LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 27 Notes Study Material

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Jurisprudence and Legal Theory Notes Study Material PDF LLB 1st Semester Year

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अध्याय 27 (Chapter 27)

सम्पत्ति (Property)

विधिक क्षेत्र में सम्पत्ति की संकल्पना का विशेष महत्व है। इसका कारण यह है कि भौतिक वस्तुओं के उपयोग के बिना मानव-जीवन सम्भव नहीं है और ये भौतिक वस्तुएँ ही सम्पत्ति की विषय-वस्तु हैं। मानव-जीवन के लिए रोटी, कपड़ा, मकान तथा अन्य वस्तुएँ परम आवश्यक होती हैं और सभी सुसभ्य समाजों के व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इन वस्तुओं को स्वयं की सम्पत्ति के रूप में रखते हैं तथा इनका उपभोग करते हैं। अत: सामान्य अर्थ में सम्पत्ति से आशय भौतिक वस्तुओं के प्रति मनुष्य के ऐसे अधिकार से है जिस पर उसका स्वामित्व है तथा जिस पर उसे अनन्य नियंत्रण तथा व्ययन का पूर्ण अधिकार प्राप्त है।

विख्यात विधिशास्त्री सामण्ड ने सारभूत सिविल विधि (substantive civil law) का विभाजन तीन | खण्डों में किया है जो क्रमशः (1) सम्पत्ति विधि (Property Law), (2) बाध्यता विधि (Law of Obligations) तथा (3) प्रास्थिति सम्बन्धी विधि (Law of Status) कहलाते हैं।  

सम्पत्ति विधि की विषय-वस्तु सर्वबन्धक सम्पत्तिक अधिकार (proprietary right in ent) है जबकि बाध्यता विधि (law of obligations) की विषय-वस्तु (proprietary rights in personant) है। प्रास्थिति-विधि के अन्तर्गत सुभी वैयक्तिक या साम्पत्तिक अधिकारों का समावेश है, चाहे वे सर्वबन्धक हों अथवा व्यक्तिबन्धक ।’ प्रस्तुत अध्याय में सम्पत्ति विधि के विषय में सविस्तार वर्णन दिया गया है।

सम्पत्ति का अर्थ

सामान्यत: सम्पत्ति से तात्पर्य उस वस्तु’ (res) से है जिस पर स्वामित्व के अधिकार का प्रयोग किया जा सकता है। स्वामित्व के अधिकार का प्रयोग प्रायः मूर्त वस्तुओं पर ही किया जाता है। सामण्ड के विचार से सम्पत्ति (property) शब्द का अर्थ सर्वबन्धक साम्पत्तिक अधिकारों (Proprietary rights in rent) से है। सर्वबन्धक अधिकार से आशय ऐसे अधिकारों से है जो किसी व्यक्ति को समस्त ‘मानव वर्ग के विरुद्ध प्राप्त होते हैं।

विधि के अन्तर्गत सम्पत्ति’ शब्द का प्रयोग भिन्न-भिन्न अर्थों में किया गया है। कभी इसे ‘स्वामित्व’ के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है और कभी हक (title) के रूप में। यही नहीं, कभी-कभी तो वे समस्त वस्तुएँ जो किसी व्यक्ति के पास हैं, उसकी सम्पत्ति मानी जाती हैं। इसमें केवल वे वस्तुएँ ही नहीं हैं जिनका कि वह व्यक्ति स्वामी (Owner) है बल्कि उस व्यक्ति के समस्त दावे (claims) भी उसकी सम्पत्ति में समाविष्ट होते हैं। परन्तु उल्लेखनीय है कि सम्पत्ति का यह अर्थ विधिक दृष्टि से अनुपयुक्त है। सामण्ड के अनुसार विधि के अन्तर्गत सम्पत्ति’ शब्द का प्रयोग निम्नलिखित सन्दर्भो में किया जा सकता है-

(1) समस्त विधिक अधिकार के रूप में (as All Legal Rights)

इस सन्दर्भ में सम्पत्ति के अन्तर्गत व्यक्ति के समस्त विधिक अधिकार शामिल हैं। यहाँ तक कि मनुष्य का स्वयं का जीवन, उसके हाथ-पैर, स्वतन्त्रता, उसके बाल-बच्चे, नौकर तथा भू-सम्पदा, आदि सभी उसकी

1. The substantive civil law, as opposed to the law of procedure is divisible into three great departments, namely, the law of property, the law of obligations, and the law of status. The first deals with proprietary rights in rem, the second with proprietary rights in personam and the thi with personal or non-proprietary rights, whether in rem or in personam, Salmond-Jurispruden (12th Edn., p. 441.

सम्पत्ति होती है। ब्लैकस्टोन (Blackstone) तथा हॉब्स (Hobbes) आदि आंग्ल-विधिशास्त्रियों ने ‘सम्पत्ति’ शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में किया है P लॉक (Loke) के अनुसार व्यक्ति का स्वयं का भौतिक शरीर उसको सम्पत्ति है तथा उसे अपने जीवन, स्वतन्त्रता तथा सम्पदा को सुरक्षित रखने का अधिकार है जो उसकी सम्पत्ति होती है। परन्तु वर्तमान में सम्पत्ति’ शब्द का प्रयोग इतने व्यापक अर्थ में नहीं किया जाता है।

(2) साम्पत्तिक अधिकार के रूप में (as Proprietary Rights)

इस अर्थ में सम्पत्ति के अन्तर्गत मनुष्य के वैयक्तिक अधिकारों (personal rights) का समावेश नहीं होता अपितु केवल साम्पत्तिक अधिकार (Proprietary rights) ही उसकी सम्पत्ति कहलाते हैं। अत: व्यक्ति को भूमि, जंगम-वस्तुएँ (chattels), कम्पनी में उसके द्वारा धारित अंश तथा उसे प्रतिदेय ऋण (debts due to him) आदि उसकी सम्पत्ति हैं, किन्तु उसके जीवन अथवा उसकी स्वतन्त्रता या प्रतिष्ठा के अधिकार को उसको सम्पत्ति के अन्तर्गत नहीं माना जायेगा। वर्तमान में ‘सम्पत्ति’ शब्द का प्रयोग प्रायः इसी अर्थ में किया जाता है।

(3) सर्वबन्धक सम्पत्तिक अधिकार के रूप में (as Proprietary Rights in rem)

इस अर्थ में सम्पत्ति’ के अन्तर्गत व्यक्ति के सभी साम्पत्तिक अधिकार (proprietary rights) नहीं आते बल्कि केवल ऐसे साम्पत्तिक अधिकार ही आते हैं जो सर्वबन्धक (in renm) स्वरूप के हैं। दूसरे शब्दों में, इस अर्थ में सम्पत्ति के अन्तर्गत व्यक्ति बन्धक साम्पत्तिक अधिकारों (proprietary rights in personal) का समावेश नहीं किया जाता है। निवेदित है कि व्यक्तिबन्धक साम्पत्तिक अधिकार बाध्यता विधि (law of obligations) की विषय-वस्तु है। अत: किसी व्यक्ति की भूमि में आत्मघृत तथा पट्टाधृत भू-सम्पदा (a freehold or leasehold estate in land), प्रतिलिप्यधिकार (copyrights) तथा पेटेन्ट (patent) उसकी सम्पत्ति होंगे, किन्तु उसका ऋण अथवा उसके द्वारा की गई किसी संविदा से प्राप्त हुए लाभ उसकी सम्पत्ति के अन्तर्गत समाविष्ट नहीं होंगे।

(4) मूर्त सम्पत्ति (Corporeal Property)

सीमित अर्थ में सम्पत्ति के अन्तर्गत भौतिक वस्तुओं पर स्वामित्व के अधिकार के अलावा किसी अन्य अधिकार का समावेश नहीं किया जा सकता। आंग्ल विधिवेत्ता बेन्थम (Bentham) ने सम्पत्ति के इसी अर्थ को उचित माना है।4

सामण्ड (Salmond) के अनुसार किसी मूर्त सम्पत्ति का स्वामित्व साधारणतः स्थायी तथा दायाई (inheritable) होता है और स्वामित्व का अधिकार रखने वाला व्यक्ति उस सम्पत्ति का उपयोग उपभोग अपनी इच्छानुसार व्ययन (disposition) कर सकता है। इसके अतिरिक्त जब तक उक्त मूर्त सम्पत्ति का अस्तित्व बना रहता है, उसके स्वामी का उस सम्पत्ति पर स्थायी (Permanent) अधिकार होगा।

मूर्त सम्पत्ति दायार्ह (inheritable) होने के कारण उसके स्वामी की मृत्यु के पश्चात् भी यह दाय सम्बन्धी अधिकार निर्बाध बना रहेगा।

तथापि जर्मी बेंथम ने ‘सम्पत्ति’ की संकुचित व्याख्या करते हुये अभिकथन किया है यह मूर्त सम्पत्ति, अर्थात्, भौतिक वस्तुओं के सिवाय अन्य कुछ नहीं है। दूसरे शब्दों में, सम्पत्ति के अन्तर्गत केवल भौतिक वस्तुओं का ही समावेश है न कि अमूर्त या अभौतिक वस्तुओं का।

2. हॉब्स : लवाइथन (Leviafhari), अध्याय 30, पृ॰ 329.

3. लॉक : सिविल गवर्नमेन्ट (ग्रन्थ 2) अध्याय 5 पृ. 102.

4. बेंथम : प्रिंसिपल्स ऑफ लेजिस्लेशन, पृ० 321.

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