Indian Penal Code 1860 Offences Relating Religion Part 28 LLB Notes Study Material

Indian Penal Code 1860 Offences Relating Religion Part 28 LLB Notes Study Material

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Indian Penal Code 1860 Offences Relating Religion Part 28 LLB Notes Study Material

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उपधारा 2( छ ) के साथ

भूपेन्द्र शर्मा बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य75 वाले मामले में घटना की शिकार की आयु 16 वर्ष थी और वह अपने बीमार दादा के लिये दवाई खरीदने सोलन गई थी। वह सोलन पहली बार गई थी और बस अड्डे पर लगभग 2.00 बजे तक पहुँच गई थी। इसके बाद उसने एक महिला से मेडिकल दवाइयों की दूकान के बारे में पूछा। उस महिला ने अनभिज्ञता प्रकट की। इसी समय दो व्यक्ति वहाँ आए और उसे तिपहिया में साथ चलने को बोले और कहा कि हम दोनों भी उसी दूकान पर जा रहे हैं। घटना की शिकार (पीड़िता) को दोनों अभियुक्त सुनसान जंगल में ले गये और तिपहिया वाले को शाम को वापस आने का निर्देश देकर उसे वापस भेज दिया गया। लड़की का मुंह बंद कर उसे एक मकान में ले गये जो सड़क से नीचे था। वहाँ चार लड़के और थे, जिनमें से तीन को पीड़िता ने विचारण के दौरान पहचान लिया। चौथे का विचारण इसलिये नहीं किया गया कि उसके विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य नहीं था। पीड़िता के साथ सर्वप्रथम हरीश ने बलात्कार किया, उसके बाद सुनील और शंकर ने किया। अपीलार्थी भूपेन्दर और शंकर अपने कपड़े लैंगिक सहवास करने के आशय से बदल रहे थे कि उसी बीच पीड़िता वहाँ से बच निकली और जब वह सड़क पर पहुँची तो वहाँ उसे सहायक पुलिस निरीक्षक चमन लाल और दो अन्य व्यक्ति मिल गये। उसने अपनी आप बीती उनको बताया। वे उसे उस कमरे तक ले गये जहां उसके साथ बलात्कार किया गया था। वहाँ जाकर पाया कि सभी छह अभियुक्त भाग गये थे। सभी छह अभियुक्तों का भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 सपठित धारा 34 तथा धारा 342 सपठित धारा 34 भा० दं० संहिता के अधीन विचारण किया गया। विचारण के बाद भूपिन्दर सिंह को धारा 376/34 के अधीन 4 वर्ष का कारावास और भारतीय दण्ड संहिता की धारा 342/34 के अधीन 2 वर्ष का कारावास दिया गया। अन्य सभी को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 और 342 के अधीन दण्डनीय अपराध के लिये 7 वर्ष का सश्रम कारावास दिया गया। विचारण न्यायालय द्वारा सामूहिक बलात्कार के मामले में विहित न्यूनतम दण्ड से कम दण्ड देने के सम्बन्ध में कारण यह दिया गया कि अपीलांट अभियुक्त ने वस्तुत: बलात्कार नहीं किया था, बल्कि अपनी बारी का इंतजार किया था। उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया कि विचारण न्यायालय द्वारा दिये गये कारण सामूहिक बलात्कार के मामले में न्यूनतम से कम दण्ड देने का उचित आधार नहीं है। अतः उच्च न्यायालय द्वारा न्यूनतम दण्ड तक दण्डादेश बढ़ाया जाना उचित है। यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि दोषसिद्धि के लिये पीड़िता के साक्ष्य की पुष्टि आवश्यक नहीं है। विरल से विरलतम मामले को छोड़कर साक्ष्य की पुष्टि पर जोर देना अपराध में किसी सहभागी की तुलना व्यभिचार में लिप्त व्यक्ति से करना सम्पुर्ण नारी जाति का अपमान करना होगा। किसी महिला के साथ बलात्कार की श्रृंखला पर विश्वास करने के लिये साक्ष्य की पुष्टि करने । की बात करना उसके लिये कटे पर नमक छिड़कने के बराबर होगा।

दण्ड की मात्रा : – कर्नाटक राज्य बनाम पुत्तराजा76 वाले मामले में अभियुक्त को विचारण न्यायालय द्वारा एक महिला के साथ जो गर्भधारण की अग्रिम अवस्था में थी, बलात्कार करने के लिये दोषसिद्ध किया गया और उसे 5 वर्ष के कारावास से दण्डित किया। अपील किये जाने पर उच्च न्यायालय ने टपट घटा कर कारावास में बिताई अवधि तक कर दिया जो 96 दिन थी। ऐसा मात्र इसलिये किया कि अभियक्त एक 22 वर्ष का किसान युवक और कुली था और घटना बहुत पहले 1945 में घटी थी। उच्चतम यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि उच्च न्यायालय द्वारा अधिरोपित शास्ति न केवल अन्यायोचित थी। कि अनपातिक रूप से भी उचित नहीं थी। उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये कारण न्यूनतम विहित सीमा से शाट कम करने के लिये उचित, पर्याप्ति और विशेष कारण नहीं थे। उच्चतम न्यायालय की राय में यह ऐसा मामला नहीं था जिसमें दण्ड को न्यूनतम विहित सीमा से भी कम कर दिया जाए, जबकि उसे विहित

  1. सतपाल सिंह बनाम हरयाणा राज्य, (2010) IV क्रि० लॉ ज० 4283 (एस० सी०),
  2. 2004 क्रि० लाँ ज० 1 (सु० को०).
  3. 2004 क्रि० लॉ ज०. 579 (सु० को०).

अधिकतम सीमा तक दण्ड मिलना चाहिये। उच्चतम न्यायालय ने निचले न्यायालय द्वारा दिये गये 5 वर्ष के 617 कारावास को पुरस्थापित कर दिया, क्योंकि दण्डादेश के विरुद्ध राज्य ने कोई अपील नहीं की थी। उच्चतम न्यायालय ने आगे यह अभिनिर्धारित किया कि लैंगिक अपराधों में नरमी बरतना न केवल अवांछनीय है, बल्कि लोक हित के विरुद्ध भी है। इस प्रकार के अपराधों में कठोरतापूर्वक विचार करना चाहिये और कड़ाई बरतनी चाहिये। ऐसे मामले में हमदर्दी दिखाना वस्तुतः हमदर्दी का दुरुपयोग करना है। इस मामले में वे कृत्य जिनके कारण दोषसिद्धि हुई है वे केवल घृणित ही नहीं वरन् अत्याचार पूर्ण भी हैं।

मध्य प्रदेश राज्य बनाम मुन्ना चौबे77 वाले मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 की उपधारा (1) और (2) दोनों ही मामलों में न्यायालय को यह विवेकाधिकार है। कि वह पर्याप्त और विशेष कारणों से विहित न्यूनतम दण्डादेश से कम कारावास अधिरोपित कर सकता है। यदि न्यायालय निर्णय में ऐसे कारणों का उल्लेख नहीं करता तो न्यायालय विहित न्यूनतम कारावास से कम कारावास नहीं अधिरोपित कर सकते। यह एक कानुनी अपेक्षा है कि न्यायालय को निर्णय में पर्याप्त और विशिष्ट कारण दर्ज करना चाहिये न कि दिखावटी कारण जिसके आधार पर न्यायालय न्यूनतम विहित दण्ड से कम दण्ड अधिरोपित करने के लिये अनुज्ञात होगा। ‘पर्याप्त” और ”विशिष्ट” कारण क्या है?, यह कतिपय तथ्यों पर निर्भर करेगा, इसके लिए कोई कठोर सूत्र उपदर्शित नहीं किया जा सकता। विहित न्यूनतम शास्ति से कम शास्ति के लिये कारण दर्ज करने की यह कानूनी अपेक्षा उच्च न्यायालय पर भी समान रूप से लागू होती है। इस मामले में उच्च न्यायालय द्वारा दर्शित एकमात्र कारण यह है कि अभियुक्त ग्रामीण क्षेत्र का रहने वाला है। इसे परिकल्पना के किसी मानदण्ड पर पर्याप्त या विशेष नहीं कहा जा सकता। विधि की यह अपेक्षा समग्र (cumulative) है।

उच्चतम न्यायालय ने भी यह अभिनिर्धारित किया कि बलात्कार ऐसा अपराध है जो मानव शरीर को प्रभावित करता है क्योंकि यह भारतीय दण्ड संहिता के अध्याय XVI में दिया गया है। दण्ड विधि (संशोधन) अधिनियम, 1983 के द्वारा धारा 375 और 376 में पर्याप्त संशोधन किया गया है और कुछ नई धारायें जोड़ी गईं, जिनमें न्यूनतम शास्ति विहित की गई है। इन परिवर्तनों से विधायी आशय प्रकट होता है। कि बलात्कार के मामले में कठोरता पूर्वक शास्ति के माध्यम से इनमें कमी लाई जाए, क्योंकि बलात्कार का अपराध किसी महिला की मर्यादा का हनन करता है। शारीरिक खरोचे भर सकती हैं किन्तु मानसिक खरोचें कभी नहीं भरतीं। जब किसी महिला के साथ बलात्कार किया जाता है तो केवल शारीरिक क्षति ही नहीं होती बल्कि उसे शर्म से भी मरना पड़ता है। ।

पंजाब राज्य बनाम राकेश कुमार78 के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि जहां भारतीय दण्ड संहिता की धारा 376 के अधीनस्थ न्यूनतम दण्ड विहित है, न्यायालय को उस विहित न्यूनतम से कम दण्ड देने हेतु यथेष्ट और विशिष्ट कारणों को अभिलिखित करना चाहिये। यह नियम अपीलीय न्यायालयों पर भी लागू होगा। आगे यह तथ्य कि अभियुक्त ग्रामीण क्षेत्र का है किसी भी दशा में विहित न्यूनतम से कम दण्ड देने हेतु न तो यथेष्ट और न विशिष्ट कारण माना जा सकता है। इसी प्रकार यह तथ्य कि अभियुक्त और पीड़िता के मध्य प्रेम सम्बन्ध था 3 वर्ष के न्यूनतम दण्ड को अभियुक्त जितनी अवधि की सजा वह भुगत चुका है। उतने तक कम करने का उचित आधार नहीं है। यह तब और अधिक सत्य है जब पीडिता 16 वर्ष से कम उम्र की थी।

नवाब खाँ एवं अन्य बनाम राज्य79 के मामले में एक महिला ने अपने पति तथा जेठानी के व्यवहार से तंग आकर घर छोड़ देने का निश्चय कर लिया और रेलवे स्टेशन जाकर उज्जैन, जहां उसके पिता रहते थे, का टिकट लिया। स्टेशन पर ही उसकी मुलाकात मुश्ताक अहमद से हुयी जिसने उसे अपने पति के घर वापस जाने के लिये राजी किया और यह आश्वासन दिया कि वह उसके मामले को सुलझाने में सहायता करेगा। उसके आश्वासन पर वह अपने पति के गाँव के निकट पहुँची तो मश्ताक अहमद चाकू से डराकर उसे दूसरी

  1. 2005 क्रि० लॉ ज० 913 (सु० को०).
  2. (2009) 1 क्रि० लॉ ज० 396 (सु० को०).
  3. 1990 क्रि० लाँ ज० 1179 (म० प्र०).

दिशा में ले गया और उसके साथ बलात्कार किया तथा रात भर एक जामुन के पेड़ के नीचे रुका रहा। दसरे दिन प्रात: नवाब, शब्बीर और अब्बास नाम के तीन व्यक्ति आये। नवाब ने भी उस महिला के साथ बलात्कार किया और उस समय शब्बीर और अब्बास चौकसी करते रहे।

उच्च न्यायालय ने शब्बीर तथा अब्बास को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 109 के अन्तर्गत बलात्संग के अपराध में सहायता द्वारा दुष्प्रेरण का दोषी पाया। मुश्ताक अहमद धारा 376 के अन्तर्गत बलात्संग का तथा धारा 366 के अन्तर्गत अयुक्त सम्भोग के आशय से अपहरण का दोषी पाया गया। नवाब खां धारा 376 के अन्तर्गत बलात्संग का दोषी पाया गया। उच्च न्यायालय ने यह भी मत व्यक्त किया कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 366 के अन्तर्गत बल का प्रयोग किया जाना आवश्यक नहीं है। यह कार्य धोखा देकर भी किया जा सकता है। साथ ही बलात्संग में महिला के गुप्तांगों पर चोट का न पाया जाना इस बात का साक्ष्य नहीं है कि सम्भोग उसकी सहमति से हुआ है।

हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम प्रेम सिंह80 के वाद में अभियुक्त, जो एक अध्यापक था, पर अभियोजिका के साथ बलात्कार करने का आरोप था और उसने न केवल अभियोजिका वरन् विद्यालय की अन्य लड़कियों की शालीनता भंग किया था। अभियुक्त को भारतीय दण्ड संहिता की धाराओं 376, 354 और 506 के अधीन अपराध हेतु विचारण किया गया। परन्तु अभियोजिका के साक्ष्य का अध्ययन करने पर वह बलात्संग का दोषी नहीं पाया गया। यह अभिनिर्धारित किया गया कि लैंगिक आक्रमण के मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने में कि विलम्ब की अन्य अपराधों के मामलों से बराबरी नहीं की जा सकती है। बलात्संग के मामले में परिवार के सदस्यों के मस्तिष्क में बहुत सारी बातें शिकायत दर्ज कराने पुलिस स्टेशन जाने के पहले विचारणीय होती हैं। भारत में विद्यमान रूढ़िवादी समाज में विशेष तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में मात्र इस आधार पर कि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने में कुछ विलम्ब हुआ है अभियोजन के मामले को अस्वीकार करना अत्यन्त असुरक्षित होगा।

8][376. बलात्संग के लिए दण्ड–(1) जो कोई, उपधारा (2) में उपबंधित मामलों के सिवाय, बलात्संग करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कठोर कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।

(2) जो कोई(क) पुलिस अधिकारी होते हुए

(i) उस पुलिस थाने की, जिसमें ऐसा पुलिस अधिकारी नियुक्त है, सीमाओं के भीतर; या

(ii) किसी भी थाने के परिसर में; या

(iii) ऐसे पुलिस अधिकारी की अभिरक्षा में या ऐसे पुलिस अधिकारी के अधीनस्थ किसी । पुलिस अधिकारी की अभिरक्षा में, किसी स्त्री से बलात्संग करेगा; या ।

(ख) लोक सेवक होते हुए, ऐसे लोक सेवक की अभिरक्षा में या ऐसे लोक सेवक के अधीनस्थ किसी लोक सेवक की अभिरक्षा में की किसी स्त्री से बलात्संग करेगा; या ।

(ग) केंद्रीय या किसी राज्य सरकार द्वारा किसी क्षेत्र में अभिनियोजित सशस्त्र बलों का कोई सदस्य  होते हुए, उस क्षेत्र में बलात्संग करेगा; या

(घ) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन स्थापित किसी जेल, प्रतिप्रेषण गृह या । अभिरक्षा के अन्य स्थान के या स्त्रियों या बालकों की किसी संस्था के प्रबंधतंत्र या कर्मचारिवृद में होते हए, ऐसी जेल, प्रतिप्रेषण गृह, स्थान या संस्था के किसी निवासी से बलात्संग करेगा; या

  1. (2009) 1 क्रि० लाँ ज० 786 (सु० को०).
  2. दण्ड विधि (संशोधन) अधिनियम, 2013 (2013 को 13) की धारा 9 द्वारा धारा 376 के स्थान पर प्रतिस्थापित दिनांक 3-2-2013 से प्रभावी)।

(ङ) किसी अस्पताल के प्रबंधतंत्र या कर्मचारिवंद में होते हुए, उस अस्पताल में किसी स्त्री से

बलात्संग करेगा; या

(च) स्त्री का नातेदार, संरक्षक या अध्यापक अथवा उसके प्रति न्यास या प्राधिकारी की हैसियत में का कोई व्यक्ति होते हुए, उस स्त्री से बलात्संग करेगा; या

(छ) सांप्रदायिक या पंथीय हिंसा के दौरान बलात्संग करेगा; या

(ज) किसी स्त्री से यह जानते हुए कि वह गर्भवती है बलात्संग करेगा; या

(झ) किसी स्त्री से, जब वह सोलह वर्ष से कम आयु की है, बलात्संग करेगा; या

(ज) उस स्त्री से, जो सम्मति देने में असमर्थ है, बलात्संग करेगा; या

(ट) किसी स्त्री पर नियंत्रण या प्रभाव रखने की स्थिति में होते हुए, उस स्त्री से बलात्संग करेगा; या

(ठ) मानसिक या शारीरिक नि:शक्तता से ग्रसित किसी स्त्री से बलात्संग करेगा; या

(ड) बलात्संग करते समय किसी स्त्री को गंभीर शारीरिक अपहानि कारित करेगा या विकलांग बनाएगा या विद्रूपित करेगा या उसके जीवन को संकटापन्न करेगा; या

(ढ) उसी स्त्री से बारबार बलात्संग करेगा, वह कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से कम की नहीं होगी, किन्तु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, जिससे उस व्यक्ति के शेष प्राकृत जीवनकाल के लिए कारावास अभिप्रेत होगा, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा।


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