Indian Penal Code 1860 Of Abetment LLB 1st Year Notes Study Material

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Indian Penal Code 1860 Of Abetment Part 2 LLB 1st Year Notes Study Material

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अध्याय 5

दुष्प्रेरण के विषय में

(OF ABETMENT)

  1. किसी बात का दुष्प्रेरण- वह व्यक्ति किसी बात के किए जाने का दुष्प्रेरण करता है,

पहला-उस बात को करने के लिए किसी व्यक्ति को उकसाता है; अथवा

दूसरा-उस बात को करने के लिए किसी षड्यंत्र में एक या अधिक अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों के साथ सम्मिलित होता है, यदि उस षड्यंत्र के अनुसरण में, और उस बात को करने के उद्देश्य से, कोई कार्य या अवैध लोप घटित हो जाए, अथवा

तीसरा-उस बात के लिए किए जाने में किसी कार्य या अवैध लोप द्वारा साशय सहायता करता है।

स्पष्टीकरण 1-जो कोई व्यक्ति जानबूझकर दुर्व्यपदेशन द्वारा, या तात्विक तथ्य, जिसे प्रकट करने के लिए वह आबद्ध है, जानबूझकर छिपाने द्वारा, स्वेच्छया किसी बात का किया जाना कारित या उपाप्त करता है, अथवा कारित या उपाप्त करने का प्रयत्न करता है, वह उस बात का किया जाना उकसाता है, यह कहा जाता है।

दृष्टान्त

क, एक लोक आफिसर, न्यायालय के वारण्ट द्वारा य को पकड़ने के लिए प्राधिकृत है। ख उस तथ्य को जानते हुए और यह भी जानते हुए कि ग, य नहीं है, क को जानबूझ कर यह व्यपदिष्ट करता है कि ग, य है, और तद्वारा साशय क से ग को पकड़वाता है। यहाँ ख, ग के पकड़े जाने का उकसाने द्वारा दुष्प्रेरण करता है।

स्पष्टीकरण 2–जो कोई या तो किसी कार्य के किए जाने से पूर्व या किए जाने के समय, उस कार्य के किए जाने को सुकर बनाने के लिए कोई बात करता है और तद्वारा उसके किए जाने को सुकर बनाता है, वह उस कार्य के करने में सहायता करता है, यह कहा जाता है।

टिप्पणी

जब कोई अपराध कारित करने में अनेक व्यक्ति हिस्सा लेते हैं तो उसे कारित करने में उनमें से प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग ढंग से और अलग-अलग मात्रा में मदद करता है। एक व्यक्ति के प्रोत्साहन पर अपराध दसरा व्यक्ति कारित कर सकता है जबकि कुछ अन्य, अपराध कारित होते समय केवल सहायता देने के लिये उपस्थित रहते हैं तथा कुछ और व्यक्ति मुख्य अपराधी को हथियार जुटाने में सहायता कर सकते हैं। अतः उनकी अपराधिता की मात्रा के विनिश्चयन हेतु यह आवश्यक है कि उनमें से प्रत्येक व्यक्ति के सहयोग की मात्रा एवं प्रकति का निर्धारण किया जाये। परन्तु कृत्य के विभिन्न वर्गीकरण दण्ड में विभेद करने के प्रयोजन से निश्चयत: दोष के विभिन्न मापों को इंगित नहीं करते।

इंगलिश विधि-इंगलिश विधि में प्रथम कोटि तथा द्वितीय कोटि के अपराधी (Principals of first and Second degree) और तथ्यपूर्व के अनुचारी एवं तथ्य पश्चात् के अनुचारी (Accessories before and after the fact) में विभेद किया गया है। प्रथम कोटि का पिन काटि का अपराधी (Principal of First degree) वह व्यक्ति होता है जिसने या तो स्वयं अपने हाथ से अपराध कार्य किया है कार्य किया है या किसी अन्य के माध्यम से सम्पन्न कराया।कि है। द्वितीय कोटि का अपराध (Principal of second degree) वह व्यक्ति है जो अपराध कार्य के क्रियान्वयन

हेतु सहायता और दुष्प्रेरण देता है। तथ्य पूर्व का अनुचारी (accessory before the fact) वह व्यक्ति है जो प्रत्यक्षत: या विवक्षित रूप से प्रमुख अपराधी को प्रोत्साहित करता है, सलाह देता है, हथियार जुटाता है तथा आदेश देता है, यदि अपराध इसके परिणामस्वरूप कारित होता है। ऐसा व्यक्ति यदि अपराध कारित होते समय घटनास्थल पर विद्यमान रहता है तो उसे द्वितीय कोटि का अपराधी मानते हैं। तथ्य पश्चात् के अनुचारी (accessory after the fact) वे अपराधी हैं जो अपराध घटित हो जाने के बाद और इस ज्ञान से कि अपराध घटित हो गया है प्रमुख अपराधी को अपने यहाँ शरण देते हैं, सुविधा (Comfort) प्रदान करते हैं तथा दण्ड से बचने में उसकी सहायता करते हैं। किन्तु इंग्लिश विधि का यह अन्तर केवल महापराधी (felony) के लिये ही उपयुक्त है, देश-द्रोह (Treason) तथा साधारण अपराध (misdemeanour) के लिये नहीं।।

दृष्टान्त-अ, ब को प्रोत्साहित करता है कि वह म की हत्या कर दे। स, मारो मारो कह कर ब को प्रोत्साहित करता है तथा द उसे लाठी पकड़ाता है। ब इस प्रोत्साहन के प्रभाव में आकर म को मार डालता है। प यह जानते हुये कि ब ने म की हत्या किया है उसे शरण देता है ताकि वह पकड़ा न जा सके। | इस उदाहरण में ब वह व्यक्ति है जो अपराध कारित करता है इसलिये यह प्रथम कोटि का अपराधी है। द उसे लाठी पकडाता है अत: वह द्वितीय कोटि का अपराधी है। अ और स तथ्यपूर्व के अनुचारी हैं क्योंकि वे ब को म की हत्या के लिये प्रोत्साहित करते हैं। प तथ्य पश्चात् का अनुचारी है क्योंकि वह दण्ड से बचने में ब की सहायता करता है।

भारतीय विधि- भारतीय दण्ड संहिता दुष्प्रेरकों एवं मुख्य अपराधियों के बीच एक विस्तृत अन्तर कायम करती है किन्तु तथ्य पश्चात् के अनुचारी को नहीं स्वीकारती सिवा इसके कि कुछ मामलों में अपराधियों को छिपाना मौलिक अपराध माना गया है। भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत निम्नलिखित रीति से दुष्प्रेरण गठित होता है

(1) एक व्यक्ति को अपराध कारित करने के लिये उकसाने (instigation) द्वारा;

(2) एक अपराध कारित करने के लिये किसी षड्यंत्र में सम्मिलित होने (conspiracy) द्वारा, या

(3) एक अपराध कारित करने के लिये जानबूझ कर एक व्यक्ति की सहायता (aiding) द्वारा ।।

दुष्प्रेरण तभी एक अपराध होता है जबकि दुष्प्रेरित कार्य स्वत: एक अपराध हो तथा भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अन्तर्गत दण्डनीय हो।

गन्गुला मोहन रेड्डी बनाम आन्ध्र प्रदेश राज्य के के बाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि दुष्प्रेरण उकसाने की मानसिक अथवा कोई निश्चित कार्य करने में साशय सहायता पहुँचाने की प्रक्रिया आवेष्टित करता है। दुष्प्रेरण हेतु अभियुक्त द्वारा कुछ सकारात्मक कार्य किया जाना आवश्यक है।

  1. उकसाना (Instigation)–उकसाना या भड़काने का अर्थ है किसी अन्य व्यक्ति को एक दोषपूर्ण कार्य करने के लिये उत्तेजित करना । एक व्यक्ति एक कार्य करने के लिये एक दूसरे व्यक्ति को सलाह, सुझाव, उकसाने या निर्देश द्वारा दुष्प्रेरित कर सकता है। उकसाने द्वारा दुष्प्रेरण गठित करने के लिये अपराध सृजन को दिशा में कुछ सक्रिय प्रक्रियायें आवश्यक हैं। उकसाने का अर्थ है सक्रिय रूप से सझाव देना अथवा प्रत्यक्ष या विवक्षित भाषा द्वारा प्रेरित करना चाहे यह स्पष्ट प्रार्थना के रूप में हो या संकेत से फुसलाना या प्रेरित करना हो। इसका अर्थ फुसलाना (goad), प्रार्थना करना, उत्तेजित करना (to provoke), उकसाना, विन या किसी कार्य के लिये उत्साहित करना है। किसी भी प्रकार की भाषा का प्रयोग दुष्प्रेरण के लि सकता है किन्तु दुष्प्रेरक द्वारा प्रयुक्त शब्दों के अर्थ के बारे में युक्तियुक्त निश्चितता होना चा प्रयुक्त यथार्थ शब्दों का सिद्ध होना आवश्यक नहीं है।
  2. धारा 130, 136, 201, 212, 216 तथा 216-अ भारतीय दण्ड संहिता को देखिये।।

1क. (2010) 2 क्रि० ला ज० 2110 (एस० सी०).

  1. आर० बनाम डेलर, 44 एल० जे० एम० सी० 67.
  2. अमीनुद्दीन, (1922) 24 बाम्बे लॉ रि० 327.।
  3. परिमल चटर्जी, (1932) 60 कल० 327.
  4. प्रेम नारायन, ए० आई० आर० 1957 इला० 177.

मात्र स्वीकृति, मूक सहमति या मौखिक आज्ञा से उकसाना गठित नहीं होगा। उदाहरण के लिये अ, ब से कहता है कि उसका आशय स की हत्या करने का है। ब, उससे कहता है कि जैसी तुम्हारी इच्छा हो करो। अ, स को मार डालता है। इस उदाहरण में यह नहीं कहा जा सकता है कि ब ने स की हत्या के लिये अ को प्रोत्साहित किया, क्योंकि प्रोत्साहन का अर्थ है किसी कार्य को कारित करने के लिये किसी सक्रिय सुझाव का समर्थन या उत्तेजना। सलाह स्वतः उकसाने के समतुल्य नहीं होती। यह उकसाना हो सकता है यदि इसका अर्थ कोई अपराध कारित करने के लिये सक्रिय रूप से सुझाव देना या उत्तेजित करना था। जहाँ प्रभावशाली व्यक्ति जो किसी अवैध सभा के उद्देश्य को जानते थे जानबूझ कर उस क्षेत्र से गायब रहते हैं ताकि सभा के उद्देश्य के प्रति सहानुभूति व्यक्त कर सकें, दुष्प्रेरक नहीं है।

जानबूझकर दुर्व्यपदेशन या तात्विक तथ्य को छिपाना– भारतीय दण्ड संहिता की धारा 107 स्पष्टीकरण 1 यह उद्घोषित करती है कि उकसाना उस व्यक्ति के, जो उसे प्रकट करने के लिये बाध्य है, जानबूझ कर दुर्व्यपदेशन अथवा आवश्यक तत्व को जानबूझ कर छिपाने द्वारा गठित हो सकता है। इस स्पष्टीकरण से संलग्न दृष्टान्त जानबूझकर दुर्व्यपदेशन द्वारा उकसाने को पूर्णतया स्पष्ट करता है। जानबूझकर छिपाने द्वारा तब उकसाना गठित है जबकि छिपाना तात्विक तथ्य से सम्बन्धित होता है जिसे प्रकट करने के लिये वह बाध्य होता है। ।

पत्र द्वारा उकसाना- उकसाना या तो स्पष्ट हो सकता है या पत्र द्वारा। जहाँ, अ, एक पत्र लिखकर स की हत्या के लिये ब को उकसाता है, उकसाने द्वारा दुष्प्रेरण का अपराध तभी पूर्ण हो जाता है जैसे ही उस पत्र में लिखी बातों का पता ब को लगता है। यदि पत्र कभी भी ब के पास नहीं पहुँचाता है तो यह दुष्प्रेरित करने का एक प्रयत्न मात्र होगा, दुष्प्रेरक नहीं होगा। किसी कार्य को करने के लिये प्रयत्न मात्र भी उकसाना हो सकता है। उदाहरण के लिये अ, एक लोक-सेवक ब को घूस देने का प्रयत्न करता है परन्तु ब उसे लेने से इन्कार कर देता है किन्तु अ दुष्प्रेरण कारित करता है। इसी प्रकार जहाँ अ, ब को घूस देता है ताकि वह अपने मालिक की सामग्री निश्चित मूल्य से कम पर उसे बेच दे, अ उकसाने का दोषी है।10।

प्रत्यक्ष रूप से उकसाना-उकसाना वहाँ प्रत्यक्ष होता है जहाँ कोई प्रत्यक्षतः एक कार्य करने का आदेश देता है, सुझाव देता है या उत्साहित करता है। उदाहरणस्वरूप अ, अपने नौकर ब को आदेश देता है। कि वह स को पीटे। यहाँ अ उकसाने का अपराधी है।11 ।

उसका कार्य अपराध कारित कराने के दुष्प्रेरण के लिये एक व्यक्ति को दण्डित करने हेतु प्रेरणा का स्पष्ट प्रमाण होना आवश्यक है। मात्र यह पर्याप्त नहीं है कि एक व्यक्ति ने उन कार्यवाहियों में भाग लिया था जो निर्दोष है अपितु उसे आपराधिक कार्यवाहियों से किसी न किसी रूप में जुड़ा होना आवश्यक है।12 कभीकभी प्रत्यक्षत: संकेत भी उकसाने के तुल्य होता है यदि वह स्वीकारसूचक तथा स्पष्ट परिणाम व्युत्पन्न करने के योग्य है। उदाहरणस्वरूप, अ जानता था कि ब, म की पत्नी से एक निर्दोष प्रयोजन हेतु मिलना चाहता था। अ, म को उत्तेजित करने के उद्देश्य से उसे बताता है कि दोनों किसी अवैध प्रयोजन हेतु मिलने वाले हैं। चूंकि सुझाव अ ने म को इस विचार से दिया कि वह ब पर हमला करे अतः वह उकसाने द्वारा दुष्प्रेरण का दोषी है। । किन्तु किसी भी रूप में प्रदर्शित मूक सहमति जो अपराध को प्रेरित करने एवं उत्साहित करने के प्रभाव से युक्त है, दुष्प्रेरण है। क्वीन बनाम मोहित13 के वाद में अभियुक्तों की उपस्थिति में एक स्त्री ने सती होने के लिये अपने को तैयार किया। वे लोग उसके साथ चिता तर्क गये तथा उसके सौतेले पुत्रों के साथ खड़े हो

  1. रघुनाथ दास, (1920) 5 पी० एल० जे० 129.
  2. यतीम अली मजुमदार बनाम इम्परर, 4 सी० डब्ल्यू० एन० 500.
  3. शिव दयाल मल, (1894) 16 इला० 389.

9 रैन्सफोर्ड, (1874) 13 काक्स 492.

  1. रेगिना बनाम डी क्रोम, 17 काक्स 492.
  2. रसूकुल्लाह, (1869) 12 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 51.
  3. क्वीन बनाम नीमचन्द, 20 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 41.
  4. (1871) 3 एन० डब्ल्यू ० पी० 316.

कर ‘राम-राम” चिल्लाते रहे। यह निर्णय दिया गया कि वे सभी व्यक्ति जो चिता तक उसके साथ आये थे तथा ‘राम-राम” चिल्ला रहे थे, दुष्प्रेरण के दोषी होंगे क्योंकि उन लोगों ने सती होने के लिये सक्रिय रूप से उसे समर्थन दिया।

  1. षड्यंत्र के माध्यम से दुष्प्रेरण (Abetment by Conspiracy)—षड़यंत्र के माध्यम से दुष्प्रेरण तब होता है जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी अवैध कार्य को करने अथवा किसी अवैध कार्य को अवैध साधनों से करने के लिये सहमत हो जाते हैं। अत: षड्यंत्र द्वारा दुष्प्रेरण गठित होने के लिये निम्नलिखित बातें आवश्यक हैं

(1) दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच षड्यंत्र,

(2) एक कार्य या अवैध लोप उस षड्यंत्र के फलस्वरूप कारित हो, तथा

(3) ऐसा कार्य या अवैध लोप जो षड्यन्त्रित वस्तु को पूर्ण करने में कारित हुआ हो, षड्यंत्र का अर्थ है, दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच एक ऐसा समझौता जो,

(क) कोई अवैध कार्य करने हेतु, अथवा

(ख) कोई ऐसा कार्य जो अवैध नहीं है, अवैध साधनों द्वारा करने हेतु किया गया हो। अत: यह स्पष्ट है। कि धारा 107 खण्ड 2 के अन्तर्गत किसी अपराध के लिये कई लोगों के बीच मात्र एक सन्धि या समझौता पर्याप्त नहीं है। षड्यंत्र के तहत एक कार्य या एक अवैध लोप का भी कारित होना आवश्यक है और यह कार्य या लोप उस निश्चित उद्देश्य की पूर्ति हेतु होना चाहिये। किन्तु धारा 120-क के अन्तर्गत किसी अपराध के लिये मात्र सम्मति पर्याप्त है यदि सम्मति एक अपराध कारित करने के उद्देश्य से दी गयी है।14 षड्यंत्र के अनुसरण में कोई प्रत्यक्ष या अवैध लोप अवश्य किया जाना चाहिये, भले ही सम्मति एक अपराध कारित करने के लिये हो।

खण्ड 2 की धारा 108 को स्पष्टीकरण के साथ पढ़ा जाना चाहिये जो यह उद्घोषित करती है कि षड्यंत्र के माध्यम से दुष्प्रेरण का अपराध कारित करने के लिये यह आवश्यक नहीं है कि दुष्प्रेरक अपराधकर्ता के साथ सम्बन्ध बनाये रखे। यह पर्याप्त होगा यदि वह उस षड्यंत्र में भाग लेता है जिसके अनुसरण में अपराध कारित होता है। स्पष्टीकरण 5 के साथ दिया गया दृष्टान्त इस स्थिति को पूर्णतया स्पष्ट करता है।

एक षड्यंत्र मात्र दुष्प्रेरक के समतुल्य नहीं होता। यदि षड्यंत्रकारियों की पहचान योजना पर विचारविमर्श के दौरान ही हो जाती है तो वे दुष्प्रेरकों के रूप में दण्डित नहीं होंगे भले ही उनका साधारण आशय अपराध कारित करने का रहा हो। परन्तु यदि उनकी योजना ही एक अपराध कारित करने की थी तो वे संहिता की धारा 120-ख के अन्तर्गत षड्यंत्र के लिये दायित्वाधीन होंगे।

पंडाला वेंकटास्वामी15 के वाद में यह निर्णय दिया गया कि यदि एक व्यक्ति अन्य कई लोगों के साथ मिलकर किसी आशयित झूठे दस्तावेज की एक प्रतिलिपि तैयार करता है तथा इस झूठे दस्तावेज को लिखने के प्रयोजन से रसीदी कागज खरीदता है और उस झूठे दस्तावेज में लिखने के उद्देश्य से एक तथ्य के विषय में सूचना इकट्ठी करता है, तो वह जालसाजी (Forgery) के दुष्प्रेरण का अपराधी है क्योंकि ये ऐसे कृत्य हैं जो अपराध कारित करने में सहायता पहुँचाते हैं। जहाँ एक औरत अपने को गर्भवती समझ कर, जबकि वह यथार्थतः गर्भवती नहीं थी, किसी अन्य व्यक्ति से मिलकर षड्यंत्र रचती है, ताकि वह उसे दवा दे दे, किसी हथियार का प्रयोग करें जिससे उसका गर्भपात हो जाये, वह गर्भपात कराने के षड्यंत्र के लिये दण्डित होगी।16


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