Indian Penal Code 1860 Offences Relating Religion Part 24 LLB Notes Study Material

Indian Penal Code 1860 Offences Relating Religion Part 24 LLB Notes Study Material

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Indian Penal Code 1860 Offences Relating Religion Part 24 LLB Notes Study Material

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(OF KIDNAPPING, ABDUCTION, SLAVERY AND FORCED LABOR)

  1. व्यपहरण-व्यपहरण दो किस्म का होता है, भारत में से व्यपहरण और विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण।

टिप्पणी

व्यपहरण का शाब्दिक अर्थ है “बाल-चौर्य”। व्यपहरण दो प्रकार का होता है-(1) भारत में से व्यपहरण, और (2) विधिपूर्ण संरक्षकता में व्यपहरण। कुछ मामलों में इन दोनों प्रकारों में अन्तर स्थापित करना दुष्कर होता है। उदाहरण के लिये, किसी अवयस्क शिशु का भारत में से किया गया व्यपहरण विधिपूर्ण संरक्षकता में से भी किया गया व्यपहरण है।

  1. भारत में से व्यपहरण-जो कोई किसी व्यक्ति का, उस व्यक्ति की, या उस व्यक्ति की ओर से सम्मति देने के लिए वैध रूप से प्राधिकृत किसी व्यक्ति की सम्मति के बिना, भारत की सीमाओं से परे प्रवहण कर देता है, वह भारत में से उस व्यक्ति का व्यपहरण करता है, यह कहा जाता है।

टिप्पणी

इस धारा के अन्तर्गत वर्णित अपराध का शिकार पुरुष या स्त्री, वयस्क या अवयस्क कोई भी व्यक्ति हो सकता है। इसके निम्नलिखित अवयव हैं

(1) किसी व्यक्ति का भारत की सीमाओं से प्रवहण करना,

(2) ऐसा प्रवहण प्रवहणित व्यक्ति की सम्मति के बिना हो।

यदि कोई व्यक्ति वयस्कता की आयु पूर्ण कर चुका हो तथा प्रवहणन हेतु अपनी सम्मति दे चुका है तो इस धारा में वर्णित अपराध कारित हुआ नहीं माना जायेगा। व्यपहरण के अपराध के प्रयोजन हेतु सम्मति देने की उम्र 16 वर्ष लड़कों के लिये तथा 18 वर्ष लड़कियों के लिये है।

  1. विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण-जो कोई किसी अप्राप्तवय को, यदि वह नर हो, तो सोलह वर्ष से कम आयु वाले को, या यदि वह नारी हो तो, अट्ठारह वर्ष से कम आयु वाली को या किसी विकृतचित्त व्यक्ति को, ऐसे अप्राप्तवय या विकृतचित्त व्यक्ति के विधिपूर्ण संरक्षक की संरक्षकता में से ऐसे संरक्षक की सम्मति के बिना ले जाता है या बहका ले जाता है, वह ऐसे अप्राप्तवय या ऐसे व्यक्ति का विधिपूर्ण संरक्षकता में से व्यपहरण करता है, यह कहा जाता है।

स्पष्टीकरण- इस धारा में ‘‘विधिपूर्ण संरक्षक” शब्दों के अन्तर्गत ऐसा व्यक्ति आता है जिस पर ऐसे अप्राप्तवय या अन्य व्यक्ति की देख-रेख या अभिरक्षा का भार विधिपूर्वक न्यस्त किया गया है।

अपवाद- इस धारा का विस्तार किसी ऐसे व्यक्ति के कार्य पर नहीं है, जिसे सदभावपूर्वक यह विश्वास है कि वह किसी अधर्मज शिशु का पिता है, या जिसे सद्भावपूर्वक यह विश्वास है कि वह ऐसे शिशु की विधिपूर्ण अभिरक्षा का हकदार है, जब तक कि ऐसा कार्य दुराचारिक या विधिविरुद्ध प्रयोजन के लिए न किया जाए।

टिप्पणी

इस धारा तथा पश्चात्वर्ती धारा के उपबन्धों का आशय अवयस्क तथा अस्वस्थ मस्तिष्क वाले व्यक्तियों के संरक्षकों के अधिकारों को संरक्षण प्रदान करने के बजाय अवयस्क तथा अस्वस्थ मस्तिष्क वाले व्यक्तियों को ही संरक्षण प्रदान करना है। यह सम्भव है कि रिष्टि, जिसे दण्डित करना ही इस धारा का आशय है, से अंशतः अभिभावक के उस अधिकार को धक्का पहुँच सकता है या उसका उल्लंघन भी हो सकता है जिसके तहत वह अपने प्रतिपाल्य (ward) को अपनी देखभाल तथा नियन्त्रण में रखता है, किन्तु इससे भी महत्वपूर्ण उद्देश्य है, प्रतिपाल्यों को अनुचित प्रयोजनों हेतु विलुब्धकरण या अपहरण के विरुद्ध उन्हें स्वयं सुरक्षा तथा संरक्षण प्रदान करना 27

अवयव- इस धारा के निम्नलिखित प्रमुख अवयव हैं

(1) किसी अवयस्क या विकृतचित्त व्यक्ति को ले जाना अथवा बहका ले जाना,

(2) ऐसा अवयस्क व्यक्ति, यदि वह पुरुष है, तो 16 वर्ष से कम, और यदि नारी है, तो 18 वर्ष से कम उम्र की हो,

(3) ले जाने अथवा बहका ले जाने का कार्य ऐसे अवयस्क या विकृत चित्त व्यक्ति के विधिपूर्ण संरक्षक की संरक्षकता में से किया गया हो,

(4) ले जाना अथवा बहका ले जाना संरक्षक की सहमति के बिना हुआ है।

ले जाना अथवा बहका ले जाना– ले जाने का अर्थ है, जाने के लिये प्रेरित करना, आधिपत्य ग्रहण करना या संरक्षण प्रदान करना। इस धारा के अन्तर्गत अपराध संरचित करने हेतु अभियोजन द्वारा यह प्रतिसिद्ध किया जाना आवश्यक है कि अभियुक्त ने लड़की द्वारा अपने विधिपूर्ण संरक्षक की संरक्षकता त्यागन तथा उसके यहाँ शरण लेने में कोई भूमिका अदा की थी 28 ले जाने के लिये वास्तविक या परिलक्षित कि

परयकता नहीं होती और यह महत्वपर्ण नहीं है कि लड़की अपनी सम्मति देता है। अथवा नहीं 29 विधिपूर्ण संरक्षकता से परे बच्चे का ले जाना इस अपराध के गठन हेतु

  1. राज्य बनाम हरवंश सिंह किशन सिंह, ए० आई० आर० 1954 बम्बई 339.
  2. छज्जू राम बनाम पंजाब राज्य, ए० आई० आर० 1968 पंजाब 439.
  3. मॉकटेलो, (1853) 6 काक्स 143. ।

ले जाने’ शब्द के अन्तर्गत ले जाये गये व्यक्ति की इच्छा की कमी या कामना की अनुपस्थिति . है 30 यह सिद्ध किया जाना आवश्यक है कि अभियुक्त ने उत्प्रेरण या अन्यथा द्वारा सक्रिय कार्यवाही लडकी को अपना घर त्यागने के लिये प्रेरित किया। यदि अभियुक्त के साथ जाने का प्रश्नाव लडकी ३ या और उसने उसके प्रस्ताव के प्रति अपना समर्थन व्यक्त कर केवल निक्रिय भूमिका अदा की थी तो दोधमक्ति का अधिकारी है।32 अभियुक्त इस धारा के अन्तर्गत तभी दण्डनीय होगा जब उसने ऐसा कोई किया हो जिससे प्रभावित होकर लड़की अपने संरक्षक की संरक्षकता से परे चली जाती है 33

यद्यपि अवयस्क को किसी व्यक्ति के साथ जाने की स्वीकृति देना सामान्यतया उस व्यक्ति द्वारा इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत ‘ले जाना’ नहीं है किन्तु कुछ परिस्थितियों में यह ‘ ले जाना’ हो सकता है। क्या कोई कार्य इस धारा के अर्थ के अन्तर्गत ले जाना है, के निर्धारण हेतु निम्नलिखित तथ्यों को ध्यान में रखना चाहिये-पार्टियों के आचरण खास कर अभियुक्त को दोनों के साथ जाने से पूर्व और तत्समय बालिका की। परिपक्वता तथा अपने विषय में सोचने की उसकी बौद्धिक क्षमता, परिस्थितियाँ जिनके अन्तर्गत तथा उद्देश्य । जिसके लिये उसने संरक्षक के संरक्षण को त्यागना उचित एवं आवश्यक समझा।

वरदराजन बनाम मद्रास राज्य35 के वाद में एक अवयस्क लड़की अपने कार्य की प्रकृति तथा परिणाम को अच्छी प्रकार जानते हुये अपने पिता का संरक्षण छोड़कर स्वेच्छया अभियुक्त के पास चली आयी। उच्चतम् । न्यायालय ने प्रेक्षित किया कि ले जाने तथा किसी अवयस्क को किसी के साथ जाने की अनुमति देना, दोनों। में अन्तर है। प्रस्तुत वाद में यह नहीं कहा जा सकता कि अभियुक्त लड़की को उसके विधिपूर्ण संरक्षक की। संरक्षकता से परे ले गया था। इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि तभी प्रदान की जाएगी जब यह सिद्ध हो जाये कि अभियुक्त ने घर छोड़ने के लिये लड़की को उत्प्रेरित किया था या इस प्रयोजन हेतु उसके आशय निर्माण में सक्रिय योगदान किया था। अतएव अभियुक्त व्यपहरण के अपराध का दोषी नहीं होगा।

बहकाना-बहकाने” का अर्थ है कि किसी अवयस्क को स्वेच्छया व्यपहरक के साथ जाने के लिये उत्प्रेरित करना। इसमें उत्प्रेरण द्वारा दूसरे व्यक्ति में आशा या इच्छा जाग्रत करना निहित है। कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को तब तक बहकाता नहीं कहा जाता जब तक कि दूसरा व्यक्ति कोई ऐसा कार्य नहीं करता जिसे वह अन्यथा नहीं कर सकेगा। ”बहकाने” का अर्थ है यद्यपि, यह सम्भव था कि व्यपहत व्यक्ति विधिपूर्ण संरक्षकता स्वेच्छया छोड़ दिया होता, फिर भी उसकी मानसिक अवस्था अभियुक्त द्वारा उत्प्रेरित होनी। आवश्यक थी।36 |

टी० डी० वाडगम्मा बनाम स्टेट आफ गुजरात7 के मामले में अभियुक्त पर 15 वर्ष उम्र की मोहिनी नामक अवयस्क लड़की को उसके पिता के विधिपूर्ण संरक्षण से भारतीय दण्ड संहिता की धारा 361 के अन्तर्गत व्यपहरण का आरोप था। यह सिद्ध कर दिया गया था कि व्यपहरण के पहले किसी समय अभियुक्त ने मोहिनी को अपने पिता का संरक्षण छोड़ने हेतु यह कहकर लुभाया अथवा उकसाया (induce) था कि वह उसे शरण प्रदान करेगा। अभियुक्त को व्यपहरण के अपराध हेतु दोषी ठहराते हुये उच्चतम न्यायालय ने यह प्रेक्षित किया कि मात्र यह परिस्थिति कि अभियुक्त का कार्य उस लड़की द्वारा अपने पिता का घर अथवा अभिभावक का संरक्षण त्यागने का तात्कालिक कारण नहीं था। उसके लिये विधिक बचाव का उपयुक्त आधार नहीं कहा जा सकता है और उस आधार पर व्यपहरण के अपराध से दोषमुक्ति नहीं मिलेगी। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने बहकाने, फुसलाने और ले जाने शब्दों की विस्तृत व्याख्या निम्नवत किया। था

30, जयनारायण बनाम हरयाना राज्य, (1969) 71 पंजाब लॉ रि० 688,

31, चाथू बनाम पी० गोविन्दन कुट्टी, ए० आई० आर० 1958 केरल 121.

32, र० बनाम जर्वीस, 20 काक्स 249.

  1. अराथन, (1966) क्रि० लॉ ज० 210
  2. एस० एस० करीभार्थी ‘अनाम गुजरात राज्य, 1966 गुजरात ला० रि० 378,
  3. ए० आई० आर० 1965 सु० को० 942.

36 सैय्यद अब्दुल सत्तार बनाम इम्परर, ए० आई० आर० 1928 मद्रास 585.

  1. ए० आई० आर० 1973 सु० को० 2313.

*”बहकाने” शब्द से उत्प्रेरण या प्रलोभन द्वारा दूसरे व्यक्ति में आशा या इच्छा जागृत करने का विचार अन्तर्निहित है। इसके अनेक प्रकार हो सकते हैं जिनकी व्यापक व्याख्या एक दुष्कर कार्य है। उनमें से कुछ बहुत ही सूक्ष्म हैं जो अपनी सफलता हेतु उस व्यक्ति की मानसिक अवस्था पर उस समय निर्भर करते हैं जिस समय उत्प्रेरण का प्रभावकारी होना आशयित है। यह तुरन्त प्रभावकारी हो सकता है या यह निरन्तर तथा शनैः शनै: किन्तु तीक्ष्ण प्रभाव सृजित कर सकता है जो कुछ समय पश्चात् अपने अन्तिम उद्देश्य के सफल उत्प्रेरण की प्राप्ति कर लेता है।”

न्यायालय ने यह भी प्रेक्षित किया था कि दोनों शब्दों ‘‘ले जाने और बहकाने” जिनका प्रयोग धारा 361 भारतीय दण्ड संहिता में हुआ है, इस प्रकार है कि दोनों एक सीमा तक एक दूसरे से प्रभावित होते हैं। सांविधिक शब्दावली यह स्पष्ट करती है कि, यदि अवयस्क अपना पैतृक मकान अभियुक्त द्वारा दी गयी किसी प्रतिज्ञा या किसी प्रस्ताव या उत्प्रेरण के पूर्ण प्रभाव के अन्तर्गत छोड़ती है तो यह नहीं कहा जा सकता कि अभियुक्त ने धारा 361 में वर्णित अपराध कारित किया है। किन्तु यदि इस गृह त्याग की आधार शिला अभियुक्त ने उत्प्रेरण, प्रलोभन तथा धमकी द्वारा रखी थी और यदि यह सिद्ध हो जाता है कि अवयस्क द्वारा | गृह त्याग के यही कारण थे, साथ ही यदि अवयस्क अभियुक्त के साथ थी तो अभियुक्त को प्रथमदृष्ट्या अपनी निर्दोषता सिद्ध करने में कठिनाई होगी। उसे दलील प्रस्तुत करने का अवसर नहीं दिया जायेगा कि अवयस्क बालिका स्वेच्छया उसके पास आयी थी।38 ।


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