Indian Penal Code 1860 General Exceptions Part 7 LLB 1st Year Notes Study Material

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  1. कार्य, जिनके विरुद्ध प्रावईट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है- यदि कोई कार्य, जिससे मृत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होती, सद्भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए लोक सेवक द्वारा किया जाता है या किए जाने का प्रयत्न किया जाता है, तो उस कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है, चाहे वह कार्य विधि अनुसार सर्वथा न्यायानुमत न भी हो।

यदि कोई कार्य, जिससे मृत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होती, सद्भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए लोक सेवक के निदेश से किया जाता है, या किए जाने का प्रयत्न किया जाता है, तो उस कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है, चाहे वह निदेश विधि-अनुसार सर्वथा न्यायानुमत न भी हो।

उन दशाओं में, जिनमें सुरक्षा के लिए लोक प्राधिकारियों की सहायता प्राप्त करने के लिए समय है, प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है।

इस अधिकार के प्रयोग का विस्तार-किसी दशा में भी प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार उतनी अपहानि से अधिक अपहानि कारित करने पर नहीं है, जितनी प्रतिरक्षा के प्रयोजन से करनी आवश्यक

स्पष्टीकरण 1–कोई व्यक्ति किसी लोक सेवक द्वारा ऐसे लोक सेवक के नाते किए गए, या किए जाने के लिए प्रयतित, कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार से वंचित नहीं होता, जब तक कि वह यह न जानत हो, या विश्वास करने का कारण न रखता हो कि उस कार्य को करने वाला व्यक्ति ऐसा लोक सेवक है। |

स्पष्टीकरण 2- कोई व्यक्ति किसी लोक सेवक के निदेश से किए गए, या किए जाने के लिए, प्रयतित, किसी कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार से वंचित नहीं होता, जब तक कि वह यह न जानता हो, या विश्वास करने का कारण न रखता हो, कि उस कार्य को करने वाला व्यक्ति ऐसे निदेश से कार्य कर रहा है, या जब तक कि वह व्यक्ति इस प्राधिकार का कथन न कर दे, जिसके अधीन वह कार्य कर रहा है, या यदि उसके पास लिखित प्राधिकार है, जो जब तक कि वह ऐसे प्राधिकार को मांगे जाने पर पेश न कर दे।

टिप्पणी

धारा 99 वह सीमा निर्धारित करती है जिसके अन्तर्गत प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग किया। जाना चाहिये।

मदन बनाम म० प्र० राज्य के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का तर्क अनुमानों और अटकलों पर आधारित नहीं हो सकता है। किसी अभियुक्त को शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उपलब्ध है या नहीं, इस पर विचार करते समय यह कि क्या हमलावरों पर उसे कठोर और घातक चोट पहुंचाने का अवसर था या नहीं, यह सुसंगत नहीं है। किसी अभियुक्त को प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार उपलब्ध है या नहीं यह पता लगाने के लिये सम्पूर्ण घटना का सतर्कतापूर्वक परीक्षण करना चाहिये और सही परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिये।

ऐसे मामले में जहां अभियुक्तगण पर मृतक को लाठी से प्रहार कर घायल करना आरोपित है और अपीलाण्ट अभियुक्तों द्वारा अपनी प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का तर्क दिया जाता है और इस बात का साक्ष्य था कि किन्हीं सीमाओं तक अपीलाण्ट अपनी सम्पत्ति की रक्षा और बचाव में अधिकार का प्रयोग कर रहे थे।

  1. (2008) 4 क्रि० लॉ ज० 3950 (सु० को०).

परन्तु उसके बाद उन्होंने अपने अधिकार का अतिक्रमण किया और इस कारण वे वहां भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के बजाय धारा 304 के भाग-I के अधीन दोषसिद्ध किये जाने के द्वारा दायित्वाधीन होंगे।

भारतीय दण्ड संहिता की धाराओं 99 से 103 में प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के इस्तेमाल के दौरान किसी दूसरे व्यक्ति की मृत्यु कारित करने के अधिकार का उल्लेख किया गया है। जब किसी व्यक्ति के जीवन या उसकी सम्पत्ति को एक दूसरे व्यक्ति के आपराधिक अतिचार से खतरा उत्पन्न होता है तो इस अधिकार का प्रयोग किया जा सकता है। किन्तु इस अधिकार के प्रयोग पर यह प्रतिबन्ध कि इसके प्रयोग के पूर्व लोक प्राधिकारियों की सहायता ली जानी चाहिये उस समय बाधा के रूप में प्रतीत होता है जबकि खतरा प्रतिरक्षक के दरवाजे पर दस्तक दे रहा हो। विधि पर जमी इस परत को हटाया जाना चाहिये। प्रतिरक्षक को अपनी परिसीमा के अन्दर रहते हुये, सन्निकट या आसन्न खतरे को रोकने का अधिकार मिलना चाहिये। लोक प्राधिकारियों द्वारा प्रदत्त सहायता आवश्यकता पड़ने पर न तो शीघ्रातिशीघ्र मिलनी है और न ही मिलने की सम्भावना रहती है।

| विधि द्वारा अभ्यारोपित प्रतिबन्ध की कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में ही मृत्यु कारित करने का अधिकार प्रदान किया जा सकता है, जैसे मृत्यु या घोर उपहति कारित होने की सम्भावना की विस्तृत रूप में व्याख्या की जानी चाहिये।

लोक-सेवकों के कार्य-( खण्ड –1 ) एक लोक-सेवक द्वारा किये गये कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार नहीं प्राप्त होता यदि निम्नलिखित शर्ते पूरी हो रही हों।

(1) कार्य लोक-सेवक द्वारा किया जाता है या किये जाने का प्रयत्न किया जाता है;

(2) कार्य सद्भावपूर्वक किया गया हो;

(3) कार्य लोक-सेवक द्वारा अपने पदाभास के अन्तर्गत किया गया हो;

(4) कार्य ऐसा है जिससे मृत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होती।

(5) कार्य विधि के अनुसार न्यायसंगत नहीं भी हो सकता है;

(6) यह विश्वास करने के लिये युक्तियुक्त आधार होना चाहिये कि कार्य लोक-सेवक द्वारा तथा उसके पदाभास के अन्तर्गत किया गया हो।

उपरोक्त परिसीमा में अन्तर्विष्ट सिद्धान्त यह है कि सामान्यतया यह प्रकल्पना की जाती है कि लोकसेवक सदैव विधि के अनुरूप कार्य करेगा। द्वितीयत: यह कि लोक-सेवक को उसके कर्तव्य के निष्पादन में, वहाँ भी जहाँ वह गलती कर रहा हो, समाज के फायदे के लिये सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिये । इस धारा के खण्ड 1 को इसी धारा में वर्णित स्पष्टीकरण 1 के साथ सदैव पढ़ा जाना चाहिये। इस धारा में उन व्यक्तियों को प्रतिरक्षित करना आशयित है जो यह न जानते हुये कार्य करते हैं कि जिस व्यक्ति के साथ संव्यवहार कर रहे। हैं वह एक लोकसेवक है। |

यह खण्ड वहाँ प्रवर्तित होता है जहाँ एक लोकसेवक अपने अधिकार के प्रयोग में अनियमितता बरतता। है न कि वहाँ जहाँ वह अपने अधिकार-क्षेत्र से बाहर कार्य करता है।10 एक प्रकरण में जहाँ कि एक पुलिस अधिकारी सद्भावपूर्वक अपने पदाभास के अन्तर्गत कार्य करते हुये एक व्यक्ति को कैदी बनाता है किन्तु बिना आदेश के, कैदी को अधिकारी के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार नहीं प्राप्त है।11 किन्तु यदि लोकसेवक का कार्य विधिविरुद्ध है तो उसके विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग किया जा सकता है।12 इसी प्रकार एक पुलिस अधिकारी जो बिना लिखित व्यादेश के छानबीन करता है अपने पदाभास । (colour of his office) के अन्तर्गत कार्य करता हुआ नहीं कहा जायेगा।”13

  1. मेन; क्रिमिनल लॉ, पृ० 203-204.
  2. देवमन शामजी, (1958) 61 बाम्बे लॉ रि० 30.
  3. मोहम्मद इस्माइल, (1935) 13 रंगून 754.
  4. जोगेन्द्र नाथ मुकर्जी, (1897) 24 कल० 320.
  5. राम परवेज (1944) 23 पटना 328.

एक प्रकरण में एक व्यक्ति की सम्पत्ति को सदोषपूर्ण कुर्क कर लिया जाता है, जैसे वह सम्पत्ति किसी 213 फरार व्यक्ति की हो तथा इस कुर्की का यथार्थ स्वामी द्वारा प्रतिरोध किया जाता है। यह निर्णय दिया गया कि प्रतिरोध को प्राइवेट प्रतिक्षा के अधिकार के वैध प्रयोजन के रूप में नहीं स्वीकार किया जा सकता, क्योंकि पुलिस अधिकारी सद्भाव में अपने पदाभास (colour of his office) के अन्तर्गत कार्य कर रहा था और यदि यह भी मान लिया जाये कि कुर्की का आदेश समुचित रूप में नहीं दिया गया था तो यह अपने आप में। प्रतिरक्षा का पर्याप्त आधार नहीं होगा।14 इसी प्रकार यदि कुर्की से उन्मुक्त सम्पत्तियों को कुर्क कर लिया जाता। है तो प्रतिरोध न्यायसंगत नहीं होगा।15

कुंवर सिंह16 के वाद में म्युनिसिपल कारपोरेशन के पदाधिकारियों द्वारा संगठित छापा मारने वाली एक पार्टी, जिसका उद्देश्य कारपोरेशन की सीमा के अन्तर्गत बिखरे जानवरों को पकड़ना था, पर उस समय आक्रमण किया गया जब वह पार्टी कुछ जानवरों को पकड़कर मवेशीखाने ले जा रही थी। यह निर्णय दिया गया कि छापा मारने वाली पार्टी का कार्य पूर्णतः न्यायसंगत् था और अभियुक्तों को प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार नहीं प्राप्त था।

एक प्रकरण में जहाँ एक पुलिस अधिकारी बिना खोज वारण्ट (Search warrant) के एक घर में घुसने का प्रयास किया ताकि वह चोरी के माल को बरामद कर सके किन्तु उसका प्रतिरोध किया गया, यह निर्णय दिया गया कि वारण्ट के बिना खोज करते समय भले ही आफीसर का कार्य न्यायसंगत न रहा हो उसके कार्य में बाधा या प्रतिरोध उत्पन्न करने वाले व्यक्ति अपने कार्य को न्यायोचित ठहराने हेतु आफीसर की अवैध प्रक्रिया को आधार नहीं बना सकते, क्योंकि यह नहीं दर्शाया गया था कि अधिकारी बिना सद्भाव के एवं ईर्ष्या से कार्य कर रहा था।17 यदि एक पुलिस अधिकारी अवैध रूप से जारी वारण्ट को निष्पादित करने का प्रयत्न करता है तो अभियुक्त द्वारा उत्पन्न प्रतिरोध न्यायसंगत होगा।18 |

मृत्यु अथवा घोर उपहति की युक्तियुक्त आशंका-एक लोक-सेवक द्वारा कारित किसी व्यक्ति के विरुद्ध प्रावईट प्रतिरक्षा का अधिकार केवल उन मामलों तक विस्तारित होता है जिनमें मृत्यु या घोर उपहति लोक-सेवक द्वारा कारित किये जाने की आशंका है।19 एक प्रकरण में एक एक्साइज इन्सपेक्टर ने एक शस्त्रधारी तस्कर व्यापारी का पीछा किया और उसके नजदीक पहुँचने पर उसे रुकने का आदेश दिया तथा उसे डराने के लिये अपनी पिस्तौल से दो बार गोली चलाया। इस पर तस्कर व्यापारी ने अपनी तलवार निकाल कर उसके जांघ पर प्रहार किया। यह निर्णय दिया गया कि तस्कर व्यापारी को यह विश्वास करने का युक्तियुक्त आधार था कि इन्सपेक्टर मृत्यु या गम्भीर चोट कारित करने का आशय रखता था और उसने प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार की सीमा का अतिक्रमण नहीं किया।20।


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