LLB 1st Semester Jurisprudence and Legal Theory Chapter 26 Notes Study Material

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Jurisprudence and Legal Theory Notes Study Material PDF LLB 1st Semester Year

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अध्याय 26 (Chapter 26)

हक (Titles)

LLB Study Material Notes

विधिशास्त्र के अन्तर्गत ‘स्वत्व’ या ‘हक’ की संकल्पना अत्यन्त महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी व्यक्ति को अधिकार है अथवा नहीं, यह प्राय: उस वस्तु पर उसके हक पर निभर करता है। हर का पर्याय ‘टाइटिल’ (title) है जिसकी उत्पत्ति लैटिन शब्द ‘टिटुलस’ (Titaulius) से हुई है। सामान्य अर्थ में से आशय किसी सम्पत्ति पर कब्जा सहित अथवा कब्जा रहित अधिकार से है। विधि में ‘हक शब्द : अधिक व्यापक अर्थ में किया गया है। ‘हक’ (title) में उन समस्त तथ्यों (facts) का समावेश है । अधिकारों तथा कर्तव्यों को उत्पन्न करते हैं। अत: ऐसे तथ्य या घटनाएँ जिनके कारण किसी अधिकार स्वामित्व उत्पन्न हो जाता है, ‘हक’ कहलाते हैं। दूसरे शब्दों में ‘हक’ एक स्रोत हैं तथा ‘अधिकार’ उसको उत्पत्ति है।

सामण्ड ने हक (title) को परिभाषित करते हुए कहा है कि प्रत्येक अधिकार की उत्पत्ति हक से होती है। ‘हक’ या स्वत्व ऐसे निश्चित तथ्य या तथ्यों के समूह को कहते हैं जिसके परिणामस्वरूप विधिक अधिकार उत्पन्न होता है। यदि विधि के अन्तर्गत किसी वस्तु के सम्बन्ध में एक व्यक्ति को अधिकार है परन्तु दूसरे को नहीं, तो इसका कारण यह है कि कतिपय तथ्य पहले व्यक्ति के प्रति विद्यमान हैं और दूसरे के प्रति नहीं हैं। अत: तथ्य ही अधिकार का हक दिलाते हैं। इस प्रकार सामण्ड ने ‘हक’ को विधिक अधिकार को एक आवश्यक तत्व माना है।

हालैण्ड ने भी हक को इसी अर्थ में परिभाषित किया है। उनके अनुसार ‘हक’ (title) वह तथ्य है। जिससे अधिकार की उत्पत्ति होती है । तथापि वे ‘हक’ को विधिक अधिकार के रूप में स्वीकार नहीं। करते हैं।

लार्ड ब्लेकबर्न (Lord Blackburn) ने ‘हक’ के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है कि ‘हक’ एक विनिहितकारी तथ्य (investive fact) को प्रदर्शित करता है और अधिकार इस तथ्य पर आधारित शक्ति (power) है। अत: किसी व्यक्ति में विनिहित तथ्य (हक) के कारण ही कोई विधिक अधिकार निहित हो सकता है।

जर्मी बेंथम (Jeremy Benthan) ने ‘हक’ की उपर्युक्त परिभाषाओं की आलोचना करते हुए कहा है कि हक उन तथ्यों को तो प्रकट करता है जिनसे अधिकार उत्पन्न होता है, किन्तु वह उन तथ्यों को प्रकट नहीं करता जो अधिकार की समाप्ति के लिए कारणीभूत होते हैं।

ऑस्टिन (Austin) ने बेंथम के विचारों का समर्थन करते हुए कहा है कि ‘हक’ (title) किसी ऐसे तय को कहते हैं जिसके माध्यम से विधि के अन्तर्गत अधिकार (right) उत्पन्न होता है या अधिकार को समाप्त होती है; अथवा कर्तव्य आरोपित होता है या कर्तव्य से उन्मुक्ति मिलती है।

न्यायमूर्ति होम्स (Justice Holmes) के अनुसार ऐसा तथ्य जो किसी अधिकार या कर्तव्य की उत्पाद करता है, ‘हक’ कहलाता है। दूसरे शब्दों में, कतिपय विनिहितकारी तथ्य मिलकर जब किसी अधिकार या स्वामित्व का सृजन करते हैं, तो इसे हक कहा जाता है।

1. सामण्ड : ज्यूरिसपूडेन्स ( 12वाँ संस्करण), पृ० 331,

तथ्य (Facts)

उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि हक (title) एक स्रोत है तथा अधिकार उस स्रोत की उपज । यह सर्वविदित है कि कुछ अधिकार मानव को जन्म से ही प्राप्त होते हैं, जैसे स्वतन्त्रता या प्रतिष्ठा या जीवन का अधिकार। परन्तु अन्य अधिकारों की प्राप्ति उसे विधि द्वारा विनिर्दिष्ट कुछ तथ्यों के विद्यमान होने पर ही होती है। दूसरे शब्दों में, अनेक अधिकार ऐसे होते हैं जिनकी प्राप्ति अथवा समाप्ति कुछ विनिर्दिष्ट तथ्यों के विद्यमान होने या न होने पर निर्भर करती है। उदाहरणार्थ, कर्ज (debt) या संविदा (contract) आदि के परिणामस्वरूप उत्पन्न अधिकारों की उत्पत्ति या समाप्ति कुछ निर्दिष्ट तथ्यों के अस्तित्व या अनस्तित्व पर निर्भर करती है।

हक से सम्बन्धित तथ्य दो प्रकार के होते हैं-(1) भौतिक (physical) और (2) मनोवैज्ञानिक (psychological) । भौतिक तथ्यों से आशय ऐसी वस्तुओं से है जिनकी अनुभूति ज्ञानेन्द्रियों द्वारा हो सकती है, जैसे मकान बेचना, पुस्तक खरीदना आदि। मनोवैज्ञानिक तथ्य का आशय मानसिक चेतना से है, जैसे किसी व्यक्ति का कर्ज अदा न करने का इरादा या चोरी करने का इरादा आदि मनोवैज्ञानिक तथ्य हैं।

उल्लेखनीय है कि विधि के अन्तर्गत केवल वे तथ्य या तथ्यों का योग हक नहीं कहलाते जो किसी व्यक्ति को अधिकारों की प्राप्ति कराते हैं, अपितु इसमें उन तथ्यों का समावेश भी है जो किसी व्यक्ति के अधिकारों की समाप्ति करते हैं। इसका कारण यह है कि प्राय: एक व्यक्ति के अधिकार की समाप्ति से दूसरे व्यक्ति के किसी अधिकार का सृजन होता है। तात्पर्य यह है कि हक के अन्तर्गत तथ्यों की सृजनात्मक एवं विनाशात्मक, दोनों ही प्रकार की शक्तियाँ विद्यमान रहती हैं। इसी आधार पर कीटन ने तथ्यों का वर्गीकरण निम्नानुसार किया है, जो ‘हक’ का वर्गीकरण भी है। सामण्ड ने भी कीटन द्वारा किये गये इस वर्गीकरण का समर्थन किया है।

हक में समाविष्ट तथ्यों का वर्गीकरण (Classification of Facts comprising Titles)

तथ्यों से अधिकार का सृजन होता है और अधिकार का विनाश भी होता है। अत: (1) निर्माण, (2) अन्तरण और (3) विनाश, ये अधिकार के तीन प्रमुख चरण होते हैं। इन्हीं तीन दशाओं के आधार पर तथ्यों (facts) तथा ‘हक’ को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया गया है-

निहितकारी तथ्य या हक (Vestitive Facts or Titles)

विनिहितकारी तथ्य/हक Investitive Facts (or Titles)

निर्निहितकारी तथ्य/हक Divestitive Facts (or Titles)

मूल हक (Original Titles)

व्युत्पन्नकारी हक (Derivative Titles)

संक्रमणकारी तथ्य (Alienative Facts)

विलोपकारी तथ्य (Extinctive Facts)

इनसे अधिकारों का

सृजन होता है। (Creation of Rights)

ये अधिकारों का अन्तरण करते हैं। (Transfer of Rights)

इनसे अधिकारों का विनाश होता है। (Extinction of Rights)

2. कीटन (Keeton) : ज्यूरिसपूडेंस (1949), पृ० 195.

ऐसे तथ्य जिनमें किसी अधिकार की प्राप्ति अथवा किसी अधिकार की समाप्ति होती है, निहितकारी तथ्य

(Vestitive facts) कहलाते हैं। बेन्थम के अनुसार ऐसे समरत तथ्य जो अधिकारों का पजन करते हैं। तथा उनका अन्तरण अथवा हरण करते हैं; ‘निहितकारी तथ्य’ कहलाते हैं। ये तय तीन प्रकार के हो सकते हैं-विनिहितकारी तथ्य (Investitive Facts)

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