Indian Penal Code 1860 Criminal Conspiracy Part 2 LLB 1st Year Notes Study Material

Indian Penal Code 1860 Criminal Conspiracy Part 2 LLB 1st Year Notes Study Material

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Indian Penal Code 1860 Criminal Conspiracy LLB 1st Year Notes Study Material

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120-ख. आपराधिक षड्यंत्र का दण्ड-(1) जो कोई मृत्यु, आजीवन कारावास या दो वर्ष या उससे अधिक अवधि के कठिन कारावास से दण्डनीय अपराध करने के आपराधिक षड्यंत्र में शरीक होगा, यदि ऐसे षड्यंत्र के दण्ड के लिए इस संहिता में कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं है, तो वह उसी प्रकार दण्डित किया जाएगा, मानो उसने ऐसे अपराध का दुष्प्रेरण किया था।

(2) जो कोई पर्वोक्त रूप से दण्डनीय अपराध को करने के आपराधिक षड्यंत्र से भिन्न किसी आपराधिक षड्यंत्र में शरीक होगा, वह दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि छह मास से अधिक की नहीं होगी या जुर्माने से, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।

टिप्पणी

आपराधिक षड्यंत्र के लिये उस समय दण्ड अधिक कठोर होगा जब कि सहमति घातक अपराध करने के लिये है। यदि सहमति एक ऐसा अपराध करने के लिये जो यद्यपि अवैध है परन्तु मृत्युदण्ड, आजीवन

  1. अम्मिनी बनाम स्टेट आफ केरल, 1998 क्रि० लाँ ज० 481 (एस० सी०).
  2. स्टेट आफ तमिलनाडू बनाम नलिनी और अन्य, ए० आई० आर० 1999 एस० सी० 2640.
  3. जगेश्वर सिंह, (1935) 15 पटना 26.
  4. मुलचेच बनाम क्वीन, (1868) 3 एल० आर० एच० एल० 306.
  5. मुलचेच बनाम क्वीन, (1868) 3 एल० आर० एच० एल० 306.

कारावास या दो वर्ष से अधिक कठिन कारावास से दण्डनीय अपराध नहीं है तो दण्ड कठोर नहीं होगा। प्रथम प्रकरण में षड्यंत्र के लिये वही दण्ड है जैसे षड्यंत्रकारी ने ही अपराध का दुष्प्रेरण किया था (48 एक अपराध कारित करने हेतु षड्यंत्र धारा 120-क के अन्तर्गत स्वयं एक सारभूत अपराध है और इसके लिये एक व्यक्ति पर अलग से आरोप लगाया जा सकता है अर्थात् उस पर षड्यंत्र तथा कारित अपराध दोनों का आरोप लगाया जा सकता है। धारा 109 तथा 20-क द्वारा सृजित अपराध बिल्कुल अलग हैं तथा जबकि अपराध षड्यंत्र के अनुसरण में अनेक व्यक्तियों द्वारा किया जाता है तब यह सामान्य नियम है कि उन पर उस अपराध तथा उस अपराध के षड्यंत्र दोनों का आरोप लगाया जाता है।

धारा 120-ख के अन्तर्गत अपराध गठित करने के लिये अभियोजन को यह सिद्ध करना आवश्यक नहीं है कि अपराधियों ने अवैध कार्य को करने या उसे किये जाने की सुस्पष्ट सहमति व्यक्त किया था। सहमति आवश्यक अनुमान द्वारा सिद्ध की जा सकती है। जहाँ अभियुक्त पर्याप्त समय तक विस्फोटक पदार्थों को अपने पास रखे हुये थे बिना किसी वैध अनुज्ञप्ति के बेच रहे थे, ऐसी दशा में यह निष्कर्ष सहज ही निकाला जा सकता है कि कथित अवैध कार्य करने या उसे किये जाने के लिये उनमें सहमति थी क्योंकि बिना किसी सहमति के एक कार्य एक लम्बे समय तक नहीं किया जा सकता था।20।

गुलाम सरबर बनाम बिहार राज्य ( अब झारखण्ड राज्य )51 के वाद में यह आरोपित था कि अभियुक्तगण ने मृतक को प्रतिद्वन्द्विता (rivalry) और मनमुटाव (strained) के कारण और उनके बीच दुर्भावना (illwill) के कारण मार डाला। आरोपित हेतुक (motive) यह था कि मृतक अभियुक्त के पारिवारिक जीवन और शिक्षण संस्थाओं के संचालन के व्यापार (business) में समस्यायें पैदा कर रहा था। अपराध कारित करने और अपराध कारित करने के बाद उनके भाग जाने के तरीके से यह स्पष्टतया षड्यन्त्र साबित होता है। डॉक्टर के बयान में कोई महत्वपूर्ण विरोधाभास अतिरंजना (embellishment) या सुधार नहीं दिखता था। डाक्टर का साक्ष्य एकमात्र मौखिक साक्ष्य द्वारा भी परिपुष्ट (corroborated) था। गवाहों का अभियुक्त को ऐसे जघन्य अपराध में गलत फंसाने का कोई कारण नहीं दर्शाया गया। अतएव अभियुक्त की दोषसिद्धि (conviction) सही अधिनिर्णीत की गयी।

इस मामले में यह भी स्पष्ट किया गया कि षड्यन्त्र के मामले में दो या उससे अधिक लोगों के मस्तिष्क मिलन को सिद्ध करना होता है। आपस में एक मत होना किसी अपराध को करने अथवा कोई गलत कार्य या कोई कार्य गलत तरीके से करने के लिये होना चाहिये। अभियुक्त की मात्र जानकारी या बहस (discussion) या मस्तिष्क में अपराध का प्रजनन (generation) अपराध गठित करने हेतु काफी नहीं है।

अपराध तब भी गठित होता है जब दो लोगों के विचार एक हों चाहे आगे और कुछ किया जाये या नहीं। यह अन्य अपराधों से अलग अपने आप में एक भिन्न और स्वतन्त्र अपराध है और अलग से दण्डनीय भी है। षड्यन्त्र के अपराध का मूल तत्व (gist) कोई कार्य करना या उस उद्देश्य को कार्यान्वित करना जिस हेतु षडयन्त्र गठित हुआ है और न पक्षकारों के मध्य उन कार्यों को करने का प्रयत्न करना ही आवश्यक है। षड्यन्त्र के लिये केवल आपस में समझौता ही आवश्यक है।

धारा 120-ख पैरा (1) जो गम्भीर अपराधों से सम्बन्धित है केवल वहाँ लाग होता है जहाँ संहिता के अन्तर्गत अपराध कारित करने हेतु षड्यंत्र को दण्डित करने के लिये कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं बनाया गया

यदि प क तथा र आपस में ब को इस बात के लिये राजी करने का निश्चय करते हैं कि वह म के घर से आभषणों की चोरी करे और वे उससे ऐसा निवेदन करते भी हैं। ब आसानी से तैयार हो । घर की चोरी करने के इरादे से चल देता है। इस मामले में प, क तथा र धारा 120-उलअपराध कारित करने का षड्यंत्र करने हेतु दायित्वाधीन होंगे। ब किसी अपराध का दोषी नहीं हो उसका कार्य केवल चोरी करने की मात्र तैयारी है।

  1. अलिम जान बीबी, (1937) 1 कल० 484.
  2. सुब्बैया, ए० आई० आर० 1961 सु० को० 1241; मोहम्मद हुसैन बनाम के० एस० दिलीप सिंह जी, (1970) 1 एस. सी. आर० 130.
  3. मोहम्मद उस्मान, मुहम्मद हुसैन मनियार तथा अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य, 1981 क्रि० लाँ ज० 588 (सु० को०)।
  4. (2014) I क्रि० लॉ ज० 34 (एस० सी०).

अब्दुल कादर बनाम राज्य-2 के वाद में यह निर्णय दिया गया कि यदि अपीलार्थी उस समय षड्यंत्र के पक्षकार थे जब वे लोग बम्बई में थे तो उन लोगों ने स्पष्टत: भारतीय सीमा के अन्तर्गत अपराध किया। अतः। यह स्वीकारना असम्भव है कि भारतीय न्यायालय इन अपराधों को विस्तारित करने का क्षेत्राधिकार नहीं रखते। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि यह धारा केवल उन सदस्यों पर लागू होती है जो षड़यंत्र के दौरान उसके। सदस्य थे। षड्यंत्र एक अनवरत अपराध (continuing offence) है और जो कोई भी षड्यंत्र का उस समय सदस्य है जिसके लिये उस पर आरोप लगाया गया है तो वह इस धारा के अन्तर्गत दण्डनीय है।

लाल चन्द इत्यादि बनाम हरियाणा राज्य3 के वाद में भीमल नामक एक व्यक्ति ने एक अनपढ़ महिला घोगरी से कपटपूर्वक एक दस्तावेज पर उसके अंगूठे का निशान लिया। दस्तावेज के द्वारा उसने उसकी। समस्त सम्पत्ति अपने नाम में करा लिया और यह दिखाया गया कि उसने अपनी सम्पत्ति उसे बेच दी है, जब उक्त महिला को असलियत का पता चला तो उसने न्यायालय में आपराधिक शिकायत दर्ज कराया किन्तु सिविल कार्यवाही द्वारा अपने हित को सुरक्षित रखने के लिये कोई कदम नहीं उठाया। इस आधार पर उच्चतम न्यायालय ने कहा कि चूंकि अभियुक्त के विरुद्ध कपट सिद्ध नहीं हो पाया है अत: दानपत्र का आरोप भी अभियुक्त सन्देह से परे सिद्ध हुआ नहीं माना जा सकता।


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