्यक्ति कहलाता है।

4. A person is any being whom the law regards as capable of rights or duties, any being that is so is a person whether human being or not and no being that is not so capable is a person even though he be a man.”-Salmond, Jurisprudence (12th ed.). 200

इस परिभाषा से स्पष्ट होता है कि जो मनुष्य अधिकार नहीं रखते, वे व्यक्ति नहीं अपितु ‘वस्तु’ कहे जाते हैं। ऑस्टिन के अनुसार व्यक्ति ऐसे मनुष्य होते हैं जो अधिकारों से युक्त हों तथा कर्त्तव्यों का विषय हों। मन के मतानुसार विधिक व्यक्तित्व (1) मनुष्य तथा (2) मनुष्य की प्रास्थिति (status) की ओर संकेत करता है।

जी० डब्ल्यू० पैटन के विचार से विधिक व्यक्तित्व एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा कुछ ऐसी इकाइयों की रचना होती है जिनमें अधिकार निहित किये जा सकें। उन्होंने विधिक व्यक्ति को एक कृत्रिम व्यक्ति निरूपित किया है जो उन सभी अधिकारों एवं कर्तव्यों को धारण करता है जिन्हें विधि सामान्य व्यक्ति के लिए मान्यता प्रदान करता है।

तात्पर्य यह है कि ‘विधिक व्यक्ति’ मानव ही हो यह आवश्यक नहीं है। वह कोई वस्तु, सम्पत्ति-पुंज (mass of property) अथवा मानव-समूह भी हो सकती है जिसे विधि के अन्तर्गत व्यक्तित्व उपारोपित (attributed) किया गया है। दूसरे शब्दों में, ‘विधिक व्यक्ति’ के अन्तर्गत उन वस्तुओं, सम्पत्ति-पुंज या संस्थाओं का समावेश है जिन्हें विधि के अन्तर्गत विधिक प्रास्थिति प्रदान की गई है और जिनके विधि की दष्टि से प्राकृतिक व्यक्ति की भाँति अधिकार और कर्त्तव्य निहित होते हैं।

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