Indian Penal Code 1860 General Exceptions Part 6 LLB 1st Year Notes Study Material

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  1. शरीर तथा सम्पत्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार-धारा 99 में अन्तर्विष्ट निबन्धनों के अध्यधीन, हर व्यक्ति को अधिकार है, कि वह

पहलामानव शरीर पर प्रभाव डालने वाले किसी अपराध के विरुद्ध अपने शरीर और किसी अन्य व्यक्ति के शरीर की प्रतिरक्षा करे,

दूसरा-किसी ऐसे कार्य के विरुद्ध, जो चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार की परिभाषा में आने वाला अपराध है, या जो चोरी, लूट, रिष्टि या आपराधिक अतिचार करने का प्रयत्न है, अपनी या किसी अन्य व्यक्ति की, चाहे जंगम, चाहे स्थावर सम्पत्ति की प्रतिरक्षा करे।

टिप्पणी

यह धारा प्रावईट प्रतिरक्षा के अधिकार के प्रयोग की सीमा से सम्बन्धित है। धारा 99 इस अधिकार की परिसीमा निर्धारित करती है। ये दोनों धारायें एक साथ मिलकर प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के सिद्धान्त को निर्मित करती हैं। यह अधिकार शरीर और सम्पत्ति दोनों से सम्बन्धित है। यह अधिकार अपने ही शरीर एवं सम्पत्ति तक सीमित नहीं है अपितु इसका प्रयोग दूसरे के शरीर एवं सम्पत्ति की प्रतिरक्षा हेतु भी किया जा सकता है। एक समय, एक सन्दर्भ में इंगलिश विधि भारतीय विधि से संकुचित थी। इंग्लैण्ड में एक व्यक्ति मात्र अपने एवं नजदीकी सम्बन्धियों को प्रतिरक्षा हेतु ही अपराधी के विरुद्ध बल का प्रयोग कर सकता था। किन्तु बाद में यह सीमा शनैः शनै बढ़ती गई और यह अधिकार अब उन व्यक्तियों तक सीमित है जिनके हित एक दूसरे से संलग्न हैं, अर्थात् व्यावहारिक एवं प्राकृतिक दोनों ही प्रकार के सम्बन्ध इसमें अन्तर्विष्ट हैं, जैसे,

  1. 2007 क्रि० लॉ ज० 874 (एस० सी०).

पति-पत्नी मालिक एवं सेवक, पिता-पुत्र तथा भूस्वामी एवं काश्तकार। अमरीका की विधि इससे विस्तृत है। भारतीय विधि तथा अमरीका की विधि के अनुसार एक व्यक्ति जो कुछ अपने लिये कर सकता है वह दूसरे के लिये भी कर सकता है।

भारत में प्रत्येक व्यक्ति को (1) अपने शरीर तथा किसी अन्य व्यक्ति के शरीर की, मानव-शरीर को प्रभावित करने वाले किसी अपराध से (2) अचल तथा चल सम्पत्ति चाहे अपनी हो या किसी अन्य व्यक्ति की चोरी, लूट (Robbery), रिष्टि (Mischief) या आपराधिक अतिचार (Criminal trespass) या इनमें से किसी एक को कारित करने के प्रयास से प्रतिरक्षित करने का अधिकार है। डकैती, लूट का तीव्र रूप है, अत: स्पष्ट रूप से इसका वर्णन नहीं किया गया है। लूट का वर्णन इसलिये किया गया है क्योंकि इसमें चोरी के अतिरिक्त उद्दापन भी सम्मिलित है।

धारा 97 के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति को बचाव का अधिकार है।” अपने शरीर तथा सम्पत्ति को अवांछित प्रहार के विरुद्ध प्रतिरक्षा करने का प्रत्येक व्यक्ति का अन्तर्निहित अधिकार (Inherent right) है। एक व्यक्ति का समाज के प्रति यह दायित्व है कि वह दूसरे के शरीर एवं सम्पत्ति की सुरक्षा करे। लोक सुरक्षा का यह नियम है कि प्रत्येक ईमानदार व्यक्ति अपने आपको दूसरे का प्राकृतिक या स्वाभाविक रक्षक समझे।90 |

प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार अभिदाचित किया जाना चाहिये-सामान्यतया प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार को अभियुक्त द्वारा अभिवाचित होना चाहिये। किन्तु यदि अभियुक्त आत्म-बचाव को अभिवाचित नहीं करता है तब भी न्यायालय इस तर्क को ध्यान में रख सकती है यदि यह उपलब्ध प्रमाणों से स्पष्ट है।91 आत्म-बचाव के तर्क को सिद्ध करने का अभियुक्त का दायित्व उतना क्लिष्ट नहीं है जितना कि अभियोजक का जबकि अभियोजन का दायित्व अपने मामले को उचित सन्देह से परे सिद्ध करने का होता है, अभियुक्त इस तर्क को उस सीमा तक सिद्ध करने के लिये बाध्य नहीं है। उसका दायित्व उस समय समाप्त हो जाता है। यदि वह मात्र इसकी सम्भाव्यता प्रतिपरीक्षण के दौरान सिद्ध कर दे या बचाव-प्रमाण प्रस्तुत करे।92

सेकर बनाम राज्य93 वाले मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया कि किन्हीं विशिष्ट परिस्थितियों में किसी व्यक्ति ने व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग किया है तथ्य सम्बन्धी प्रश्न है जिसका अवधारण प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार किया जाता है। व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का अभिवचन करने वाले अभियुक्त से साक्ष्य प्रस्तुत करने की अपेक्षा नहीं की जाती, वह अपना अभिवचन अभियोजन साक्ष्य से प्रकट होने वाली परिस्थितियों के माध्यम से ही सिद्ध कर सकता है। ऐसे मामले में अभियोजन साक्ष्य के सही प्रभाव के मूल्यांकन का प्रश्न उठता है, और अभियुक्त द्वारा किसी भार (दायित्व) को निभाना नहीं है।

वी० सुब्रमणि बनाम तमिलनाडु राज्य94 वाले मामले में 21-12-1993 को रवि कुमार का भान्जा सिबा अभि० सा० 1 के परिवार की भूमि में अ-1 की भैंसें चरा रहा था। इसे देख कर अभि० सा० 5 ने उसे मारा-पीटा, जिसे उसने अ-1 को बताया, जिसने अभि० सा० 5 से उसके आचरण के बारे में पूछताछ किया। इस समाचार को सुन कर मृतक और उसका भाई अभि० सा० 6 मध्यस्थता करने पहुँचे और उन पर भी हमला किया गया, जिससे उनके सम्बन्धों में तनाव आ गया।

दिनांक 22-12-1993 को लगभग 8.00 पूर्वान्ह अभि० सा० 1 एवं अभि० सा० 2 शामिल हाल कुयें के निकट ब्रश (दातून) कर रहे थे, उन्होंने अ-1 को पास से जाते हुए देखा। अभि० सा० 1 ने उससे पूंछा कि क्या अभि3 सा० 5 के साथ मारपीट करना उसके लिये उचित था, जो कि उनकी भूमि में ही भैंस चरा रहा था। अ-1 और अभि० सा० 1 के बीच अभि० सा० 2 की उपस्थिति में कहासुनी हुई। अ-1 क्रोधित हो गया और वह अ-6 के घर में गया और एक लाठी लेकर आया और अभि० सा० 1 की पीठ में मारा। अ-1 के आचरण से व्यथित होकर दोनों भाई अभि० सा० 1 और अभि० सा० 2 ने अ-1 को खदेड़ा और अ-1 ने अ-6

  1. बेन्थम, प्रिन्सिपल्स ऑफ दि पेनल कोड, पृ० 269.
  2. मुन्शीराम बनाम दिल्ली प्रशासन, ए० आई० आर० 1968 सु० को० 702.
  3. सलीम मियाँ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, (1979) 1 क्रि० लॉ ज० 323; मोहिन्द्र पाल बनाम पंजाब राज्य, 1979 क्रि० लाँ। ज० 584 भी देखें।
  4. 2003 क्रि० लॉ ज० 53 (सु० को०). .
  5. 2004 क्रि० लाँ ज० 1727 (सु० को०).

के घर में शरण ले लिया। तब अभि० सा० 1 और अभि० सा० 2 दोनों अ-6 के घर के बाहर चिल्लाने लगे। 207 धमकी भरी बातें सुन कर अ-3 ने ललकारा कि अभि० सा० 1 और अभि० सा० 2 पर प्रहार किया जाय, भले। दी हत्या क्यों न हो जाए, क्योंकि वे उसके घर में घुस आये हैं। इस ललकार के समर्थन में अ-2 ने अभि० सा० 2 के सिर पर प्रहार किया और अ-4 ने रीपर से मारा और अ-1 ने लोहे की छड़ से सर पर प्रहार किया। यह देखकर अभि० सा० 3 जो अभि० सा० 1, अभि० सा० 2 और 5 का पिता है। उन्हें बचाने गया, उसे देख कर अ-3 और अ-5 ने उसके सिर पर हल के जुओं से प्रहार किया जबकि अ-6 ने उसे पकड़ लिया, जिससे उसे गंभीर चोटें आयीं। अभि० सा० 1 को मौके पर पड़ा एक डंडा मिल गया, जिसे लेकर उसने अभियुक्तों को खदेड़ा। यह सुनकर कि भाइयों पर हमला किया गया, अभि० सा० 6 मौके पर आया, उसने घायल को देखा। और अभियुक्तों का पीछा किया और इस प्रक्रम में अ-1 को भी चोटें आई। यह घटना मुथूकृष्णन और नागप्पन ने देखा। मृतक को घायल अवस्था में 11.30 बजे पूर्वान्ह अस्पताल ले जाया गया, जहाँ 22-12-99 को लगभग 12.10 बजे अपरान्ह उसकी मृत्यु हो गयी।

ऊपर उल्लिखित पृष्ठभूमि के तथ्यों पर विचार करते हुये यह अभिनिर्धारित किया गया था कि अभियुक्त व्यक्तियों ने व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग करते हुये कृत्य नहीं किया था। शेष अभिवचन के बारे में कि हलके वजन के लकड़ी के बने हल के जुओं से मात्र एक ही प्रहार किया गया था यह अभिनिर्धारित किया गया कि इसे सार्वभौम रूप से लागू होने वाले सामान्य नियम के रूप में अधिकथित नहीं किया जा सकता कि जब कभी एकमात्र प्रहार से मृत्यु कारित हो जाए, तब भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 को लागू न किया जाय, प्रत्येक मामले में परिस्थिति के तथ्यों पर विचार किया जाना चाहिए। उपरोक्त परिस्थितियों में दोषसिद्धि को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 से परिवर्तित कर धारा 304 भाग I के अधीन कर दिया। गया ।। |

यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि क्षतियों की संख्या यह अवधारित करने के लिये सुरक्षित नहीं है। कि आक्रमणकर्ता कौन था। सार्वभौम नियम के रूप में यह उल्लेख नहीं किया जा सकता कि जब कभी अभियुक्त के शरीर पर चोटें पाई जाएं, तब आवश्यक रूप से यह उपधारणा कर ली जाए कि अभियुक्त व्यक्तियों ने व्यक्तिगत प्रतिरक्षा में क्षति कारित किया है। प्रतिरक्षा के लिए यह सिद्ध करना होता है कि अभियुक्त को आई क्षति से यह संभावना बनती है कि व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रयोग किया गया होगा। घटना के समय या कहा सुनी के समय अभियुक्त को आई क्षतियों के बारे में स्पष्टीकरण न देना बहुत महत्वपूर्ण परिस्थिति है। किन्तु अभियोजन द्वारा क्षतियों के बारे में मात्र स्पष्टीकरण न देने से अभियोजन के पक्ष कथन पर सभी मामलों में प्रभाव नहीं पड़ेगा। यह पता लगाने के लिये कि व्यक्तिगत प्रतिरक्षा का अधिकार उपलब्ध है। या नहीं, अभियुक्त को आई क्षतियाँ, उसकी सुरक्षा के आसन्न संकट, अभियुक्त द्वारा कारित क्षति और यह परिस्थिति कि अभियुक्त के पास लोक प्राधिकारियों से संपर्क करने का अवसर था या नहीं, ऐसे सुसंगत तथ्य हैं, जिन पर विचार किया जाना चाहिये। |


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