Indian Penal Code 1860 Offences Relating Religion Part 29 LLB Notes Study Material

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Indian Penal Code 1860 Offences Relating Religion Part 29 LLB Notes Study Material

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कमल किशोर बनाम स्टेट आफ हिमाचल प्रदेश92 के वाद में यह प्रेक्षित किया गया कि चूंकि संसद ने निर्धारित न्यूनतम दण्ड से कम दण्ड देने का समर्थन नहीं किया है अतएव संसद ने ‘‘दण्ड की अवधि 10 वर्ष से कम की नहीं होगी” शब्दावली का प्रयोग किया है जिसकी ध्वनि अनिवार्य है। अर्थात् जिससे यह स्पष्ट है कि न्यूनतम निर्धारित दण्ड से कम दण्ड नहीं दिया जायेगा। सामान्यतया न्यायालय को यनतम निर्धारित से कम दण्ड देने का विवेकाधिकार प्राप्त नहीं है। तथापि संसद द्वारा कतिपय अत्यन्त । अपवाद स्वरूप परिस्थितियों को एक दम विस्मृत नहीं किया गया था और इस कारण ऐसी अपूर्वतम परिस्थितियों में उचित न्याय प्रदान करने की दृष्टि से न्यूनतम के कठोर दण्ड के नियम में ढील देने की व्यवस्था द्वारा न्यायालयों को विवेकाधिकार प्रदान किया गया। इस विवेक शक्ति का न्यायालयों द्वारा प्रयोग किये जाने हेतु दो शर्ते हैं। प्रथम यह कि “पर्याप्त एवं विशेष कारण” का होना और द्वितीय यह कि ऐसे **कारणों का निर्णय में उल्लिखित किया जाना” आवश्यक है।

आगे यह भी प्रेक्षित किया गया कि पर्याप्त और विशेष कारण” शब्दावली यह दर्शाती है कि पयात कारण और विशेष कारण दोनों अलग-अलग नहीं हैं कि दो में से एक भी हो तो विवेकाधिकार का प्रयोग किया जा सकता है बल्कि इसका अर्थ यह है कि दोनों ही प्रकार के कारण साथ-साथ मिलक

आवश्यक है अर्थात् कारण ऐसे हों जो विशेष भी हों और साथ में पर्याप्त भी हों। ऐसे कारण जो सामान्य 91. 2000 क्रि० लॉ ज० 1793 (एस० सी०).

  1. 2000 क्रि० लॉ ज० 2292 (एस० सी०).

अनेक मामलों में उभयनिष्ठ (Common) होते हैं उन्हें विशिष्ट कारण नहीं कहा जा सकता है। यह तथ्य कि घटना 10 वर्ष पूर्व घटित हुई और अब तक अभियुक्त जीवन में व्यवस्थित (settled) हो चुका होगा ये इस मामले में विशिष्ट कारण नहीं हैं। यह कारण कि उत्पीड़ित बालिका का घटना के बाद विवाह हो गया है। और वह जीवन में व्यवस्थित (settled) हो गयी है तथा अभियुक्त का विवाह उसकी बदनामी के कारण नहीं हुआ है, यह भी विशेष कारण नहीं है। अतएव न्यूनतम से कम मात्र 3 वर्ष की सजा देना अनुचित था अतएव सजा को 3 वर्ष से बढ़ाकर 7 वर्ष की कर दिया गया। |

कन्हई मिश्र बनाम बिहार राज्य23 के वाद में 27 जुलाई, 1995 को लगभग 5 बजे प्रातः अभियुक्त गाँव के ही एक निवासी रामसुन्दर झा के यहाँ गया और उसकी लड़की रीता कुमारी को शोभाकान्त मिश्रा के बाग में उसके साथ चलकर फूल तोड़ने के लिये कहा। उसके बाद रीता घर से बाहर फूल तोड़ने के लिये गई और पीछे-पीछे अपीलांट भी गया। 6 बजे गाँव के ही कुछ निवासी लड़की के पिता रामसुन्दर झा के घर आये और उसे यह सूचना दी कि उसकी लड़की रीता का मृत शरीर प्रभु मिश्रा के जुट के खेत में पड़ा है। इस सूचना पर राम सुन्दर झा उन लोगों तथा अपने परिवार के सदस्यों के साथ वहाँ गया और अपनी पुत्री को जमीन पर पड़ा पाया तथा उसका लाल रंग का जांघिया (under garments) उसके एक पैर से निकाला हुआ था। यह भी देखा गया कि उसके जननांगों के चारों ओर वीर्य से मिलते-जुलते रंग के सफेद धब्बे पड़े थे तथा उसके कंधे के दोनों ओर खरोंचने के काले निशान भी थे। फूलों के साथ फूलों की टोकरी बिखरी हुई पाई गई और उसके चप्पल कुछ दूरी पर पड़े थे। घटना की सूचना लड़की के पिता ने पुलिस को दी। यह आरोप था कि अपीलांट अभियुक्त रीता को फुसला कर ले गया उसके साथ बलात्कार किया और गला दबाकर उसे मार डाला। यह अभिनित किया गया कि उन महत्वपूर्ण गवाहों, जिन्होंने पहले लड़की के पिता को घटना की सूचना दी थी, कि उसकी लड़की के साथ बलात्कार कारित कर अभियुक्त ने गला दबाकर हत्या कर दी और उसका मृत शरीर जूट के खेत में पड़ा है, का परीक्षण न किये जाने से साक्ष्य में एक महत्वपूर्ण कमी रह गई। साक्ष्य में यह कमी भी रह गयी थी कि मृतका और अभियुक्त दोनों साथ-साथ फूल के बाग गये और वहाँ फूल तोड़ा। ये परिस्थितियाँ कि अभियुक्त और मृतका को अन्तिम बार बाग में फूल तोड़ते देखा गया भी सिद्ध नहीं हो पायीं। यह साक्ष्य कि अभियुक्त को जूट के खेत के पास घटना के तुरन्त बाद भागते हुये देखा गया विश्वसनीय नहीं है। इस बात का भी विश्वसनीय साक्ष्य नहीं था कि अभियुक्त अपने घर से फरार था और लगभग एक माह बाद न्यायालय में समर्पण किया। विवेचनाधिकारी ने यह तथ्य भी छिपाया कि सूचना देने वाला लडकी का पिता थाने गया और थाने पर उसने पूरी घटना का वर्णन किया। अतएव एक मात्र इस परिस्थिति का सिद्ध किया जाना कि अभियुक्त ने लड़की से फूल के बाग में चलकर फूल तोड़ने का प्रस्ताव किया अभियुक्त की दोषसिद्धि के लिये यथेष्ट नहीं था विशेषतौर पर यह दृष्टि में रखते हुये कि विवेचना अधिकारी ने अन्वेषण करने और विचारण संचालन में विलम्ब किया, दोषसिद्धि और दण्ड उचित नहीं है। अतएव अपीलांट अभियुक्त की दोषसिद्धि और दण्ड को निरस्त कर दिया गया।

विश्वेसरन बनाम राज्य4 के मामले में बलात्कार की शिकार महिला अपने पति और अन्य सम्बन्धियों के साथ बस स्टैण्ड पर सो रही थी, जहाँ एक पुलिस का सिपाही आकर उससे पूछताछ करने के बहाने ले गया और होटल के एक कमरे में बलात्कार किया। घटना की शिकार और साक्षी अभियुक्त सिपाही को पहचानने में विफल रहे। पहचान परेड भी नहीं कराई गई। तथापि, अपीलार्थी जो पुलिस पदधारी था, एक होटल के कमरे में पकड़ा गया। होटल के रिकार्ड से होटल में अपीलार्थी द्वारा कमरा बुक करने और 100 रु० अग्रिम देने का तथ्य प्रकट हुआ। अपराध के समय अपीलार्थी कहाँ था, इस संबंध में कोई स्पष्टीकरण नहीं दे सका अन्वेषण के दौरान उसने सहयोग नहीं किया। उसने अपने वीर्य का नमुना देने से इनकार कर दिया। घटना की शिकार और उसके पति की परीक्षा के समय उसने भिन्न वेशभूषा बना रखी थी। घटना के समय उपके दाढ़ी-मछ नहीं थी, किन्तु घटना की शिकार और उसके पति की न्यायालय की परीक्षा के समय उसके दाढ़ी और मछ थी और धोती पहने था। घटना की शिकार और उसके पति का परिसाक्ष्य बहुत स्पष्ट था। साक्षियों ने घटना के तुरन्त बाद अपीलार्थी का नाम बता दिया।

यह अभिनिर्धारित किया गया कि इन परिस्थितियों से अपीलार्थी के दोषी होने का स्पष्ट संकेत मिलता है। जो यक्तियक्त संदेह से परे है। यह नहीं कहा जा सकता कि अभियुक्त की पहचान साबित नहीं हुई है भले ही घटना की शिकार ने उसे न्यायालय में नहीं पहचाना और पहचान-परेड नहीं कराई गई थी। आगे यह भी

  1. 2001 क्रि० लॉ ज० 1259 (एस० सी०).
  2. 2003 क्रि० लाँ ज० 2548 (सु० को०).

अभिनिर्धारित किया गया कि बलात्कार के मामले में न्यायालयों द्वारा अब भिन्न दृष्टिकोण अपनाए जाने का। जरूरत है। इन मामलों को अत्यधिक संवेदनशीलता के साथ निपटाए जाने की आवश्यकता है। अभियुक्ता का बलात्कार के लिये विचारण करते समय न्यायालय को अधिक उत्तरदायित्व दर्शित करना चाहिये। ऐसे मामलों में व्यापक संभाव्यताओं की जाँच करनी आवश्यक है और न्यायालयों को मामूली प्रतिविरोध से अथवा कम महत्व की कमियों, जो महत्वपूर्ण प्रकति की नहीं हैं, से प्रभावित नहीं होना चाहिये। साक्ष्य की परीक्षा संपूर्ण मामले की पृष्ठभूमि में करना चाहिये और अलग करके नहीं करना चाहिये। आधारभूत वास्तविकता को ध्यान में रखना चाहिये। यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिये कि प्रत्येक त्रुटिपूर्ण अन्वेषण का परिणाम आवश्यक रूप से दोषमुक्ति के रूप में नहीं होता। त्रटिपर्ण अन्वेषण में न्यायालयों को साक्ष्य का मूल्यांकन करते समय अतिरिक्त सावधानी बरतना आवश्यक है। अभियुक्त को एकमात्र अन्वेषण की त्रुटि के आधार पर दोषमुक्त नहीं करना चाहिये। अन्वेषण में कोई कमी या अनिवार्यता का परिणाम आवश्यक रूप से यही नहीं है कि अभियोजन के मामले को जो अन्यथा साबित है, अस्वीकार कर दिया जाए। इसलिये अपीलाथी को दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीन दोषसिद्धि ठीक है।

गोलकण्डा वेंकटेश्वर राव बनाम आंध्र प्रदेश राज्य95 वाले मामले में अपीलार्थी मृतक अवयस्क लड़की देवनवीना लक्ष्मी का पड़ोसी था, जो 15-16 वर्ष की आयु की थी। अपीलार्थी मृतका को घटना से लगभग 2 माह पूर्व 14-7-1996 को भगा ले गया। मृतका नहर के पुश्ते पर बकरी चराने गई थी। अभियुक्त ने देखा कि लड़की नहर के बांध की ओर जा रही है, उसने पीछा किया और बुरी नजर से उससे बातें करने लगा। यह तथ्य साला अनकम्मा अभि० सा० 5 ने देखा। यह कहा गया कि आसपास में सुनसान जगह पाकर अपीलार्थी ने मृतक को पकड़ा, उसे खींच कर पास में वीरान पडे छप्पर में ले गया, उसका मुंह बंद कर दिया। और उसकी मर्जी के विरुद्ध बलात्कार किया। यह भी अभिकथन किया गया कि शिकार लड़की द्वारा किया गया, सब प्रतिरोध व्यर्थ हो गया और अभियुक्त ने लड़की को दबोच लिया। आगे यह भी प्रकट किया गया कि संघर्ष के क्रम में मृतक का ऊपरी और भीतरी लहंगा फट गया। जब अपीलार्थी ने मृतक को अकेला छोड़ दिया और वह घटनास्थल से जाने लगा, तो मृतक ने अपीलार्थी से कहा कि वह अपने गांव वालों और पुलिस के सामने मामला लाएगी। इस भेद खोलने से भयभीत अपीलार्थी ने उसको खदेड़ा, उसे पकड़ा और पास के कुएं में फेंक दिया। अपीलार्थी ने कुएं में एक पत्थर भी डाल दिया, जिससे लाश ऊपर न तैर सके और अपराध छुपाने के लिये कुछ झाड़-झंखाड़ भी डाल दिया। अपीलार्थी ने मृतका के फटे कपड़ों को गाड़ दिया। जब लड़की शाम तक घर नहीं लौटी तब उसके सगे-संबंधियों ने खोजना आरंभ किया और लड़की को न पाकर अभि० सा० 1 और लड़की के पालक पिता अभि० सा० 2 को अभि० सा० 5 साला अनकम्मा से ज्ञात हुआ कि दो माह पूर्व उसने अपीलार्थी को मृतका से बात करते देखा था, तब अभि० सा० 1 गांव के श्रेष्ठ जनों के पास गया और श्रेष्ठ जनों से पूछने पर अपीलार्थी ने बलात्कार करने और लड़की को कुएं में फेंकने की गलती स्वीकार कर लिया। इसके बाद अभि० सा० 1 ने प्रथम इत्तिला रिपोर्ट दर्ज कराई। यह अभिनिर्धारित किया गया कि अंतिम बार साथ-साथ देखे जाने के सिद्धान्त को मात्र इस आधार पर नकारा नहीं जा सकता कि प्रथम निला रिपोर्ट में उसके द्वारा कथित समय और दिन के सम्बन्ध में साक्षियों के बयान में अंतर है। घटना की शिकार ठेठ ग्रामीण महिला है, उससे घटना के चार वर्ष बाद भी घटना को गणितीय क्रम में याद रखने की उम्मीद नहीं की जा सकती तथापि, साक्षी ने यह पुष्ट किया कि वे एक स्थान पर बैठकर बातें कर रहे थे। यह तथ्य दर्शाता है कि उक्त साक्षी ने अंतिम बार मृतका और अपीलार्थी को साथ-साथ देखा था। यह तथ्य धराशायी नहीं हुआ है और सुदृढ़ रूप से स्थिर है। अत: इसे दोषसिद्धि का आधार मानकर अवलम्ब लिया जा सकता है।

आगे यह उल्लेख किया गया कि मृतका के अस्थिपंजर के अवशेष कुएं से बरामद हुये और वस्तुएं अभियुक्त अपीलार्थी द्वारा बताये गये स्थान से खोद कर निकाली गई। बरामदगी अभियुक्त द्वारा स्वेच्छा से दिये गये बयान के आधार पर की गई। वस्तुएं ऐसे स्थान से नहीं बरामद हुई, जहाँ लोगों का बराबर आना जाना हो, जबकि कुएं से और अपीलार्थी द्वारा दिखाए गये स्थान की खोदायी से बरामद हुई। ऐसी आशंका नहीं है कि प्रदर्शित सामग्री अपीलार्थी को अपराध में फंसाने के लिये कुएं में डाल दी गई थी। बरामद सामग्री लाख से। सील की गई थी। बाल में लगाने वाली पिने और चूड़ियों का न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत न किया जाना साक्ष्य के साथ छेडछाड नहीं माना जायेगा। मृतक की पहचान और उसकी आय चिकित्सीय साक्ष्य के जरिए साबित

  1. 2003 क्रि० लॉ ज० 3731 (सु० को०).

की गई है। अतः अभियुक्त अपीलार्थी की भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीन की गई दोषसिटि उचित है।

राम सिंह बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य96 के वाद में बलात्कार की शिकार श्रीमती चन्चला देवी पेशे से दाई (midwife) थी। अगस्त 12/13, 1989 की रात्रि में नरेश सिंह नाम का एक व्यक्ति उसके घर आया और उससे अपने घर चलने का निवेदन किया क्योंकि उसके भाई की पत्नी को प्रसूति दर्द (labour pain) हो रहा था। वह शुरू में जाने में अनिच्छुक थी परन्तु बाद में वह नरेश सिंह के साथ चली गई। जब दोनों रास्ते में जा रहे थे तो रामसिंह नाम का एक व्यक्ति मिला और वह भी साथ हो लिया। जब तीनों नरेश सिंह के घर की तरफ जा रहे थे तब नरेश ने पीड़िता चंचला देवी को पकड़ लिया और अपीलांट रामसिंह ने उसे जमीन पर गिरा दिया और उसका पाजामा खोल दिया। जब पीड़िता ने शोर मचाना चाहा तो नरेश ने उसके मुंह पर एक मुक्का मारा और उसके बाद उसका मुंह दबोच लिया। दोनों ही अभियुक्तों ने पीड़िता चंचला देवी के साथ जबर्दस्ती लैंगिक संभोग किया और उसके बाद उस जगह से चुपके से खिसक गये। दिनांक 14-8-1989 को प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई गयी और उसी दिन पीड़िता का मेडिकल परीक्षण भी कराया गया। अभियुक्त का भी मेडिकल परीक्षण कराया गया।

इन तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुये अभियुक्तों को बलात्कार के अपराध का दोषी पाया गया और अपील में बचाव पक्ष के विधि परामर्शी ने यह तर्क दिया कि पीड़िता के खून के धब्बों से सने कपड़े रासायनिक परीक्षण हेतु नहीं भेजे गये और यह भी कि उसके गुप्तांग पर किसी प्रकार की चोट भी नहीं थी। इन तर्को के उत्तर में उच्चतम न्यायालय ने अभियुक्तों को दोषी ठहराते हुये यह अभिनिर्धारित किया कि पीड़िता की साक्ष्य विश्वसनीय है। उसके साक्ष्य की न केवल अन्य साक्ष्य से संपुष्टि हो रही है वरन मेडिकल साक्ष्य भी उसे पुष्ट कर रही है। आगे यह भी कि अन्वेषण एजेन्सी द्वारा खुन से भीगे कपड़ों का परीक्षण हेतु न भेजा जाना पीड़िता के साक्ष्य को अमान्य करने का कोई उचित आधार नहीं हो सकता है। पीड़िता का अन्वेषण एजेन्सी पर कोई नियंत्रण नहीं था और अन्वेषण अधिकारी की किसी भी प्रकार की लापरवाही/असावधानी पीड़िता के बयान की विश्वसनीयता को किसी प्रकार प्रभावित नहीं कर सकती है। जहां तक कि पीड़िता के गुप्तांग पर किसी प्रकार की क्षति न होने का प्रश्न है तो डाक्टर ने यह पाया है कि वह लैंगिक सम्भोग की अभ्यस्त थी और ऐसी दशा में पीड़िता के गुप्तांग पर क्षति न होना बहुत महत्वपूर्ण नहीं हो सकता है। अतएव अपीलांट की बलात्कार के अपराध हेतु दोषसिद्धि रिकार्ड पर आधारित होने के कारण एकदम उचित है।

उत्पल दास और अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य27 के वाद में सीतारानी झा नाम की महिला दिनांक 28-4-1984 को लगभग 8 बजे रात्रि में रेलगाड़ी से उतरी और बस स्टैण्ड के लिए एक रिक्सा किया। बस स्टेशन पहुँचने पर उसे पता लगा कि आखिरी बस पहले ही जा चुकी है। तब उसने रिक्शा चालक से उसे निकट के एक गांव जहाँ उसकी एक मित्र लड़की रहती थी ले चलने को कहा। जब वह स्टैण्ड छोड़ने ही वाली थी कि उसे चार या पांच व्यक्तियों द्वारा बीच में ही रोक लिया गया जो उसे बलपूर्वक एक निर्माणाधीन मकान में ले गये और उसकी इच्छा के विरुद्ध एक के बाद दूसरे ने बलात्कार किया। बलात्कार करने के बाद वह एक चाय की स्टाल पर ले जाई गयी और वहां उसे एक छोटे से कमरे में ताला बन्द कर दिया गया। कुछ समय के बाद उसे कुछ लोगों द्वारा छुड़ाया गया जिनसे उसने पूरा किस्सा बताया। वह रात्रि में वहाँ अपने एक रिश्तेदार के घर में ठहरी। दूसरे दिन प्रात: अर्थात् 29-4-1984 को पुलिस अपीलांट नं० 1 उत्पल दास और हराधन अपीलांट नं० 2 और वंशीधर को पीड़िता के सामने ले आई और उस महिला ने उत्पल और हराधन की उन लोगों के रूप में जिन्होंने उसके साथ बलात्कार किया था, पहचान किया। उस समय हराधन भाग जाने में सफल रहा। दिनांक 29-4-1984 को 10.45 बजे पूर्वान्ह पुलिस स्टेशन में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई गयी। भारतीय दण्ड संहिता की धारा 366, 368 और 376 सपठित ग के अधीन वाद पंजीकृत किया गया। सीतारानी दो बच्चों की माँ थी। मेडिकल परीक्षण किये जाने पर उसके गुप्तांगों पर किसी प्रकार की चोटें नहीं पाई गयीं। |


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