Indian Penal Code 1860 Of Abetment Part 2 LLB 1st Year Notes Study Material

Indian Penal Code 1860 Of Abetment Part 2 LLB 1st Year Notes Study Material

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Indian Penal Code 1860 Of Abetment LLB 1st Year Notes Study Material

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Indian Penal Code 1860 Of Abetment Part 2 LLB 1st Year Notes Study Material

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  1. दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित कार्य उसके परिणामस्वरूप किया जाए, और जहाँ कि उसके दण्ड के लिए कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं है– जो कोई किसी अपराध का दुष्प्रेरण करता है, यदि दुष्प्रेरित कार्य दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया जाता है, और ऐसे दुष्प्रेरण के दण्ड के लिए इस संहिता द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं किया गया है, तो वह उस दण्ड से दण्डित किया जाएगा, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है।

स्पष्टीकरण- कोई कार्य या अपराध दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया गया तब कहा जाता है, जब वह उस उकसाहट के परिणामस्वरूप या उस षड्यंत्र के अनुसरण में या उस सहायता से किया जाता है, जिससे दुष्प्रेरण गठित होता है।

दृष्टान्त

(क) ख को, जो एक लोकसेवक है, ख के पदीय कृत्यों के प्रयोग में क पर कुछ अनुग्रह दिखाने के लिए इनाम के रूप में क रिश्वत की प्रस्थापना करता है, ख वह रिश्वत प्रतिगृहीत कर लेता है। क ने धारा 161 में परिभाषित अपराध का दुष्प्रेरण किया है।

(ख) ख को मिथ्या साक्ष्य देने के लिए क उकसाता है। ख उस उकसाहट के परिणामस्वरूप, वह अपराध करता है। क उस अपराध के दुष्प्रेरण का दोषी है, और उसी दण्ड से दण्डनीय है, जिससे ख है।

(ग) य को विष देने का षड़यंत्र क और ख रचते हैं। क उस षड़यंत्र के अनुसरण में विष उपाप्त करता है। और उसे ख को इसलिए परिदत्त करता है कि वह उसे य को दे। ख उस षड़यंत्र के अनुसरण में वह विष क की अनुपस्थिति में य को देता है और उसके द्वारा य की मृत्यु कारित कर देता है। यहाँ ख हत्या का दोषी है। क षड़यंत्र द्वारा उस अपराध के दुष्प्रेरण का दोषी है और वह हत्या के लिए दण्ड से दण्डनीय है।

टिप्पणी

यह धारा दुष्प्रेरक के लिये उसी दण्ड का उपबन्ध करती है जो प्रमुख अपराधी के लिये उपबन्धित है। यदि

(क) दुष्प्रेरण के अनुसरण में दुष्प्रेरित कार्य किया गया है; तथा

(ख) ऐसे दुष्प्रेरण के दण्ड के लिये इस संहिता द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं किया गया है।

यह धारा मात्र यह उपबन्धित करती है कि यदि किसी दुष्प्रेरण के लिये इस संहिता द्वारा कोई अलग उपबन्ध नहीं किया गया है तो वह उसी दण्ड से दण्डनीय होगा जो मौलिक अपराध के लिये उपबन्धित

है।48

यह स्पष्टीकरण यह स्पष्ट करता है कि दुष्प्रेरण निम्नलिखित में से किसी एक प्रकार का हो सकता है–उकसाना, सहायता पहुँचाना तथा षड्यंत्र ।।

इस धारा के अन्तर्गत दोषसिद्धि प्रदान करने के लिये अलग आरोप का लगाया जाना आवश्यक नहीं है। पंजाब उच्च न्यायालय के मतानुसार इस विषय पर उपलब्ध पूर्व निर्णयों को पुनर्विलोकन करने पर यह सुस्पष्ट है कि अनावर्त्य नियम के रूप में यह प्रतिपादित नहीं किया जा सकता है कि किसी प्रकरण में अभियुक्त को दष्प्रेरण के लिये दण्डित नहीं किया जा सकता यदि अभियुक्त पर केवल मुख्य अपराध के लिये आरोप लगाया गया है और दुष्प्रेरण के लिये अलग आरोप नहीं लगाया गया है। यदि अभियुक्त को उन तथ्यों का ज्ञान था। जिनमें दष्प्रेरण का गठन हुआ था, तो भले ही उस पर केवल मुख्य अपराध का आरोप लगाया गया हो, और यदि दुष्प्रेरण के लिये अलग आरोप लगाने से अभियुक्त को कोई नुकसान नहीं हुआ था, उसे दुष्प्रेरण के लिये दोषसिद्धि प्रदान की जा सकती है यद्यपि मुख्य अपराध के लिये आरोप सफल न हुआ हो।

  1. शेष अय्यर बनाम वेंकट सुब्बा शेट्टी, ए० आई० आर० 1924 मद्रास 487.

मुन्नू स्वामी एवं अन्य बनाम तमिलनाडु राज्य-9 वाले मामले में क सड़क के किनारे घ का इंतजार कर रहा था। स ने साइकिल से घ का पीछा किया। घ भी साइकिल पर था। अ, ब और स ने घ को रोका। खतरा महसूस करते हुये घ जान बचाने के लिये भागने लगा, किन्तु क और ख ने उसे पकड़ लिया। इसके बाद क और ख ने घ के हाथ पकड़ लिये। क द्वारा घ को चाकू मारने के लिये उकसाए जाने पर तीसरे अभियक्त ग ने। चाकू से घ के संवेदनशील अंगों पर चाकू से प्रहार किये। संवेदनशील अंगों जैसे सीना और पैरिएटल भाग में चाकू मारा, जिससे घ की मृत्यु हो गई। तथ्यों और परिस्थितियों से यह स्पष्ट है कि तीनों अभियुक्तों ने घ की हत्या करने का षड़यंत्र किया होगा और उसके अनुसरण में क मौके पर इंतजार करता रहा, जबकि ख और ग ने साइकिल पर मृतक का पीछा किया। उन सभी ने घ को खदेड़ा और जब वह क और ख की पकड़ में आ गया, तब क के आदेश पर ग ने क्षतियाँ कारित की। मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में यह नहीं कहा जा सकता कि ग का कृत्य व्यक्तिगत कृत्य है। यह अभिनिर्धारित किया गया कि यह षड़यंत्र द्वारा दुष्प्रेरण का मामला है, जिसमें योजना को कार्यरूप देते समय तीन षडयंत्रकारी उपस्थित थे, और सक्रिय रूप से भाग लिया। इसलिये ग धारा 302 के अधीन हत्या के लिये दोषी है तथा क और ख भा० द० सं० की धारा 109 के साथ पारित धारा 302 के अधीन अपराध के दोषी थे।

आनन्दमोहन बनाम बिहार राज्य0 के वाद में मृतक की मृत्यु चार अभियुक्तों द्वारा प्रबोधन दिये जाने के कारण हुई थी। गवाहों में से बहुमत ने भीड़ में से एक के द्वारा प्रबोधन दिये जाने की बात कहा परन्तु अन्य तीन के बारे में वे चुप थे। अतएव केवल एक अभियुक्त की भारतीय दण्ड संहिता की धारा 309/109 के अधीन दोषसिद्धि उचित कही गयी। आगे यह भी स्पष्ट किया गया कि गवाहों में से बहुमत के साक्ष्य पर। आधारित दोषसिद्धि को मात्र इस कारण कि मृतक का ड्राइवर और अंगरक्षक दोनों प्रबोधन दिये जाने । (exhortation) और मृत्यु कारित करने के बारे में चुप थे, गलत नहीं कहा जा सकता है।

  1. दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति दुष्प्रेरक के आशय से भिन्न आशय से कार्य करता है- जो कोई किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करता है, यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति ने दुष्प्रेरक के आशय या ज्ञान से भिन्न आशय या ज्ञान से वह कार्य किया हो, तो वह उसी दण्ड से दण्डित किया जाएगा, जो उस अपराध के लिए उपबन्धित है, जो किया जाता यदि वह कार्य दुष्प्रेरक के ही आशय या ज्ञान से, न कि किसी अन्य आशय या ज्ञान से, किया जाता।

टिप्पणी

यह धारा यह उपबन्धित करती है कि यद्यपि दुष्प्ररित व्यक्ति दुष्प्रेरक के आशय या ज्ञान से भिन्न आशय या ज्ञान से अपराध कारित करता है फिर भी दुष्प्रेरक दुष्प्रेरित अपराध के लिये उपबन्धित दण्ड द्वारा दण्डनीय होगा। इस धारा को धारा 108 स्पष्टीकरण 3 के साथ पढ़ा जाना चाहिये। यदि दोनों को एक साथ पढ़ा जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है कि दुष्प्रेरित व्यक्ति का दायित्व इस धारा द्वारा प्रभावित नहीं होता है तथा एक व्यक्ति दुष्प्रेरण का दोषी हो सकता है भले ही दुष्प्रेरित व्यक्ति अपराध कारित करने हेतु विधित: सक्षम भी न हो या उसका भी वही अपराधिक आशय या ज्ञान न रहा हो जो दुष्प्रेरक का था।51 |

  1. दुष्प्रेरक का दायित्व जब एक कार्य का दुष्प्रेरण किया गया है और उससे भिन्न कार्य किया गया है जबकि किसी एक कार्य का दुष्प्रेरण किया जाता है, और कोई भिन्न कार्य किया जाता है, तब दुष्प्रेरक उस किए गए कार्य के लिए उसी प्रकार से और उसी विस्तार तक दायित्व के अधीन है, मानो उसने सीधे उसी कार्य का दुष्प्रेरण किया हो;

परन्तुक- परन्तु यह तब जबकि किया गया कार्य दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम था और उस उकसाहट के असर के अधीन या उस सहायता से या उस षडयंत्र के अनुसरण में किया गया था जिससे वहे। दुष्प्रेरण गठित होता है।

  1. 2002 क्रि० लॉ ज० 3915 सु० को०.
  2. (2013) III क्रि० लॉ ज० 2644 (एस० सी०).
  3. प्रमथनाथ हरबाव, (1953) 1 कल० 81.

दृष्टान्त

(क) एक शिशु को य के भोजन में विष डालने के लिए क उकसाता है, और उस प्रयोजन से उसे विष परिदत्त करता है। वह शिशु उस उकसाहट के परिणामस्वरूप भूल से म के भोजन में, जो य के भोजन के पास रखा हुआ है, विष डाल देता है। यहाँ, यदि वह शिशु क के उकसाने के असर के अधीन उस कार्य को कर रहा था, और किया गया कार्य उन परिस्थितियों में उस दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम है, तो क उसी प्रकार और उसी विस्तार तक दायित्व के अधीन है, मानो उसने उस शिशु को म के भोजन में विष डालने के। लिए उकसाया हो।

(ख) ख को य का गृह जलाने के लिए क उकसाता है। ख उस गृह को आग लगा देता है और उसी समय वहाँ सम्पत्ति की चोरी करता है। क यद्यपि गृह को जलाने के दुष्प्रेरण का दोषी है, किन्तु चोरी के दुष्प्रेरण का दोषी नहीं है, क्योंकि वह चोरी एक अलग कार्य थी और उस गृह के जलाने का अधिसम्भाव्य परिणाम नहीं थी।

(ग) ख और ग को बसे हुए गृह में अर्धरात्रि में लूट के प्रयोजन से भेदन करने के लिए क उकसाता है, और उनको उस प्रयोजन के लिए आयुध देता है। ख और ग वह गृह भेदन करते हैं, और य द्वारा, जो निवासियों में से एक है, प्रतिरोध किए जाने पर, य की हत्या कर देते हैं। यहाँ, यदि वह हत्या उस दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम थी, तो क हत्या के लिए उपबन्धित दण्ड से दण्डनीय है।

टिप्पणी

यह धारा इस सूत्र पर आधारित है कि यह एक प्रकल्पना है कि व्यक्ति के कार्यों का स्वाभाविक प्रतिफल ही उसका आशय है” (every man is presumed to intend the natural consequences of his act)। अत: यह धारा तभी प्रवर्तित होती है जबकि किया गया कार्य दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम हो।52 यदि दुष्प्रेरित कार्य से भिन्न कोई कार्य किया जाता है तो दुष्प्रेरक उसी अपराध के दुष्प्रेरण के लिये उत्तरदायी होगा यदि (क) किया गया कार्य दुष्प्रेरण का अधिसम्भाव्य परिणाम था, तथा (क) कार्य उस उकसाहट के असर के अधीन या उस सहायता या उस षड्यंत्र के अनुसरण में किया गया था जिससे वह दुष्प्रेरण गठित होता है। ।

मथुरा दास3 के वाद में स्ट्रेट जज ने यह प्रेक्षित किया कि यदि एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को । एक विशिष्ट अपराध कारित करने के लिये उकसाता है और वह दूसरा व्यक्ति ऐसे उकसाहट के अनुसरण में केवल उसी अपराध को नहीं करता है, अपितु ऐसा करने के दौरान, उसके अग्रसरण में एक दूसरा अपराध कारित करता है, तो पहला व्यक्ति बाद वाले अपराध के लिये दुष्प्रेरक के रूप में उत्तरदायी होगा यदि कार्य । ऐसा है जिसे एक युक्तियुक्त व्यक्ति की तरह उकसाने के समय ही उसे जान लेना चाहिये था कि मौलिक अपराध को कारित करते समय ही उसका कारित किया जाना सम्भाव्य है।” ।

उपरोक्त प्रेक्षण से जो बात स्पष्ट होती है वह यह है कि जब दुष्प्रेरित कार्य से भिन्न कोई कार्य किया जाना है तो वह निश्चयत: दुष्प्रेरित कार्य के किये जाने के दौरान किया जाता है और वह ऐसा होता है जिससे यह कहा जा सकता है कि दुष्प्रेरक ने इस तथ्य की प्रकल्पना कर ली थी कि उसके उकसाने का सम्भाव्य परिणाम क्या होगा, फिर भी यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरक उसे सम्भाव्य परिमाण के रूप में जानता ही हो।54

अधिसम्भाव्य परिणाम (Probable Consequence)—गिरजा प्रसाद5 के बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह प्रेक्षित किया कि किसी कार्य का अधिसम्भाव्य परिणाम वह है जो उस कार्य के परिणामस्वरूप घटित होने के लिये सम्भाव्य है या युक्तियुक्त रूप में जिसके घटित होने की अपेक्षा की जा सकती है, किसी असाधारण अथवा अनपेक्षित परिणाम को अधिसम्भाव्य नहीं कहा जा सकता। यदि किया

  1. मुमताज अली, ए० आई० आर० 1925 अवध 473.
  2. (1884) 6 इला० 491 पृ० 494. एम० एण्ड एम० १.
  3. (1934) 57 इला० 717.

गया। कार्य जारी गरी कार्य से 1 है, तो दुष्प्रेरक उस भिन्न कार्य के लिये तभी उत्तरदायी होगा यदि वह उसाने ।। ।भा परिणाम है या यदि वह एक ऐसा कार्य है जिसकी दुष्प्रेरक युक्तियुक्त रूप में प्रकल्पना कर सकता था कि वह उसके उकसाने का परिणाम है।


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