Indian Penal Code 1860 Offences Against The State LLB 1st Year Notes Study Material

Indian Penal Code 1860 Offences Against The State LLB 1st Year Notes Study Material

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Indian Penal Code 1860 Offences Against The State LLB 1st Year Notes Study Material

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अध्याय 6

राज्य के विरुद्ध अपराधों के विषय में

(OF OFFENCES AGAINST THE STATE)

  1. भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करना या युद्ध करने का प्रयत्न करना या युद्ध करने का दुष्प्रेरण करना- जो कोई भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करेगा, या ऐसा युद्ध करने का प्रयत्न करेगा या ऐसा युद्ध करने का दुष्प्रेरण करेगा, वह मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

दृष्टान्त

भारत सरकार के विरुद्ध विप्लव में सम्मिलित होता है। क ने इस धारा में परिभाषित अपराध किया

टिप्पणी

प्रत्येक राज्य को अपने को सुरक्षित रखने का उसी प्रकार अधिकार है जैसे कि उसकी प्रजा को तथा मनुष्यों की तरह राज्य भी अपने अस्तित्व को बनाये रखने तथा सुरक्षित रखने के लिये आदिकाल से ही उपाय करते चले आ रहे हैं। कामन ला में राजद्रोह (Treason) के अपराध को इसी तथ्य को विचार में रखकर सृजित किया गया था। घोर राजद्रोह (High Treason) की मूलभूत विशेषता यह है कि इसमें शासक को राज्य का सर्वोच्च पदाधिकारी होने के नाते जिस विश्वास एवं समर्थन की अपने प्रजा से अपेक्षा रहती है, वह समाप्त हो जाती है। इस अपराध को गठित करने के लिये व्यक्तियों की किसी विशिष्ट संख्या की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसी प्रकार इस अपराध को गठित करने के लिये व्यक्तियों को किसी विशिष्ट ढंग से इकट्ठा होना या हथियार एकत्रित करना भी आवश्यक नहीं है। इसका प्रमुख परीक्षण (Test) यह है कि किस प्रयोजन अथवा किस आशय से वे लोग इकट्टे होते हैं। उस समूह का प्रयोजन निश्चयत: बल अथवा हिंसा के प्रयोग द्वारा सामान्य लोक प्रकृति (general public nature) के किसी उद्देश्य को प्राप्त करना तथा सरकार के प्रभुत्व पर प्रत्यक्षत: प्रहार करना होना चाहिये।

अवयव- इस धारा के निम्नलिखित अवयव हैं

(1) अभियुक्त ने युद्ध किया या युद्ध करने का प्रयत्न किया या युद्ध करने का दुष्प्रेरण किया, तथा

(2) ऐसा युद्ध भारत सरकार के विरुद्ध था।

युद्ध करना (Waging war)- कोई व्यक्ति जो सांविधानिक प्राधिकारियों पर हुये संगठित सशस्त्र आक्रमण में भाग लेता है तथा आक्रमण का उद्देश्य सरकार को विध्वंश कर उसके स्थान पर दूसरे को थापित करना है तो वह व्यक्ति युद्ध करने के अपराध का दोषी होगा। यह अपराध किसी नागरिक द्वारा या किसी विदेशी द्वारा किया जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने राजनीतिक विचारों के विस्तारण एवं संस्थापन के लिये तब तक स्वतन्त्र है जब तक वह बल या हिंसा का प्रयोग नहीं करता है। राजनीतिक प्रणाली में अथवा यरकार की प्रकति में शांतिपूर्ण साधनों द्वारा परिवर्तन के लिये प्रयत्न करना युद्ध करने के समतुल्य नहीं है

  1. मगन लाल, (1946) नाग० 126.
  2. इन० रे० यू० पी० वी० खादेर बनाम इम्परर, 23 क्रि० लॉ ज० 203.
  3. आर० वास नायर बनाम टी० सी० स्टेट, ए० आई० आर० 1955 टी० सी० 33.

किन्तु यदि अभियुक्त सरकार को उखाड़ फेंकने के उद्देश्य से व्यक्तियों का चयन करता है तथा जो उसका साथ नहीं देते हैं उन्हें दण्डित करता है तो, यह युद्ध करने का दोषी होगा।।

मगन लाल राधा कृष्ण बनाम इम्परर में इस अपराध के निम्नलिखित गुण बताये गये हैं

(1) इस अपराध को गठित करने के लिये व्यक्तियों की किसी विशिष्ट संख्या की आवश्यकता नहीं होती है।

(2) सम्बन्धित व्यक्तियों की संख्या तथा उसके सुसज्जित होने की प्रकृति महत्वहीन है;।

(3) वास्तविक परीक्षण यह है कि ”किस आशय” से वे एकत्रित हुये हैं;

(4) जमघट (gathering) का उद्देश्य बल और हिंसा के प्रयोग द्वारा किसी सामान्य लोक प्रकृति के उद्देश्य की प्राप्ति और शासक के प्राधिकारों को प्रभावित करना होना चाहिये।

(5) मुख्य कर्ता तथा सहायक कर्ता में कोई अन्तर नहीं है। जो कोई भी अवैध कार्य में भाग लेता है।

उसी अपराध का दोषी होगा।

युद्ध करने का आशय है युद्ध में सामान्यतया प्रयुक्त रीतियों द्वारा युद्ध करना। इस धारा के अधीन किसी व्यक्ति को दण्डित करने के लिये केवल यह दर्शाना ही पर्याप्त नहीं है कि अभियुक्त ने शस्त्रागार (armoury) को अपने कब्जे में लेने के लिये छल किया था और जब उसे समर्पण करने के लिये कहा गया तो उसने छल द्वारा प्राप्त बन्दूकों और अन्य युद्धोपकरणों (ammunitions) का प्रयोग सरकारी फौजों के विरुद्ध किया, अपितु यह भी दर्शाना आवश्यक है कि शस्त्रागार का छीना जाना भी सुनियोजित योजना का अंग था। सरकारी फौजों को प्रतिरोध देते समय उनका आशय था कि उन्हें आश्चर्य में डालकर पराजित कर दिया जाये, तत्पश्चात् सभी सरकारी प्रतिरोधी को कुचल कर या तो उसके नेता शासन की बागडोर अपने हाथ में ले लें या शासन उनकी मांगों के सम्मुख झुक जाये । सरकारी फौजों पर जानबूझकर एवं संगठित रूप में किया गया। आक्रमण युद्ध के समतुल्य होगा यदि विद्रोहियों का उद्देश्य सशस्त्र सेना एवं हिंसा द्वारा लोक-सेवकों को अपने आधिपत्य में करना तथा सामान्य टैक्स वसूली को स्थगित करना हो ।

युद्ध करने का दुष्प्रेरण करता है (Abets the waging of war)–युद्ध करने का दुष्प्रेरण इस धारा के अन्तर्गत एक विशिष्ट अपराध घोषित किया गया है। यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरण के फलस्वरूप ही युद्ध हो। यद्यपि दुष्प्रेरण से सम्बन्धित सामान्य विधि दण्ड के प्रयोजन हेतु सफल दुष्प्रेरण तथा असफल दुष्प्रेरण में विभेद करती हैं किन्तु इस धारा में इस तरह का कोई अन्तर नहीं है। प्रमुख कर्ता तथा सहायक कर्ता में भी कोई अन्तर नहीं है और वे सभी व्यक्ति जो अवैध कार्यवाही में भाग लेते हैं एक ही दण्ड से दण्डित होंगे।

जब तक कोई व्यक्ति केवल विचारों को भड़काने अथवा उत्तेजित करने का प्रयत्न करता है तब तक वह राजद्रोह (sedition) के अतिरिक्त किसी अन्य अपराध का दोषी नहीं होगा। कोई व्यक्ति उकसाने तथा युद्ध करने के दुष्प्रेरण का दोषी तभी माना जायेगा जब वह स्पष्टतः एवं निश्चयत: किसी कार्यवाही को उकसाता है। उदाहरण के लिये गणेश डी० सावरकर के वाद में अभियुक्त ने कविताओं की एक किताब प्रकाशित किया जिसमें सरकार एवं ‘श्वेत’ शासकों के विरुद्ध प्रत्येक कविता में रक्त पिपासा एवं घातक उत्कंठाओं को प्रेरित किया गया था, हथियार धारण करने के लिये असंदिग्ध भाषा में विचार प्रतिपादित किया गया था तथा गुप्त संस्थाओं के निर्माण और विदेशी शासन को जड़ से समाप्त करने के लिये गुरिल्ला युद्ध पद्धति को अपनाने के

  1. ए० आई० आर० 1946 नाग० 173.
  2. मीर हसन खान बनाम राज्य, ए० आई० आर० 1951 पटना 60.
  3. ओंग लॉ बनाम इम्परर, ए० आई० आर० 1931 रंगून 235 पृ० 239.
  4. मगन लाल, 1946 नागपुर 126.
  5. गणेश डी० सावरकर, (1909) 12 बाम्बे लॉ रि० 105.
  6. उपरोक्त सन्दर्भ. ।

लिये सुझाव दिया गया था। यह निर्णय दिया गया कि कवितायें पाठकों को युद्ध करने के लिये उकसाने हेत सक्षम थी और अभियुक्त युद्ध करने के दुष्प्रेरण का दोषी था।

121-क. धारा 121 द्वारा दण्डनीय अपराधों को करने का षड्यंत्र- जो कोई धारा 121 द्वारा दण्डनीय अपराधों में से कोई अपराध करने के लिए भारत के भीतर या बाहर षड्यंत्र करेगा, या केन्द्रीय सरकार को या किसी राज्य की सरकार को आपराधिक बल द्वारा या आपराधिक बल के प्रदर्शन द्वारा आतंकित करने का षड्यंत्र करेगा, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

स्पष्टीकरण– इस धारा के अधीन षड्यंत्र गठित होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उसके अनुसरण में कोई कार्य या अवैध लोप घटित हुआ हो।

टिप्पणी

अवयव– यह धारा दो प्रकार के षड्यंत्रों से सम्बन्धित है

(1) धारा 121 द्वारा दण्डनीय किसी अपराध को करने के लिये भारत में अथवा भारत के बाहर षड्यंत्र करना, एवं

(2) आपराधिक बल द्वारा अथवा आपराधिक बल के प्रदर्शन द्वारा केन्द्रीय सरकार अथवा किसी राज्य सरकार को आतंकित करने हेतु षड्यंत्र करना। |


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