Indian Penal Code 1860 Offences Relating Religion Part 30 LLB Notes Study Material

Indian Penal Code 1860 Offences Relating Religion Part 30 LLB Notes Study Material

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दण्ड की मात्रा

गर्भवती महिला के साथ बलात्संग-ओम प्रकाश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिधारित किया कि अभियुक्त को धारा 376 (2) (ङ) को लागू करते हुये दण्डित करने के लिये अभियोजन पक्ष को यह सिद्ध करना होगा कि अभियुक्त यह जानता था कि पीड़िता (Victim) गर्भवती है क्योंकि इसी कारण धारा 376 (2) (ङ) के अधीन अपराध हेतु कठोर दण्ड विहित किया गया है। इस मामले में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है। विचारण न्यायालय ने मात्र यह निष्कर्ष दिया है कि इस बात की पूर्ण सम्भावना थी कि अभियुक्त यह जानता था कि महिला गर्भवती है। यह अभिधारित किया गया कि सम्भावना और निश्चितता में बहुत अन्तर है। इस धारा के अधीन निश्चित ज्ञान होना आवश्यक है मात्र ज्ञान की सम्भावना काफी नहीं है। जहाँ मामला ऐसा है कि अपराध की गम्भीर प्रकृति के कारण जैसा विधान द्वारा विहित है अधिक कठोर दण्ड का प्रावधान है, इसे सिद्ध किया जाना आवश्यक है, केवल सम्भावना का अनुमान लगाना ही यथेष्ट नहीं है। धारा 376 (2) (ङ) की भाषा बिल्कुल स्पष्ट है। इसके अधीन यह आवश्यक है कि अभियोजन यह सिद्ध करे कि अभियुक्त यह जानता था कि महिला गर्भवती है। यह इस धारा में प्रयक्त पदावली “उसे गर्भवती जानते हुये” से स्पष्ट है। इस कसौटी पर अधीनस्थ न्यायालयों के | निर्णय पुष्ट किये जाने योग्य नहीं हैं। परन्तु भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 (1) के अधीन विहित न्यूनतम दण्ड लागू होगा। अतएव कारावास की अवधि को 10 वर्ष से 7 वर्ष घटा दिया गया।

सामूहिक बलात्संग-सन्तोष कुमार बनाम मध्य प्रदेश राज्य के वाद में अभियोजिका हल्की बाई अपने पति द्वारा परित्यक्ता थी। एक दिन अपने भरण-पोषण की व्यवस्था हेतु वह काम की खोज में दिनांक 20.5.1985 को बस द्वारा सिलवानी आई और वहाँ लगभग 10 बजे रात्रि में पहुँची। जब वह बस से उतरने

2006 क्रि० लाँ ज० 2913 (ए० सी०).

2006 क्रि० लॉ ज० 4594 (एस० सी०).

का प्रयास कर रही थी उसी समय बस के कन्डक्टर मुनीम मिश्र ने उससे कहा कि वह रात में बस में ही सो सकती है और सुबह काम खोजने जा सकती है। वह बस की पीछे वाली सीट पर सो गयी। लगभग मध्य रात्रि में जब बस स्टैण्ड की सभी दुकानें बन्द हो गयीं बस का ड्राइवर अपीलांट संतोष कुमार ने उसकी छाती दबाया और उसकी धोती जो वह पहने थी हटाने लगा। जब उसने शोर मचाने का प्रयास किया तब पनी मिश्रा ने उसके हाथों को पकड़ लिया और मुंह दबा दिया और तब संतोष कुमार ने उसके साथ बलात्संग। किया। उसके बाद संतोष कुमार ने उसको पकड़ा और मुनीम मिश्रा ने उसके साथ दुष्कर्म किया। उसका शोर सुनकर तीन पुलिस कांस्टेबिल जो पेट्रोल ड्यूटी पर थे और कुछ अन्य लोग बस के पास आये । परन्तु दोनों ही अभियुक्त बचकर भाग निकलने में सफल रहे। अन्वेषण के पश्चात् दोनों ही अभियुक्त संतोष कुमार और मुनीम मिश्रा का विचारण किया गया और दोषसिद्ध किया गया। अभियोजिका का दिनांक 21.5.1985 को लगभग 2 बजे रात्रि चिकित्सीय परीक्षण किया गया। उसके शरीर के गुप्तांगों पर कोई चोट नहीं पाई गयी। अपील खारिज करते हुये उच्चतम न्यायालय ने अभिधारित किया कि अभियोजिका के गप्तांगों पर चोट न पाया जाना यह निर्णय देने के लिये कि उसके साथ बलात्संग नहीं किया गया हैं उचित आधार नहीं है क्योंकि अभियाजिक युवा और विवाहिता महिला थी। अभियोजिका का बयान और साक्षियों का साक्ष्य जिसमें दो पुलिस कान्स्टेबिल शामिल थे अपीलांट की दोषसिद्धि को उचित मानने हेतु यथेष्ट था। बचाव पक्ष का यह कथन कि उन्हें हफ्ता न देने के कारण गलत फंसाया गया मान्य नहीं पाया गया। अतएव अभियुक्त की दोषसिद्धि को उचित कहा गया। ।

प्रिया पटेल बनाम मध्य प्रदेश राज्य10 के वाद में अभियोजिका स्पोर्टस मीट में भाग लेने के बाद उत्कल एक्सप्रेस से वापस आ रही थी। जब वह अपने गन्तव्य सागर स्टेशन पर पहुँची तब अभियुक्त/अपीलांट का पति अभियुक्त भानु प्रताप पटेल उससे रेलवे स्टेशन पर मिला और उससे कहा कि उसके पिता ने उससे उसको स्टेशन से ले आने को कहा है। चूंकि अभियोजिका बुखार से पीड़ित थी वह भानु प्रताप के साथ उसके घर चली गयी। वहाँ पर अभियुक्त ने उसके साथ बलात्संग किया। जब भानु प्रताप बलात्संग कर रहा था उसकी पत्नी वर्तमान अपीलांट प्रिया पटेल वहाँ पहुँची। अभियोजिका ने प्रिया पटेल से अपने को बचाने का निवेदन किया परन्तु उसको बचाने के बजाय उसने उसे तमाचा मारा और मकान का दरवाजा बन्द कर दिया और घटनास्थल से चली गयी। घटना की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करायी गयी और अन्वेषण के उपरान्त भान्। प्रताप को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 और 323 के अधीन तथा अपीलांट को धारा 323 और 376 (2) (छ) के अन्तर्गत आरोपित किया गया। ।

उच्चतम न्यायालय ने यह अभिधारित किया कि किसी महिला को गैंग बलात्संग के लिये अभियोजित नहीं किया जा सकता है। न्यायालय ने यह अभिधारित किया कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 (2) (छ) यह उपबन्धित करती है कि जो भी गैंग बलात्संग करेगा उसे दण्डित किया जायेगा। स्पष्टीकरण केवल यह स्पष्ट करता है कि जब कभी भी किसी महिला के साथ एक या एक से अधिक व्यक्तियों के समूह द्वारा उनके सामान्य आशय के अग्रसरण में कार्य करते हुये बलात्संग किया जाता है प्रत्येक ऐसा व्यक्ति धारा 376 (2) के अधीन गैंग बलात्संग कारित करने वाला माना जायेगा। चूंकि एक महिला बलात्संग नहीं कर सकती है, अतएव वह गैंग बलात्संग कारित करने की भी दोषी नहीं होगी। स्पष्टीकरण केवल एक धारणा उपबन्ध (deeming provision) है। धारणा उपबन्ध के प्रवर्तन द्वारा एक व्यक्ति जो वास्तव में बलात्संग कारित नहीं किये रहता है उसे भी माना जाता है कि बलात्संग कारित किया है, भले ही समूह में ऐसे केवल एक व्यक्ति ने समह के सामान्य आशय के अग्रसरण में बलात्संग कारित किया हो। धारा 34 लागू करने के लिये आवश्यक यह है कि किसी आपराधिक कृत्य को करने के लिये कार्य सामान्य आशय के अग्रसरण में किया जाना चाहिये। धारा 376 (2) के स्पष्टीकरण में प्रयुक्त पदावली ”उनके सामान्य आशय के अग्रसरण में” बलात्संग। कारित करने के आशय से सम्बन्धित है और इसलिये अपीलांट अभियुक्त धारा 376 (2) (छ) के अन्तर्गत दण्डनीय आरोपित अपराध के लिये अभियोजित नहीं किया जा सकता है। |

राजस्थान राज्य बनाम हनीफ खान एवं अन्य के वाद में अभियुक्तगणों पर पीड़िता के साथ यापटिक बलात्संग कारित करने और जब उन्होंने उसे मृत पाया तो गड़े में फेंक देने का आरोप था। प्रत्यक्षदशा। यिक की पत्नी ने घटना को सार्वजनिक किया परन्तु उसके साक्ष्य को उच्च न्यायालय ने बिना कोई कारण स्पष्ट किये अमान्य कर दिया। शिकायतकर्ता पीड़िता के पिता प्रत्यक्षदर्शी साक्षी नहीं थे। यह अभिनिर्धारित

  1. 2006 क्रि० लॉ ज० 3627(एस० सी०),
  2. (2009) 2 क्रि० लाँ ज० 1765 (सु० को०).

किया गया कि यह तथ्य कि शिकायतकर्ता ने शिकायत में यह नहीं दर्शाया है कि प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों ने उसे क्या बताया है उसके साक्ष्य को अमान्य करने का आधार नहीं हो सकता है। उच्च न्यायालय का तर्क गलत था। और पूर्णरूपेण मस्तिष्क लागू न करना दर्शाता था। अतएव अभियुक्त की दोषमुक्ति अनुचित अभिनिर्धारित की गयी।

राजिन्दर बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य12 के वाद में अभियोजिका लगभग 18 वर्ष की युवा लड़की अपने माता-पिता के साथ एक गांव में रह रही थी। अभियुक्त, एक ठेकेदार उसके निवास के निकट पाइप की लाइन डाल रहा था। एक दिन दोपहर को अभियोजिका के गले में कुछ दर्द हुआ। जब अभियुक्त ठेकेदार को इसकी बीमारी की जानकारी हुई तो उसने उस बालिका की माता को यह सुझाव दिया कि उसका भतीजा डाक्टर है और यदि वह आज्ञा दे तो वह अभियोजिका को अपने भतीजे को दिखा सकता है। माता इस पर सहमत हो गयी। उसके पश्चात् लगभग अपरान्ह 3 बजे अभियुक्त उस बालिका को अपने स्कूटर पर ले गया। और पीड़िता बालिका को डाक्टर के यहाँ ले जाने के बजाय कई अन्य जगहों पर ले गया और जब अंधेरा हो । गया तब वह उस बालिका को एक सुनसान स्थान पर ले गया और उसके साथ लैंगिक संभोग किया। इस मामले में अभियुक्त को धारा 376 के अधीन बलात्कार के लिए दोषी करार देते हुए न्यायालय ने यह प्रक्षित किया कि ऐसी परिस्थितियों में पीड़िता से प्रतिरोध की आशा नहीं की जा सकती है और पीड़िता के अंग पर क्षति की अनुपस्थिति से यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता है कि वह लैंगिक संभोग हेतु सहमत थी।

आगे यह भी कि भारतीय संस्कृति के सन्दर्भ में यौन आक्रमण की शिकार कोई महिला किसी व्यक्ति को झूठा फंसाने के बजाय चुपचाप सहन कर लेगी। बलात्कार का कोई भी बयान किसी महिला के लिए अत्यन्त अपमानजनक अनुभव होता है और जब तक वह यौन अपराध की शिकार नहीं होती वह सही अपराधी के सिवाय किसी अन्य पर दोषारोपण नहीं कर सकती है। अभियोजिका के साक्ष्य का मूल्यांकन करते समय न्यायालयों को सदैव अपने मस्तिष्क में यह रखना चाहिए कि अपने आत्मसम्मान का आदर करने वाली कोई महिला किसी व्यक्ति पर अपने साथ बलात्कार करने का गलत दोषारोपण कर अपनी मान प्रतिष्ठा दांव पर नहीं लगाएगी। अतएव मात्र अभियोजिका का ही साक्ष्य दोषसिद्धि हेतु यथेष्ट है और उसके साक्ष्य की अन्य साक्ष्य से पुष्टि अनावश्यक और अनपेक्षित है। अभियोजन के मामले घोर असम्भाव्यता को छोड़ कर यौन अपराधों में दोषसिद्धि मात्र अभियोजिका की साक्ष्य पर ही आधारित हो सकती है।

ओम प्रकाश बनाम हरियाणा राज्य13 का वाद सामूहिक बलात्कार का मामला है। इस मामले में अकेले अभियुक्त ने अभियोजिका का चाकू की नोंक पर अपहरण किया और अपीलाण्ट ने केवल जगह और चारपाई का प्रबन्ध किया और अभियोजिका को गलत ढंग से रोकने में (detain) सहायता किया। इस बात का साक्ष्य नहीं था कि व्यपहरण करना और बलात्कार किया जाना अपीलाण्ट को मालूम था। अभियोजिका को इस बयान के परिप्रेक्ष्य में कि व्यपहरण और बलात्कार का वास्तविक कार्य स्वयं सहअभियुक्त द्वारा कारित किया। गया दोनों अभियुक्तों के मध्य अपराध कारित करने के पूर्व इस बात का साक्ष्य नहीं है कि सामान्य सहमति (consent) या सामान्य आशय या मस्तिष्कों का पूर्व मिलन में जो भा० ० सं० की धारा 376 (2) (छ) के अधीन आवश्यक हैं, मौजूद था। अतएव अभियुक्त की भा० द० सं० की धारा 376 (2) (ज) के अधीन दोषसिद्धि निरस्त कर दी गयी तथापि भा० ० सं० की धारा 368 के अधीन दोषसिद्धि यथावत् रखी गयी।

यह भी स्पष्ट किया गया कि भा० ० सं० की धारा 376 (2) (छ) के अधीन अपराध हेतु आपराधिक सभी व्यक्तियों का सामान्य आशय के अग्रसरण में कारित होना चाहिये। इस धारा में सम्मिलित उत्तरदायित्व का सिद्धान्त निहित है और उस दायित्व का मूल तत्व सामान्य आशय का अस्तित्व में होना है और वह सामान्य आशय पूर्व सहमति (concent) से जिसे अपराधियों के आचरण से जो कार्य के दौरान दिखता है। विनिश्चित किया जाना चाहिये।

प्रेम प्रकाश बनाम हरियाणा राज्य14 के बाद में कु० सुदेश अपने भाई सतीश उम्र लगभग 5 साथ दिनांक 25 जुलाई, 1990 को रात्रि में लगभग 8-9 बजे एक खेत में शौच के लिये गयी थी

  1. (2009) 4 क्रि० लॉ ज० 4133 (एस० सी०),
  2. (2011) 4 क्रि० लॉ ज० 4225 (एस० सी०),
  3. (2011) 4 क्रि० लॉ ज० 4281 (एस० सी०).

लेने के पश्चात् जब वह अपने घर वापस लौट रही थी तो पीछे से एक कार उसके पास पहुंची और बगल में खड़ी हो गयी। अभियुक्त धरमवीर कार से उतरा और उसे अपनी भुजाओं में कस लिया। ट अभियुक्त ने उसके मुंह को दबा दिया। उसे उठाकर कार के अन्दर डाल दिया गया। कार अभियुक्त लिल चला रहा था। कार गाँव की आबादी से दर सड़क के बगल खेतों में ले जायी गयी। यह आरोप था कि ती अभियुक्तों ने उस लड़की के साथ खेत में एक के बाद एक बलात्कार किया। अभियुक्त धरमवीर वहीं छोट दिया गया और अन्य दोनों लोग अभियोजिका को अज्ञात जंगल में कार में ले गये थे और उस रात उसे वहीं रखा और दूसरे दिन दोपहर बाद जंगल में उसके साथ इन दोनों अभियुक्तों ने पुन: बलात्कार किया। 26 जलाई । 1990 की लगभग अपरान्ह 4 बजे उसके घर से लगभग 1 किमी दूरी पर नहर के पुल के ऊपर उसे छोट दिया गया और उसे यह धमकी दी गयी यदि उसने इस घटना के बारे में बताया तो उसका पुन: अपहरण कर उसके साथ बलात्कार कर मार डाला जायेगा। अभियुक्तगणों को भा० द० सं० की धारा 376 (2) (छ) के अधीन अभियोजित किया गया। अभियोजिका के अनुसार जिस कार में उसके साथ बलात्कार किया गया उसे अपीलाण्ट चला रहा था। इसका समर्थन उसके पिता ने भी किया यद्यपि कि वह घटना का प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। अभियोजिका का कथन (version) कि उसके साथ कार में अपीलाण्ट के अलावा एक के बाद दूसरे दो अभियुक्तों ने बलात्कार किया, साक्षियों द्वारा समर्थित नहीं था।

यह अभिनिर्धारित किया गया कि उक्त विरोधाभास अभियोजिका के कथन को अविश्वसनीय नहीं बनाता है। इसके साथ ही एक अभियुक्त ने अपने द० प्र० सं० की धारा 313 के अन्तर्गत बयान में अपीलाण्ट को जमीन के विवाद के कारण गलत फंसाये जाने के बारे में जैसा कि अभियुक्त ने अपने बयान में कहा था कि कुछ भी नहीं कहा था। अभियोजिका का पिता अपीलाण्ट को पिछले 10 वर्षों से जानता था क्योंकि वह उसी गांव में बसा था अभियोजिका का परीक्षण घटना के दो दिन बाद किया गया था। चिकित्सक (डाक्टर) की राय कि अभियोजिका लैंगिक संसर्ग की अभ्यस्त थी इस भूमिका में समझा जाना चाहिये विशेषकर तब जबकि डाक्टर ने विशेष रूप से यह कहा है कि इस बात की सम्भावना थी कि भियोजिका के साथ घटना के दिन भी लैंगिक मैथुन कारित किया गया है। अतएव उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि अपीलाण्ट की दोषसिद्धि (conviction) उचित थी।15

पारिस्थितिक साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि-उत्तर प्रदेश राज्य बनाम देशराज16 के बाद में दिनांक 21.2.1979 को लगभग 10 वर्ष की उम्र वाली अभियोजिका अपने घर से गायब हो गयी। चूंकि वह घर वापस नहीं लौटी, अतएव उसके पिता बृज लाल ने उसकी गहन खोज किया और उसके पश्चात् । 22.2.1979 को लगभग 8.15 बजे पूर्वान्ह प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराया। अभियोजन पक्ष ने 8 साक्षियों का परीक्षण कराया परन्तु मुख्य रूप से साक्षी संख्या 2,5,6 और 7 पर विश्वास किया जिन्होंने अभियुक्त को पीडिता के साथ अन्त में देखा था। जिस डाक्टर ने अन्त्य परीक्षण किया था उसका परीक्षण और बृजलाल जिसने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराया था, का भी परीक्षण किया गया। साक्षियों ने यह कहा कि उन्हें अभियक्त को लड़की के साथ फल के बाग के खेत की तरफ जाते देखा था और बाद में पीड़िता का शव फल के बगीचे के खेत में बरामद हुआ। अन्त में देखे जाने का साक्ष्य लम्बे प्रति परीक्षण के पश्चात् भी खरा पाया गया। उच्चतम न्यायालय ने अभियुक्त की दोषमुक्ति को पलटते हुये यह अभिधारित किया कि मृतका के शरीर पर डाक्टर द्वारा पाई गयी चोटें स्पष्टतया यह सुझाव दे रही हैं कि पीड़िता बालिका ने काफी संघर्ष किया और बलात्संग के प्रयास का विरोध किया। अभियुक्त अपने चेहरे पर खरोंच के निशानों का कोई स्पष्टीकरण नहीं दे सका था। यद्यपि यह मामला अन्तिम बार साथ देखे जाने का और पारिस्थितिक साक्ष्य पर आधारित था, परन्तु । न्यायालय ने यह अभिधारित किया कि परिस्थितियाँ अभियुक्त के दोष की ओर स्पष्ट संकेत कर रही हैं। अभियुक्त की धारा 302/376 के अधीन दोषसिद्धि उचित अभिधारित की गयी, इसलिये दोषमुक्ति के आदेश को रद्द कर दिया गया।

मध्य प्रदेश राज्य बनाम बालू7 वाले मामले में कुसुमबाई (अभि० सा० 2) नाम की लड़की जिसकी आय लगभग 13 वर्ष थी, एक निर्जन खेत में काम करने जा रही थी, उसे अभियुक्त अपीलार्थी घसीट कर ले

  1. (2011) 4 क्रि० लाँ ज० 4281 (एस० सी०).
  2. 2006 क्रि० लॉ ज० 2108 (एस० सी०).
  3. 2005 क्रि० लाँ ज० 335 (सु० को०).

गया, उसके साथ बलात्कार किया, जिसके परिणामस्वरूप उसके और प्रत्यर्थी के अण्डरवियर पर रक्त के दाग पड़ गये। पीड़िता ने घटना के बारे में अपने पिता अभि० सा० 4 और माँ अभि० सा० 3 से शिकायत की जो पीड़िता को लेकर थाने गये और शिकायत दर्ज कराई गई। अन्वेषण अधिकारी अभि० सा० 5 जिसने शिकायत दर्ज किया, उसने पीड़िता के कपड़े रासायनिक जाँच के लिये भेजा और लड़की को भी चिकित्सा परीक्षा के लिये भेजा गया। अभियुक्त को अगले दिन गिरफ्तार कर लिया गया, और उसका रक्तरंजित अंडरवियर भी। बरामद कर लिया गया और रासायनिक परीक्षण के लिये भेजा गया। लड़की की चिकित्सा परीक्षा डॉ० इन्दिरा गुप्ता (अभि० सा० 6) ने किया, लड़की के साथ चिकित्सा परीक्षा से पूर्व 24 घण्टे के भीतर कई बार संभोग किया गया था। डॉ० के० एन० वेदी ने पीड़िता की आयु लगभग 14 वर्ष बताया, किन्तु उसकी आयु में 3 वर्ष का अन्तर भी हो सकता है।


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