Indian Penal Code 1860 General Exceptions Part 5 LLB 1st Year Notes Study Material

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  1. किसी व्यक्ति के फायदे के लिए सम्मति से सद्भावपूर्वक किया गया कार्य, जिससे मृत्यु कारित करने का आशय नहीं है कोई बात, जो मृत्यु कारित करने के आशय से न की गई हो, किसी ऐसी अपहानि के कारण नहीं है जो उस बात से किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके फायदे के लिए यह बात सद्भावपूर्वक की जाए और जिसने उस अपहानि को सहने, या उस अपहानि की जोखिम उठाने के लिए चाहे। अभिव्यक्त चाहे विवक्षित सम्मति दे दी हो, कारित हो या कारित करने का कर्ता का आशय हो या कारित होने की सम्भाव्यता कर्ता को ज्ञात हो।

दृष्टान्त

क, एक शल्य चिकित्सक, यह जानते हुए कि एक विशेष शल्यकर्म से य की, जो वेदनापूर्ण व्याधि से। ग्रस्त है, मृत्यु कारित होने की सम्भावना है, किन्तु य की मृत्यु कारित करने का आशय न रखते हुए और सद्भावपूर्वक य के फायदे के आशय से य की सम्मति से य पर वह शल्यकर्म करता है। क ने कोई अपराध नहीं किया है।

टिप्पणी

सामान्य नियम यह है कि मृत्यु जो एक आशय से कारित की गई है सहमति द्वारा कभी भी न्यायोचित नहीं ठहरायी जा सकती। किन्तु एक व्यक्ति जिसके लाभ के लिये कोई कार्य किया जाता है, अपनी सहमति दे। सकता है कि दूसरा व्यक्ति वह कार्य करे भले ही मृत्यु सम्भाव्य हो, यद्यपि कर्ता का आशय कभी भी मृत्यु कारित करना नहीं था। धारा 87 के अन्तर्गत मृत्यु तथा गम्भीर चोट को छोड़कर यदि कोई अन्य क्षति क्षतिग्रस्त व्यक्ति की सहमति से कारित की जाती है तो अभियुक्त का कार्य न्यायसंगत माना जायेगा। धारा 88 उन कार्यों को क्षमा करती है तो क्षतिग्रस्त व्यक्ति के फायदे के लिये हैं।

यदि एक व्यक्ति अपनी स्वतन्त्र तथा विवेकयुक्त सहमति एक आपरेशन के खतरे को उठाने हेतु देता है। जो अधिकतर मामलों में घातक सिद्ध हुआ है तो डाक्टर जो आपरेशन करता है दण्डित नहीं होगा भले ही आपरेशन के फलस्वरूप मृत्यु हो जाये। इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति पर कोई जंगली जानवर प्रहार करता है। और वह अपने दोस्तों को उस जानवर पर गोली चलाने को कहता है, यद्यपि उसकी अपनी जिन्दगी के लिये गभीर खतरा है फिर भी उन्हें दंडित करना उचित नहीं होगा, भले ही उनकी गोली से उसकी मृत्यु हो जाये तथा भले ही गोली चलाते वक्त उन्हें इस बात का आभास था कि उसकी मृत्यु सम्भाव्य है।

धारा 88 धारा 87 से दो प्रकार से भिन्न है-(1) धारा 88 के अन्तर्गत मृत्यु के अतिरिक्त कोई भी क्षति कारित की जा सकती है जबकि धारा 87 के अन्तर्गत मृत्यु तथा गम्भीर चोट के अतिरिक्त कोई भी क्षति कारित की जा सकती है, (2) धारा 88 के अन्तर्गत सहमति देने वाले व्यक्ति की आयु का वर्णन नहीं किया गया है। जबकि धारा 87 के अन्तर्गत सहमति देने वाले व्यक्ति की आयु 18 वर्ष से अधिक होनी चाहिये।

अवयव– यह धारा प्रतिपादित करती है कि एक कर्ता उस कार्य के लिये दण्डित नहीं किया जायेगा भले ही वह साशय ऐसी क्षति कारित करता है जिससे मृत्यु हो जाती है, या उसे इस बात का ज्ञान था कि कार्य। हानिकारक है। यदि

(1) कार्य क्षतिग्रस्त व्यक्ति के लाभ हेतु किया गया है,

(2) कार्य उस व्यक्ति की सहमति से किया गया है, कि वह अपहानि बर्दास्त करेगा,

(3) सहमति अभिव्यक्त या विवक्षित हो सकती है,

(4) कार्य सद्भावपूर्वक किया गया है, ।

(5) कार्य बिना मृत्यु कारित करने के आशय से किया गया है भले ही उसे कारित करते समय यह आशय रहा हो कि ऐसी अपहानि कारित हो सकती है जिससे मृत्यु सम्भाव्य है।

लाभ हेतु कारित किया गया कार्य-इस धारा के अन्तर्गत बचाव हासिल करने के लिये यह आवश्यक है कि कार्य उस व्यक्ति के लाभ के लिये किया गया है। इस धारा के अन्तर्गत तथा संहिता की धारा 89 एवं 92 के अन्तर्गत भी मात्र आर्थिक लाभ नहीं है।

कार्य सहमति से किया गया- यदि कार्य क्षतिग्रस्त व्यक्ति की सहमति से किया गया है तो अभियुक्त इस धारा के अन्तर्गत प्रतिरक्षा की माँग करने का अधिकारी होगा। सहमति अभिव्यक्त या विवक्षित । हो सकती है, किन्तु सहमति वैध होनी चाहिये। सहमति विधित: प्राप्त होनी चाहिये। सहमति उस व्यक्ति ।

द्वारा दी जानी चाहिये जो विधि के अन्तर्गत वैध सहमति के लिये सक्षम है। इस धारा के अन्तर्गत 12 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति अपनी सहमति देने के लिये सक्षम हैं।

सद्भावपूर्वक किया गया कार्य-धारा 88 के अन्तर्गत बचाव हेतु यह आवश्यक है कि वह कार्य जिससे अपहानि या चोट उत्पन्न होती है, सद्भावपूर्वक किया गया हो। अर्थात् वह एक ऐसा कार्य नहीं होना चाहिये जो बिना उचित सावधानी तथा ध्यान से किया गया हो। इस धारा के अन्तर्गत उचित सावधानी तथा ध्यान की मात्र आवश्यकता है, विशेष निपुणता एवं ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। सुकरू कविराज22 के वाद में कविराज ने आन्तरिक बवासीर से पीडित एक रोगी का आपरेशन किया जिसके लिये उसने सामान्य चाकू का प्रयोग किया। अत्यधिक रक्तस्राव के कारण रोगी की मृत्यु हो गयी। उपेक्षा एवं अदूरदर्शिता कार्य सम्पादित कर मृत्यु कारित करने के लिये कविराज को अभियोजित किया गया। यह निर्णय दिया गया कि वह इस धारा के अन्तर्गत बचाव का हकदार नहीं है, क्योंकि उसने सद्भावपूर्वक कार्य नहीं किया। फिर भी न्यायालय ने दण्ड को कम कर दिया और कैद की सजा के स्थान पर मात्र जुर्माने से उसे दण्डित किया गया।

सूरजबली23 के वाद में एक महिला की आँख का आपरेशन किया गया जिससे उसकी ज्योति जाती रही। यह सिद्ध किया गया कि आपरेशन जिसके फलस्वरूप उसकी दृष्टि ज्योति समाप्त हो गयी, रोगी की सहमति से सम्पादित किया गया था, तथा सद्भावपूर्वक उसके हित के लिये किया गया था। उसका आपरेशन मान्यता प्राप्त भारतीय पद्धति के अनुसार किया गया था। यह निर्णय दिया गया कि कोई अपराध कारित नहीं हुआ है। तथा वह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 88 के अन्तर्गत बचाव प्राप्त करने का हकदार है। परन्तु ऐसे व्यक्ति जो मेडिकल प्रेक्टिशनर्स के रूप में योग्यता प्राप्त नहीं है इस धारा का लाभ उठाने के हकदार नहीं हैं क्योंकि ऐसे व्यक्तियों के विषय में यह नहीं कहा जा सकता है कि उन्होंने सद्भावपूर्वक जैसा कि इस पदावली को संहिता की धारा 52 में परिभाषित किया है, कार्य किया है। |

अपहानि कारित करने का आशय न कि मृत्यु-इस धारा के अन्तर्गत अपहानिकर्ता प्रतिरक्षित है। भले ही उसने कार्य अपहानि कारित करने के उद्देश्य से किया हो तथा कारित अपहानि गम्भीर चोट हो किन्तु मृत्यु नहीं। यह लाभ इसलिये प्राप्त होता है क्योंकि कार्य सद्भाव में किया जाता है तथा क्षतिग्रस्त व्यक्ति के लाभ हेतु किया जाता है। |

उदाहरण– एक स्कूल का अध्यापक जो अपने शिष्य को उचित एवं उपयुक्त शारीरिक दण्ड देता है। ताकि स्कूल में अनुशासन बना रहे इस धारा के अन्तर्गत प्रतिरक्षित है तथा वह संहिता की धारा 323 के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध का दोषी नहीं होगा 24 यदि शिशु 12 वर्ष से अधिक आयु का है, तो धारा 88 उसे सुरक्षा प्रदान करेगी और यदि वह 12 वर्ष से कम आयु का है तो उसे धारा 89 का लाभ मिलेगा।

इंग्लैण्ड में एक व्यक्ति जो दूसरे के जीवन तथा उसके स्वास्थ्य से सम्बन्धित कोई कार्यवाही करता है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह सुयोग्य चातुर्य तथा पर्याप्त सावधानी का प्रयोग करेगा और यदि रोगी की मृत्यु इनमें से किसी एक की कमी के कारण हो जाती है, तो वह व्यक्ति मानव वध का दोषी होगा। |

  1. संरक्षक द्वारा या उसकी सम्मति से शिशु या उन्मत्त व्यक्ति के फायदे के लिए सद्भावपूर्वक किया गया कार्य- कोई बात, जो बारह वर्ष से कम आयु के या विकृतचित्त व्यक्ति के फायदे के लिए सद्भावपूर्वक उसके संरक्षक के, या विधिपूर्ण भारसाधक किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा, या की अभिव्यक्त या विवक्षित सम्मति से की जाए, किसी ऐसी अपहानि के कारण, अपराध नहीं है जो उस बात से उस व्यक्ति को कारित हो, या कारित करने का कर्ता का आशय हो या कारित होने की सम्भावना कर्ता को ज्ञात हो । परन्तुक– परन्तु

पहला-इस अपवाद का विस्तार साशय मृत्यु कारित करने या मृत्यु कारित करने का प्रयत्न करने पर न होगा;

दूसरा-इस अपवाद का विस्तार मृत्यु या घोर उपहति के निवारण के या किसी घोर रोग या अंग शैथिल्य से मुक्त करने के प्रयोजन से भिन्न किसी प्रयोजन के लिए किसी ऐसी बात के करने पर न होगा जिसे करने वाला व्यक्ति जानता हो कि उससे मृत्यु कारित होना सम्भाव्य है।

  1. (1887) 14 कल० 566.
  2. 28 ए० डब्ल्यू ० एन० 566.
  3. नटेसन (1962) 1 क्रि० लाँ ज० 727; ए० आई० आर० 1962 मद्रास 216.

तीसरा-इस अपवाद का विस्तार स्वेच्छया घोर उपहति कारित करने, या घोर उपहति कारित करने का प्रयत्न करने पर न होगा जब तक कि वह मृत्यु या घोर उपहति के निवारण के, या किसी घोर रोग या अंग शैथिल्य से मुक्त करने के प्रयोजन से न की गई हो;

चौथा-इस अपवाद का विस्तार किसी ऐसे अपराध के दुष्प्रेरण पर न होगा जिस अपराध के किए जाने पर इसका विस्तार नहीं है।

दृष्टान्त

क सद्भावपूर्वक, अपने शिशु के फायदे के लिए अपने शिशु की सम्मति के बिना, यह सम्भाव्य जानते हुए कि शस्त्रकर्म से उस शिशु की मृत्यु कारित होगी, न कि इस आशय से कि उस शिशु की मृत्यु कारित कर दे, शल्यचिकित्सक द्वारा पथरी निकलवाने के लिए अपने शिशु की शल्यक्रिया करवाता है। क का उद्देश्य शिशु को रोगमुक्त कराना था, इसलिए वह इस अपवाद के अन्तर्गत आता है।

टिप्पणी

यह धारा 12 वर्ष से कम आयु के शिशु अथवा विकृत चित्त वाले व्यक्ति के अभिभावक को अधिकार देती है कि वह शिशु या विकृत चित्त वाले व्यक्ति को अपहानि कारित करने हेतु सहमति दे परन्तु यह आवश्यक है कि अपहानि सद्भाव में उसके लाभ हेतु कारित की गई हो। यह धारा अभिभावकों तथा अभिभावकों की सहमति से कार्य करने वाले अन्य व्यक्तियों को सुरक्षा प्रदान करती है परन्तु यह आवश्यक है। कि अभिभावक ऐसे व्यक्ति हों जो बारह वर्ष से कम के हों या विकृत चित्त के हों। 12 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति अपनी सहमति देने के लिये सक्षम माने जाते हैं। धारा 88 के अन्तर्गत क्षतिग्रस्त व्यक्ति की अपनी सहमति होती है जब कि धारा 89 के अन्तर्गत शिशु अथवा विकृत चित्त वाले व्यक्ति के अभिभावक की सहमति होती है।

अवयव-इस धारा के अन्तर्गत बचाव प्राप्त करने के लिये निम्नलिखित शर्तों का पूरा होना आवश्यक

(1) कार्य 12 वर्ष से कम आयु के शिशु या विकृत चित्त वाले व्यक्ति के लाभ के लिये किया गया हो;

(2) कार्य सद्भावपूर्वक किया गया है;

(3) कार्य अभिभावक द्वारा या अभिभावक की सहमति से या उस व्यक्ति पर विधिक अधिकार रखने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया हो;

(4) सहमति या तो अभिव्यक्त हो या विवक्षित।

यदि उपरोक्त शर्ते पूर्ण हो जाती हैं तो कार्य अपराध नहीं होगा भले ही इससे कोई अपहानि कारित हो या अपहानिकर्ता द्वारा आशयित हो या उसे ज्ञात हो कि अपहानि कारित होने की सम्भाव्यता है। परन्तु इसके साथ ही साथ यह भी आवश्यक है कि कार्य इस धारा से जुड़े हुये चार में से किसी अपवाद के अन्तर्गत न आता हो।


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