Indian Penal Code 1860 General Exceptions Part 8 LLB 1st Year Notes Study Material

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  1. कब ऐसे अधिकार का विस्तार मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि कारित करने तक का होता है- यदि अपराध पूर्वगामी अन्तिम धारा में प्रगणित भांतियों में से किसी भांति का नहीं है, तो शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार हमलावर की मृत्यु स्वेच्छया कारित करने तक का नहीं होता, किन्तु इस अधिकार का विस्तार धारा 99 में वर्णित निर्बन्धनों के अध्यधीन हमलावर की मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि स्वेच्छया कारित करने तक का होता है।

टिप्पणी

शरीर सम्बन्धी वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार का अध्ययन करते समय धारा 100 तथा 101 को एक साथ पढ़ा जाना चाहिये। इस धारा के अन्तर्गत वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार का उपयोग करते हुये हमलावर की मृत्यु कारित करने के अतिरिक्त कोई अन्य अपहानि कारित की जा सकती है, यदि मामला धारा 100 के अन्तर्गत नहीं आता है। वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करते हुये यदि अभियुक्त मृत्यु के अतिरिक्त कोई अन्य अपहानि कारित करता है तो उसे केवल यह सिद्ध करना होगा कि उसने संहिता की धारा 99 में, प्रतिपादित सीमा का उल्लंघन नहीं किया है। जहाँ सादी वर्दी में कोई सिपाही विधिपूर्वक अ को कैद करने का प्रयत्न करता है और अ उसे लुटेरा समझकर अत्यधिक तथा अनावश्यक बल से उस पर प्रहार कर देता है। अ. सिपाही को उपहति कारित करने के लिये दण्डनीय होगा। जिस अपराध का उसे भय था वह लट नहीं वरन केवल कैद था। अत: सिपाही को लुटेरा समझने का अ के पास कोई युक्तियुक्त कारण नहीं था भले ही वह अपने प्राधिकार के अन्तर्गत कार्य नहीं कर रहा था। उसका कार्य धारा 100, खण्ड 6 के अन्तर्गत नहीं आता है बल्कि धारा 101 के अन्तर्गत आता है। चूंकि धारा 101 की धारा 99 में उल्लिखित परिसीमाओं के अध्यधीन क्रियान्वित होती है, अत: अ दण्डनीय होगा।

योगेन्द्र मोरारजी बनाम गुजरात राज्य73 के वाद में अभियुक्त तथा मृतक के बीच किसी ऋण की। अदायगी तथा एक कुयें की खुदायी को लेकर विवाद था। एक बार जब अभियुक्त जीप से घर को वापस लौट

  1. ए० आई० आर० 1930 पटना 347.
  2. 1977 क्रि० लॉ ज० (एन० ओ० सी०) 116 (इला० ).
  3. रारू ए० आई० आर० 1946 सिन्ध 17.
  4. 2002 क्रि० लॉ ज० 4102 (सु० को०).
  5. ए० आई० आर० 1980 सु० को० 660.

रहा था, दो व्यक्तियों ने हाथ उठाकर जीप रोकने का इशारा किया। इसी समय उनके अन्य सहयोगी भी जीप धारा 102 के समीप आ गये, इस पर अभियुक्त ने अपनी पिस्तौल निकाल कर दनादन तीन बार गोलियाँ चलायीं जिससे एक व्यक्ति की मृत्यु हो गयी । ऐसा करते समय उन्होंने रुक कर यह सुनिश्चित करने का प्रयत्न नहीं किया। कि जल्दी-जल्दी तीन बार गोली चलाने की आवश्यकता थी या नहीं और न ही, उसने इसके प्रभाव को देखना उचित समझा। यह अभिनिर्णीत हुआ कि वह इस धारा द्वारा प्रदत्त अधिकार की सीमा को पार कर गया। था।

धन्नू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य74 के बाद में अधिकार विधिक परिसीमा को पार कर गया था यद्यपि अभियुक्त ने उस समय प्रहार किया था जबकि अभियोजन पक्ष से सम्बन्धित लोगों ने गोलियाँ चलायी थीं। आभयुक्त द्वारा पिस्तौल छीन कर प्रयोग में लाया गया बल इस अवधारणा को जन्म देता था कि मृत्यु अथवा घोर उपहति के भय का कारण समाप्त हो चुका था। इन परिस्थितियों में अभियुक्त द्वारा पिस्तौल से गोला। चलाना प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार की सीमा से अधिक था।

  1. शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारम्भ और बना रहना- शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उसी क्षण प्रारम्भ हो जाता है, जब अपराध करने के प्रयत्न या धमकी से शरीर के संकट की युक्तियुक्त आशंका पैदा होती है, चाहे वह अपराध किया न गया हो, और वह तब तक बना रहता है। जब तक शरीर के संकट की ऐसी आशंका बनी रहती है।

टिप्पणी

यह धारा यह प्रतिपादित करती है कि शरीर की वैयक्तिक प्रतिरक्षा का अधिकार कब प्रारम्भ होता है। और कब तक बना रहता है। यह अधिकार उसी समय प्रारम्भ होता है जैसे ही शरीर को खतरे की युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न होती है और तब तक बना रहता है जब तक खतरे की आशंका बनी रहती है। यह अधिकार केवल तभी प्रारम्भ होता है जब अपराध करने के प्रयत्न या धमकी से शरीर के संकट की युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न होती है।75 यह आवश्यक नहीं है कि वास्तविक अपराध कारित ही हुआ हो। दूसरे शब्दों में इस अधिकार का प्रयोग करने के पूर्व वास्तविक उपहति होनी आवश्यक नहीं है।76 अपराध का सचमुच कारित किया जाना आवश्यक नहीं है। अधिकार के प्रारम्भ के लिये प्रयत्न धमकी तथा उसके परिणामस्वरूप संकट की आशंका पर्याप्त है। उदाहरण के लिये यदि एक व्यक्ति एक खतरनाक हथियार छीन कर अपने आप को इस प्रकार तैयार कर रहा हो जिससे तुरन्त हिंसा का उसका आशय स्पष्ट हो तो वैयक्तिक प्रतिरक्षा के प्रयोग के लिये पर्याप्त न्यायोचित आधार होगा, क्योंकि उसका आचरण धमकी के सदृश्य है और अन्य दूसरे व्यक्ति यह सोचने का पर्याप्त आधार रखते हैं कि खतरा बिल्कुल समीप है।77

अरुण बनाम महाराष्ट्र राज्य78 के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया कि प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार वैसे ही प्रारम्भ हो जाता है जैसे शरीर को खतरा की युक्तियुक्त आशंका उत्पन्न होती है और यह अधिकार तब तक रहता है जब तक कि शरीर को खतरे की युक्तियुक्त आशंका वर्तमान रहती है। |

नवीन चन्द्र बनाम उत्तरांचल राज्य79 के वाद में दो भाइयों में पारिवारिक विवाद था और दुर्घटना के दिन प्रात: काल दोनों परिवारों के बीच कुछ कहा सुनी भी हुई थी। मृतक को सर पर चोटें पहुँची थीं। पंचायत के माध्यम से कुछ सुलह समझौते की बात भी हुई थी। समझौता पंचायत के समय मृतक जिसे प्रात:काल सर में चोटें आईं थीं उत्तेजित हो गया और अभियुक्त को गालियाँ देने लगा और फलतः उसके बाद वाकयुद्ध के दौरान अभियुक्त ने दो लोगों को जो निहत्थे थे चोटें पहुँचायी और परिवार के अन्य लोगों को भी खदेड़ दिया। यह अभिधारित किया गया कि इन परिस्थितियों में अभियुक्त को प्राइवेट प्रतिरक्षा का तर्क देने का अधिकार नहीं प्राप्त था। यह भी अभिधारित किया गया कि प्रावईट प्रतिरक्षा का अधिकार अपने बचाव का अधिकार है। और इसका तर्क दण्डात्मक (Vindictive), आक्रामक और प्रतिशोधात्मक अपराधों के प्रयोजन हेतु नहीं दिया जा सकता है।

  1. ए० आई० आर० 1980 सु० को० 864.
  2. गोवर्धन भूयन (1870) 4 बंगाल लॉ रि० (अपेन्डिक्स) 101.
  3. एम० सी० दत्त बनाम राज्य, 1977 क्रि० लॉ ज० 506 गौहाटी.
  4. विक्टर सोलेमन, (1966) क्रि० लाँ ज० 841:
  5. (2009) 2 क्रि० लॉ ज० 2065 (सु० को०).
  6. 2007 क्रि० लॉ ज० 874 (एस० सी०).

यह भी अभिधारित किया गया कि शरीर की प्रावईट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारम्भ, जैसे ही शरीर के खतरे की युक्तियुक्त आशंका होती है वैसे हो जाता है और तब तक जारी रहता है जब तक कि वह खतरा बना रहता है। खतरे की आशंका को टालने के लिये प्रयोग की जाने वाली शक्ति का व्यावहारिक दृष्टिकोण से न कि सूक्ष्मदर्शी या उच्च शक्ति वाली दृष्टि के चश्मे से मामूली या सीमान्त अतिलंघन का पता लगाने के लिये परीक्षण किया जाना चाहिये।

  1. कब सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने तक का होता है- सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार, धारा 99 में वर्णित निर्बन्धनों के अध्यधीन दोषकर्ता की मृत्यु या अन्य अपहानि स्वेच्छया कारित करने तक का है, यदि वह अपराध जिसके किए जाने के, या किए जाने के प्रयत्न के कारण उस अधिकार के प्रयोग का अवसर आता है, एतस्मिन्पश्चात् प्रगणित भांतियों में से किसी भी भांति का है, अर्थात्:

पहला-लूट,

दूसरा-रात्रौ गृह-भेदन

तीसरा– अग्नि द्वारा रिष्टि, जो किसी ऐसे निर्माण, तम्बू या जलयान को की गई है, जो मानव आवास के रूप में या सम्पत्ति की अभिरक्षा के स्थान के रूप में उपयोग में लाया जाता है।

चौथा-चोरी, रिष्टि या गृह अतिचार, जो ऐसी परिस्थितियों में किया गया है, जिनसे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका कारित हो कि यदि प्राइवेट प्रतिरक्षा के ऐसे अधिकार का प्रयोग न किया गया तो परिणाम मृत्यु या घोर उपहति होगा।

टिप्पणी

यह धारा उन परिस्थितियों को इंगित करती है जिनमें सम्पत्ति से प्रतिकूल वैयक्तिक प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करते हुये हमलावर की मृत्यु तक कारित की जा सकती है। एक व्यक्ति अपनी सम्पत्ति तथा किसी अन्य व्यक्ति की सम्पत्ति की रक्षा करते हुये हमलावर की मृत्यु कारित कर सकता है। यदि यह विश्वास करने का आधार था कि हमलावर जिसकी मृत्यु कारित की गयी है, इस धारा में वर्णित अपराधों में से कोई अपराध कारित करने वाला था या उसका प्रयत्न कर रहा था।80 सम्पत्ति के सम्बन्ध में प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग कर मृत्यु कारित करने की पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं है। यह परिसीमित है। यह मृत्यु या घोर उपहति का युक्तियुक्त भय तथा लोक प्राधिकारियों द्वारा प्रदत्त सहायता द्वारा परिसीमित है। इस विचार की पुष्टि कन्चन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य81 के वाद में भी की गयी थी। किन्तु उत्तर प्रदेश राज्य बनाम शिवमूरत82 में प्राइवेट प्रतिरक्षा सम्बन्धी अधिकार को एक प्रगतिशील दृष्टिकोण प्रदान किया गया। इस वाद में कहा गया कि प्रतिरक्षा सम्बन्धी अधिकार की परिसीमा का निर्धारण करते समय हमें उपहति कारित करने में अभियुक्त की वास्तविकता को मुख्यतया ध्यान में रखना चाहिये। प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार विभिन्न परिस्थितियों में परिसीमा से अधिक भी हो सकता है। किसी व्यक्ति द्वारा कठिन परिस्थितियों में अपने को बचाने हेतु किये गये कार्यों तथा घटनाओं का परिमापन उस विवेक तथा सावधानी के सन्दर्भ में किया जाना चाहिये, जिसने उसे कार्य करने तथा अपने अधिकार का प्रयोग करने के लिये बाध्य किया।


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