Indian Penal Code 1860 Criminal Conspiracy LLB 1st Year Notes Study Material

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Indian Penal Code 1860 Criminal Conspiracy Part 2 LLB 1st Year Notes Study Material

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अध्याय 5-क

आपराधिक षड्यंत्र (CRIMINAL CONSPIRACY)

120-क. आपराधिक षड्यंत्र की परिभाषा- जबकि दो या अधिक व्यक्ति

(1) कोई अवैध कार्य, अथवा

(2) कोई ऐसा कार्य, जो अवैध नहीं है, अवैध साधनों द्वारा, करने या करवाने को सहमत होते हैं, तब ऐसी सहमति आपराधिक षड्यंत्र कहलाती है,

परन्तु किसी अपराध को करने की सहमति के सिवाय कोई सहमति आपराधिक षड्यंत्र तब तक न होगी, जब तक कि सहमति के अलावा कोई कार्य उसके अनुसरण में उस सहमति के एक या अधिक पक्षकारों द्वारा नहीं कर दिया जाता।

स्पष्टीकरण– यह तत्वहीन है कि अवैध कार्य ऐसी सहमति का चरम उद्देश्य है या उस उद्देश्य का आनुषंगिक मात्र है।

टिप्पणी

मात्र दो या दो से अधिक व्यक्तियों के आशय द्वारा षड्यंत्र गठित नहीं होता, अपितु इसके लिये दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच कोई अवैध कार्य या अवैध साधनों द्वारा वैध कार्य को करने के लिये सहमति होना आवश्यक है। जबकि ऐसी परिकल्पना (design) केवल आशय के रूप में रहती है, दण्डनीय नहीं होती किन्तु जैसे ही दो व्यक्ति उस परिकल्पना को कार्यान्वित करने को सहमत हो जाते हैं तो योजना स्वयं अपने आप एक कार्य का रूप धारण कर लेती है, और प्रत्येक पक्षकार का कार्य प्रतिज्ञा के बदले प्रतिज्ञा, कृत्य के बदले कृत्य (actus contra actus) यदि वैध होता तो प्रवर्तन के योग्य होता तथा यदि आपराधिक साधनों द्वारा किया जाता है तो दण्डनीय होता है। व्यक्तियों की संख्या तथा उनका सम्बन्ध बल प्रदान कर खतरा उत्पन्न करते हैं। सहमति उस आशय के अग्रसरण हेतु एक कार्य था जिसकी प्रकल्पना प्रत्येक व्यक्ति ने अपने मस्तिष्क में की थी। षड्यंत्र के आरोप में सत्यापित करने के लिये सहमति का होना आवश्यक है। इसके लिये न तो प्रत्यक्ष विचार-विमर्श अथवा समुच्चय के साक्ष्य की आवश्यकता होती है और न ही यह आवश्यक है। इसके लिये न तो प्रत्यक्ष विचार-विमर्श अथवा समुच्चय के साक्ष्य की आवश्यकता होती है और न ही यह आवश्यक है कि पक्षकार एक दूसरे के पास लाये गये हों। सहमति का निष्कर्ष उन परिस्थितियों से निकाला जा सकता है जो अवैध परिकल्पना को कार्यान्वित करने की सामान्य योजना की अवधारणा को सृजित करती हैं। समुच्चय (combination) ही इस अपराध का सार है। शब्द ‘षड्यंत्र’ में समुच्चय के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है और इसका यही सार है।

षड्यंत्र की निष्क्रिय संज्ञेयता (Cognizance) मात्र पर्याप्त नहीं है वरन् सक्रिय सहयोग आवश्यक है। दसरे शब्दों में अपराध गठित करने के लिये संयुक्त दुराशय आवश्यक है। पुलिन बिहारी दास बनाम इम्परर। के वाद में एक संस्था के कुछ सदस्यों को क्रांतिकारी पाया गया किन्तु वे संस्था के वास्तविक उद्देश्यों से

  1. मुलचे बनाम रेग, (1868) 3 एल० आर० एच० एल० आर० 306 में विलिस जज का मत।
  2. मुलचे बनाम रेग, (1868) 3 एल० आर० एच० एल० आर० 306 में लार्ड जेम्सफोर्ड का मत।
  3. बारेन्द्र कुमार घोष बनाम इम्परर, (1924) 52 आई० ए० 40.
  4. पुलिन बिहारी दास बनाम इम्परर,
  5. 16 सी० डब्ल्यू० एन० 1105. 16 सी० डब्ल्यू० एन० 1105.

अवगत नहीं थे, संस्था के गुप्त तथ्यों का उन्हें पता नहीं था। इस प्रकरण में चूँकि दो मस्तिष्कों का सम्मिलन नहीं हुआ था तथा प्रत्येक की परिकल्पना को कोई अन्य नहीं जानता था, अत: उन्हें षड्यंत्र के आरोप के लिये दण्डित नहीं किया गया।

षड्यंत्र गठित करने के लिये दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच सहमति होनी चाहिये । सहमति का अर्थ है एक विशिष्ट वस्तु के सन्दर्भ में दो मस्तिष्कों का सम्मिलन और जब तक वस्तु के विषय में चर्चा होती है तथा विचारों का आदान-प्रदान होता है परन्तु जब तक दो या अधिक षड्यंत्रकारियों की सम्मति द्वारा कार्यवाही की योजना निश्चित नहीं हो जाती तब तक आपराधिक षड्यंत्र की स्थिति या अवस्था को पहुंचा हुआ नहीं माना जायेगा।

योगेश उर्फ सचिन जगदीश जोशी बनाम महाराष्ट्र राज्य के वाद में यह अभिनिर्धारित किया गया। कि षड्यन्त्र के अपराध के गठन हेतु दो या दो से अधिक व्यक्तियों के मस्तिष्क का मिलन अनिवार्य है। परन्तु प्रत्यक्ष साक्ष्य द्वारा ऐसे व्यक्तियों के मध्य करार को सिद्ध करना सम्भव नहीं है। षड्यन्त्र के उद्देश्य को आसपास की परिस्थितियों और अभियुक्त के आचरण (conduct) से अनुमान लगाया (inferred) जा सकता है। यह एक मौलिक (substantive) अपराध है। किसी अपराध के करने का मात्र करार ही इसे दण्डनीय बनाता है। भले ही वह अपराध उस अवैध करार के परिणामस्वरूप घटित न हो क्योंकि षड्यंत्र स्वत: एक मौलिक अपराध है।

अजय अग्रवाल बनाम भारत संघ के वाद में एक अप्रवासी भारतीय अपीलांट दुबई में मेसर्स सेल्स इण्टरनेशनल के नाम से एक प्रतिष्ठान संचालित कर रहा था और भारत में रह रहे चार अन्य लोग अपना प्रतिष्ठान चंडीगढ़ में संचालित कर रहे थे। इन सभी पांच लोगों ने मिलकर चंडीगढ़ में पंजाब नेशनल बैंक को छलने के लिए एक षड्यंत्र रचा और इस षड्यंत्र के निष्पादन (अनुसरण) में वे बैंक को 40,30,329 रुपये का धोखा देने में सफल रहे। यह पाया गया कि अपीलांट द्वारा दुबई के एक बैंक को झूठे और जाली शिपिंग अभिलेख के प्रेषण के आधार पर विदेशी क्रेडिट के जालीपत्र बनाये गये। एतद्नुसार उनमें से सभी भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120ख, 420, 468 और 471 के अधीन आरोपित किये गये। इस मामले में अपीलांट का यह तर्क था कि अपराध का संज्ञान लेने हेतु भारत की केन्द्रीय सरकार से पूर्व स्वीकृति लेना आवश्यक था। क्योंकि वह एक अप्रवासी भारतीय था।

यह अभिनिर्धारित किया गया कि षड्यंत्र का आवश्यक तत्व दो या अधिक लोगों के मध्य आपसी सहमति होना आवश्यक है न कि ऐसे लोगों का भारत में निवास। भले ही षड्यंत्र के अनुसरण में आंशिक रूप से ही कार्य भारत में किया गया हो, भारत में उसका संज्ञान लिया जा सकता है। षड्यंत्र स्वयमेव वह अपराध जिसे कारित करने का षड्यंत्र रचा गया है उससे भिन्न एक तात्विक अपराध है। जब तक यह षड्यंत्र कार्यान्वित नहीं हो जाता अथवा स्वेच्छा या आवश्यकतावश त्याग नहीं दिया जाता या असफल नहीं हो जाता यह एक निरन्तरित अपराध है। आगे यह भी अभिनिर्धारित किया गया कि यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक षड्यंत्रकारी को योजना के सभी बातों की पूर्ण जानकारी हो।

तमिलनाडु राज्य बनाम नलिनी8 के वाद में भारत के पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी की हत्या करने का षड्यंत्र रचा गया था। अभियुक्तों में से एक मुख्य अभियुक्त ने ऐच्छिक रूप से षड्यंत्र में उसकी प्रधान भूमिका का होना संस्वीकार किया था। संस्वीकृति की साक्षियों के साक्ष्य और महत्वपूर्ण अभिलेखों द्वारा चारपुष्ट होती थी। उच्चतम न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 और 120ख के अधीन उसका बापासाद्ध सही अभिनिर्धारित किया। दूसरा अभियुक्त जो मानव बम के प्रस्फोटन हेतु पावर बैटरी ले आया र यह जानता था कि उसका प्रयोग विस्फोट हेतु किया जायेगा. भी आपराधिक षड्यंत्र हेतु दोषी है। तु उन अभियुक्तों का जिनका उन कट्टर उग्रवादियों से जो हत्या के लिये जिम्मेदार थे मात्र से उन्हें दोषी नहीं बनाता है।

  1. (2008) 4 क्रि० लॉ ज० 3872 (सु० को०).
  2. 1993 क्रि० लों ज० 2516 (एस० सी०).
  3. 1999 क्रि० लाँ ज० 3124 (एस० सी०).

यायोचितता-षड्यंत्र सम्बन्धी विधि के समर्थन में अनेक तर्क प्रस्तुत किये गये हैं। इसके संबंध में सामान्य न्यायोचितता कि यह एक अपरिपक्व (inchoate) अपराध है, उसी प्रकार है जैसे कि अन्य अपरिपक्व अपराधों में। यह उन परिस्थितियों में जिनमें यह स्पष्ट है कि अपराध कारित करने का एक निश्चित आशय निरूपित हो चुका है, आशयित अपराधियों के विरुद्ध निवारक कार्यवाही को सुगम बनाती है। बहधा वे कार्य जिनसे षड्यंत्र का निष्कर्ष निकाला जाता है अपराध कारित करने के प्रयास को दर्शाते हैं, किन्त षड्यंत्र दर्शाने का लाभ यह है कि यह प्रयास के लिये आवश्यक समीपता (proximity) के दुष्कर तत्व को समाप्त कर देता है।

द्वितीयत: षड्यंत्र का समर्थन इस आधार पर भी किया गया है कि एक अवैध कार्य करने के लिये दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच सन्धि कार्य को गति प्रदान करती है जो संभावित प्रारम्भिक अवस्था में ही इसे दण्डित किये जाने को न्यायोचिंत ठहराती है।

यह समझना कठिन प्रतीत होता है, कि क्यों सिविल दोष कारित करने के षड्यंत्र को दण्डनीय बनाया जाना चाहिये, क्योंकि सिविल दोष, यदि यथार्थतः कारित किया गया है तो दण्डनीय नहीं होगा। इसके जवाब में दो तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं

(1) एक समुच्चय उसे उत्पीड़क या घातक बना सकता है जो कि यदि एक अकेले व्यक्ति द्वारा किया जाता तो अन्यथा होगा, और (2) समुच्चय से यह भी स्पष्ट हो सकता है कि इसका उद्देश्य मात्र एक व्यक्ति के वैध अधिकार के प्रयोग को अपहानि कारित करना है।

प्रथम तर्क यदा-कदा सत्य होता है, सदैव नहीं। बहुधा एक व्यक्ति उतनी ही अपहानि पहुँचा सकता है। जितना कि दो या तीन व्यक्ति तथा ऐसे अनेक घातक उद्देश्य हैं जो कई व्यक्तियों के संयोजित होने के बावजूद भी उद्देश्य पूर्ति के लिये एक व्यक्ति से अधिक सक्षम नहीं हो सकते। फलत: संख्याओं के तथ्य में निश्चयत: कोई असामाजिक महत्व नहीं है। कार्य या तो पर्याप्त हानिकारक माना जाता है जिससे वह एक अपराध बन जाता है या अपराध नहीं होता, और यदि अपराध नहीं है, तो इसे करने के लिये कोई संधि या सहमति क्यों आपराधिक मानी जाये।

दूसरे तर्क के बारे में यह कहना पर्याप्त होगा कि षड्यंत्र विद्वेष (Malice) का प्रमाण हो सकता है परन्तु इसका एकमात्र तथा पर्याप्त साक्ष्य नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त यह भी कि सभी विद्वेषपूर्ण आचरण आपराधिक नहीं है।

यह भी सुझाव दिया गया है कि गोपनीयता जिसके तहत सामान्यतया षड्यंत्रकारी कार्य करते हैं उन सामान्य सिद्धान्तों, जो कुछ पकड़े गये लोगों को लागू होते हैं, से विचलित होने के लिये एक दूसरा आधार है। इस स्पष्टीकरण अथवा स्पष्टीकरण के प्रयास का चाहे जो भी मूल्य हो किन्तु इस तर्क से सन्तुष्ट होना कठिन है। कि कोई कार्य जो मात्र अवैध है यदि एक व्यक्ति द्वारा किया जाता है तो अपराध नहीं है परन्तु यदि उसी अवैध कार्य को करने की सहमति एक से अधिक व्यक्ति द्वारा दी जाती है तो वह अपराध है। । ततीयत: वर्तमान विधि को कभी-कभी इस आधार पर समर्थन दिया जाता है कि परिस्थितियाँ अनगिनत हैं और पूर्वनिर्धारित विधियों में उन सभी बातों को सम्मिलित करना सम्भव नहीं है सामाजिक रूप से हानिकारक है। कुछ विद्वानों का विचार है कि आपराधिक षड्यंत्र सम्बन्धी विधि विस्तृत आपराधिक विधि की अतिवद्धि हैं। दोनों में पर्याप्त साम्यता है तथा एक ही सामान्य सिद्धान्त पर आधारित हैं। फिर भी दोनों एक नहीं है। एक व्यक्ति इसके बहुत पूर्व ही षड्यंत्र का दोषी बन सकता है जबकि उसका कार्य पूर्ण होने के करीब इतना घातक रूप में आ चुका है कि वह कारित करने का प्रयत्न किये गये अपराध के लिये आपराधिक रूप से दण्डनीय बन जाये।


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