Indian Penal Code 1860 General Exceptions Part 4 LLB 1st Year Notes Study Material

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  1. ऐसे व्यक्ति का कार्य जो अपनी इच्छा के विरुद्ध मत्तता में होने के कारण निर्णय पर पहुँचने में असमर्थ है- कोई बात अपराध नहीं है, जो ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाती है, जो उसे करते समय मत्तता के कारण उस कार्य की प्रकृति, या यह कि जो कुछ वह कर रहा है वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, जानने में असमर्थ है, परन्तु यह तब जबकि वह चीज, जिससे उसको मत्तता हुई थी, उसके अपने ज्ञान के बिना या इच्छा के विरुद्ध दी गयी थी।

टिप्पणी

प्रारम्भिक कामन लॉ में मत्तता के आधार पर कोई भी छूट नहीं प्रदान की जाती थी वरन् मत्तता को एक ऐसी परिस्थिति माना जाता था जो अपराध को गुरुतर बना देती थी। सर्वप्रथम इंग्लिश मामला जिसमें न्यायालय ने अत्यधिक मत्तता के प्रभाव के अन्तर्गत कारित किये गये मानववध (Homicide) के लिये मृत्युदण्ड की सजा को स्वीकार किया, रेनिन्जर बनाम फोगोस्सा75 का है। यह कठोर नियम उन्नीसवीं । शताब्दी के प्रारम्भ तक लागू होता रहा यद्यपि ब्लैकस्टन तथा कोक के प्रयत्न की मत्तता को उत्तेजक के रूप में स्वीकार किया जाय सफल न हो सका। ह्वार्टन का विचार है कि, “यदि मत्तता दायित्व का परिहार करती थी। तो मानव-वध के लिये कदाचित ही दण्ड आरोपित किया जा सकता था।”76 स्टोरी का कहना था कि, ‘‘विधि किसी व्यक्ति को यह स्वीकृति नहीं प्रदान करती कि वह अपने आपत्तिजनक दोष तथा दुराचरण का लाभ स्वयं उठा सके जिससे वह ऐसे अपराध के विधिक परिणामों से अपने को सुरक्षित रख सके।”77 । किन्तु उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इस नियम में न्यायिक निर्णयों द्वारा शनैः शनैः ढील दी गई और अब मत्तता के कारण व्युत्पन्न यथार्थ चित्तविकृतता आपराधिक उत्तरदायित्व के विरुद्ध उस सीमा तक एक बचाव है जैसे कि वह अन्य कारणों से उत्पन्न हुआ था।78 किन्तु केवल अनैच्छिक मत्तता ही बचाव के लिये प्रेषित की जा सकती है, स्वैच्छिक मत्तता नहीं। इंग्लैण्ड में सामान्य नियम इस प्रकार है-“मात्र यह दर्शाना कि अभियुक्त का मस्तिष्क नशे के कारण इस सीमा तक प्रभावित हो चुका था कि वह आसानी से तीव्र उत्तेजना के सम्मुख नतमस्तक हो गया, बचाव नहीं।”79 इस सामान्य नियम के दो अपवाद हैं।

(क) लगातार मदिरापान से कभी-कभी मस्तिष्क की कोशिकाओं में ऐसे स्थायी परिवर्तन हो जाते हैं। जिसे पागलपन या चित्तविकृतता80 की संज्ञा दी जा सकती है जैसे, डिलीरियम ट्रीमेंस (Delirium tremens) तथा मादक पागलपन (Alcoholic Dementia) । जहाँ एक व्यक्ति का विवेक स्थायी तौर पर घृणित आदत के द्वारा क्षतिग्रस्त हो चुका है तो असमर्थता के तर्क को त्यागने का आधार प्रभावकारी नहीं होगा।81

74ग, (2012) III क्रि० ला ज० 3398 (एस० सी०).

  1. (1851) के० बी० 75 ई रिपोर्ट 1.
  2. ह्वार्टन, क्रिमिनल लॉ 95 (1932).
  3. यूनाइटेड स्टेट्स बनाम ड्यू, 25 फेडरल केसेज नं० 15, पृ० 993.
  4. डेवीस (1881) 14 काक्स 563.
  5. डी० पी० पी० बनाम बीयर्ड, (1920) ए० सी० 479.
  6. डेवीस (1881) 14 काक्स 563.
  7. क्रिमिनल लॉ कमीशन 7वीं रिपोर्ट, (1843) पार्लियामेण्टरी पेपर्स XIX, 24,

(ख) अनैच्छिक मत्तता एक बचाव है। यह अपवाद इसलिये न्यायोचित है क्योंकि अनैच्छिक मत्तता का दुरुपयोग उसी प्रकार नहीं किया जा सकता जिस प्रकार स्वैच्छिक मत्तता का तथा अपराध की पुनरावृत्ति किये जाने की सम्भावना नहीं रहती है।82

जहाँ तक स्वैच्छिक मत्तता का प्रश्न है, रेक्स बनाम ग्रिंडले83 के वाद में यह सुझाव दिया गया कि यद्यपि स्वैच्छिक मत्तता एक बचाव नहीं हो सकता फिर भी पूर्व संकल्प (premeditation) का निर्धारण करते। समय इसे ध्यान में रखना चाहिये। तत्पश्चात् रेगिना बनाम दोहटी84 के वाद में स्टीफेन जज ने कहा किमत्तता या मदिरापान अपराध के लिये कोई बचाव साबित नहीं हो सकता फिर भी यदि अपराध ऐसा है कि इसे कारित करने वाले पक्षकार का आशय इसका एक अवयव है तो इस तथ्य के निर्धारण हेतु कि क्या अपराध गठित करने के लिये आवश्यक आशय उस व्यक्ति का था, हम इस विषय पर ध्यान दे सकते हैं कि वह व्यक्ति नशे में था।

दोषमोचक (Exculpatory) नियम का पालन उन प्रकरणों में नहीं किया जाता है जो लोक भावनाओं को आघात पहुँचाते हैं।85 मदिरापान का प्रतिरक्षा के रूप में उपलब्ध होने के लिये उस मात्रा एवं सीमा तक का होना चाहिये जो प्रतिवादी को लगभग स्वचालित बना देता है ।86 तथा आवश्यक आपराधिक आशय को विनिर्मित करने हेतु क्षमता की कमी को सिद्ध करने का दायित्व प्रतिवादी पर होता है।87 उपयुक्त मनःस्थिति का खण्डन करने की आज्ञा प्रदान करने वाले नियम को व्यापक स्वीकृति दी गई 188 विशप प्रचलित . विधि पर अपने विचार व्यक्त करते हुये कहते हैं

“अत: मत्तता का साक्ष्य यह विनिश्चय करने के उद्देश्य हेतु ग्राह्य है कि क्या वह आरोपित विशिष्ट आशय को सृजित करने में सक्षम था? क्या ऐसा आशय विधि के अन्तर्गत कारित किये गये विनिर्दिष्ट अपराध का आवश्यक अवयव है?”89 | भारतीय विधि-अनैच्छिक मत्तता से सम्बन्धित भारतीय विधि भारतीय दण्ड संहिता की धारा 85 में वर्णित है-यह धारा एक अभियुक्त को वही बचाव प्रदान करती है जो धारा 84 एक अस्वस्थ मस्तिष्क वाले व्यक्ति को प्रदान करती है। धारा 85 के अन्तर्गत आपराधिक दायित्व से उन्मुक्ति की मांग करने के लिये अभियुक्त को यह स्थापित करना होगा कि(1) कार्य करते समय मत्तता के कारण वह समझने में असमर्थ था कि

(क) कार्य की प्रकृति; या

(ख) यह कि वह जो कुछ कर रहा था वह दोषपूर्ण या विधिविरुद्ध था; और

(2) यह कि जिस वस्तु ने उसे उन्मत्त किया था या तो उसके बिना ज्ञान के अथवा उसकी इच्छा के विरुद्ध उसे दी गयी थी।

उसके ज्ञान के बिना अथवा उसकी इच्छा के विरुद्ध- पदावली ‘‘बिना उसके ज्ञान के” का अर्थ है इस तथ्य की अज्ञानता कि क्या उसे दिया जा रहा है या मादक पदार्थ में क्या चीज मिला दी गई है 90 एक कार्य जो कि कर्ता अपनी, स्वयं की चेतना के अन्तर्गत सम्पादित नहीं करता अपितु किसी बाहरी दबाव के अन्तर्गत जिसने उसकी इच्छा को या तो नष्ट कर दिया है या उसे अपने प्रभाव में कर लिया है, करता है। उसकी इच्छा के विरुद्ध किया गया कार्य है।91

  1. विलियम्स जी, क्रिमिनल लॉ (2रा संस्करण) पृष्ठ 562-63.
  2. रेक्स बनाम कैरोल, 173 इंग्लिश रिपोर्ट 64 में वर्णित.
  3. 16 काक्स सी० सी० 306, पृ० 308. ।
  4. उदाहरण के लिये बलात्संग के आशय से किया गया हमला।
  5. टेट बनाम कामनवेल्थ 258 की० 685 पृ० 695 पर (1935).
  6. विल्सन बनाम स्टेट, 60 एन० जे० एल० 171. ।
  7. हाल, जेरोम, जनरल प्रिंसपल आफ क्रिमिनल लॉ (2रा संस्करण) पृ० 534.
  8. 1 विशप, क्रिमिनल लॉ 299 (9वाँ संस्करण) 1923.
  9. जेठू राम, (1960) क्रि० लॉ ज० 1093.
  10. उपरोक्त सन्दर्भ.

स्वैच्छिक मदिरापान अपराध कारित करने के लिये कोई बचाव नहीं है।92 मत्तता पागलपन की एक – 177 स्वैच्छिक प्रजाति है जिससे वह व्यक्ति अपने को विरत रख सकता है और वह इसके लिये जवाब देने को बाध्य है। किन्तु जहाँ मदिरापान अनैच्छिक है जैसे यदि एक व्यक्ति को शराब पीने के लिये बाध्य किया गया हो या छल-कपट द्वारा उसे मदिरापान हेतु प्रेरित किया गया हो या अज्ञान में या कोई मादक पदार्थ उसके ज्ञान के बिना अथवा इसकी इच्छा के विरुद्ध उसे दिया गया हो93 तो उसके आपराधिक कार्य का विनिर्णय अपराध कारित होते समय विद्यमान उसकी मानसिक स्थिति को ध्यान में रखकर किया जायेगा। ऐसा मामला भी उसी । प्रकृति का है जैसे चित्तविकृतता का। धारा 84 तथा धारा 85 में प्रयुक्त शब्द लगभग एक जैसे हैं और वे सभी तथ्य जो चित्तविकृतता के प्रकरण में उत्पन्न होते हैं, अनैच्छिक मदिरापान या मत्तता के प्रकरण में भी उत्पन्न होते हैं।

डायरेक्टर आफ पब्लिक प्राजीक्यूशन बनाम बियर्ड94 का वाद इस विषय पर महत्वपूर्ण निर्णय है। इस वाद में 13 वर्ष की एक लड़की बाजार जाते समय एक मिल के फाटक से निकल रही थी जहाँ अभियुक्त बीयर्ड पहरेदार के रूप में कार्यरत था। अभियुक्त ने बलात्कार करने का प्रयास किया। लड़की ने इसका प्रतिरोध किया। इस पर अभियुक्त ने अपना हाथ लड़की के मुंह पर रख दिया तथा दूसरे हाथ का अंगूठा उसके गले पर रखकर दबाया ताकि लड़की शोर न मचा सके। इस प्रयास में उसने अनजाने में ही उसकी हत्या कर दिया। कोर्ट आफ क्रिमिनल अपील ने उसे मानव-वध का दोषी पाया किन्तु हाउस आफ लार्ड्स ने उसे मृत्युदण्ड से दण्डित किया। इस प्रकरण में अग्रलिखित सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये

(1) जहाँ अपराध में एक विशिष्ट आशय एक आवश्यक तत्व है, वहाँ मत्तता की स्थिति का लक्ष्य जो अभियुक्त को ऐसा आशय सृजित करने से वंचित कर दे, को इस बात को विनिश्चित करने हेतु ध्यान में रखना चाहिये कि क्या विशिष्ट अपराध को गठित करने के लिये आवश्यक आशय उसका था। यदि वह नशे में इस कदर चूर था कि आवश्यक आशय को सृजित करने में असमर्थ था तो उन अपराधों के लिये दण्डित नहीं किया जायेगा जिनके लिये आशय का सिद्ध होना आवश्यक है। किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मत्तता अपने आप में एक उन्मुक्ति है परन्तु मत्तता की स्थिति वास्तविक आरोपित अपराध की विसंगति में हो सकती है, अत: उस अपराध के दायित्व को शून्य कर सकती है। |

(2) चित्तविकृतता चाहे मदिरापान से व्युत्पन्न हो या अन्यथा, आरोपित अपराध के लिये बचाव है। अत्यधिक मदिरापान से उत्पन्न यथार्थतः चित्तविकृतता के बचाव तथा मत्तता के बचाव जो ऐसी परिस्थिति व्युत्पन्न करते हैं कि विशिष्ट आशय को विनिर्मित करने में उन्मत्त व्यक्ति का मस्तिष्क असमर्थ बन जाता है, के अन्तर को सुरक्षित रखा गया है। विकृतचित्त वाला व्यक्ति किसी अपराध के लिये दण्डित नहीं किया जा सकता। विधि चित्त विकृतता के कारण पर ध्यान नहीं देती। यदि वास्तविक चित्त-विकृतता अलकोहल की अधिकता के फलस्वरूप सृजित होती है तो यह आपराधिक दायित्व के लिये उसी प्रकार पूर्ण उत्तर होता है। जैसे कि अन्य कारणों से उत्पन्न चित्त-विकृतता । पागलपन अस्थायी ही क्यों न हो वह एक उन्मुक्ति है। जहाँ यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि कार्य को करते समय अभियुक्त का मस्तिष्क अस्वस्थ था तथा साक्ष्य से यह सिद्ध हो गया कि वह डिलीरियम ट्रीमेंस से पीड़ित था और यह अत्यधिक मदिरापान से उत्पन्न हुआ, यह निर्णय दिया गया कि “मदिरापान एक चीज है तथा मदिरापान से उत्पन्न रोग एक अलग चीज है, और यदि एक व्यक्ति मदिरापान द्वारा रोग को इस स्थिति में ला देता है कि मात्र कुछ समय के लिये पागलपन की वह स्थिति उत्पन्न हो जाती है, जिसने उसे दायित्व से मुक्त कर दिया होता, यदि वह अन्य किसी ढंग से कारित हुआ होता, तो वह अपराध हेतु दायित्वाधीन नहीं होता।”

(3) यह मदिरापान के साक्ष्य, जो एक अपराध गठिन करने के लिये आवश्यक विशिष्ट आशय को सृजित करने से अभियुक्त को असमर्थ बना देता है, को अन्य स्थापित तथ्यों के साथ यह विनिश्चित करने हेतु कि क्या वह इस आशय से युक्त था अथवा नहीं, ध्यान में रखना चाहिये 95

  1. बोधी खान (1866) 5 डब्ल्यू० आर० (क्रि०) 79.
  2. 1 ह्वेल पी० सी० 32.
  3. 1920 ए० सी० 479.
  4. वासुदेव बनाम पेप्सू राज्य, ए० आई० आर० 1956 सु० को 488 भी देखें।

(4) यह कि अपराध गठित करने के लिये आवश्यक आशय को सृजित करने के लिये अभिय== सत्यापित असमर्थता से न्यून मदिरापान का साक्ष्य तथा मात्र यह सिद्ध करना कि उसका मस्तिष्क प्रभावित था जिससे वह सहज ही में तीव्र उत्तेजना के सम्मुख झुक गया, इस अवधारणा का खण्डन नहीं करने कि अभियुक्त अपने कृत्य के स्वाभाविक परिणामों से भिज्ञ था।

उपरोक्त वर्णित दूसरा सिद्धान्त चित्त-विकृतता तथा मत्तता के आधार पर प्रतिरक्षा के अन्तर को स्पष्ट करता है। केवल पागलपन के प्रकरणों में ही अभियुक्त द्वारा अपने व्यवहार के विधिक प्रभावों का मूल्यांकन महत्वपूर्ण होता है ।26 गल्लाधर97 के वाद में दिये गये निर्णय को उचित स्थान दिया जाना चाहिये जो प्रतिपादित करता है कि मस्तिष्कीय रोग जिसका सम्बन्ध नशे से नहीं है, तो वह रोग मात्र इस कारण नशे से उत्पन्न नहीं माना जायेगा, क्योंकि नशा उसे उत्तेजित कर देता है।98।


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